देश की राजनीति में एक बार फिर विपक्षी एकजुटता चर्चा के केंद्र में है. बीते कुछ महीनों में राष्ट्रीय राजनीति के बदलते घटनाक्रम, क्षेत्रीय दलों की नई प्राथमिकताएं, दल बदल और चुनावी समीकरणों के बीच अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया विपक्षी दलों को फिर एक साझा मंच पर लाने का माध्यम बन सकता है?
INDIA ब्लॉक की 8 जून को 2 साल बाद 7वीं बैठक दिल्ली में हुई थी. इसमें 25 दलों के नेता शामिल हुए थे लोकसभा चुनाव-2024 के बाद विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ की सक्रियता पहले जैसी दिखाई नहीं दी. कई मुद्दों पर सहयोगी दलों के अलग-अलग रुख सामने आए और कई राज्यों में गठबंधन के घटक दल एक-दूसरे के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी नजर आए. ऐसे माहौल में SIR को लेकर बढ़ती राजनीतिक चर्चा को विपक्ष के भीतर नई ऊर्जा पैदा करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
आखिर SIR को लेकर चर्चा क्यों?
राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि किसी भी बड़े राष्ट्रीय मुद्दे पर विपक्षी दल यदि साझा रणनीति बनाते हैं तो इससे उनके बीच संवाद और समन्वय की नई शुरुआत हो सकती है. SIR को लेकर कई दलों द्वारा एक जैसी राजनीतिक प्रतिक्रिया सामने आने के बाद यह चर्चा तेज हुई कि क्या यह विपक्षी एकजुटता का नया आधार बन सकता है.
यही वजह रही कि SIR प्रक्रिया पर 23 विपक्षी दलों और निर्दलीय सांसद ने मंगलवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) को पत्र लिखा. पत्र में आरोप लगाया गया है कि SIR की प्रक्रिया मनमानी और लोकतंत्र विरोधी है, जिसका उद्देश्य मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाना है, जबकि लोकतंत्र का आधार सभी वयस्क नागरिकों को वोट का अधिकार देना है. पत्र पर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) समेत 23 विपक्षी दलों और निर्दलीय राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने एकजुट होकर हस्ताक्षर किए हैं.
विश्लेषकों का कहना है कि विपक्ष के लिए यह केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का भी सवाल है. संसद से लेकर राज्यों तक यदि साझा राजनीतिक संदेश जाता है तो उसका असर राष्ट्रीय विमर्श पर भी पड़ सकता है.
क्या पहले जैसी एकजुटता संभव है?
‘इंडिया’ गठबंधन का गठन राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता पक्ष के मुकाबले के उद्देश्य से किया गया था, लेकिन समय के साथ कई चुनौतियां सामने आईं. राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों ने सहयोगी दलों के रिश्तों को प्रभावित किया.
लोकसभा चुनाव से पहले 'इंडिया' गठबंधन की प्रमुख सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने सीटों में बटवारे से नाराज होकर अलग रास्ता अपनाया. पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में भी कमोबेश यही स्थिति रही लेकिन अब पार्टी पूरी तरह से टूट चुकी है. तृणमूल तीन हिस्सों में बंट चुकी है लेकिन SIR के राष्ट्रीय मुद्दे पर विपक्ष के साथ खड़ी है.
TMC सांसद सागरिका घोष ने कहा कि SIR के मुद्दे पर पूरा विपक्ष एकजुट है और ऐसा पहली बार हुआ है कि 23 विपक्षी दलों ने संयुक्त रूप से CJI को लेटर लिखकर न्यायपालिका से अपील की है कि SIR प्रक्रिया की जांच की जाए.
कुछ प्रमुख चुनौतियां—
राज्यों में क्षेत्रीय दलों के अलग हित
सीट बंटवारे को लेकर संभावित मतभेद
नेतृत्व का प्रश्न
साझा एजेंडा तय करने की चुनौती
स्थानीय बनाम राष्ट्रीय राजनीति का संतुलन
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि केवल साझा बयान या मंच तैयार करना पर्याप्त नहीं होगा. जमीनी स्तर पर राजनीतिक तालमेल ही किसी भी गठबंधन की वास्तविक परीक्षा होगी.
सत्ता पक्ष का संभावित राजनीतिक नैरेटिव
यदि विपक्ष SIR जैसे किसी मुद्दे पर एकजुटता दिखाता है तो सत्ता पक्ष इसे राजनीतिक अवसरवाद के तौर पर पेश कर सकता है. सत्ता पक्ष पहले भी विपक्षी गठबंधनों को चुनाव केंद्रित प्रयोग बताता रहा है. ऐसे में विपक्ष के सामने चुनौती केवल एकजुट होने की नहीं बल्कि यह साबित करने की भी होगी कि उसका एजेंडा दीर्घकालिक और स्पष्ट है.
आगामी संसद सत्र, राज्यों के चुनाव और राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दे यह तय करेंगे कि विपक्षी दलों की यह सक्रियता स्थायी राजनीतिक रणनीति बनती है या केवल सीमित समय का समन्वय साबित होती है. फिलहाल इतना स्पष्ट है कि राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष नए समीकरण तलाश रहा है और SIR को लेकर बढ़ी गतिविधियों ने राजनीतिक चर्चा को नया विषय जरूर दे दिया है.
वैसे राजनीति में स्थायी दोस्त और स्थायी विरोधी कम ही होते हैं, लेकिन परिस्थितियां नए गठबंधन और नए समीकरण जरूर बनाती हैं. अब नजर इस बात पर होगी कि SIR विपक्षी दलों को केवल चर्चा के स्तर पर जोड़ता है या वास्तव में ‘इंडिया’ गठबंधन को फिर से सक्रिय राजनीतिक मंच में बदलने का रास्ता बनता है.









