पश्चिम बंगाल में सत्ता की चौसर पर कड़ा मुकाबला, किसके नाम होगा बंगाल, 294 सीटों के महायुद्ध में क्या बदलेगा बंगाल का सियासी भविष्य?
Bengal Election: पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है. 294 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में मुकाबला सिर्फ सत्ता का नहीं, बल्कि विचारधारा, नेतृत्व और जमीनी पकड़ का भी है. एक ओर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस पार्टी की सुप्रीमो और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में TMC चौथी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है, तो भारतीय जनता पार्टी ‘परिवर्तन’ के नारे के साथ सत्ता परिवर्तन के लिए पूरी ताकत झोंक रही है.
294 सीटों का गणित
पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए 148 सीटों का बहुमत जरूरी है. तृणमूल कांग्रेस 2011 से लगातार सत्ता में है और जीत की हैट्रिक जमा चुकी है. ममता बनर्जी ने 2011 में पश्चिम बंगाल में 34 साल से शासन कर रहे वाम मोर्चा (Left Front – CPI(M)) को हराकर सत्ता हासिल की थी. TMC-कांग्रेस गठबंधन को 294 में से 227 से अधिक सीटें मिलीं.
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इस ऐतिहासिक जीत के साथ उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार को बेदखल कर पहली बार तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सरकार बनाई और लगातार 16 सालों से सत्ता की कुर्सी पर काबिज है. 2021 में बीजेपी ने टक्कर दी लेकिन ममता की पार्टी ने 200 से अधिक सीटें जीतकर बीजेपी को बैकफुट पर ला दिया. हालांकि बीजेपी एक मजबूत विपक्ष बनने में कामयाब होग या क्योंकि वाम दल और कांग्रेस गठबंधन कभी बंगाल की राजनीतिक धुरी हुआ करती थी, जो अब अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.
कल्याणकारी योजनाएं दीदी की बड़ी ताकत
सीएम की राजनीति का सबसे बड़ा आधार है महिला वोट, ग्रामीण समर्थन और कल्याणकारी योजनाएं. इन्हीं के दम पर ममता बीजेपी से ही नहीं, बल्कि केंद्र की मोदी सरकार को भी कड़ी टक्कर दे रही है. लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री जैसी योजनाएं, अल्पसंख्यक वोट बैंक पर मजबूत पकड़ और मजबूत संगठन के साथ बूथ स्तर तक नेटवर्क दीदी की ताकत को बढ़ाते हैं हालांकि शिक्षक भर्ती, कोयला, पशु तस्करी जैसे मुद्दों पर भ्रष्टाचार के आरोप, एंटी-इनकंबेंसी और पार्टी के अंदर गुटबाजी उनके सामने मुख्य चुनौतियां हैं.
बीजेपी का मिशन परिवर्तन
इधर बीजेपी बंगाल में अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए लगातार प्रयासरत है. कभी ममता के खास रहे सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता के बीच हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का एजेंडा बंगाल में ला रही है. उत्तर बंगाल और सीमावर्ती इलाकों में बीजेपी की मजबूत पकड़ है. हालांकि स्थानीय नेतृत्व का अभाव, टीएमसी के मुकाबले संगठनात्मक कमजोरी और ग्रामीण बंगाल में सीमित प्रभाव उनके रास्ते के सबसे बड़े कांटे हैं. गोरखा, राजवंशी और आदिवासी वोट बीजेपी के केंद्र बिंदु हैं लेकिन दलित एवं अल्प संख्यक वोट बैंक पर ममता की पकड़ है.
क्या कहते हैं आंकड़े
राजनीति रुझानों के मुताबिक ममता की चौथी बार पश्चिम बंगाल में सरकार बनते दिख रही है. हालांकि दीदी की पॉपुलर्टी कम हो सकती है. तृणमूल को 150–180 सीटों पर जीत हासिल हो रही है जबकि बीजेपी का लक्ष्य 100+ सीटें पार करने की कोशिश है. वाम-कांग्रेस 20–40 सीटों के बीच संघर्ष कर रही है.
निष्कर्ष: मुकाबला कांटे का
बंगाल की राजनीति में इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प और कड़ा है. वोटिंग 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में होगी. 4 मई को नतीजे आ जायेंगे. अगर ममता अपनी योजनाओं और संगठन के दम पर बढ़त बनाए रखती हैं, तो ‘चौका’ संभव है. दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी अगर ग्रामीण और महिला वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल होती है, तो ‘परिवर्तन’ का सपना भी हकीकत बन सकता है. अंततः फैसला बंगाल की जनता के हाथ में है कि वे निरंतरता को चुननते हैं या फिर बदलाव.
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