राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में फिर नया मोड़

राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति नया मोड़ लेगी. सचिन पायलट की सक्रियता से इसके आसार दिखने लगे हैं. अगर गहलोत गांधी परिवार के निकट हैं तो पायलट भी गांधी परिवार से दूर नहीं है. राजीव गांधी जयंती पर प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में हुए कार्यक्रम में संगठन के महत्व पर जोरदार तरीके से प्रकाश डालते हुए उन्होंने संकेत दे दिया था वह अब चुपचाप उप-मुख्यमंत्री बने नहीं रह सकते. शायद वह सोच रहे होंगे, गहलोत अकेले सरकार नहीं चलाएंगे, मैं भी कुछ न कुछ करूंगा.

सचिन पायलट बुधवार को अलवर जिले के झिवाणा पहुंच गए और हरीश जाटव, रतिराम जाटव के परिवार से मिले. हरीश जाटव की एक हादसे में मौत हो गई थी. उसके पिता रतिराम ने आरोप लगाया था कि हरीश की मौत भीड़ की पिटाई से हुई है. लेकिन पुलिस ने इस मामले को मॉब लिंचिंग नहीं माना ना ही आरोपियों के खिलाफ आज तक कुछ कर पाई है. पुलिस के इस रवैये से दुखी होकर रतिराम ने स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त को जहर खाकर आत्महत्या कर ली. इसके बाद यह मामला मीडिया की चर्चा में आया था. सचिन पायलट ने जाटव परिवार से मिलने के बाद घोषणा की कि यह घटना मॉब लिंचिंग है या नहीं, इसकी नए सिरे से जांच भिवाड़ी के नए एसपी डॉ. अमनदीप सिंह करेंगे.

इस दौरान पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने पहलू खां की मौत के मामले में गहलोत सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि पहलू खां मामले में यदि आठ माह पहले सरकार बनते ही एसआईटी का गठन कर जांच करवाई जाती तो अदालत का फैसला कुछ और होता. हालांकि अदालत के फैसले के बाद सरकार ने एसआईटी गठित कर दी है. अब कोई दोषी बच नहीं पाएगा. पायलट ने अलवर में बढ़ रही आपराधिक घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह सभी के लिए आत्मचिंतन का विषय है. कानून हर जाति, समुदाय के लिए बराबर है.

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रतिराम जाटव की मौत के बाद दलित समाज के लोगों और भाजपा नेताओं ने टपूकड़ा सीएचसी के सामने तीन दिन तक धरना दिया था. इसके बाद यह मामला मीडिया में उछला और भाजपा ने कांग्रेस पर तीखे हमले शुरू कर दिए थे. भाजपा का आरोप था कि कांग्रेस के नेता हरीश जाटव के परिवार से मिलने तक नहीं गए. सरकार सिर्फ पहलू खां मामले में ही जुटी है. इसके बाद सचिन पायलट कांग्रेस की तरफ से सबसे पहले झिवाणा पहुंचे और पीड़ित परिवार को ढाढ़स बंधाया.

पायलट के पहुंचते ही हरीश जाटव की पत्नी रेखा उनके पैरों से लिपट गई और न्याय की गुहार करने लगी. पायलट ने रेखा की चारों बेटियों के लालन-पालन, पढ़ाई और अन्य आर्थिक मदद के लिए सरकार से हर संभव सहायता दिलवाने की बात कही. हरीश के परिजनों ने पायलट से एफआईआर के आधार पर जांच कराने और दोषी पुलिस कर्मियों को हटाने की मांग की. पायलट ने आश्वासन दिया कि किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा. पायलट के साथ राज्य के श्रम मंत्री टीकाराम जूली, जिला कलेक्टर इंद्रजीत सिंह, अलवर एसपी परिघ देशमुख सहित कई अधिकारी और स्थानीय नेता मौजूद थे.

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इस बीच पुलिस ने रतिराम जाटव की पोस्टमार्टम रिपोर्ट जारी कर दी है, लेकिन उसमें मौत का कारण का खुलासा नहीं है. डॉक्टरों का कहना है कि फोरेंसिक जांच होने के बाद मौत के कारणों का खुलासा होगा. रतिराम की मौत 15 अगस्त की शाम को जहरीला पदार्थ खाने से हुई थी. इसके बाद दलित समाज के लोगों ने टपूकड़ा में धरना देते हुए शव लेने से इनकार कर दिया था. धरने को भाजपा का भी समर्थन था. तीन दिन बाद धरना खत्म होने के बाद रतिराम का मेडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम कराया गया था. अब एफएसएल से विसरा की रिपोर्ट का इंतजार है.

गहलोत सरकार को भारी पड़ेगा बिजली महंगी करने का फैसला

राजस्थान में गहलोत सरकार ने राज्य की मध्यमवर्गीय जनता पर बिजली की दरों का बोझ बढ़ाने का फैसला अगर कर ही लिया है तो उसे इसके राजनीतिक परिणामों का भी अनुमान कर लेना चाहिए. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को पूरी तरह बहुमत भी नहीं मिला था. किसी तरह उसकी सरकार बन गई है तो उसे जनता का समर्थन समाप्त करने वाले काम नहीं करने चाहिए. दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने मध्यम वर्ग को बिजली में राहत देकर प्रशंसनीय कार्य किया है, जिसका लाभ उसे दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिलेगा. ऐसे में पड़ौसी राज्य राजस्थान की गहलोत सरकार के बारे में जनता क्या सोचेगी?

राजस्थान में कोई भी सरकार रही हो, मध्यम वर्गीय जनता को महंगाई के भार से दबाने में उसने कोई कंजूसी नहीं की है. अन्य राज्यों की सरकारें राजस्थान सरकार से प्रेरणा ले सकती है कि आम लोगों की जेब से ज्यादा पैसा किस तरह निकाला जाए. यहां पहले बिजली वितरण का काम बिजली बोर्ड संभालता था. उसके बाद नई नीतियां बनीं. निजी कंपनियां बिजली उत्पादन करने लगीं तो बिजली वितरण का ढांचा भी सरकार को बदलना पड़ा. 2000 में राज्य में जयपुर, अजमेर और जोधपुर में तीन विद्युत वितरण निगम कंपनी की तर्ज पर बना दिए, जिन्हें डिस्कॉम कहा जाता है.

राजस्थान के तीनों डिस्कॉम की कार्यप्रणाली में राज्यहित कम, मुनाफाखोरी ज्यादा है. राजस्थान में 2000 में जो बिजली दरें थीं, उनमें डिस्कॉम 16 साल में 99 फीसदी बढ़ोतरी कर चुके हैं. शायद राज्य सरकार यह समझती है कि राजस्थान में कमाने खाने वाले लोग ज्यादा हैं, जीवन चलाने के लिए इतना अतिरिक्त पैसा तो जेब से निकाल ही सकते हैं. इस तरह सरकार खामोशी से आवाम की जरूरियात का फायदा उठाने पर तुली हुई है. शायद इसलिए कि विधानसभा चुनाव चार साल बाद होंगे.

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दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने मध्यमवर्गीय जनता का बोझ कम करने का सराहनीय प्रयास किया है, क्योंकि अगले साल ही दिल्ली विधानसभा चुनाव होंगे. पिछले विधानसभा चुनाव में केजरीवाल की पार्टी को छप्परफाड़ बहुमत मिला था, जिससे दिल्ली के पूरे राजनीतिक समीकरण बदल गए थे. राजस्थान में हालांकि कोई नई पार्टी नहीं है, लेकिन गहलोत सरकार से लोगों को उम्मीदें रहती हैं. लेकिन उनके सरकार चलाने में कुछ ऐसा होता है कि जनता उनसे नाराज हो जाती है और सरकार बदल देती है. गहलोत के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस ने दो बार विधानसभा चुनाव हारे. अब गहलोत तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं. लोगों ने उन पर फिर से भरोसा किया है. उनकी सरकार ने काम संभालते ही सबसे पहले पेट्रोल-डीजल महंगा किया, और अब विधानसभा का पहला सत्र संपन्न होने के बाद बिजली महंगी होने की चर्चा जोर पकड़ रही है.

केजरीवाल सरकार ने इस बात को समझा कि मध्यमवर्गीय लोगों के लिए बिजली कितनी जरूरी है. पिछले साल उनकी सरकार ने बिजली की दरें बढ़ाई थी. जनता की परेशानियों को देखते हुए अब उन्होंने एक झटके में बिजली के बिलों में बड़ी राहत देते हुए दिल्ली के मध्यमवर्गीय परिवारों का दिल जीत लिया है. गहलोत के बारे में लोग क्या सोचेंगे? आजकल मध्यमवर्गीय परिवारों का जीवन बिजली से ही चलता है. ईंधन उपलब्ध नहीं होने पर हीटर विकल्प होता है. पंखा, टीवी, लाइटें, फ्रीज जैसे सामान हर घर में देखे जा सकते हैं. इन सबके लिए बिजली जरूरी है. बिजली महंगी होने से अनिवार्य रूप से आर्थिक बार बढ़ जाता है.

दिल्ली के डिस्कॉम ने दो किलोवाट तक बिजली की दरें 125 रुपए से घटाकर 20 रुपए प्रति किलोवाट कर दी है. 1200 यूनिट से ज्यादा खपत होने पर दरें प्रति यूनिट चार आने बढ़ाकर 7.75 से बढ़ाकर आठ रुपए प्रति यूनिट कर दी है, जिससे संपन्न लोगों पर ही थोड़ा भार बढ़ेगा, जो ज्यादा बिजली खर्च करते हैं. दो से पांच किलोवाट की खपत पर बिजली शुल्क 140 से घटाकर 50 रुपए प्रति यूनिट कर दिया गया है. पांच से 15 किलोवाट के कनेक्शन पर प्रति किलोवाट शुल्क 175 से घटाकर सौ रुपए कर दिया है. 15 से 25 किलोवाट के लिए कोई बदलाव नहीं है.

दिल्ली में चलने वाले ई-रिक्शा और विद्युत वाहनों को चार्ज करने के लिए स्टेशनों पर भी बिजली की दरें घटा दी गई हैं. एलटी लेवल पर चार्ज 5.5 से घटाकर 4.5 रुपए यूनिट और एचटी लेवल पर चार्ज पांच से घटाकर चार रुपए कर दिया गया है. दिल्ली में बिजली की ये दरें एक अगस्त से लागू हो गई हैं. इधर राजस्थान में लोग यह सोचने पर मजबूर हैं कि बिजली की खपत कैसे कम करें, क्योंकि वह जीवन चलाने के लिए जरूरी है. राजस्थान के तीनों डिस्कॉम के अधिकारियों को दिल्ली विद्युत नियामक आयोग (डीईआरसी) के प्रमुख आरएस चौहान से प्रेरणा लेनी चाहिए और संभव हो सके उनसे मिलकर यह सीखना चाहिए कि लोगों पर बिजली की दरों का भार कम कैसे किया जा सकता है.

आजकल की राजनीति मध्यमवर्गीय लोगों की भावना से चलती है. दिल्ली के लोगों के मन में केजरीवाल बैठ चुके हैं. राजस्थान के लोगों को अब तक ऐसा कोई नेता नहीं मिला, जो उनके मन में सम्मानजनक जगह बना सके. पद का सम्मान होता है. पद पर बैठे व्यक्ति का बाद में भी उसी के अनुरूप सम्मान हो तो बात बनती है. गहलोत को राजस्थान के कई लोग पसंद करते हैं. उनकी सरकार के महंगाई बढ़ाने वाले फैसलों से उन्हें नापसंद करने वालों की तादाद बढ़ेगी. महंगाई के जमाने में आर्थिक राहत बहुत बड़ी बात होती है. विधानसभा में गहलोत सरकार ने मंत्रियों, विधायकों के वेतन-भत्ते तुरत-फुरत बढ़वा लिए. राजस्थान की आम जनता ने क्या गुनाह किया है?

बहरहाल बिजली की दरें बढ़ाने का फैसला गहलोत पर बहुत भारी पड़ने वाला है. इससे गहलोत सरकार के खिलाफ जनभावना बनेगी और कांग्रेस में पहले से ही दो गुट बने हुए हैं. सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री पद संभाले हुए हैं. जनता में सरकार का विरोध बढ़ने पर नेतृत्व परिवर्तन से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

मध्यमवर्गीय लोग जैसे तैसे जीवन यापन कर रहे हैं. बाजार में भयंकर मंदी की आहट है. आमदनी और खर्च का संतुलन बिगड़ रहा है. ऐसे में बिजली जैसे जरूरी साधन का महंगा होना किसे पसंद आएगा? सरकार कितने ही तर्क दे कि ऐसा है, वैसा है, इसलिए जरूरी है, लेकिन वह लोगों के गले उतरने वाला नहीं है. सरकार अपना राजस्व बढ़ाने के लिए बिजली, पानी, ईंधन को महंगा करने के अलावा और कोई भी उपाय कर सकती है. लोगों को जबरन परेशान करने में सरकार का क्या लाभ है?

मध्यप्रदेश में भाजपा के सहयोग से ज्योतिरादित्य सिंधिया बन सकते हैं मुख्यमंत्री!

Jyotiaditya Sindhiya

भाजपा सुप्रीमो अमित शाह की नजर अब मध्य प्रदेश पर है. उधर शिवराज सिंह चौहान निर्दलीय विधायकों के साथ संपर्क बनाए हुए हैं. कमलनाथ सरकार को बमुश्किल बहुमत मिला हुआ है, इसलिए उनकी चिंताएं बढ़ गई हैं. भाजपा से ही नहीं उन्हें पार्टी के भीतर से भी चुनौती है. ज्योतिरादित्य खेमा उपेक्षा से दुखी है और हाईकमान से लगातार शिकायत कर रहा है. हाल ही में जब ज्योतिरादित्य के समर्थक उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए दबाव बढ़ा रहे थे तब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य का नाम लिए बगैर उनके बारे में कोई टिप्पणी कर दी थी, जिसकी शिकायत राहुल गांधी से की गई है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक लगातार बैठकें कर रहे हैं. हाल ही में ज्योतिरादित्य ने दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात भी की थी. इसके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि ज्योतिरादित्य को मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बनाने के लिए अमित शाह सहयोग कर सकते हैं. वहीं सिंधिया की दूरभाष पर भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से हुई लम्बी वार्ता भी इस बात को हवा दे रही है.

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इस घटनाक्रम से लगता है कि मध्य प्रदेश में सबकुछ ठीक नहीं है. ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थन में अगर ज्यादा विधायक जुट गए, तो वे कभी भी नेतृत्व परिवर्तन का दबाव बना सकते हैं और कमलनाथ सरकार संकट में आ सकती है. सिंधिया समर्थक मंत्री लगातार विधायकों से संपर्क बनाए हुए हैं. प्रद्युम्न सिंह तोमर का चंबल के, गोविंद सिंह राजपूत का बुंदेलखंड से और तुलसी सिलावट का मालवा के विधायकों से संपर्क बना हुआ है. इनका दावा है कि करीब 60 विधायक उनके साथ हैं. कांग्रेस में अपनी लगातार उपेक्षा से ज्योतिरादित्य भी दुखी हैं. उनके पिता माधवराव सिंधिया भी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बनते बनते रह गए थे. ज्योतिरादित्य उस इतिहास को दोहराना नहीं चाहते, इसलिए उनकी सक्रियता बढ़ गई है. सिंधिया समर्थकों का भोपाल आना-जाना बढ़ गया है.

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गौरतलब है कि ज्योतिरादित्य के प्रति भाजपा का रवैया हमेशा से ही नरम रहा है. चुनाव प्रचार के दौरान भी भाजपा की तरफ से ज्योतिरादित्य के खिलाफ बयानबाजी नहीं हुई. ज्योतिरादित्य भी भाजपा के खिलाफ कड़े शब्दों के इस्तेमाल से बचते रहे हैं. ज्योतिरादित्य का नाम कांग्रेस अध्यक्ष की दौड़ में भी शामिल था. अगर वे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए होते तो भाजपा को इससे असुविधा होती.

लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित साह ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके परिवार पर तीखा हमला बोला था. लेकिन अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस अध्यक्ष बन जाते तो भाजपा उन पर या उनके परिवार पर सीधा हमला नहीं कर पाती, क्योंकि उनकी दादी राजमाता सिंधिया भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल रही हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया की बुआ यशोधरा राजे और वसुंधरा राजे भाजपा में हैं. वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और फिलहाल भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं. यशोधरा राजे मप्र सरकार में मंत्री रह चुकी हैं और फिलहाल शिवपुरी से भाजपा विधायक हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया हमेशा विवादों से दूर रहते हैं. उनका ऐसा कोई बयान अब तक सामने नहीं आया है, जिसके आधार पर भाजपा को आलोचना का मौका मिले. उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का भी कोई मामला नहीं है. ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ बोलने से भाजपा के बड़े नेता भी बचते हैं. मध्य प्रदेश में प्रभात झा और जयभान सिंह पवैया के अलावा कोई भी नेता सिंधिया पर सीधा हमला नहीं करता है. विधानसभा चुनाव के दौरान अमित शाह ने ग्वालियर में सभा की थी लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया पर हमला बोलने की बजाए उन्होंने अपनी रैली में सिंधिया को श्रीमंत कहकर संबोधित किया था.

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ज्योतिरादित्य सिंधिया के दूसरी पार्टी के नेताओं से भी रिश्ते अच्छे हैं. हाल ही में भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने बयान दिया था कि ज्योदिरादित्य सिंधिया अगर कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते हैं तो यह गौरव की बात होगी. कैलाश विजयवर्गीय 29 जुलाई को मप्र के नए राज्यपाल लालजी टंडन से मिलने पहुंचे थे. उसके बाद भाजपा कार्यालय में उन्होंने पत्रकारों से बात की. पत्रकारों ने उनसे सिंधिया के अध्यक्ष बनने की संभावना पर सवाल किया था. उन्होंने कहा, मेरी शुभकामनाएं सिंधियाजी को कि वे राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें. यह मध्यप्रदेश के लिए गौरव की बात होगी.

सोशल मीडिया में राहुल गांधी को ट्रोल किया जाता है, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया को नहीं. ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी रैलियों में संतुलित भाषण देते हैं. ऐसे में अगर सिंधिया कांग्रेस अध्यक्ष बन जाते तो सोशल मीडिया के माध्यम से भाजपा को कोई विशेष फायदा नहीं होता जैसा सोशल मीडिया का फायदा बीजेपी गांधी परिवार के खिलाफ लेती है.

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इसके अलावा ज्योतिरादित्य सिंधिया युवाओं की पसंद हैं. जानकारों का कहना है कि अगर इस समय कांग्रेस में कोई नेता है जो पीएम मोदी की लोकप्रियता को टक्कर दे सकता है तो वह केवल ज्योतिरादित्य सिंधिया ही हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया की आक्रामक शैली युवाओं की पसंद बनती जा रही है. सिंधिया अपने भाषणों में आक्रमक नजर आते हैं, लेकिन सिंधिया अपनी चुनावी रैलियों में कभी भी अपनी बुआ वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे पर हमला नहीं करते हैं. ऐसे में कभी कांग्रेस में सिंधिया के लिए मुश्किलें भी खड़ी हो सकती हैं.

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश में भाजपा आज भी विजयाराजे सिंधिया के नाम पर सियासत करती है. अगर सिंधिया कांग्रेस अध्यक्ष बनते तो भाजपा को मध्यप्रदेश में सिंधिया के खिलाफ रणनीति बनाने में मशक्कत करनी पड़ती. लोकसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान के अलावा भाजपा का कोई भी बड़ा नेता गुना-शिवपुरी प्रचार के लिए नहीं पहुंचा था.

सोनिया गांधी के दुबारा कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष चुने जाने के कुछ दिनों पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राजधानी भोपाल का दौरा किया था. इस दौरान उन्होंने कहा था- पार्टी के लिए अभी कठिन हालात हैं. अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफ़े के बाद कांग्रेस में संकट की घड़ी है. कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की मांग पर सिंधिया ने कहा कि अभी हमें कांग्रेस को मजबूत करने की जरूरत है. इस वक्त पार्टी को एक ऊर्जावान नेतृत्व की जरूरत है. सिंधिया ने कहा- राहुल जी ने जो रास्ता दिखाया है, मेरी विचारधारा है कि सभी कांग्रेसी कार्यकर्ता उसी रास्ते पर चल कर पार्टी को फिर से मजबूत करें.

देवड़ा ने सुझाए पायलट और सिंधिया के नाम, प्रियंका की संभावना से किया इनकार

पिछले लगभग 2 माह से नेतृत्वहीन चल रही कांग्रेस पार्टी को आगामी 10 अगस्त को होने वाली कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अपना नेता मिलने की सम्भावना प्रबल हो गई है. लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था, तब से ही कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद को लेकर माथापच्ची जारी है. पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल द्वारा आगामी 10 अगस्त को कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक की जानकारी दिए जाने के साथ ही कांग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने पार्टी अध्यक्ष के लिए सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया के नामों का प्रस्ताव दिया है. देवड़ा … Read more

चौथी बार सीएम बने येदियुरप्पा ने एक बार भी पूरा नहीं किया पांच साल का कार्यकाल

कर्नाटक के मांड्या जिले के बुकानाकेरे में सिद्धलिंगप्पा और पुत्तथयम्मा के घर 27 फरवरी 1943 को जन्मे बीएस येदियुरप्पा ने मात्र 300 रुपए की नौकरी से अपने कैरियर की शुरुआत की थी. येदियुरप्‍पा काफी साधारण परिवार से थे. शुरूआती जिंदगी में संघर्ष करने वाले येदियुरप्‍पा ने एक चावल मील में क्लर्क की नौकरी से अपने जीवन की शुरूआत की. क्‍लर्क की नौकरी और 300 रुपए प्रतिमाह की तनख्‍वाह पाने वाले येदियुरप्‍पा और उनके परिवार का जीवन काफी मुकिश्‍लों से कटता था. लेकिन येदियुरप्पा की जिंदगी बदली और जिस कंपनी में क्‍लर्क थे उसी कंपनी की मालिक की बेटी से उनकी शादी हो गई. जब येदियुरप्‍पा ने राजनीति में एंट्री की … Read more

अमित शाह के निर्देशों के विपरीत येदियुरप्पा लेंगे शपथ

गुरुवार को दिल्ली में हुई पार्टी अध्य्क्ष अमित शाह और कर्नाटक के नेताओं की मुलाकात के बाद खबरें आई कि अमित शाह ने कर्नाटक के बीजेपी नेताओं को साफ-साफ निर्देश दिए हैं कि जल्दबाजी करने की जरुरत नहीं है, बागी विधायकों पर विधानसभा अध्यक्ष के फैसले का इंतजार करना चाहिए. लेकिन पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के निर्देशों के 24 घण्टे के भीतर ही कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा का पार्टी हाइकमान की मंजूरी के बिना राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करना हैरान करता है. शुक्रवार को बीएस येदियुरप्पा ने सुबह 10 बजे राज्यपाल वजुभाई वाला पटेल से मुलाकात कर सरकार बनाने का दावा पेश किया. येदियुरप्पा शुक्रवार शाम … Read more

आरटीआई संशोधन विधेयक के बाद अब तीन तलाक बिल भी होगा पारित!

संसद में गुरुवार का दिन केन्द्र सरकार के लिए बड़ी सफलता वाला रहा. एक तरफ जहां सरकार ने लोकसभा में तीन तलाक बिल 82 वोट के बदले 303 वोट से पारित करवा लिया, तो वहीं राज्यसभा में सरकार ने विपक्षी एकजुटता का तानाबाना तोड़ते हुए सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक बिल पारित करवा लिया. राज्यसभा में गुरुवार को सरकार ने एक बड़ी सफलता हासिल की. राज्यसभा में संख्या बल की कमी से परेशान रहने वाली मोदी सरकार ने सूचना का अधिकार संशोधन बिल पारित करवा लिया. बिल के समर्थन में 117 वोट पड़े जबकि इसके विरोध में सिर्फ 75 वोट पड़े. कांग्रेस समेत कई विरोधी पार्टियों ने इस बिल का … Read more

राजस्थान में बुरी तरह उलझ रहे अशोक गहलोत और सचिन पायलट

राजस्थान के राजनीतिक हालात विकट हैं. यहां भले ही किसी भी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार रही हो लेकिन स्थानीय नेताओं की आपसी खींचतान, प्रदेश इकाई और दिल्ली स्थित हाईकमान की खींचतान के चलते राज्य का विकास उस तरह कभी नहीं हो पाया, जैसा होना चाहिए. पिछली वसुंधरा राजे सरकार का पूरे पांच साल का कार्यकाल भी इसी आपसी खींचतान के नाम रहा और जिसके चलते प्रदेश में विकास उस स्तर से नहीं हुआ जैसा कि राजे की प्रथम सरकार के समय हुआ था.

फिलहाल राज्य में कांग्रेस की सरकार है लेकिन पार्टी में आपसी खींचतान अपने चरम पर है. प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट बुरी तरह उलझ रहे हैं. एक तरफ गहलोत कई बार यह दावा कर चुके हैं कि प्रदेश की जनता ने उनमें भरोसा जताया है, इसीलिए वह तीसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं. हाल ही में राज्य का बजट पेश करने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में भी उन्होंने कहा कि विधानसभा चुनाव से पहले गांव-ढाणियों से आवाज आ रही थी कि मैं ही सीएम बनूं.

अशोक गहलोत ने दावा किया कि विधानसभा चुनाव में लोगों ने उनके नाम पर वोट दिए हैं. उनको मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट दिए हैं. इसलिए कांग्रेस पार्टी ने उनको मुख्यमंत्री बनाया है. किसी और के नाम पर वोट नहीं मिले हैं. जो मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में भी नहीं थे, वह भी अपना नाम आगे ला रहे हैं. गहलोत ने बहुत सधी हुई भाषा में, नपे-तुले अंदाज में यह बात कहते हुए पायलट को इशारा कर दिया कि वह मुख्यमंत्री बनने का मंसूबा न पालें. साथ ही हाईकमान को भी समझा दिया कि राजस्थान का नेता मैं ही हूं. इस पर सचिन पायलट ने भी पलटवार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

सचिन पायलट ने भी उसी दिन प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बजट के बहाने अलग से प्रेस कांफ्रेंस की और पत्रकारों द्वारा सवाल नहीं पूछे जाने के बाद भी अपनी तरफ से ही दावा किया कि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार कार्यकर्ताओं की मेहनत का नतीजा है. पायलट को लगता है कि उन्होंने पांच साल तक मेहनत करके 21 विधायकों वाली पार्टी को बहुमत की सरकार बनाने वाली पार्टी बनाया और जब मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो अशोक गहलोत आगे आ गए.

लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पार्टी की हार के बाद पायलट को उम्मीद थी कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उनको मौका दे सकते हैं, लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा है. इससे पायलट की बेसब्री बढ़ रही है. इसी के चलते पत्रकारों ने कोई सवाल नहीं पूछा, फिर भी उन्होंने अपने मन की बात जाहिर कर दी. उन्होंने कहा कि राजस्थान में सरकार कार्यकर्ताओं की मेहनत से बनी है, राहुल गांधी के नाम पर बनी है, किसी और के नाम पर नहीं बनी है.

पायलट ने बजट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी, लेकिन किसी ने भी गहलोत के बयान पर प्रतिक्रिया नहीं मांगी. तब अपनी बात कहने के लिए पायलट ने पत्रकारों को उलाहना दिया कि आपको सवाल पूछना नहीं आता. आप लोग कठिन सवाल नहीं पूछते. इसके बाद खुद ही उन्होंने अपनी बात कह दी. इस घटनाक्रम से समझा जा सकता है कि राजस्थान में गहलोत और पायलट की खींचतान कहां तक पहुंची हुई है. अगर इस मुद्दे का जल्दी ही कोई समाधान नहीं निकाला गया तो गहलोत सरकार कहां तक चल पाएगी?

गौरतलब है कि राजस्थान में राजनीति इसी तरह चलती है, जिसमें राज्य का विकास अवरुद्ध बना रहता है. गहलोत से पहले वसुंधरा राजे की भाजपा सरकार थी. वसुंधरा राजे भारी बहुमत से चुनी गई सरकार की मुख्यमंत्री थीं, लेकिन भीतरी खींतचान वहां भी कम नहीं थी. समय-समय पर खबरें आती रहती कि भाजपा हाईकमान वसुंधरा राजे से संतुष्ट नहीं है और कभी भी नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है. इन खबरों के बीच वसुंधरा राजे की सरकार ठीक से नहीं चल पाती थी. अब यही उदाहरण गहलोत सरकार में भी देखा जा सकता है. राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर सचिन पायलट नजरें गड़ाए हुए हैं. गहलोत खुद के अलावा और किसी को नेता मानने को तैयार नहीं हैं. यह सिलसिला कब तक चलेगा?

नेताओं की आपसी राजनीति की इस चक्की में राजस्थान की जनता पिस रही है और प्रदेश अपने विकास से पिछड़ रहा है. उम्मीद की जाती है कि आपसी खींचतान का यह सिलसिला जल्द थमे और प्रदेश में विकास की रफ्तार आगे बढे.