राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत के विजयादशमी संबोधन के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है. बांग्लादेश, नेपाल और फ्रांस के घटनाक्रमों का जिक्र करते हुए भागवत ने भारत में आंदोलनों के पीछे बाहरी शक्तियों की भूमिका को लेकर चिंता जताई थी. अब कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रमुख अभिजीत दीपके ने इस बयान पर पलटवार करते हुए भारतीय आंदोलनों की तुलना विदेशों में हुए हिंसक प्रदर्शनों और सत्ता परिवर्तन की घटनाओं से करने पर आपत्ति जताई है.
यह भी पढ़ें: 'भारत में न पहले हुआ, न कभी होगा', रिजीम चेंज की कोशिशों पर मोहन भागवत का बड़ा बयान
दीपके ने अपने वीडियो बयान में कहा कि उनके आंदोलन को नेपाल और बांग्लादेश में हुए घटनाक्रमों के साथ जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने दावा किया कि उनका आंदोलन हिंसा के बजाय शांति और अहिंसा के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है. इस बयान के बाद आंदोलन के स्वरूप, लोकतांत्रिक विरोध और राजनीतिक विचारों को लेकर बहस तेज होने की संभावना है.
गांधीवादी सत्याग्रह का दिया हवाला
अभिजीत दीपके ने अपने बयान में CJP के जेल में बंद कार्यकर्ताओं सौरव दास और आशुतोष रांका का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि दोनों कार्यकर्ता गिरफ्तारी के बाद शांतिपूर्वक जेल गए और उन्होंने अपने विरोध को हिंसक रूप नहीं लेने दिया. दीपके के मुताबिक, दोनों का यह व्यवहार गांधीवादी सत्याग्रह की भावना को दर्शाता है. उन्होंने अपने समर्थकों से भी शांति बनाए रखने की अपील की और कहा कि आंदोलन के दौरान गुस्से तथा नफरत को हावी नहीं होने देना चाहिए.
उन्होंने विश्वास जताया कि जेल से बाहर आने के बाद भी दोनों कार्यकर्ता शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलते रहेंगे. उनके बयान का मुख्य संदेश यही रहा कि किसी आंदोलन का आकलन उसके तरीके और उद्देश्यों के आधार पर होना चाहिए.
नेपाल-बांग्लादेश से तुलना पर जताई आपत्ति
मोहन भागवत ने विजयादशमी संबोधन में बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस और अल्बानिया के घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा था कि कुछ शक्तियां सत्ता परिवर्तन के जरिए अपने हित साधने की कोशिश करती हैं. उन्होंने भारत में भी ऐसे प्रयासों को लेकर सतर्क रहने की बात कही थी. इसी संदर्भ में दीपके ने कहा कि भारत में चल रहे उनके आंदोलन की तुलना विदेशों में हुए हिंसक प्रदर्शनों से करना उचित नहीं है. उन्होंने फ्रांस में हुए युवा प्रदर्शनों और नेपाल-बांग्लादेश के सत्ता परिवर्तन से जुड़े घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए अपने आंदोलन को शांतिपूर्ण बताया.
दीपके ने अपने बयान में कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि उनके आंदोलन को समझने के लिए उसके वास्तविक स्वरूप पर ध्यान देना चाहिए. हालांकि, भागवत की टिप्पणियों का व्यापक संदर्भ विभिन्न देशों में आंदोलनों और बाहरी प्रभावों को लेकर उनकी चिंता थी, जबकि दीपके का जवाब अपने आंदोलन की प्रकृति और तरीकों पर केंद्रित रहा.
सौरव दास और आशुतोष रांका की गिरफ्तारी का मामला
CJP प्रमुख ने अपने दोनों कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और न्यायिक हिरासत का भी उल्लेख किया. उपलब्ध विवरण के मुताबिक, सौरव दास और आशुतोष रांका को 12 अक्टूबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर बिना अनुमति जाने के मामले में गिरफ्तार किया गया था. गिरफ्तारी के बाद दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया. इसके बाद उनकी न्यायिक हिरासत को 21 अक्टूबर तक बढ़ाए जाने की जानकारी दी गई है.
आंदोलन, अहिंसा और लोकतांत्रिक विरोध पर नई बहस
भागवत और दीपके के बयानों के बीच मूल अंतर आंदोलनों की प्रकृति और उनके संभावित प्रभाव को लेकर है. भागवत ने आंदोलनों के राजनीतिक इस्तेमाल और बाहरी शक्तियों के प्रभाव पर चिंता जताई, जबकि दीपके ने अपने आंदोलन को शांतिपूर्ण और गांधीवादी परंपरा से जुड़ा बताया. फिलहाल, दीपके के पलटवार ने इस बहस को नया आयाम दे दिया है.












