कांग्रेस से बीजेपी तक का सफर, रणनीति और नेतृत्व के दम पर असम की राजनीति में बनाई अलग पहचान
असम विधानसभा चुनाव के बीच सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी नेता की है, तो वह हैं मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा. बीजेपी उनके नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की उम्मीद कर रही है. बीते कुछ वर्षों में हिमंत का कद न सिर्फ असम बल्कि पूरे पूर्वोत्तर की राजनीति में काफी बढ़ा है. 1 फरवरी 1969 को असम के जोरहाट में जन्मे हिमंत का शुरुआती जीवन शिक्षा और छात्र राजनीति से जुड़ा रहा. गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वे छात्र संगठन से जुड़े और यहीं से उनकी राजनीतिक समझ विकसित हुई. कॉलेज पॉलिटिक्स में सक्रिय रहते हुए उन्होंने असम आंदोलन से जुड़े नेताओं के साथ काम किया, जिसने उनके सियासी करियर की नींव रखी.
मुख्यधारा की राजनीति में उनका पहला कदम 1996 के विधानसभा चुनाव से पड़ा, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा. हालांकि, उन्होंने हार नहीं मानी और 2001 में कांग्रेस के टिकट पर जालुकबाड़ी सीट से जीत दर्ज कर पहली बार विधायक बने. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. CM तरुण गोगोई के नेतृत्व में वे तेजी से उभरे और राज्य सरकार में अहम मंत्री बने. स्वास्थ्य, शिक्षा और वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभालते हुए उन्होंने कई बड़े फैसले लिए, जिनमें मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और शिक्षा सुधार शामिल हैं.
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2011 के चुनाव में कांग्रेस की जीत के पीछे भी उनकी रणनीति को अहम माना गया. लेकिन समय के साथ उनके और तत्कालीन मुख्यमंत्री के बीच मतभेद बढ़ते गए, जो 2014 के बाद खुलकर सामने आए. नेतृत्व को लेकर खींचतान के बीच हिमंत ने बड़ा फैसला लेते हुए 2015 में कांग्रेस छोड़ दी.
इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया. बीजेपी में शामिल होने के बाद उनकी राजनीतिक भूमिका और भी मजबूत होती गई. 2016 के असम चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद वे सरकार में मंत्री बने और उन्हें वित्त, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे अहम विभाग मिले.
इतना ही नहीं, उन्हें नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) का संयोजक बनाया गया, जहां उन्होंने पूर्वोत्तर राज्यों में बीजेपी की पकड़ मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा जैसे राज्यों में पार्टी के विस्तार का श्रेय भी काफी हद तक उनकी रणनीति को दिया जाता है.
2021 में जब बीजेपी ने असम में लगातार दूसरी बार सरकार बनाई, तब हिमंत को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई. इसके बाद से वे राज्य की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल हो गए. अब 2026 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर हिमंत केंद्र में हैं. वे जलुकबाड़ी सीट से मैदान में हैं और बीजेपी उनके नेतृत्व में जीत की हैट्रिक की उम्मीद कर रही है. वहीं कांग्रेस ने युवा नेता गौरव गोगोई को आगे कर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है.
ऐसे में देखना होगा कि क्या हिमंत बिस्वा सरमा अपनी राजनीतिक रणनीति और नेतृत्व के दम पर जीत की हैट्रिक लगा पाते हैं या इस बार असम की सियासत नया मोड़ लेती है.










