एक मार्च को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का जन्मदिवस, राज्य के इतिहास में सबसे अधिक समय तक रहने वाले सीएम, गांधीवादिता में रखते हैं विश्वास
जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के मुखिया और बिहार के ‘सुशासन बाबू’ के नाम से पहचाने जाने वाले राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज 75 साल के हो गए हैं. उनकी ‘डायमंड जुबली’ के मौके पर पूरे राज्य में जश्न मनाया जा रहा है. 2005 में बिहार की सत्ता से लालू राज खत्म करने के बाद नीतीश ने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा और लगातार दो दशकों से बिहार की कुर्सी पर आसीन हैं. नीतीश ने 2005 से 2014 तक प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी सेवाएं दी. हालांकि थोड़े समय के लिए जीतनराम मांझी (2014-15) जदयू की ओर से सत्तारूढ़ जरूर हुए थे लेकिन राज तभी भी नीतीश का ही था. उसके बाद उन्होंने राजद के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा और एक बार फिर मुख्यमंत्री बन गए. 2017 में मनमुटाव के चलते पद से इस्तीफा दिया और कुछ ही घंटों के भीतर एनडीए से हाथ मिलकर फिर से राज्य के मुख्यमंत्री बन गए. नीतीश ने 2025 में 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. वे बिहार के सबसे लंबे समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री हैं.
हरनौत (कल्याण बिगहा) नालन्दा में जन्मे नीतीश कुमार एक स्वतंत्रता सेनानी के सुपुत्र हैं. 1972 में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब एनआईटी पटना) से विद्युत इंजीनियरिंग में डिग्री लेकर बिहार बिजली बोर्ड में शामिल हुए, लेकिन उनका मन गांधीवादिता में रमा रहा. उस समय के महान समाजसेवी एवं राजनेता सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के काफी करीबी होने का लाभ लेकर 1975 में पहली बार बिहार विधानसभा के लिए चुने गये थे. यहीं से उनकी राजनीति पारी शुरू हो गयी.
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1999 के लोकसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) को भाजपा + जद(यू) गठबंधन के हाथों झटका लगा. नया गठबंधन 324 विधानसभा क्षेत्रों में से 199 पर आगे चलकर उभरा और यह व्यापक रूप से माना जाता था कि बिहार राज्य विधानसभा के आगामी चुनाव में लालू-राबड़ी शासन समाप्त हो जाएगा. राजद ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था, लेकिन गठबंधन ने कांग्रेस के राज्य नेतृत्व को यह विश्वास दिलाने का काम नहीं किया कि चारा घोटाले में लालू प्रसाद का नाम आने के बाद उनकी छवि खराब हो गई थी. नतीजतन, कांग्रेस ने 2000 के विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का फैसला किया.
हालांकि मनमुटाव और सीएम फेस की लड़ाई के चलते बीजेपी और जदयू ने भी अलग अलग चुनाव लड़ा. राजद यादव + मुस्लिम रणनीति साधते हुए सबसे बड़ी पार्टी बनी और नीतीश पहली बार प्रदेश के सीएम लेकिन बहुमत के अभाव में उन्हें 7 दिनों के भीतर ही इस्तीफा देना पड़ा. लालू यादव के राजनीतिक पैंतरेबाज़ी से राबड़ी देवी ने फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
सन 2000 में वे फिर से केन्द्रीय मंत्रीमंडल में कृषि मंत्री और 2001 से 2004 तक बाजपेयी सरकार में केन्द्रीय रेलमंत्री रहे. 2005 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने बाढ़ एवं नालंदा से अपना पर्चा दाखिल किया लेकिन वे बाढ़ की सीट हार गये. केंद्र की सत्ता पलट के बाद उन्होंने फिर से बिहार की राजनीति पर ध्यान दिया और 2005 में बीजेपी के सहयोग से सीएम का ताज पहना. उसके बाद से अब तक बिहार की सत्ता उनकी पकड़ से बाहर नहीं गयी.
नीतीश कुमार की खास बात ये भी है कि उन्होंने 2004 के बाद कभी किसी भी सदन यानी न तो लोकसभा और न ही विधानसभा का चुनाव लड़ा. वे विधान परिषद के जरिए सदन में बने रहे. विपक्ष उन्हें हमेशा चुनावी अखाड़े में उतरने की चुनौती पेश कर चुके हैं लेकिन अपने चित्त परिचित अंदाज में हमेशा उन्होंने सभी को अनसुना किया. चूंकि अब नीतीश 75 सावन पार पार कर चुके हैं. ऐसे में उन्हें अपने उत्तराधिकारी की तलाश है. पार्टी कार्यकर्ता उनके सुपुत्र निशांत को राजनीति में उतारने की मंशा रखते हैं. हालांकि अभी तक ऐसा हुआ नहीं है.
खैर राजनीति में कभी भी किसी भी समय कुछ भी संभव है. फिलहाल के लिए पॉलिटॉक्स बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जन्मदिन की बधाई देता है.










