तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एवं द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) प्रमुख एमके स्टालिन ने एक बार फिर हिन्दी भाषा को नकारते हुए केंद्र से लैंग्वजे वॉर शुरू करने की चेतावनी दी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का विरोध करते हुए स्टालिन ने कहा कि एक अखंड हिंदी पहचान की कोशिश प्राचीन भाषाओं को खत्म कर रही है. राज्यों पर जबरन हिंदी थोपने से 100 सालों में 25 नॉर्थ इंडियन भाषाएं खत्म हो गई. उन्होंने हिन्दी भाषा को राज्य पर कथित रूप से थोपने का विरोध किया है. स्टालिन ने कहा कि हिंदी थोपने का विरोध किया जाएगा क्योंकि हिंदी मुखौटा और संस्कृत छुपा हुआ चेहरा है. उन्होंने ये भी कहा कि उत्तर प्रदेश और बिहार कभी भी हिंदी क्षेत्र नहीं थे. अब उनकी असली भाषाएं अतीत की निशानी बन गई है.
दरअसल, नई शिक्षा नीति 2020 के तहत देश के सभी सरकारी एवं निजी विद्यालयों में तीन भाषाएं सिखायी जानी अनिवार्य है. इनमें दो भारतीय भाषाएं एवं एक अन्य भाषा होगी. पहली भाषा विद्यालय की मातृभाषा/स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा होगी. जहां तक संभव हो, प्राइमरी एजुकेशन भी इसी भाषा में होगी. दूसरी भाषा के तौर पर हिन्दी या राज्य की दूसरी भारतीय भाषा और तीसरी अंग्रेजी या भारतीय/विदेशी भाषा. NEP 2020 के तहत, स्टूडेंट्स को 3 भाषाएं सीखनी होंगी, लेकिन किसी भाषा को अनिवार्य नहीं किया गया है. राज्यों और स्कूलों को यह तय करने की आजादी है कि वे कौन-सी 3 भाषाएं पढ़ाना चाहते हैं. हालांकि किसी भाषा को अपनाना अनिवार्य नहीं राज्यों और स्कूलों को यह तय करने की स्वतंत्रता है कि वे कौन-सी तीन भाषाएं पढ़ाएंगे. किसी भी भाषा को अनिवार्य रूप से थोपने का प्रावधान नहीं है.
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इस पर स्टालिन ने कहा कि हिंदी थोपने का विरोध किया जाएगा क्योंकि हिंदी मुखौटा और संस्कृत छुपा हुआ चेहरा है. उन्होंने कहा कि एक अखंड हिंदी पहचान की कोशिश प्राचीन भाषाओं को खत्म कर रही है. उत्तर प्रदेश और बिहार कभी भी हिंदी क्षेत्र नहीं थे. अब उनकी असली भाषाएं अतीत की निशानी बन गई है.
एक सोशल मीडिया पोस्ट में स्टालिन ने कहा, ‘दूसरे राज्यों के मेरे प्रिय बहनों और भाइयों, क्या आपने कभी सोचा है कि हिंदी ने कितनी भारतीय भाषाओं को निगल लिया है? भोजपुरी, मैथिली, अवधी, ब्रज, बुंदेली, गढ़वाली, कुमाऊंनी, मगही, मारवाड़ी, मालवी, छत्तीसगढ़ी, संथाली, अंगिका, हो, खरिया, खोरठा, कुरमाली, कुरुख, मुंडारी, और कई सारी भाषाएं अब अस्तित्व के लिए हांफ रहे हैं.’ स्टालिन ने ये भी कहा कि हिंदी थोपने का विरोध किया जाएगा क्योंकि हिंदी मुखौटा और संस्कृत छुपा हुआ चेहरा है. उन्होंने कहा कि केंद्र हमारे ऊपर हिंदी न थोपे. अगर जरूरत पड़ी तो उनका राज्य एक और लैंग्वेज वॉर के लिए तैयार है.
इससे पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धमेंद्र प्रधान ने वाराणसी में हुए एक कार्यक्रम में तमिलनाडू की सरकार पर राजनीतिक हितों को साधने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि राज्य को समग्र शिक्षा मिशन के लिए करीब 2400 करोड़ रुपए की धनराशि तब तक नहीं मिलेगी, जब तक वह राष्ट्रीय शिक्षा नीति को पूरी तरह से अपना नहीं लेता है.
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इसके जवाब में चेन्नई में डीएमके की रैली में उदयनिधि स्टालिन ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान ने हमें खुलेआम धमकी दी है कि फंड तभी जारी किया जाएगा जब हम तीन-भाषा फॉर्मूला स्वीकार करेंगे. लेकिन हम आपसे भीख नहीं मांग रहे हैं. जो राज्य हिंदी को स्वीकार करते हैं, वे अपनी मातृभाषा खो देते हैं. केंद्र लैंग्वेज वॉर शुरू न करें.
इस पर बीजेपी सांसद धमेंद्र प्रधान ने कहा कि किसी भी भाषा को थोपने का सवाल नहीं है. लेकिन विदेशी भाषाओं पर अत्यधिक निर्भरता खुद की भाषा को सीमित करती है. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) इसे ही ठीक करने का प्रयास कर रही है. NEP भाषाई स्वतंत्रता को कायम रखती है और यह सुनिश्चित करती है कि स्टूडेंट अपनी पसंद की भाषा सीखना जारी रखें.