कांग्रेस ने ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह नहीं बदली तो पार्टी जीरो हो जाएगी: थरूर

बीते कुछ दिनों से कांग्रेस के लिए ‘बीजेपी के सुब्रमण्यम स्वामी’ (Subramanian Swamy) बनते जा रहे शशि थरूर जमकर अपनी ही पार्टी पर निशाना साध रहे हैं. तिरुवनंतपुरम (केरल) से लोकसभा सांसद शशि थरूर (Shashi Tharoor) हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) की तारीफ कर कांग्रेस (Congress) के नेताओं के निशाने पर आ चुके हैं. अब उन्होंने कांग्रेस की नीतियों पर सवाल उठाया. थरूर ने कांग्रेस की ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ पर धावा बोलते हुए इसे पार्टी के लिए संकट बताया.

उन्होंने कहा , ‘कांग्रेस का कर्तव्य है कि वह धर्मनिपेक्षता की रक्षा करे. खासकर उन हिंदी भाषी क्षेत्रों में, जहां उसके पास बहुमत नहीं है. अगर कांग्रेस चुनाव में लाभ पाने के लिए ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह अपनाती है तो यह पार्टी के लिए ठीक नहीं है. अगर पार्टी इसी रास्ते पर आगे बढ़ी तो जीरो हो जाएगी.’

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इतना कहकर कांग्रेस सांसद ने अपनी पार्टी और उसकी नीतियों पर सीधे-सीधे सवालिया निशान लगाते हुए ये भी बता दिया कि उनकी पार्टी सचमुच ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की राह पर चल रही है. शशि यहीं नहीं थमे. आगे तंज मारते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं कांग्रेस में महज इसलिए नहीं आया क्योंकि यहां मुझे जिंदगीभर के लिए अच्छा करियर बनाना था. मैं यहां इसलिए आया क्योंकि मुझे यकीन था कि पार्टी देश के विकास की सोच आगे बढ़ाएगी. महज वोटों के लिए हम विचारों से समझौता नहीं कर सकते.’

कांग्रेस नेता शशि थरूर भारत सरकार की नीति का समर्थन करते हुए पाकिस्तान पर जमकर बरसे. उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि पाकिस्तान को किसी मंच पर भारत के आंतरिक मुद्दे पर हस्तक्षेप करने का अधिकार है? कांग्रेस विपक्ष में होने के नाते सरकार की आलोचना कर सकती है लेकिन देश से बाहर हम एक हैं और पाक को एक इंच भी जमीन नहीं देंगे. थरूर ने कहा कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNHRC) में उठाने की बात कही है लेकिन पाकिस्तान ने गिलगित-बाल्तिस्तान और पीओके (PoK) का स्टेटस ही बदल दिया. आखिर उन्हें इसमें छेड़छाड़ करने का अधिकार किसने दिया.

पलवल विधानसभा सीट पर इस बार करण सिंह दलाल को करना पड़ सकता है हार का सामना

हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 (Haryana Assembly Election) – पलवल (Pawal) विधानसभा सीट हरियाणा (Haryana) में विधानसभा चुनावों (Assembly Election) की तिथि की घोषणा अभी नहीं हुई है, ऐसी संभावना है की हरियाणा में नवंबर माह में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं. इसके मद्देनजर विभिन्न दलों ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं. संभावित प्रत्याशियों ने जनसंपर्क अभियान छेड़ दिया है, प्रचार साधनों के माध्यम से वे उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. आज हम आपको हमारी खास रिपोर्ट में हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 में हरियाणा के पलवल जिले की पलवल (Palwal) विधानसभा सीट के जमीनी हालात से रुबरु करवाएंगे. हरियाणा के पलवल (Palwal) जिले के अंदर तीन विधानसभा सीटें आती … Read more

‘राहुल गांधी की कप्तानी जाते ही टीम के प्लेयर्स किए जा रहे रिटायर्ड हर्ट’

कहते हैं टीम का पूरा भार कप्तान के कंधों पर टिका रहा है. अगर कप्तान आउट हो जाए तो टीम का संभल पाना मुश्किल होता है. वर्तमान में कांग्रेस के भीतरी हालात और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) पर ये कहावत एकदम सटीक बैठती है. राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा क्या दिया, उनके करीबी माने जाने वाले तकरीबन सभी नेताओं पर गाज गिरने लगी है. उनकी जी हजुरी करने वाले सभी नेताओं को प्रमुख पदों से हटाया जा रहा है. चूंकि अब सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बन गयी हैं, ऐसे में अब राहुल की टीम के खिलाड़ियों को रिटायर कर नयी ​टीम बनायी जा रही है. कुमारी शैलजा (Kumari Selja) को हरियाणा का प्रदेशाध्यक्ष बना इसकी शुरुआत भी हो चुकी है.

लोकसभा चुनाव-2019 में पार्टी की हुई बुरी गत की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए जब राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश की थी, तभी राहुल गांधी के करीबियों में कुर्सी खिसकने का भय घर कर गया था. यही वजह है कि पार्टी के सीनियर नेताओं के साथ यूथ कांग्रेस और अन्य नेताओं ने राहुल गांधी से इस्तीफा वापिस लेने की गुहार लगायी. यहां तक की कई राज्यों की प्रदेश कमेटियों ने तो उनके इस्तीफे की पेशकश को ही ठुकरा दिया लेकिन राहुल गांधी अपने फैसले पर अड़े रहे. नतीजा, आखिरकार सोनिया गांधी को ही कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान संभालनी पड़ी.

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अब टीम का कप्तान नया और अनुभवी है तो टीम तो नए सिरे से चुननी ही थी. ऐसे में राहुल गांधी के सिपेहसालार खिलाड़ी एक-एक कर बाहर होने लगे या फिर यूं कहें, बाहर किए जाने लगे. पार्टी के युवराज के त्यागपत्र देते ही कुछ ने अपने आप ही इस्तीफे दे दिए और कुछ के इस्तीफे रखवा लिए गए. सोनिया के कमान संभालते ही राहुल के बेहद करीबी माने जाने वाले हरियाणा के प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर (Ashok Tanwar) को हटा सोनिया की खास कुमारी शैलजा को उनका स्थान दिया गया. इससे पहले हरियाणा में लोकसभा चुनाव में करारी शिखस्त के बाद भी तंवर ने इस्तीफा देने से सीधे सीधे मना कर दिया था. राहुल गांधी की शह पर ही तंवर पिछले 6 साल से अपने पद पर बने हुए थे. अपने संबंधों के चलते राहुल गांधी खुद चाहते हुए भी इस बारे में कोई फैसला नहीं कर पा रहे थे.

वहीं मुंबई क्षेत्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मिलिंग देवड़ा (Milling Deora) और दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन (Ajay Maken) ने राहुल गांधी के समर्थन में इस्तीफा पार्टी कमान को भेजा था, जिसे अब सोनिया गांधी ने मंजूर कर लिया है. अब देवड़ा की जगह एकनाथ गायकवाड़ को मुंबई क्षेत्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया है. वहीं राहुल गांधी के कार्यकाल में डॉ. अजय कुमार (Dr.Ajoy Kumar) को झारखंड का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया था, उन्हें भी अपने पद से हटा दिया गया है. गुजरात की टीम में भी बदलाव के कयास हैं जहां राहुल के करीबी राजीव सातव (Rajeev Satava) प्रभारी हैं.

जिस तरह से एक-एक करके राहुल गांधी के करीबी नेताओं की छुट्टी हो रही है, उससे तो यही कयास लगाए जा रहे हैं कि इन सभी पदों पर सोनिया गांधी के खास लोगों की नियुक्ति की जाएगी. अब चूंकि कांग्रेस वर्किंग कमेटी में राहुल गांधी की एंट्री हो गयी है, ऐसे में उम्मीद तो ये भी जताई जा रही है कि राहुल अपनी टीम का साथ यूं तो नहीं छोड़ेंगे. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि इन सभी नेताओं को बाद में एडजस्ट कर दिया जाएगा. मिलिंद देवड़ा, अजय माकन और डॉ.अजय कुमार को राहुल गांधी के कहने पर राष्ट्रीय टीम में जगह मिल सकती है. वहीं ज्योतिरादियत्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) को राष्ट्रीय टीम से निकाल मध्यप्रदेश भेजे जाने की संभावना है.

फेल हुआ गहलोत का कानून प्रबंधन

राजस्थान पुलिस (Rajasthan Police) निकम्मी बन गई है या अपराधियों को वारदात करने की छूट दे दी गई है. जयपुर (Jaipur) में एक अखबार वितरक की हत्या और पुलिस द्वारा पत्रकार की पिटाई का विवाद थमा भी नहीं था कि बहरोड़ पुलिस थाने से कुछ लोग अंधाधुंध गोलियां चलाकर एक दुर्दांत अपराधी को छुड़ा ले गए.

जन तंत्र पर भारी गन तंत्र, उधर गहलोत और पायलट उलझे राजनीतिक रस्साकस्सी में

कहते हैं कि मजबूत सरकार विकास के पथ पर रहती है और मजबूर सरकार झगड़ों में उलझ कर विकास के पथ से भटक जाती है. कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है इन दिनों राजस्थान (Rajasthan) में, यहां सरकार में वर्चस्व की लड़ाई का खामियाजा प्रदेश में बिगड़ी कानून व्यवस्था के रूप में देखने को मिल रहा है. मरुधरा में जनतंत्र (Public System) पर अपराधियों का गन तंत्र (Gun System) भारी पड़ रहा है. गुंडे-मवालियों के सामने खाकी लाचार और कमजोर नजर आ रही है. राजधानी में इंसाफ मांग रहे लोगों पर लाठी बरसाई जा रही है तो बहरोड़ में खुलेआम लॉक-अप में फायरिंग कर अपराधियों को छुड़ाया जा रहा है तो वहीं सीकर में सरेआम बंदूक की नोक पर बैंक को लूटा जा रहा हैं. आखिर क्या हो गया है अमन-चैन वाले प्रदेश राजस्थान को?

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट (Sachin Pilot) के बीच की तनातनी का संघर्ष अब सतह पर है. नौबत यहां तक आ गई है कि अब सरकार के दोनों सिपहसालार एक दूसरे के खुशियों के पल से भी कन्नी काटने लगे हैं. शनिवार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और प्रदेश के उपमुख्यमंत्री सीएम सचिन पायलट के जन्मदिन के मौके पर मुख्यमंत्री पहले दिल्ली और बाद में जैसलमेर में घूम रहे थे. इस दौरान उन्हें प्रदेश में पिछले तीन दिन से बिगड़ी कानून व्यवस्था का ख्याल भी नहीं आया. इससे पहले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के जन्मदिन के मौके पर सचिन पायलट भी कुछ ऐसा ही कर चुके हैं. इससे दोनों के बीच का मनमुटाव फिर जगजाहिर हो चुका है.

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पीसीसी अध्यक्ष सचिन पायलट ने अपने जन्मदिन के अवसर पर शक्ति प्रदर्शन करने की कोशिश की जिसमें वह नाकाम रहे और उनका यह प्रदर्शन फीका ही रहा. हालांकि पीसीसी से सभी जिलों में जनप्रतिनिधियों को जयपुर भीड़ लेकर आने का संदेश दिया गया था और उम्मीद थी 20,000 से ज्यादा भीड़ जुटाने की लेकिन जयपुर में 5000 नेता और कार्यकर्ता ही उपस्थित हुए. प्रदेश सरकार के छः मंत्रियों सहित करीब 12 विधायकों ने ही पीसीसी जाकर पायलट को बधाई दी जबकि कुछ नेताओं ने विवाद से बचते हुए बधाई देने के लिए पीसीसी के बजाय पायलट के घर को चुना. क्योंकि इस बात पर भी नजर रखी जा रही थी कि कौन-कौन से बड़े नेता पायलट को बधाई देने पहुँचते हैं. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच की खींचतान का सबसे बड़ा उदाहरण तो यही है, जनप्रतिनिधियों की सबसे बडी फांस की किसकी बोलें और किसकी नहीं. यही कारण रहा कि मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार पायलट के जन्मदिन की रौनक फिकी रही आखिर वर्तमान नेतृत्व से पंगा कौन ले?

सीएम अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम व पीसीसी चीफ सचिन पायलट के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई अब शायद अंतिम दौर में पहुंच चुकी है. मुख्यमंत्री गहलोत जहां दिल्ली दरबार में प्रदेश में नया पीसीसी चीफ और एक डिप्टी सीएम और बनाने की अर्जी लगा चुके हैं तो वही गाहे-बगाहे पायलट खेमा भी सरकार की मुखालफत का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहा है. बहराल हम बात कर रहे हैं कि दोनों नेताओं की आपसी खिंचतान का सीधा खामियाजा प्रदेश की जनता को उठाना पड़ रहा है. वरना मुख्यमंत्री जी को इस बिगड़ी कानून व्यवस्था को संभालने के बजाय इस तरह पायलट के जन्मदिन पर राजधानी छोड़कर जाने की नौबत नहीं आती. जबकि दिल्ली या जैसलमेर में कोई ऐसा अतिआवश्यक काम भी नहीं था की जिसे टाला नहीं जा सकता था.

प्रदेश के मुखिया अशोक गहलोत के पास गृह विभाग भी है ऐसे में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी भी गहलोत के ही कंधों पर है लेकिन पिछले 3 महीने और ख़ासकर गतसप्ताह में प्रदेश में हुए अपराध और उनके तरीकों पर नजर डाले तो पुलिस लाचार और नाकाम नजर आती है. मुख्यमंत्री गहलोत जहां राजधानी में पुलिस अधिकारियों को कानून व्यवस्था का पाठ पढ़ा रहे थे तो उसी वक़्त अलवर में बदमाश उसकी बखिया उधेड़ने का प्लान बना रहे थे. प्रदेश के इतिहास में शायद पहली बार हुई बहरोड़ थाने में फायरिंग कर अपराधी को छुड़ाने की घटना के बाद गहलोत के कंट्रोल वाली पुलिस की कलई खुल गई है. मुख्यमंत्री के चहेते डीजीपी अपराध पर अंकुश लगाने में अब तक विफल साबित हुए हैं. ऐसे में राजनीतिक स्थिरता का फायदा अब अपराधी उठा रहे हैं और आम जनता को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है.

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अचानक बदले समीकरण

सोनिया गांधी के अंतरिम राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते ही कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में सत्ता के केंद्र बदल गए. सोनिया के विश्वस्त माने जाने वाले अशोक गहलोत को मानो अभय दान मिल गया हो. राहुल गांधी जहां युवा नेतृत्व की बात करते थे तो ऐसे में सचिन पायलट आत्मविश्वास के साथ रेस में खुद को बरकरार रखे हुए थे. इसी कारण गहलोत खेमे में थोड़ा भय भी था कि कहीं किसी दिन नेतृत्व परिवर्तन का फरमान न आ जाये. लेकिन सोनिया गांधी के अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद तो गहलोत खेमा अधिक पॉवरफुल हो गया है. इसीलिए पहले जो नेता और कार्यकर्ता सचिन पायलट का खुल कर समर्थन करते थे यहां तक कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाये जाने की खुलकर पैरवी करते थे उनमें से कुछ एक को छोड़कर ज्यादातर उनके जन्मदिन के मौके पर भी कन्नी काटते नजर आये.

राजस्थान में कानून-व्यवस्था की हालत, गहलोत सरकार फेल

राजस्थान (Rajasthan) में क्या हो रहा है? पुलिस निकम्मी बन गई है या अपराधियों को वारदात करने की छूट दे दी गई है. जयपुर में एक अखबार वितरक की हत्या के मामले में पुलिस को जो सांप्रदायिक पक्ष दिखा, वह चौंकाने वाला रहा. पुलिस ने हत्यारे के खिलाफ सख्ती करने की बजाय उससे सहानुभूति दिखाई, जिससे लोग भड़क गए. पुलिस ने उलटे प्रदर्शऩ करने वालों पर लाठियां भांजी. रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को खदेड़ा. फोटो खींच रहे फोटोग्राफर को पीट दिया. पुलिस की ज्यादती सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. यह विवाद थमा भी नहीं था कि शुक्रवार सुबह अलवर जिले के बहरोड़ पुलिस थाने (Behror Police Station) से कुछ लोग अंधाधुंध गोलियां चलाकर, पुलिस को धमकाकर एक दुर्दांत अपराधी को छुड़ा ले गए.

जयपुर पुलिस (Jaipur Police) का रवैया अजीबो गरीब रहा. एक व्यक्ति ने अखबार वितरक को कुल्हाड़ी से काट दिया और पुलिस ने उसे अस्पताल में भर्ती करवा कर रहा कि वह मानसिक रूप से विक्षिप्त है. क्या मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति को हत्या करने का हक मिला हुआ है? मुख्यमंत्री गहलोत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक करते हैं, जिसकी खबरें अखबारों में छपती रहती हैं. इससे यह लगता है कि मुख्यमंत्री को प्रदेश की कानून-व्यवस्था को लेकर बड़ी फिक्र है. गहलोत पुलिस अफसरों को सीख भी देते होंगे कि पुलिस को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? क्या उनकी सीख यह है कि दुर्दांत अपराधी को थाने से भागने देना चाहिए, या अखबार वितरक को कुल्हाड़ी से काट देने वाले के खिलाफ तत्काल प्रभाव से हत्या का मामला दर्ज नहीं करना चाहिए?

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राजस्थान में कानून-व्यवस्था की स्थिति विकट है. मुख्यमंत्री गहलोत राज्य के गृहमंत्री भी हैं और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बुरी तरह फेल साबित हो रहे हैं. जयपुर की घटना पुलिस की आम आदमी के खिलाफ बर्बरता का उदाहरण पेश करती है, जबकि बहरोड़ की घटना पुलिस के नाकारापन की मिसाल है. किसी की हत्या होने पर उसके परिजन जब न्याय की मांग करते हैं तो पुलिस लाठी चलाती है, उनके साथ अमानवीय व्यवहार करती है और जब एक थाने से कुछ लोग अपराधी को छुड़ाने पहुंचते हैं तो उसके सामने समर्पण की मुद्रा में आ जाती है. क्या लोग पुलिस पर भरोसा कर सकते हैं?

बहरोड़ (Behror) का घटनाक्रम इस प्रकार है. शुक्रवार तड़के करीब 3.20 बजे पुलिस ने एक गाड़ी की तलाशी ली तो उसमें सवार तीन लोग भागने लगे. एक पुलिस की पकड़ में आ गया. वह हरियाणा का कुख्यात अपराधी विक्रम गुर्जर उर्फ पपला था. उसने पुलिस को अपना गलत नाम बताया. खुद को प्रॉपर्टी कारोबारी साहिल के रूप में पेश किया. पुलिस ने सुबह पांच बजे बाद उसे थाने लाकर हवालात में बंद कर दिया. शुक्रवार सुबह करीब 8.20 बजे थाने के सामने तीन गाड़ियां रुकी उनमें करीब 15 लोग सवार थे. सात-आठ थाने में घुसे और गोलियां चलानी शुरू कर दी.

अचानक हुए इस हमले से थाने में मौजूद तमाम पुलिस कर्मी बचने की कोशिश करते दिखे. कुछ यहां-वहां छिपे, कुछ दीवार लांघकर भागे. थाना अधिकारी सुगन सिंह अपने कक्ष में बैठे थे. हमला होने पर वह पिछले दरवाजे से निकल गए. कक्ष के दरवाजे पर काली फिल्म लगी होने से वह हमलावरों को नहीं दिखे. हमलावर चिल्ला रहे थे, जो भी दिखे, गोली से उड़ा दो. कुछ ही देर में वे पपला को हवालात से छुड़ा ले गए. पपला को छुड़ा कर ले जाने में उन्हें सात मिनट से ज्यादा समय नहीं लगा. एके-47 से फायरिंग करते हुए अपराधी को थाने से छुड़ा ले जाने का यह राजस्थान में पहला मामला है.

पपलू हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के खेतली गांव का रहने वाला है. महेन्द्रगढ़ पुलिस उसे 8 सितंबर, 2017 को अदालत में पेशी के लिए ले जा रही थी, तब उसके साथी उसे छुड़ा ले गए थे. तब भी पपला के साथियों ने पुलिस पर फायरिंग की थी और चार पुलिस कर्मियों को गोली लगी थी. उसके बाद से वह फरार थी. हरियाणा के मोस्ट वांटेड अपराधियों की सूची में उसका नाम शामिल है. उस पर पांच लाख रुपए का इनाम है. वह अनायास ही राजस्थान पुलिस की पकड़ में आ गया था, लेकिन गलत नाम बताने से पुलिस गफलत में रही. पुलिस ने उसके पास से 31.90 लाख रुपए नकद बरामद किए थे.

क्या पुलिस अधिकारी लालच में आ गए थे? खबर है कि पुलिस अधिकारी ज्यादा रकम ऐंठने के लिए सौदेबाजी में लगे रहे. पपला ने छोड़ने के बदले 35 लाख रुपए देने की बात कही थी. इस पर पुलिस अधिकारियों ने पपला को साथियों से संपर्क करने के लिए अपना मोबाइल फोन दे दिया. पपला को अपने साथियों से संपर्क करने का मौका मिल गया. उसके बाद जो हुआ, वह सबके सामने है. पुलिस ने रोजनामचे में साहिल उस्मान के नाम से रिपोर्ट लिखी थी.

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पपला को छुड़ाकर भागे लोगों ने अपनी कार रास्ते में छोड़कर एक पिकअप गाड़ी लूटी. उसके बाद उसे भी छोड़कर एक और अन्य गाड़ी पर कब्जा किया, फिर हरियाणा सीमा पर उस गाड़ी को भी वहीं छेड़कर खेतों से पैदल भाग निकले. हमले के बाद हतप्रभ पुलिस ने पीछा किया, लेकिन कोई भी पकड़ में नहीं आया. पुलिस को दोष नहीं दिया जा सकता. पुलिस भले ही अपराधियों को पकड़ न सके, लेकिन पीछा तो करती ही है. बच्चों में चोर-पुलिस का खेल ऐसे ही लोकप्रिय नहीं हुआ है.

बहरहाल डीजीपी भूपेन्द्र सिंह (DGP Bhupendra Singh) बहरोड पहुंचे हुए हैं. भारी पुलिस बल भेजा गया है. घटना की एसआईटी से जांच की घोषणा हो चुकी है. सांप निकल गया, लकीर पीटने का काम हो रहा है. मुख्यमंत्री गहलोत की तरफ से इस घटना पर प्रतिक्रिया नहीं आई है. यह राजस्थान में कानून-व्यवस्था की तस्वीर है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) ने बहरोड़ की घटना पर गहलोत सरकार को कठघरे में खड़ा किया है. उन्होंने ट्वीट किया है कि इस घटना से प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लग गया है. विधानसभा में भाजपा विधायक दल के उपनेता राजेन्द्र राठौड़ (Rajendra Rathore) ने कहा कि प्रदेश में अराजकता की स्थिति है. राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीणा (Kirodi Lal Meena) और विधायक कालीचरण सराफ (Kalicharan Saraf) ने मुख्यमंत्री गहलोत से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की मांग की है.

बेरी सीट पर रघुवीर कादयान की सल्तनत को चुनौती दे पाएंगे मनोहर लाल खट्टर?

हरियाणा (Haryana) में विधानसभा चुनाव (Assembly Election-2019) की घोषणा चुनाव आयोग की तरफ से जल्द की जा सकती है. संभावना जताई जा रही है कि चुनाव आयोग अक्टूबर और नवंबर के महीने में हरियाणा में विधानसभा चुनाव करवा सकता है. पॉलिटॉक्स न्यूज ने हरियाणा विधानसभा चुनाव को लेकर एक विशेष कार्यक्रम शुरु किया है. जिसमें हम आपको रोज एक नए विधानसभा क्षेत्र की ग्राउंड रिर्पोट (Ground Report) से अवगत करवाते है. आज हम आपको हरियाणा की बेरी विधानसभा सीट (Beri Assembly Constituency) के जमीनी हालात से रुबरु करवाएंगे.

बेरी विधानसभा क्षेत्र झज्जर जिले के अन्तर्गत आता है, लेकिन बेरी विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा क्षेत्र रोहतक लगता है. विधानसभा क्षेत्र पर पिछले काफी समय से कांग्रेस का एक-क्षत्र राज है. कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता और भूपेन्द्र हुड्डा के खास सिपहसालार चौधरी रघुवीर सिंह कादयान (Choudhary Raghuveer Singh Kadayan) पिछले चार चुनाव से यहां लगातार अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखने में कामयाब रहे हैं.

राजनीतिक इतिहासः
हरियाणा गठन के साथ ही बेरी विधानसभा भी अस्तित्व में आई. बेरी विधानसभा सीट से सर्वप्रथम 1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के प्रताप सिंह दौलुता विधायक चुने गए थे. 1968 के चुनाव में पार्टी ने प्रताप सिंह की जगह रण सिंह को प्रत्याशी बनाया और रण सिंह ने प्रताप सिंह को मात दी. साल 1972 में प्रताप सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में जीत हासिल की. 1977, 80 के विधानसभा चुनाव में यहां से जनता पार्टी के उम्मीदवार ने जीत हासिल की.

साल 1987 में लोकदल उम्मीदवार के रुप में रघुवीर सिंह कादयान ने जीत हासिल की, लेकिन कादयान जीत के इस सिलसिले को बरकरार नहीं रख पाये और 1991 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी ओमप्रकाश से हार बैठे. 1996 के चुनाव में बाजी वीरेन्द्र ने मारी. साल 2000 को विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने रघुवीर कादयान को उम्मीदवार बनाया. बेरी की जनता ने इस बार रघुवीर को निराश नहीं किया और रघुवीर बड़े अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब हुए.

साल 2000 में शुरु हुआ रघुवीर कादयान की जीत का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. साल 2014 के चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस विरोधी लहर होने के बावजूद भी रघुवीर कादयान चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे. उन्होंने इंडियन नेशलन लोकदल के चतर सिंह को लगभग 4500 मतों से मात दी थी.

सामाजिक समीकरणः
बेरी विधानसभा सीट रोहतक लोकसभा क्षेत्र के अन्तर्गत आता है. बेरी विधानसभा सीट में जाट समाज बहुतायात में है. जाट वोटर्स के कारण ही रघुवीर लगातार चुनाव जीतने में कामयाब हो रहे हैं. 2019 के विधानसभा चुनाव में कादयान को इनेलो के कमजोर होने का भी फायदा मिलेगा. इस चुनाव में रघुवीर कादयान को जाट वोट एकमुश्त मिलने का अनुमान है, जैसा लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से जाट समाज का समर्थन दीपेन्द्र हुड्डा को एकतरफा मिला था.

2019 विधानसभा चुनावः
विधानसभा चुनाव को लेकर तमाम पार्टियों ने प्रत्याशी चयन की प्रकिया शुरु कर दी है. पार्टियों के वरिष्ठ नेता इलाकों में अपने मजबूत उम्मीदवारों की तलाश में लग गए है. कांग्रेस के सामने प्रत्याशी चयन में कोई समस्या नहीं है. तंवर के हटने के बाद पार्टी पर पुरा नियंत्रण भूपेन्द्र हुड्डा का होगा इसलिए टिकट एक बार फिर रघुवीर कादयान को मिलना तय है. रघुवीर कादयान, हुड्डा के करीबी है, तो इसलिए भी उनके टिकट पर कोई संशय नहीं है.

बीजेपी की तरफ से बेरी विधानसभा सीट को लेकर दावेदारों की सूची काफी लंबी है. इन दावेदारों में विक्रम सिंह कादयान, प्रदीप अहलावत, शिव कुमार रंगीला प्रमुख दावेदार है. जजपा की तरफ से उपेन्द्र कादयान का टिकट लगभग पक्का है. इनेलो इस बार प्रमोद राठी पर दांव लगाने का मन बना चुकी हैं.

जीत की संभावनाः
रघुवीर कादयान के लिए इस बार का चुनाव पिछले चुनावों की तरह आसान नहीं होने वाला है. हमारे इस तर्क के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रदेश कांग्रेस के अंदर मची भारी गुटबाजी है. कादयान हुड्डा गुट के नेता हैं तो दुसरे गुट के नेता उन्हें चुनाव में कमजोर करने के पुरे प्रयास करेगें. जिसका नुकसान सीधा-सीधा रघुवीर सिंह कादयान को चुनाव में होगा. 2019 में बीजेपी और कांग्रेस के मध्य रोचक मुकाबला देखने को मिलेगा यह तय है.

मैं मध्य प्रदेश का सुपर सीएम नहीं हूं: दिग्विजय सिंह

Digvijay Singh on Mohan bhagwat

वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) ने इन आरोपों का जोरदार शब्दों में खंडन किया है कि वह मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh ) में सुपर सीएम के रूप में काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि कमलनाथ (Kamalnath) अपने आप में मजबूत नेता हैं और उन्हें किसी सुपर सीएम की जरूरत नहीं है. दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उन पर आरोप कि वह गैर जरूरी तरीके से सरकार के काम में रुकावटें पैदा करते रहते हैं. दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh)  ने कहा कि मध्य प्रदेश में कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत से कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका मिला है. वे सरकार … Read more

तीन राज्यों में चुनाव जीतने के लिए भाजपा की मजबूत तैयारी

देश में तीन राज्यों हरियाणा (Haryana), झारखंड (Jharkhand) और महाराष्ट्र (Maharastra) में विधानसभा चुनाव (Assembly Election 2019) होने वाले हैं. भाजपा की तैयारियां जोरों पर है जबकि विपक्ष लड़ाई से पहले ही हारने की स्थिति में दिख रहा है. चुनाव आयोग ने इन राज्यों में चुनाव का कार्यक्रम अभी घोषित नहीं किया है. लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा ने अपने चुनाव अभियान का पहला चरण करीब-करीब पूरा कर लिया है. विपक्षी पार्टियां अभी सीटों के तालमेल में ही उलझी हुई हैं और किस नेता के नाम पर चुनाव लड़ा जाएगा, यह तय नहीं है.

हरियाणा में भाजपा के चुनाव अभियान के तहत बड़े नेताओं के दौरे शुरू हो चुके हैं. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दो रैलियां कर चुके हैं. शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रोहतक में विजय संकल्प रैली कर रहे हैं. इस तरह भाजपा का चुनाव अभियान पूरी गति से आगे बढ़ रहा है, वहीं प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस स्थानीय नेताओं के आपसी मतभेदों को दूर करने में जुटी हुई है. हाल की कांग्रेस ने नेताओं के आपसी विवाद थामने के लिए कुमारी शैलजा को हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और भूपेन्द्र सिंह हुड्डा (Bhupendra Singh Hooda) को विधायक दल नेता बना दिया है. चुनाव अभियान समिति के प्रमुख भी हुड्डा ही रहेंगे.

इसके बावजूद यह पूरी तरह तय नहीं है कि कांग्रेस के भीतरी मतभेद, विवाद आसानी से हल हो पाएंगे. हरियाणा में सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस कभी भी किसी भी मुद्दे पर भाजपा सरकार को न तो घेर पाई है और न ही चुनौती दे पाई है. एक स्थानीय कांग्रेस नेता का कहना है कि इतने सालों से चल रहे झगड़े एकदम से खत्म होना मुश्किल है.

हरियाणा में राजनीतिक रूप से मजबूत चौटाला परिवार (Chautala Family) में भी फूट पड़ी हुई है. इसको देखते हुए विधानसभा चुनाव में इनेलो अपनी मौजूदगी दिखा पाएगी, इसमें संदेह है. अजय चौटाला (Ajay Chautala) ने अपनी अलग जननायक जनता पार्टी (JJP) बना ली है. उनकी पार्टी का बसपा से तालमेल हो चुका है. उनका दावा है कि इस बार हरियाणा में चारकोणी मुकाबला होगा. भाजपा, कांग्रेस, इनेलो और जेपीपी के बीच टक्कर होगी.

महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस अपनी महाजनादेश यात्रा पूरी कर चुके हैं. इस दौरान उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ राज्य के हर क्षेत्र के लोगों से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की. दूसरी तरफ महाराष्ट्र का मुख्य विपक्षी गठबंधन कांग्रेस और राकांपा आपसी झगड़ों में उलझा हुआ है. दोनों ही पार्टियों के प्रमुख नेताओं में पार्टी छोड़ने का रुझान बढ़ता जा रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद दोनों ही पार्टियों में उत्साह की कमी नजर आ रही है.

लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बदल दिया है, लेकिन पार्टी नेताओं के अंदरूनी मतभेद खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं. दोनों ही पार्टियां प्रकाश अंबेडकर की पार्टी वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीएस) से तालमेल करना चाहती हैं. लोकसभा चुनाव में वीबीएस के कारण दोनों पार्टियां कम से कम आठ सीटों पर नुकसान उठा चुकी हैं. कांग्रेस के सामने वीबीएस ने शर्त रखी है कि वह राकांपा को गठबंधन से अलग करे. यह शर्त मानना कांग्रेस के लिए मुश्किल है.

महाराष्ट्र में एक हद तक राज ठाकरे (Raj Thackeray) की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MANS) का भी असर है. लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे ने मोदी सरकार के खिलाफ प्रचार किया था. विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर मनसे के उम्मीदवार भी चुनाव लड़ेंगे. कांग्रेस और राकांपा, दोनों पार्टियां अभी राज ठाकरे से गठबंधन के बारे में कोई फैसला नहीं ले पाई है.

झारखंड की राजधानी रांची में 12 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी की रैली का कार्यक्रम तय हो चुका है. विपक्षी खेमे को अब तक कांग्रेस के साथ बैठक का इंतजार है. झारखंड मुक्ति मोर्चा (Jharkhand Mukti Morcha) के नेता हेमंत सोरेन अपने स्तर पर 26 अगस्त को साहेबगंज से राज्य में बदलाव यात्रा शुरू कर चुके हैं. वह पूरे राज्य का दौरा करने के बाद 19 सितंबर को रांची में बड़ी रैली को संबोधित करेंगे. कांग्रेस अभी तक अपने अंदरूनी झगड़ों में उलझी हुई है. पार्टी को एकजुट करने के लिए कांग्रेस ने झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार को हटाकर उनकी जगह रामेश्वर उरांव (Rameshwar Oraon) को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है. लेकिन इसका उलटा असर हो रहा है. कांग्रेस के कई विधायक भाजपा में जाने की योजना बना रहे हैं.

इस तरह तीनों राज्यों में साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी अभी से काफी मजबूत स्थिति में नजर आ रही है. एक तरफ तीनों राज्यों में जहां कांग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टियों के नेता बीजेपी में शामिल हो रहे हैं और जो बचे हुए हैं वो आपसी खींचतान के चलते एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी लोकसभा में मिले भारी बहुमत और उसके बाद के ताबड़तोड़ लिए गए जम्मू कश्मीर पुनर्गठन (Jammu Kashmir Reorganization) जैसे कई बिलों को लागू करवाने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज है.