चुनाव आयोग ने दिए एग्जिट पोल संबधी सभी ट्वीट हटाने के निर्देश

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देशभर में लोकसभा चुनाव के 6 चरणों का मतदान हो चुका है. 19 मई को आखिरी चरण की वोटिंग होनी है. इसी बीच हर कोई चुनाव परिणाम को लेकर खासा उत्साहित नजर आ रहा है. जिसके चलते सोशल मीडिया पर चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी संबधी पोस्ट धड़ाधड़ वायरल हो रही हैं. चुनाव आयोग को इस संबध में कई शिकायतें मिलने के बाद आयोग ने ट्वीटर को निर्देश दिए हैं. जिसमें कहा गया है कि ट्वीटर से एग्जिट पोल संबधी सभी ट्वीट हटाए जाएं. जानकारी के अनुसार निर्वाचन विभाग द्वारा ट्विटर को एग्जिट पोल संबधी सभी ट्वीट हटाने को कहा गया है. आयोग को लगातार इस संबध में शिकायतें मिल रही … Read more

क्या यूपी में गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ है?

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सपा और बसपा का साथ आना यूपी की सियासत में ‘दो ध्रुवों का एक साथ’ हो जाने जैसा रहा. इसकी चर्चा पूरे देश में है. जाहिर है कि जब चर्चा इतना असर दिखाए तो वोटर्स का प्रभावित होना लाज़मी है. अब तक हुए छह चरणों के चुनाव में कुछ ऐसा ही देखने को मिला. कुछ एक सीटों को छोड़ दें तो गठबंधन के ज्यादातर प्रत्याशी खुद-ब-खुद यह संदेश देने में सफल रहे कि बीजेपी से मुकाबले में वही हैं. कांग्रेस के बड़े नाम तो पूरी लड़ाई में यही साबित करने में रह गए कि वे भी चुनाव लड़ रहे हैं.

शुरुआत अमरोहा के चुनाव से करते हैं. यहां से कांग्रेस ने राशिद अल्वी को टिकट दिया था. टिकट मिलने के कुछ दिन के भीतर ही उन्होंने निजी कारणों से के चलते अपना टिकट वापस कर दिया. कांग्रेस को बाद में यहां से सचिन चौधरी को मैदान में उतारना पड़ा. ऊपरी तौर पर भले ही यह कहा गया हो कि उन्होंने निजी कारणों से टिकट वापस किया, लेकिन भितरखाने के लोग हकीकत बयां करते हैं कि गठबंधन के प्रत्याशी के सामने लोग उन्हें ‘वोट कटवा’ मान रहे थे. ऐसे में उन्होंने चुनाव न लड़ना ही मुनासिब समझा.

इसी तरह, सहारनपुर में कांग्रेस उम्मीदवार रहे इमरान मसूद की भी सारी ताकत यही साबित करने में लगी रही कि वह बीजेपी के उम्मीदवार राघव लखनपाल से सीधे मुकाबले में हैं. दूसरी तरफ गठबंधन के उम्मीदवार हाजी फजलुर्रहमान को वोटर्स में यह संदेश देना आसान था कि उनके पास वोटर्स का अंकगणित कहीं अधिक मजबूत है.

सपा-बसपा और आरएलडी के अपने बेस वोट बैंक हैं जबकि कांग्रेस के पास इस तरह के वोट बैंक की कमी है. ऐसे में साफ है कि बेस वोट बैंक का अंकगणित महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में गया है. इस संगठन से जो भी मैदान में उतरा, उसके पास सपा, बसपा और आरएलडी के वोट एकमुश्त थे. ऐसे में उसे केवल मजबूती से चुनाव लड़ना है. बाकी की राह उसके लिए कांग्रेस प्रत्याशी के मुकाबले आसान रही.

वहीं, कांग्रेस का सिंबल पाने वाले नेताओं को भी यह साबित करना कठिन रहा कि वह गठबंधन के बेस वोट के बावजूद ज्यादा मजबूत हैं. कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर जगहों पर यही स्थिति बनी रही. उन्नाव सीट पर कांग्रेस की अन्नू टंडन, कानपुर सीट पर श्रीप्रकाश जायसवाल आदि नेताओं की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा केवल गठबंधन उम्मीदवार के वोटों के अंकगणित से भारी दिखाने में लगा.

वैसे भी सपा, बसपा और बीजेपी के इतर कांग्रेस को मूवमेंट बेस्ड पार्टी माना जाता है. अगर चुनाव के समय कांग्रेस अपने मूवमेंट से लोगों को जोड़ पाती है तो परिणाम बेहतर दिखाई देते हैं. अन्यथा उसके पास करने के लिए कुछ खास नहीं होता है. 2009 में किसानों की कर्जमाफी की बात को जिस तरह से कांग्रेस ने ऊपर तक पहुंचाया था, उसका असर परिणाम के रूप में भी मिला. पार्टी यूपी में 21 सीटें जीतने में कामयाब रही.

इस बार कांग्रेस ने चुनाव मैदान में जाते हुए जनता के लिए न्यूनतम आय योजना का बड़ा वादा किया. लेकिन स्थिति यह रही कि वह इस वादे के बारे में जनता को पूरी तरह बता पाने में ही असफल रह गई. अधिकतर लोग इस योजना के बारे में अनभिज्ञ हैं जिससे वोटर्स के साथ कांग्रेस का जुड़ाव उस हद तक नहीं हो सका जितना उसे अपना असर छोड़ने के लिए जरूरी था.

वहीं, दूसरी तरफ गठबंधन का उम्मीदवार अपने जातीय अंकगणित से अपने लिए वोटर्स में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा. उसका मजबूत कैडर बैकअप भी उसके लिए जनता के बीच पहुंचा. इस तरह से गठबंधन का उम्मीदवार बीजेपी से मुकाबले में दिखा जबकि कांग्रेस ऐसा नहीं कर सकी और लड़ाई बीजेपी बनाम गठबंधन के तौर पर वोटर्स के बीच पहुंच गई.

राहुल गांधी ने अलवर में गैंगरेप पीड़िता से मुलाकात की, न्याय का भरोसा दिलाया

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आज अलवर के थानागाजी में गैंगरेप पीड़िता और उसके परिवार से मुलाकात की. राहुल गांधी करीब आधा घंटे पीड़ित परिवार के साथ रहे. इस दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, डिप्टी सीएम सचिन पायलट और प्रभारी अविनाश पांडे्य भी साथ थे. मुलाकात के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि यह मेरे लिए कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है. यह एक भावनात्मक मामला है.

उन्होंने आगे कहा कि जैसे ही मुझे इस घटना के बारे में पता चला, मैंने तुरंत प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से फोन पर बात की. मैं पहले यहां आना चाहता था लेकिन किन्हीं कारणों के कारण ऐसा हो न सका. राहुल ने कहा कि मैं सुनिश्चित करना चाहता हूं कि पीड़ित परिवार को जल्द से जल्द न्याय मिलेगा. परिवार की मांगों को भी जल्दी पूरा किया जाएगा. जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

इस मौके पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीएम गहलोत ने भी मीडियाकर्मियों से पीड़ित परिवार को जल्दी से जल्दी न्याय मिलने की बात कही. उन्होंने अलवर जिले को प्रशासनिक तौर पर अलवर शहर और अलवर ग्रामीण में बांटने की बात कही. दोनों जगह दो एसपी को लगाया जाएगा. जिले में बढ़ती अनैतिक गतिविधियों को देखते हुए यह बात कही गई है.

उन्होंने यह भी कहा कि थानागाजी मामले में सात दिन में चालान पेश कर देंगे. पीड़ित को नौकरी दी जाएगी. सीएम गहलोत ने कहा कि बीजेपी इस मामले पर राजनीति कर रही है और पूरी पार्टी राजनीति पर उतर आई है.

बता दें, राहुल गांधी बुधवार को अलवर आने वाले थे लेकिन खराब मौसम के चलते उनके हेलिकॉप्टर को दिल्ली में उड़ान भरने की अनुमति नहीं मिल पायी थी. इसके बाद कांग्रेसी प्रवक्ता जयवीर शेरविल ने उनके दौरा रद्द होने की सूचना दी थी.

राहुल गांधी का संवेदनशील मामलों में प्रदेश में यह तीसरा दौरा है. इससे पहले राहुल गांधी 2011 में गहलोत सरकार के दौरान गोपालगढ़ में हुए साम्प्रदायिक हिंसा के बाद राहुल यहां आए थे. उसके बाद वसुंधरा सरकार में बीकानेर की डेल्टा मेघवाल की दुष्कर्म और हत्या के बाद राहुल गांधी ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की थी.

लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राजस्थान में बदलेगा सत्ता-संगठन का चेहरा

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कांग्रेस के गलियारों में इन दिनों बस दो ही चर्चाएं जोरों पर है. एक तो ये कि लोकसभा में कांग्रेस की कितने सीटें आएंगी. दूसरी- परिणाम के आधार पर क्या मंंत्रीमंडल और पार्टी संगठन में बदलाव होगा? सूत्रों की मानें तो लोकसभा परिणाम के बाद राजस्थान सरकार और कांग्रेस संगठन में फेरबदल देखने को मिल सकता है. यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि इस बदलाव के संकेत खुद राजस्थान प्रभारी महासचिव अविनाश पांडेय ने दिए हैं.

पांडेय ने आलाकमान के निर्देशों के तहत राजस्थान में लोकसभा चुनाव के दौरान एक-एक गतिविधियों की खुफिया रिपोर्ट तैयार की है जिसे वे राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को सौपेंगे. रिपोर्ट में राहुल गांधी को वॉर रूम से लेकर चुनाव प्रचार, मंत्रियों और विधायकों का रोल जैसे फीडबैक दिए जाएंगे. यह रिपोर्ट पर्यवेक्षकों और प्रत्याशियों से मिले फीडबैक के आधार पर तैैयार की गई है. देश में अंतिम चरण का मतदान खत्म होने के बाद पांडे्य यह रिपोर्ट राहुल को हैंडओवर कर देंगे.

आलाकमान से होगी चर्चा
रिपोर्ट आने के बाद राहुल गांधी अपने लेवल पर इसका मंथन करेंगे. उसके बाद प्रभारी अविनाश पांडेय, सीएम अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ सचिन पायलट के साथ सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेेल को लेकर चर्चा होगी. रिपोर्ट के तहत जिन विधायकों और मंंत्रियों की परफॉर्मेंस अच्छी होगी, उन्हें पदोन्नत किया जाएगा.

वहीं जिन्होंने भितरघात किया, उनके खिलाफ कड़ा एक्शन लेते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने के पूरे आसार हैं. यानी भितरघात करने वाले विधायकों के मंत्री बननेे के चांस बेहद कम हो जाएंगे. मंत्रियों पर मंत्रिमंडल से बाहर होने की तलवार भी लटक सकती है.

परफोर्मेंस बनेगा पैमाना
अगर प्रभारी के संकेतों को समझा जाए तो यही निकलकर सामने आ रहा है कि गहलोत मंत्रिमंडल में फेरबदल या विस्तार तय है. परफॉर्मेंस देने वाले विधायकों को मंत्री बनाया जाएगा और नहीं देने वालों को हटाया जाएगा. हालांकि मंत्रिमंडल में फेरदबल और विस्तार में इतनी जल्दबाजी नहीं होने की बातेें भी सामने आ रही है. ऐसे में अंदेशा यही है कि यह फेरबदल दिवाली तक हो सकता है. यह भी माना जा रहा है कि मंत्रियों की फेहरिस्त में कई नए चेहरों को भी शामिल किया जा सकता है. वहीं कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जाने के आसार हैं.

मिलेगा नया पीसीसी चीफ
चुनावी परिणाम से पहले यह चर्चा भी कांग्रेस में गर्म हैं कि क्या अब पीसीसी को नया मुखिया मिलेगा, क्योंकि सचिन पायलट को इस पद पर रहते हुए पांच साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है. जानकारों का यह भी कहना है कि सचिन पायलट खुद इस पद पर रहने को लेकर ज्यादा इच्छुक नहीं हैं. इसकी वजह है- पायलट के पास डिप्टी सीएम होने के साथ अन्य विभाग भी हैं.

हालांकि इन बातों की पुष्टि अभी कोई नहीं कर रहा है. कईं नेताओं का ऑफ द रिकॉर्ड कहना है कि जुलाई बाद नया पीसीसी चीफ जरुर बनेगा.

राहुल ने मोदी पर ली चुटकी, पूछा- क्या बारिश में सभी विमान हो जाते हैं रडार से गायब?

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सियासत में बयानों का बड़ा महत्व है. कई बार ऐसा होता है कि बयान नेता के लिए परेशानी का सबब बन जाता है. ऐसा ही कुछ प्रकरण प्रधानमंत्री नरेंद मोदी के साथ हुआ है. पीएम मोदी ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान बादल छाए रहने से भारतीय वायुसेना के विमानों को रडार से बचने में मदद मिली थी. उनके इस बयान पर राहुल गांधी ने चुटकी ली है. राहुल गांधी ने बयान पर कहा, ‘मोदीजी के अनुसार जब भी भारत में तुफान और बारिश आती है तो सारे विमान रडार की रेंज से बाहर हो जाते है.’ अभिनेता अक्षय कुमार को … Read more

सिख दंगों की इस कहानी से अधिकतर लोग हैं बेखबर

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सैम पित्रोदा के ‘हुआ तो हुआ’ वाले बयान ने देशभर में फिर से 1984 में हुए सिख दंगों की यादों को ताजा कर दिया. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद भड़के उन दंगों ने देश में एक बाद फिर से राजनीति में भूचाल सा ला दिया है. असल में उन दंगों के पीछे एक कहानी है जो अधिकतर लोगों को पता ही नहीं है. 1978 के एसजीपीसी चुनावों में कांग्रेस के नेता ज्ञानी जैल सिंह ने एक भस्मासुर को समर्थन दिया था. यह भस्मासुर कोई और नहीं बल्कि दल खालसा का चीफ जरनैल सिंह भिंडरांवाले था.

जरनैल सिंह भिंडरांवाले कोई देवता नहीं बल्कि उस वक्त भारत को तोड़कर अलग खालिस्तान की मांग कर रहा था. वैसे ही जैसे आज कश्मीर के अलगाववादी कर रहे हैं. 1971 के युद्ध के बाद उसकी अलग खालिस्तान की मांग को पाकिस्तान परोक्ष रूप से समर्थन दे रहा था. देश के भीतर अकाली दल उसके साथ खड़ी थी.

1982 में भिंडरावाले ने हरमंदिर साहिब स्थित सिखों की प्रतिष्ठित संस्था दमदमी टकसाल पर कब्जा कर लिया और अकाली दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया. अकाली दल के साथ उसका यह गठबंधन एक तरह से आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पर जनादेश की मांग था जहां अलग खालिस्तान का समर्थन किया गया था.

खैर, वह अपनी इस योजना में सफल नहीं हो सका. हरमंदिर साहब में सेना ने घुसकर भिंडरावाले को खत्म कर दिया. लेकिन भिंडरावाले तो भस्मासुर था और उसके रक्तबीज आज भी मौजूद हैं. इतने सालों बाद भी अलग खालिस्तान की मांग खत्म नहीं हुई है. आज भी सिखों का एक वर्ग ऐसा है जो भिंडरावाले को ‘संत’ मानता है. उस वक्त भिंडरावाले को खत्म करने की कीमत इंदिरा गांधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी.

दिल्ली में 1984 का सिख विरोधी दंगा इसी पृष्ठभूमि में हुआ था. आप कल्पना कर सकते हैं लोगों के मन-मानस में सिखों के प्रति कितना गुस्सा रहा होगा. अगर आज कश्मीर के अलगाववादियों के खिलाफ इतना गुस्सा है तो इससे कई गुना ज्यादा गुस्सा उस वक्त सिख अलगाववादियों के खिलाफ था. इसकी वजह रही कि सिखों से किसी को उम्मीद नहीं रही थी कि वो देश को तोड़ने की बात करेंगे.

इसी दबे हुए गुस्से को हवा दे दी इंदिरा गांधी की हत्या ने. दिल्ली में सिखों का कत्लेआम हुआ, ये बात सही है लेकिन इस परिस्थिति के लिए सिखों का एक वर्ग भी जिम्मेदार था. क्रिया प्रतिक्रिया का ये दौर करीब डेढ़ दशक तक चलता रहा. बाद के दिनों में एक सिख पुलिसवाले ने ही पंजाब से इस खालिस्तानी आतंकवाद को खत्म करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई, ये भी उतना ही सच है.

सिख दंगों का घोषित परिणाम ये हुआ कि देशभर में सिख अलगाववाद खत्म हो गया. वहीं अघोषित परिणाम ये हुआ कि चौरासी के चुनाव में राजीव गांधी को अभूतपूर्व बहुमत मिला. तीन चौथाई सीटें कांग्रेस को मिली. यह फायदा कुछ वैसा ही था जैसे 2002 के दंगों का फायदा आज तक मोदी को मिल रहा है. बात कड़वी है लेकिन सच्चाई यही है. अगर गुजरात का मुस्लिम विरोधी दंगा क्रिया की प्रतिक्रिया थी तो दिल्ली का सिख विरोधी दंगा भी क्रिया की प्रतिक्रिया ही थी. दोनों जगहों पर सामाजिक प्रतिक्रिया मुखर हुई जिसका राजनीतिक दलों ने अपने-अपने लाभ के मुताबिक समर्थन या विरोध किया.

खैर… वो इतिहास का ऐसा काला अध्याय है जिसके पन्ने पलटने से कुछ हासिल नहीं होगा. लेकिन आज राजनीतिक रूप से जो बीजेपी सिख दंगों के लिए कांग्रेस को दोषी करार दे रही है, उस वक्त कांग्रेस बीजेपी पर आरोप लगा रही थी कि वह देश के टुकड़े करने वालों का साथ दे रही है. कर्नाटक के शिमोगा की एक रैली में राजीव गांधी ने कहा था, ‘बीजेपी न जाने क्यों देश को तोड़ने की बात करने वालों का साथ दे रही है. फिर चाहे वह सीपीआईएम हो या अकाली दल.’

राजीव गांधी के इस बयान का उस वक्त कितना खतरनाक मतलब था, इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं जैसे कोई राजनीतिक दल आज कश्मीर में सैयद अली शाह गिलानी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतर जाए.

फिर एक बड़ी भूमिका में नजर आएंगेे गहलोत, आलाकमान ने सौंपी बड़ी जिम्मेदारी

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इस बार का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए करो या मरो जैसा है. इसी के चलते सियासत के जादूगर और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को चुनावी परिणाम आने से पहले कांग्रेस आलाकमान ने एक और अहम जिम्मेदारी दी है. राहुल गांधी ने खास टास्क देते हुए गहलोत को यूपीए के दलों और अन्य विपक्षी दलों से बातचीत करते हुए उन्हें साधने की जुगत में लगा दिया है. गहलोत के साथ कोषाध्यक्ष अहमद पटेल को भी इस काम में शामिल किया है. लिहाजा गहलोत ने दिल्ली में दो दिन डेरा डालते हुए इस रणनीति पर काम शुरु कर दिया है. हालांकि गहलोत अब जयपुर लौट आए हैं लेकिन फोन के जरिए लगातार अन्य दलों के प्रमुख नेताओं से संपर्क में बने हुए हैं.

दिल्ली में गहलोत ने अहमद पटेल से पहले हर राज्य के संभावित परिणाम पर मंत्रणा की. उसके बाद जोधपुर हाउस में कईं अन्य दलों के नेताओं से गुप्त मुलाकात भी की. बता दे कि कर्नाटक और गुजरात सहित कई राज्यों में गहलोत संकटमोचक की भूमिका में पार्टी के लिए उभरकर सामने आए थे, जिनकी बदौलत उन्हें फिर से राजस्थान का मुख्यमंत्री का दायित्व ​सौंपा गया.

केंद्र में कांग्रेस की संभावित सरकार बनाने के आधार में जुटे गहलोत
दिल्ली में अहमद पटेल से चर्चा करने के बाद चाणक्य गहलोत यूपीए सरकार बनाने के आंंकड़े पर काम में जुट गए हैं. गहलोत सहित कांग्रेस के कद्दावर नेताओं का मानना है कि बीजेपी इस बार केवल 200 सीटें ही जीत पाएगी. ऐसे में यूपीए के अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई जा सकती है. सहयोगी दलों की सीटें कम पड़ने पर गैर यूपीए-एनडीए दल या फिर एनडीए के साथ वाली पार्टियों को कैसे तोड़ा जाए, इस कार्य में सियासी जादूगर का अनुभव और सहयोग लिया जाए. अगर कांग्रेस की उम्मीदों के तहत बीजेपी की गाड़ी 200 सीटों पर अटक जाती है तो फिर गहलोत जैसे वरिष्ठ नेताओं का लंबा सियासी तजुर्बा और उनकी अन्य दलों से ट्यूनिंग यूपीए की सरकार बनानेे में मददगार साबित होगी.

अगर बीजेपी 225 सीटों का आंकड़ा पार करती है तो नरेंद्र मोदी को पीएम बनने से कैसा रोका जाए, इसमें जादूगर के दांवपेंच बेहद काम आ सकते हैं. गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता ही अन्य दलों को बीजेपी के किसी अन्य नेता को पीएम प्रोजेक्ट के लिए आगे करने की शर्त के लिए तैयार करा सकते हैं.

गहलोत के साथ अन्य वरिष्ठ नेता भी देखेंगे काम
अशोक गहलोत के साथ कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को भी ऐसी जिम्मेदारियां दी गई हैं. गहलोत के साथ अहमद पटेल, एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल, पी.चिदंबरम, मुकुल वासनिक और गुलाम नबी आजाद आदि उन प्रमुख नेताओं की लिस्ट में शामिल हैं जो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के निर्देश पर चुनावी गणित के आंकड़ों को देख रहे हैं. गहलोत ने दो दिन दिल्ली में नेताओं के साथ बंद कमरे में बैठक करते हुए गहनता से हर राज्य की लोकसभा सीटों के संभावित परिणाम को लेकर फीडबैक जुटाया है. वैसे भी गहलोत के राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं से अच्छे रिश्ते जगजाहिर हैं.

कर्नाटक-गुजरात में गहलोत ने दिखाया था जलवा
बताया जा रहा है कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद जेडीएस को देने का आईडिया अशोक गहलोत ने ही दिया था. इस पर आलाकमान ने उन्हें फ्री हैंड दे दिया. उसके बाद गहलोत ने कर्नाटक में कई दिनों तक डेरा डालते हुए कांग्रेस के समर्थन से जेडीएस की सरकार बना डाली. उससे पहले गुजरात के प्रभारी रहते हुए उन्होंने पीएम मोदी के गृहराज्य में मजबूती से विधानसभा चुनाव लड़ते हुए एक बार तो बीजेपी के छक्के छुड़ा दिए थे. यह गहलोत की रणनीति का ही कमाल था कि कांग्रेस 80 सीटों तक पहुंच गई. उसके बाद से गहलोत आलाकमान के लिए एक बार फिर आंखों का तारा बन गए.