लोकसभा में हार के बाद पहली बार अमेठी पहुंचेंगे राहुल गांधी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी कल अमेठी दौरे पर रहेंगे. वे गौरीगंज के एक इंस्टीट्यूट में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक कर चुनाव में हुई हार की समीक्षा करेंगे. लोकसभा चुनाव हारने के बाद यह उनका पहला अमेठी दौरा है. अमेठी गांधी परिवार की परम्परागत सीट है जहां से राहुल गांधी खुद तीन बार सांसद रहे हैं. हाल में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में उन्हें बीजेपी की स्मृति ईरानी ने 50 हजार से अधिक वोटों से मात दी है. राहुल गौरीगंज के निर्मला इंस्टीट्यूट ऑफ वूमेन एजूकेशन एंड टेक्नोलॉजी में दोपहर 12 से तीन बजे तक कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगे. इस दौरान राहुल गांधी जिला से लेकर ग्राम स्तर के पदाधिकारियों … Read more

‘युवा कप्तान या ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ के फेर में फंसी कांग्रेस

राहुल गांधी के इस्तीफा सार्वजनिक करने के बाद भी लगता है जैसे कांग्रेस के कप्तान पर अभी तक सबकी एकमत राय नहीं बन पा रही है. राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद नए कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अब तक अशोक गहलोत, मल्लिकार्जुन खड़गे, सुशील कुमार शिंदे, के.सी.वेणुगोपाल और मोतीलाल वोरा के नाम सामने आ चुके हैं.  लेकिन इनमे से किसी के भी नाम पर कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) ने मुहर नहीं लगाई है. कांग्रेस की नाव का नया खेवनहार कौन होगा, इसपर बहस चल ही रही थी कि एक नया बखेड़ा और खड़ा हो गया है.

पंजाब के मुख़्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एक बयान देकर सभी की नींदे उड़ा दी है. कैप्टन ने कहा है कि ‘राहुल गांधी का पद छोड़ने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है. अब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में एक गतिशील युवा नेता की उम्मीद है. CWC से आग्रह है कि युवा भारत की युवा आबादी के लिए युवा नेता की जरूरत पर ध्यान दें.’ कैप्टन ने यह बयान सोशल मीडिया पर शेयर किया है.

अमरिंदर सिंह ने यह भी कहा है कि देश की बहुसंख्यक युवा आबादी के मद्देनजर कांग्रेस वर्किंग कमिटी को राहुल गांधी के विकल्प के तौर पर नई पीढ़ी के ऐसे नेता को कमान सौंपनी चाहिए, जो अपनी देशव्यापी पहचान और जमीन से जुड़ाव के जरिए लोगों को उत्साहित कर सके. यही नहीं, अमरिंदर ने बुजुर्ग नेताओं को नसीहत देते हुए कहा कि समय आ गया है कि पुराने लोग नए लोगों को रास्ता दें. वरना कांग्रेस मौजूदा चुनौतियों का सामना नहीं कर पाएगी.

अब इस मामले पर फिर से एक बहस छिड़ गई है. कैप्टन अमरिंदर सिंह का बयान इसलिए भी अहम है, क्योंकि पहली बार पार्टी के किसी नेता ने अगले कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर विचार रखा है. अब इस बात को गफलत में इसलिए भी नहीं रखा जा सकता क्योंकि सोशल मीडिया पर बयान आने के बाद उनके विचार सभी के पास पहुँच गए है. ऐसे में उनकी मांग को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता.

कैप्टन के ये विचार इसलिए भी अहम है क्योंकि अमरिंदर सिंह कांग्रेस सत्ताधारी राज्यों मे पहले ऐसे CM थे जिन्होंने न केवल खुद के दम पर विधानसभा चुनाव जीता बल्कि लोकसभा चुनाव में साफ तौर पर कहा था कि अगर पंजाब में उनका नेतृत्व फेल होता है तो वो पद से इस्तीफा दे देंगे. उनके इस बयान के बाद राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में हुई शर्मनाक हार के बाद यहां के मुख्यमंत्रियों को कमान सपने हाथों से जाती हुई दिख रही थी. हालांकि ऐसा कुछ हुआ नहीं.

अभी तक नए कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर जितने भी नाम सामने आये हैं, वे सभी नाम ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ कांग्रेस के नाम जैसे ही है. मोतीलाल वोरा (90) साल के है. अशोक गहलोत (68), मल्लिकार्जुन खड़गे (76) और सुशील कुमार शिंदे (77) कोई भी युवा नहीं है. अगला नाम है के.सी.वेणुगोपाल जो 56 साल के है और काफी हद तक इस जिम्मेदारी को वहन करने की काबिलियत भी रखते है लेकिन युवा तो ये भी नहीं है.

अब कैप्टन के इस बयान ने सवाल तो खड़ा कर ही दिया कि अगर उनकी बात पर गौर किया जाए तो आखिर कांग्रेस के पास युवा नेताओं के तौर पर कौन से चेहरे हैं? इनमें सबसे पहले राजस्थान के डिप्टी CM के साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट और पार्टी के महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम आता है. उनके पास पश्चिमी यूपी का प्रभार है. मुकुल वासनिक के रूप में कांग्रेस एक और महासचिव को इस सूची में शामिल किया जा सकता है.

जहां तक प्रियंका गांधी का सवाल है तो वो इस रेस में इसलिए नहीं हैं क्योंकि राहुल गांधी चाहते हैं कि उनके बाद पार्टी अध्यक्ष गांधी परिवार के बाहर का नेता बने. ऐसे में देश के राजनैतिक पटल पर 60 साल तक एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस की पतवार युवा कप्तान या ग्रैंड ओल्ड पार्टी के भंवर में एकबार फिर फंसते हुए नजर आ रही है.

कांग्रेस अध्यक्ष पर कैप्टन अमरिंदर का बड़ा बयान, युवा नेता को अध्यक्ष बनाने की मांग

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पंजाब के मुख़्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एक बयान देकर सभी की नींदे उड़ा दी है. कैप्टन ने कहा है कि ‘राहुल गांधी का पद छोड़ने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है. अब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में एक गतिशील युवा नेता की उम्मीद है. CWC से आग्रह है कि युवा भारत की युवा आबादी के लिए युवा नेता की जरूरत पर ध्यान दें.’ कैप्टन ने यह बयान सोशल मीडिया पर शेयर किया है. कैप्टन अमरिंदर सिंह का बयान इसलिए भी अहम है, क्योंकि पहली बार पार्टी के किसी नेता ने अगले कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर विचार रखा है. अमरिंदर सिंह ने कहा, ‘देश की बहुसंख्यक युवा आबादी के मद्देनजर कांग्रेस वर्किंग … Read more

यह होंगी कांग्रेस अध्यक्ष की जरूरी योग्यताएं…

राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद की कुर्सी संभालने से साफ मना कर दिया है. इसी के चलते उन्होंने अपने ट्वीटर अकाउंट पर अपना इस्तीफा शेयर कर दिया. उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह भी कह दिया कि एक महीने के भीतर नए अध्यक्ष का चुनाव कर लिया जाए. यही वजह है कि सोनिया गांधी और कांग्रेस नेताओं को अब लगने लगा है कि राहुल तो अब मानेंगे नहीं तो इसलिए नया अध्यक्ष चुनने में ही भलाई है.

राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद यह तो तय है कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष गांधी परिवार से बाहर का होगा, लेकिन यह नहीं पता कौन होगा. गांधी परिवार से बाहर के किसी नेता को कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले कई योग्यताओं को पुरा करना होगा, इसके बाद ही उसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर ताजपोशी हो पायेगी.

गांधी परिवार के प्रति वफादारीः
कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए नेहरू-गांधी परिवार के प्रति वफादारी पहली कसौटी है, जिस पर खरा उतरे बगैर किसी भी नेता को पार्टी की कमान नहीं मिल सकती है. कांग्रेस का अगला अध्यक्ष वही होगा जो गांधी परिवार के नजदीक होगा, हालांकि 30 साल के लंबे समय से गांधी परिवार का कोई भी सदस्य प्रधानमंत्री नहीं बना है. लेकिन 2004 से 2014 तक यानी 10 साल तक केंद्र में कांग्रेस-यूपीए की सरकार थी, गांधी परिवार के बाहर के मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे. लेकिन उस समय भी सत्ता की चाबी गांधी परिवार यानि सोनिया गांधी के पास ही रही. अब राहुल गांधी कांग्रेस संगठन को इसी तर्ज पर गांधी परिवार से मुक्त करना चाहते है. वो पार्टी की कमान अपने सबसे भरोसेमंद साथी के हाथों में सौंपना चाहते है ताकि जब भी वो चाहे पुनः कांग्रेस की कमान अपने हाथ में ले पायें.

राष्ट्रीय पहचानः
राहुल गांधी के विकल्प में कांग्रेस को ऐसे नेता की तलाश है, जिसकी पहचान राष्ट्रीय स्तर की हो. दरअसल कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है, जिसका राजनीतिक रुप से फैलाव उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक के सभी राज्यों में फैला हुआ है. इसी वजह से कांग्रेस ऐसे नेता को अध्यक्ष बनाएंगी जो देश के हर हिस्से में अपनी पहचान रखता हो.

हिंदी भाषी राज्य से होः
कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के लिए सबसे जरुरी योग्यता यह है कि अध्यक्ष बनने वाले नेता की हिंदी भाषा पर अच्छी पकड़ होनी चाहिए. इसके पीछे मकसद है कि वो उत्तर भारत के लोगों तक अपनी बातों को असानी से पहुंचा सके, जिस प्रकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह अपनी बातों को समझने में सफल रहते हैं. ठीक उसी प्रकार वो भी अपनी बात जनता को समझाने में कामयाब रहे. कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा उम्मीद इन्हीं हिंदी भाषी राज्यों से थी, लेकिन यहां के नतीजे उसके अनुमान के बिल्कुल उलट आए.

संघर्षशील नेताः
सोनिया गांधी और राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए सड़क पर संघर्ष करते कम नजर आए हैं, हालांकि राहुल आखिर के दिनों में कई बार जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर सड़क पर नजर आए. लेकिन सोनिया गांधी अपने कार्यकाल के दौरान एक बार भी ऐसा करती नजर नहीं आई. कांग्रेस लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के लिए इसको भी जिम्मेदार मानती है. इसीलिए वो इस बार ऐसे नेता को अध्यक्ष बनाने पर विचार कर रही है, जो सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतरकर संघर्ष करें और सरकार को घेर सके.

क्या इस्तीफा देकर राहुल गांधी ने साधे हैं एक तीर से कई निशाने

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राहुल गांधी ने हाल में सोशल मीडिया पर अपना इस्तीफा शेयर कर उन अटकलों को समाप्त कर दिया है जिसमें यह माना जा रहा था कि वे अपने फैसले पर फिर से विचार कर सकते हैं. हालांकि उनके इस्तीफा देने से पार्टी नेतृत्व विहिन हो गई है. राहुल के इस्तीफा देने के बाद विपक्ष उन्हें युद्ध में हथियार डालने वाला सिपाही बता रहा है.

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों ने राहुल गांधी के इस फैसले को सरासर गलत और जोखिम वाला बताया है. यह भी कहा जा रहा है कि ऐसा करके उन्होंने अपने राजनीतिक करियर के साथ एक बड़ा रिस्क लिया है. वहीं एक तबका वो भी है जिनका कहना है कि राहुल गांधी ने इस्तीफा देकर एक तीर से कई निशाने साध दिए हैं.

थोड़ा अटपटा जरूर है लेकिन एकदम सही है. हाल में हुए लोकसभा चुनावों में विपक्ष ने कांग्रेस पर सबसे बड़ा प्रहार वंशवाद को लेकर किया था. विपक्ष के इस हमले का तोड़ किसी भी कांग्रेसी नेता या यूं कहें कि खुद राहुल गांधी के पास भी नहीं था. चुनाव के नतीजों से यह साफ झलकता है. इस्तीफा देकर और साफ तौर पर किसी गैर गांधी सदस्य को अध्यक्ष पद सौंपकर राहुल गांधी ने विपक्ष पर एक जवाबी हमला कर दिया है.

यह बात सही है कि लंबे समय से पार्टी के शीर्ष पद पर गांधी परिवार का ही कोई सदस्य विराजमान है. लेकिन इसका गहरा असर अन्य नेताओं पर पड़ रहा है. ‘गांधी परिवार’ के सिवा पार्टी के बाकी नेता मेहनत नहीं करना चाहते जबकि दूसरी पार्टियों में नेता से लेकर कार्यकर्ता तक संघर्ष करते नजर आते हैं.

अब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ साफ संकेत दे दिए हैं कि अगर पार्टी को जीत दर्ज करनी है तो सबको मेहनत करनी होगी. जिस प्रकार 1989 के बाद गांधी परिवार का कोई भी सदस्य प्रधानमंत्री नहीं बना है, अब उसी तर्ज पर कांग्रेस संगठन को गांधी परिवार से मुक्त रखने का कदम उठाया जा रहा है ताकि सभी को बराबरी का मौका मिल सके.

देखा जाए तो यह बात भी काफी हद तक सही है की राहुल का डर भी कांग्रेस नेताओं के बीच उस तरह का नहीं है जिस तरह का भय केंद्रीय नेतृत्व का होना चाहिए. इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी बहुत ज्यादा लिबरल हैं. यही वजह है कि वह अपनी बातों को सख्ती से मनवा नहीं पाते. राजस्थान और मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पद की लड़ाई इस बात को पुख्ता तौर पर बयां करती है.

अगर इतिहास पर गौर करें तो इंदिरा गांधी पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदल देती थी लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने दिल्ली में शीला दीक्षित और असम में तरुण गोगई को 15 साल तक मुख्यमंत्री बने रहने दिया. इसका खामियाजा क्या हुआ, वह सामने है.

2014 के लोकसभा चुनाव में राज्यों की आंतरिक राजनीति कांग्रेस को ले डूबी. हालांकि उस समय सोनिया गांधी कांग्रेस की सर्वेसर्वा थी लेकिन चला राहुल गांधी ही रहे थे. 2017 में ताजपोशी के बाद यह उनका पहला लोकसभा नेतृत्व था लेकिन हाल पहले से भी बुरा रहा. लेकिन अब राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष नहीं रहने के बाद भी मास लीडर के तौर पर उनकी अहमियत रहेगी.

राहुल गांधी इस बात को भलीभांति समझ रहे हैं कि आज कांग्रेस जिस हालत में है, चेहरा बदले बगैर नरेंद्र मोदी और अमित शाह से मुकाबला नहीं किया जा सकता. वहीं कांग्रेस में कई ऐसे मठाधीश नेता भी हैं जिनके चलते राहुल गांधी अपने फैसलों को पार्टी में लागू नहीं कर पा रहे थे. अब राहुल गांधी परदे के पीछे रहकर कांग्रेस में बने अलग-अलग पावर सेंटर की बेड़ियों को तोड़ने के साथ ही बीजेपी के नैरेटिव को भी तोड़ने का काम करेंगे.

नए कांग्रेस अध्यक्ष के बाद भी उनकी भूमिका में कोई खास फर्क नहीं आएगा लेकिन दोहरा दवाब पॉलिसी के चलते राहुल गांधी न केवल स्टेट पॉलिटिक्स को नियंत्रित कर पाएंगे, साथ ही कांग्रेस की आगामी रणनीति पर भी फोकस कर पाएंगे.

उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने महासचिव पद से दिया इस्तीफा

harish rawat

राहुल गांधी के इस्तीफा देने के बाद एक बार फिर कांग्रेस पार्टी में इस्तीफों की झड़ी लगने वाली है. आज इसकी शुरुआत हो चुकी है. आज सुबह पहले हरियाणा के वरिष्ठ नेता कुलदीप विश्नोई ने cwc सदस्य के पद से इस्तीफा दे दिया. कुलदीप के बाद अब उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया. इस्तीफा देते हुए हरीश रावत ने कहा कि राहुल गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहना चाहिए ताकि 2024 में बीजेपी का मुक़ाबला किया जा सके. हरीश रावत ने अपने इस्तीफे की जानकारी ट्वीटर अकाउंट के माध्यम से दी. हरीश रावत ने पोस्ट में लिखा, ‘लोकसभा चुनाव में … Read more

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बनेंगे कांग्रेस अध्यक्ष!

कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से सार्वजनिक तौर पर राहुल गांधी इस्तीफा दे चुके हैं. कल उन्होंने अपना इस्तीफा ट्वीटर पर शेयर कर दिया था. हालांकि, कांग्रेसी दिग्गजों की तरफ से राहुल को मनाने की कई बार कोशिशे की गई. लेकिन राहुल आखिर तक अपने फैसले पर अड़े रहे. राहुल के इस्तीफे के बाद अब पार्टी के भीतर नए अध्यक्ष को लेकर चर्चा शुरु हो गई है. यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के साथ पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता इस पद के लिए उपयूक्त चेहरे की तलाश में लग गए हैं. वहीं कांग्रेस के नए अध्यक्ष को लेकर कयासों का बाजार भी गर्म है. कांग्रेस के नए अध्यक्ष को लेकर कई नामों … Read more

कांग्रेस के साथ कुछ भी नहीं हो रहा है सही, अब गुजरात में विधायकों पर पड़ रहा ‘डाका’

जब से लोकसभा चुनाव के नतीजे आए हैं, लगता है कांग्रेस की किस्मत सो गई है. कुछ भी पार्टी के लिए सही नहीं हो रहा है. एक तो पहले से ही राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर बैठे हैं, जिससे पार्टी की बागड़ौर कमजोर हो गई है. वहीं दूसरी ओर, लगातार कांग्रेस शासित प्रदेशों में विधायकों पर हो रही डकैती दिल्ली में बैठे नेताओं की नींदे हराम कर रही है. आए दिन कोई न कोई कांग्रेसी विधायक पार्टी से इस्तीफा दे रहा है या फिर गायब हो रहा है. ऐसे में कांग्रेस पर चुनिंदा राज्यों में सरकार खोने का खतरा भी मंडराने लगा है.

फिलहाल राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब और पांडिचेरी में कांग्रेस सरकार है जबकि कर्नाटक में जेडीएस के कुमार स्वामी के साथ साझा सरकार है. मध्यप्रदेश में भी पार्टी की सरकार बसपा विधायकों के सहारे टिकी हुई है. लोकसभा चुनाव में करारी शिख्स्त के बाद करीब-करीब सभी राज्यों में कांग्रेस के विधायकों के इस्तीफे और पार्टी छोड़ने का दौर लगातार जारी है. इनमें से अधिकतर विधायक बीजेपी की ओट में जाकर छिप रहे हैं.

यह घटनाक्रम गुजरात और कर्नाटक में ज्यादा देखा जा रहा है. हाल ही में कर्नाटक में तीन कांग्रेसी विधायकों पार्टी से इस्तीफा दे दिया. शेष बचे विधायकों को बचाने के लिए पूर्व सीएम सिद्धारमैया प्रयासों में लगे हैं. अब यह दिक्कत गुजरात में भी आ खड़ी हुई है. गुजरात विधानसभा से लेकर अब तक कांग्रेस के 7 विधायक पार्टी से इस्तीफा दे चुके हैं. अब खबर आ रही है कि 18 अन्य विधायक भी इसी लाइन में खड़े हैं.

हाल ही में कांग्रेस के पूर्व सदस्य अल्पेश ठाकोर ने एक नया बयान देकर कांग्रेस खेमे की मुश्किलों को और हवा दे दी है. दरअसल अल्पेश ने कहा है कि गुजरात में 18 कांग्रेसी विधायक पार्टी छोड़ने का मन बना रहे हैं. इससे कांग्रेसी खेमा एकदम से एक्टिव हो गया है और अपने शेष विधायकों को बचाने की कोशिशों में जुट गया है. इस बयान को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के गुजरात दौरा करने की खबर से और हवा मिल रही है.

बता दें, इसी महीने में गुजरात राज्यसभा की दो सीटों पर उपचुनाव होने हैं. अमित शाह और स्मृति ईरानी के लोकसभा पहुंचने से यह सीटें खाली हुई हैं. पहले भी इन दोनों सीटों पर एक साथ चुनाव कराने को लेकर कांग्रेस हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुकी है लेकिन उनकी याचिका खारिज कर दी गई. अब बीजेपी कांग्रेसी विधायकों को अपनी तरफ करने का प्रयास कर रही होगी, इस बात में कोई संदेह नहीं है.

राहुल गांधी के कांग्रेस पद से इस्तीफा देने के बाद से पार्टी एक तरह से नेतृत्व विहीन हो चुकी है. ऐसे में पार्टी के दिग्गज़ नेता अहमद पटेल ने कांग्रेस में आए इस प्रवाह को रोकने की जिम्मेदारी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सौंपी हैं. गहलोत को अनुभवी राजनीतिज्ञ और रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता है जिनका कोई वार कभी खाली नहीं गया. गुजरात विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने अपने अनुभव से बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी.

अब अशोक गहलोत ने गुजरात में कांग्रेसी विधायकों की बाड़बंदी गुजरात में नहीं बल्कि राजस्थान में करने की योजना बनाई है. उन्होंने गुजरात में उपस्थित सभी कांग्रेसी विधायकों को माउंट आबू पहुंचने का फरमान सुनाया है. यहां उन्हें सैर सपाटे के लिए बल्कि दो दिन की घेराबंदी के लिए बुलाया है. सभी विधायकों को अचलगढ़ की एक निजी होटल में रखा जाने की सूचना है.

अब गहलोत की यह रणनीति कितनी काम आएगी, इसका तो पता नहीं लेकिन यह पता जरूर चल गया है कि सच में कांग्रेस का अब कोई ठोर-ठिकाना नहीं बचा है. कांग्रेस अध्यक्ष का चयन भी खटाई में पड़ा हुआ है. आगामी कुछ महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव भी होने हैं. ऐसे में कांग्रेस का लोकसभा चुनाव की हार भूल फिर खड़े होकर बीजेपी की आंधी का सामना करना आसान काम नहीं लग रहा है.