राजस्थान: इन 6 नेताओं और संघ की मेहनत से प्रदेश में खिलेगा कमल

तमाम एग्ज़िट पोल राजस्थान में बीजेपी को 25 में से 19 या उससे भी ज्यादा सीटें दे रहे हैं. हालांकि इस बात में कोई शक नहीं है कि बीजेपी प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन करने जा रही है. इसका क्रेडिट जाता है बीजेपी के छह प्रमुख नेताओं को. पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह, प्रकाश जावड़ेकर, वसुंधरा राजे, सुंधाशु त्रिवेदी और चंद्रशेखर ने विधानसभा चुनाव में हार होने के बावजूद राज्य में बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाया.

मोदी ने जहां ताबड़तोड़ सभाएं करते हुए अपने भाषणों से कार्यकर्ताओं को जोश दिलाया. शाह के नेतृत्व में मजबूत रणनीति को इन नेताओं ने अंजाम दिया. वसुंधरा राजे ने टिकट वितरण से लेकर प्रचार तक कमान संभाले रखी. वहीं संघ ने कमजोर सीटों पर विशेष फोकस रखते हुए प्रत्याशियों को जीत की दहलीज पर ला खड़ा किया. अगर एग्ज़िट पोल के दावे नतीजों में तब्दील होते हैं तो बीजेपी का कम से कम 20 सीटों पर जीत तय है. पांच महीने पहले ही विधानसभा चुनाव में हारने वाली बीजेपी का कांग्रेस पर यह करारा पलटवार होगा.

आइए जानते हैं प्रदेश में कमल खिलाने में बीजेपी के किन छह नेताओं का अहम योगदान रहा …

पीएम नरेंद्र मोदी
बीजेपी की अगर एग्ज़िट पोल के तहत 20 सीटें आ रही हैं तो इसके रियल हीरो होंगे पीएम मोदी. मोदी का चेहरा और राष्ट्रवाद बीजेपी के लिए राजस्थान में संजीवनी बूंटी बन गया. हर प्रत्याशी बस ‘मोदी को ही वोट’ देने की रट लगा रहा था. जहां बीजेपी कमजोर थी, वहां मोदी ने ताबड़तोड सभाएं करते हुए अपने प्रत्याशियों को टक्कर में ला दिया. मोदी ने अपने ओजस्वी भाषण से कार्यकर्ताओं में जोश फूंक दिया. यह मोदी का ही करिश्मा था कि राजस्थान में फर्स्ट टाइमर्स वोटर्स थोक के भाव बीजेपी के पाले में गए.

अमित शाह
प्रदेश में कमल खिलाने में नरेंद्र मोदी के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का अहम रोल रहा. शाह ने विधानसभा चुनाव में हार की भनक लगते ही राजस्थान पर ध्यान देना शुरु कर दिया था. इसके लिए शाह लगातार राजस्थान में दौरे करते रहे. इस दौरान शाह ने मौजूदा सांसदों की परफॉर्मेंस जानी. शाह ने ही रणनीति के तहत प्रकाश जावड़ेकर को राजस्थान चुनाव का प्रभारी बनाने का फैसला लिया. शाह की राय से ही टिकट वितरण से लेकर प्रचार प्रसार की रणनीति को अंजाम दिया गया था.

प्रकाश जावड़ेकर
केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर आलाकमान के चयन पर एकदम खरे साबित होते दिख रहे हैं. हर टास्क को जावड़ेकर ने बखूबी अंजाम दिया. जावड़ेकर ने कमान तब संभाली जब विधानसभा चुनाव में बीजेपी हार चुकी थी. जावड़ेकर ने हर सियासी और जातिगत समीकरण पर फोकस रखा. जातिगत समीकरण साधने के लिए नागौर की सीट हनुमान बेनीवाल को देने की चाल जावड़ेकर की ही थी. इसका फायदा बीजेपी को कईं सीटों पर मिलता दिख रहा है.

सुधांशु त्रिवेदी
सुधांशु त्रिवेदी को सहप्रभारी बनाकर चुनाव से पहले राजस्थान में भेजा गया था. त्रिवेदी ने हर जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए लगातार गहलोत सरकार पर आक्रामक हमले किए. कर्ज माफी और युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने जैसे वादों की जमकर पोल खोली. साथ ही जमकर केंद्रीय योजनाओं के फायदे गिनाएं. त्रिवेदी ने प्रदेश सरकार पर जमकर आरोप लगाते हुए कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाए रखा.

वसुंधरा राजेे
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का प्रदेश की हर रणनीति में अहम रोल रहा. राजे ने टिकटों के बंटवारों से लेकर जातिगत समीकरण साधने और तूफानी चुनाव प्रचार तक पूरी कमान संभाले रखी. प्रदेश के तमाम नेताओं को राजे ने एकजुट बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यहां तक की राजे नाराजगी के बावजूद राज्यवर्धन सिंह और गजेंद्र सिंह का प्रचार करने गई थी.

चंद्रशेखर
बीजेपी प्रदेश संगठन मंत्री चंद्रशेखर के प्रयास भी पार्टी के लिए काम आए. चंद्रशेखर के प्रयासों के चलते ही संघ का बीजेपी को पूरा साथ मिला. शाह के निर्देशन में चंद्रशेखर पर्दे के पीछे हर रणनीति को अंजाम देते बखूबी नजर आए. चंद्रशेखर संघ के साथ मिलकर प्रत्याशियों को जिताने में जुटे रहे. यही वजह रही कि इस बार राजस्थान में संघ ने बीजेपी के लिए जमकर पसीना बहाया.

आरएसएस का रोल
जानकारों की माने तो संघ ने पहली बार राजस्थान में सक्रिय होकर अपना रोल निभाया. इस बार वसुंधरा राजे के बजाय चुनाव की कमान केंद्रीय नेताओं के हाथ में थी इसलिए संघ ने मोदी को दोबारा पीएम बनाने के लिए जी-जान से मेहनत की. बीजेपी का जीत के लिए अन्य राज्यों के स्वयंसेवक भी राजस्थान में आए. संघ ने सबसे ज्यादा ध्यान कमजोर सीटों पर दिया. यह संघ की मेहनत का ही कमाल था कि जहां कांग्रेस लाखों से जीत का दावा कर रही थी, वहां अब जीत का टोटा पड़ रहा है. यही वजह रही कि सीएम अशोक गहलोत ने संघ को राजनीतिक पार्टी बनाने की नसीहत दे दी.

अगर एग्ज़िट पोल के दावे सही साबित होते हैं तो इन छह धुंरधंर बीजेपी नेताओं का कद बढ़ना तय है. क्योंकि भीषण गर्मी में भी इन नेताओं ने दिन-रात एक कर दिया और सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस के ‘मिशन 25’ को फेल करने की दिशा में जुट गए.

देश के ऐसे कौनसे बड़े दल हैं जो NDA के साथ जा सकते हैं, डालिए एक नजर…

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देश में लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण का मतदान खत्म होने के बाद तमाम न्यूज़ चैनल्स ने ऐजेंसियों के साथ मिलकर चुनाव के दौरान किए गए सर्वे को सामने रखा है. इनमें से ज्यादातर एग्ज़िट पोल्स ने यह अनुमान लगाया है कि देश में पुन: मोदी सरकार बनने जा रही है. लेकिन कुछ-एक एग्ज़िट पोल का यह भी मानना है कि एनडीए को पूर्ण बहुमत नहीं मिल रहा है. एनडीए को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में देश के ऐसे कौनसे बड़े दल हैं जो उनके साथ जा सकते हैं, डालिए एक नजर…

वाईएसआर कांग्रेस:
आंध्र प्रदेश में इस बार वाईएसआर कांग्रेस का प्रदर्शन काबिलेतारीफ रहने वाला है. आंध्र प्रदेश में लोकसभा चुनाव के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी हुए हैं. जगन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस यहां 19 से 21 सीट लोकसभा की सीटें जीतने जा रही है. इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि किसी को भी बहुमत नहीं मिलने की परिस्थिति में जगन रेड्डी किसके साथ जाएंगे. जगन के अभी तक के क्रियाकलापों के अनुसार तो ऐसा ही लग रहा है कि जगन दिल्ली में मोदी की गाड़ी में ही सवारी करेंगे.

टीआरएस:
तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव काफी लंबे समय से तीसरे मोर्चे को लेकर कवायद कर रहे हैं. हालांकि वो अभी तक इसमें असफल रहे है. जब कोई व्यक्ति इस समय साझा विपक्ष की कवायद को छोड़कर तीसरे मोर्चे की बात करता है, वो कहीं न कही बीजेपी को ही समर्थन कर रहा है. अनुमान भी ये ही है कि जरूरत पड़ने पर चंद्रशेखर बीजेपी के साथ चले जाएंगे.

बीजू जनता दलः
बहुमत कम रहने के स्थिति में एनडीए को जिस दल पर सबसे अधिक भरोसा है, वो है नवीन पटनायक का बीजू जनता दल. ओडिशा में बीजेडी और बीजेपी ने 10 साल तक गठबंधन सरकार चलाई है. इसलिए यह तो तय है कि चुनाव नतीजों के बाद नवीन पटनायक मोदी के साथ जाएंगे. हाल ही में नवीन पटनायक ने आपदा प्रबंधन के मामले में पीएम मोदी की जमकर तारीफ भी की थी.

दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कई दल यूपीए के साथ जा सकते हैं. इस लिस्ट में …

  • टीएमसी
  • समाजवादी पार्टी (SP)
  • बहुजन समाज पार्टी (BS)
  • राष्ट्रीय लोकदल
  • टीडीपी
  • एआईयूडीएफ
  • इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग
  • नेशनल कॉन्फ्रेंस
  • पीडीपी आदि दलों के शामिल होने की उम्मीद है.

एग्ज़िट पोल: वीआईपी सीटों पर किसके सिर बंधेगा जीत का सेहरा

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देश में 7वें चरण के मतदान के तुरंत बाद तमाम न्यूज़ चैनल्स ने अपने-अपने एग्ज़िट पोल पेश कर दिए हैं. इन चैनल्स में जो तथ्य सभी एग्ज़िट पोल में एक जैसे निकलकर सामने आए हैं, वो यह है कि देश में एक बार फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने जा रही है. एग्ज़िट पोल में यह तो बता दिया कि किस राज्य में किसकी कितनी सीटें आ रही हैं, लेकिन देश की बड़ी सीटों के परिणाम के बारे में पूरी तरह चुप रहे. हमारे इस खास आर्टिकल में हम आपको देश की बड़ी सीटों के बारे में बताएंगे कि कौन कहां से जीत रहा है…

वाराणसी
देश की सबसे चर्चित सीट वाराणसी, जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद चुनाव लड़ रहे है. यहां विपक्षी दल मोदी के खिलाफ कहीं मुकाबले में नजर नहीं आए. आकलन यह है कि मोदी यहां 2014 से भी ज्यादा मतों से चुनाव जीतेंगे. कांग्रेस और सपा के बीच दूसरे नंबर की लड़ाई दिख रही है.

रायबरेली
यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी इस बार भी रायबरेली से आसानी से चुनाव जीतती हुई दिखाई दे रही है. बीजेपी के दिनेश प्रताप सिंह यहां सोनिया गांधी के खिलाफ कहीं मुकाबले में नहीं दिखे.

अमेठी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस बार अमेठी के साथ-साथ वायनाड से भी चुनावी मैदान में है लेकिन परम्परागत सीट अमेठी में ही उनकी प्रतिष्ठा दांव पर है. हमारे अनुमान के अनुसार, यहां राहुल और स्मृति के बीच मुकाबला बहुत करीबी रहने वाला है. हालांकि यहां थोड़ा सा पलड़ा राहुल गांधी का भारी दिखाई दे रहा है.

कन्नौज
यहां से सपा की तरफ से अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव चुनाव लड़ रही है. उनका मुकाबला बीजेपी के सुब्रत पाठक से है. 2014 में डिंपल ने पाठक को करीबी अंतर से हराया था. लेकिन हमारे आकलन में इस बार सुब्रत उलटफेर करते हुए दिखाई दे रहे है. उन्हें यहां करीबी मुकाबले में जीत हासिल हो सकती है. डिंपल इससे पूर्व फिरोजाबाद से राजबब्बर के खिलाफ चुनाव हार चुकी है.

गोरखपुर
गोरखपुर में इस बार यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा दांव पर है. हमारा अनुमान यह है कि वो अपनी प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब हुए है. यह सीट बीजेपी के खाते में जाती दिखाई दे रही है.

बेगूसराय
देश की चर्चित सीटों में से एक बेगूसराय में मुकाबला काफी दिलचस्प रहा. कन्हैया कुमार ने यहां अपने पक्ष में माहौल बनाने की काफी कोशिशे की. लेकिन उनका यह अथा प्रयास गिरिराज सिंह को कमजोर नहीं कर पाया. यहां से बीजेपी के गिरिराज सिंह आसानी से चुनाव जीतते दिखाई दे रहे है.

पाटलिपुत्र
पाटलिपुत्र में मुकाबला इस बार भी 2014 के उम्मीदवारों के बीच देखने को मिल रहा है. यहां चुनावी टक्कर बीजेपी से केन्द्रीय मंत्री रामकृपाल यादव और राजद से मीसा भारती के बीच है. मीसा भारती बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालु यादव की बेटी है. 2014 में मीसा भारती को रामकृपाल यादव से हार का सामना करना पड़ा था. हमारे अनुमान के अनुसार, इस बार भी नतीजे 2014 की तरह ही रहने वाले है. यहां बीजेपी के रामकृपाल यादव जीतते हुए दिखाई दे रहे है.

भोपाल
भोपाल के चुनावी नतीजों पर पूरे देश की निगाहें हैं. यहां कांग्रेस और बीजेपी के प्रत्याशियों ने चुनाव को हिंदुत्व को मुद्दे के आस-पास लड़ा. लेकिन हमारे अनुमान में बीजेपी की साध्वी प्रज्ञा ठाकुर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह पर भारी पड़ती नजर आ रही हैं. यह सीट आसानी से बीजेपी के खाते में जाते हुए दिख रही है.

रोहतक
यहां मुकाबला कांग्रेस के वर्तमान सांसद दीपेन्द्र हुड्डा और बीजेपी के अरविंद शर्मा के मध्य है. यह सीट बीजेपी 2014 की मोदी लहर में भी नहीं जीत पाई थी. लेकिन इस बार यह सीट बीजेपी के खाते में जाती दिखाई दे रही है. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के पुत्र को इस बार हार का सामना करना पड़ रहा है. यह उनके लिए बड़ा झटका होगा.

सोनीपत
सोनीपत में मुकाबला इस बार त्रिकोणीय दिखाई दिया. यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस के भूपेंद्र हुड़डा, बीजेपी से रमेश कौशिक और जजपा के दिग्विजय चौटाला के बीच है. हमारे अनुमान के अनुसार सोनीपत भी 2019 में मोदी लहर पर सवार है. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड़डा को यहां हार का सामना करना पड़ सकता है.

फिरोजाबाद
यहां मुकाबला चाचा-भतीजे के बीच रहा. यहां से सपा के टिकट पर अक्षय यादव मैदान में है. सामने उनके चाचा शिवपाल यादव प्रसपा से ताल ठोक रहे है. बीजेपी ने यहां से चंद्रसेन जादौन को उम्मीदवार बनाया है. हमारे अनुमान के अनुसार, यह सीट सपा की तरफ जाती हुई नजर आ रही है. यहां भतीजा यानि अक्षय यादव अपने चाचा के उपर भारी पड़ रहे हैं.

गुरदासपुर
पंजाब की गुरदासपुर लोकसभा सीट पर पहले दावा कांग्रेस का मजबूत था. लेकिन सनी देओल की बीजेपी से उम्मीदवारी घोषित होने के बाद यहां के चुनावी समीकरण पुरी तरह से बदल गए हैं. पॉलिटॉक्स के अनुसार, यहां सनी देओल और सुनील जाखड के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिलेगी.

फलौदी का सट्टा बाजार बना रहा है एनडीए की सरकार

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देश में होने वाले लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुके हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियां अपनी-अपनी जीत के दावे कर रही हैं लेकिन हर बार की तरह पूरे देश की निगाहें फलौदी के सट्टा बाजार पर है. हमेशा सटीक परिणाम के लिए पहचान रखने वाले फलौदी का सट्टा बाजार इस बार पुनः केंद्र में मोदी की सरकार बनने का दावा कर रहा है. वहीं राजस्थान में बीजेपी की 20 से 22 सीट आने और जोधपुर सिटी में गजेंद्र सिंह शेखावत के स्पष्ट जीत के संकेत दे रहा है. आम सभा चुनाव को लेकर दोनों ही पार्टियों ने चुनाीव प्रचार में ताकत झोंक दी थी. अपने-अपने घोषणापत्र और विकास कार्यों … Read more

TMC को मोदी की यात्रा के कवरेज पर आपत्ति, चुनाव आयोग में की शिकायत

लोकसभा चुनाव के रण में आखिरी चरण के लिए वोटिंग हो रही है. आज देश की 59 सीटों पर वोट डाले जा रहे हैं. इस बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केदारनाथ-बदरीनाथ की धार्मिक यात्रा को आचार संहिता का उल्लंघन बताते हुए चुनाव आयोग में शिकायत की है. आपको बता दें कि दूसरे विपक्षी दल भी मोदी की यात्रा के मकसद पर सवाल उठा चुके हैं. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा मोदी ध्रुवीकरण करने के लिए यह सब कर रहे हैं. तृणमूल कांग्रेस की ओर से लिखे गए पत्र में कहा गया है कि 17 मई को ही चुनाव का प्रचार खत्म हो गया था, … Read more

लोकसभा चुनाव: अंतिम चरण की 59 सीटों पर मतदान शुरू

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देश में आज लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण का मतदान शुरू हो गया है. सातवें और आखिरी चरण में 8 राज्यों की 59 लोकसभा सीटों पर वोटिंग हो गई है. हाल ही में कलकाता मेें बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के रोड के दौरान हुई हिंसा के चलते पश्चिमी बंगाल पर लोगों की खासी नजरें गढ़ी हैं. पं.बंगाल में 9 सीटों पर आज ही मतदान हो रहा है. इसके साथ ही पंजाब और उत्तप्रदेश में 13-13, बिहार और मध्यप्रदेश में 8-8, हिमाचल प्रदेश में चार, झारखंड में तीन और चंड़ीगढ़ में एक सीट पर भी वोटिंग जारी है. मतदान सुबह 7 बजे से शुरू हो गया है जो शाम … Read more

पटना साहिब सीट पर जीत की हैट्रिक लगाएंगे बिहारी बाबू!

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बॉलीवुड में बिहारी बाबू के नाम से मशहूर अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा फिल्मों में तो सफल रहे ही, सियासत में ठीक-ठाक शोहरत हासिल की. करीब ढाई दशक पहले लाल कृष्ण आडवाणी की अंगुली पकड़ कर सियासत की पथरीली राह चुनने वाले ‘मिस्टर खामोश’ राज्यसभा से सांसद बनकर वाजपेयी सरकार में दो बार मंत्री रहे. वह अटल बिहारी वाजपेई और लाल कृष्ण आडवाणी के बेहद करीबी माने जाते हैं. लालकृष्ण आडवाणी से करीबी होने के कारण ही 1992 में नई दिल्ली लोकसभा सीट पर होनेवाले उपचुनाव में पहली बार शत्रुघ्न सिन्हा को चुनावी राजनीति में उतारा गया था.

इस सीट पर 1989 और 1991 में लाल कृष्ण आडवाणी जीत चुके थे. 1992 में हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने इस सीट से फिल्म अभिनेता राजेश खन्ना को उतारा था. राजेश खन्ना ने 28,256 वोटों से जीत दर्ज की थी. बताया जाता है कि खुद के खिलाफ चुनाव लड़ने के कारण राजेश खन्ना शत्रुघ्न सिन्हा से नाराज हो गए थे. शत्रुघ्न सिन्हा खुद भी राजेश खन्ना के खिलाफ चुनाव लड़ने को लेकर अफसोस जाहिर कर चुके हैं.

बहरहाल, 2009 में बीजेपी ने शत्रुघ्न सिन्हा को पटना साहिब संसदीय सीट से टिकट दिया. यह सीट 2008 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी. उन्होंने इस सीट से जीत दर्ज की. 2014 के आम चुनाव में भी उन्हें इस सीट से टिकट मिला और उन्होंने नरेंद्र मोदी की लहर में पिछले चुनाव की तुलना में जीत के अंतर में करीब एक लाख वोटों का इजाफा किया. हालांकि मोदी-शाह के नेतृत्व में बीजेपी का काम करने का तरीका वाजपेयी-आडवाणी की तुलना में बिल्कुल जुदा था. लिहाजा कई नेताओं को दरकिनार किया गया.

अरुण शौरी, जसवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा भी इस लिस्ट में शामिल थे. मोदी कैबिनेट में जगह नहीं मिलने पर शत्रुघ्न सिन्हा ने बागी तेवर अपना लिया. जब भी मौका मिला, उन्होंने मोदी सरकार पर जुबानी हमला किया. आखिरकार शत्रु ने आम चुनाव से पहले कांग्रेस का दामन थाम लिया.

बिहार में महागठबंधन की पार्टियों में सीटों के समझौते के तहत पटना साहिब सीट कांग्रेस की झोली में आ गई और कांग्रेस ने शत्रुघ्न सिन्हा को मैदान में उतार दिया. बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद को टिकट दिया है. हालांकि, पहले चर्चा थी कि पटना निवासी और बीजेपी के राज्यसभा सांसद आर.के. सिन्हा को पटना साहिब से टिकट मिलेगा, लेकिन ऐन वक्त पर उनका टिकट काट दिया गया.

कांग्रेस की तरफ से शत्रुघ्न सिन्हा को पटना साहिब से टिकट दिए जाने के बाद अब यह सीट दोनों ही पार्टियों के लिए नाक का सवाल बन गई है. दोनों ही पार्टियों ने इस सीट से जीत दर्ज करने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है. पिछले दिनों बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने इस क्षेत्र में पदयात्रा की थी. वहीं आचार संहिता लगने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने रोड शो किया था. दोनों पार्टियों की तरफ से पूरी ताकत लगाने का क्या परिणाम निकलता है, ये तो 23 मई को ही पता चलेगा. इससे पहले उन फैक्टर्स पर चर्चा करना जरूरी है जो शत्रुध्न सिन्हा की हार या जीत में अहम किरदार निभा सकते हैं.

सबसे पहले बात करें वोटर्स की तो पटना साहिब कायस्थ बहुल इलाका है. यहां कायस्थों की आबादी करीब चार लाख है. ये एक बड़ी वजह है कि 2009 से लगातार शत्रुघ्न सिन्हा को यहां से टिकट दिया गया है. दरअसल, शत्रुघ्न सिन्हा कायस्थ बिरादरी से ही आते हैं. शत्रुघ्न जब कांग्रेस में शामिल हो गए तो इस सीट पर बीजेपी की पहली पसंद रविशंकर प्रसाद बने क्योंकि वह भी कायस्थ हैं और मोदी-शाह के करीबी भी. कायस्थों के अलावा राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मणों की आबादी करीब छह लाख है. यादव व मुस्लिम वोट यहां करीब साढ़े तीन लाख हैं लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा का फोकस कायस्थ और यादव-मुस्लिम वोट है. राजपूत, भूमिहार और ब्राह्मणों का वोट तो बीजेपी को जाना करीब-करीब तय माना जा रहा है.

जानकार बताते हैं कि अगर कायस्थ वोट बंटता है तो शत्रुघ्न सिन्हा के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है. वैसे देखा जाए तो पटना साहिब में सांसद शत्रुघ्न सिन्हा का कामकाज संतोषजनक नहीं रहा है. उन्होंने आदर्श ग्राम योजना के तहत जिस गांव को गोद लिया था, उस गांव में उम्मीद के मुताबिक काम नहीं हुआ है. पटना साहिब में पटना के शहरी क्षेत्रों के अलावा कुछ ग्रामीण इलाके भी आते हैं. इन ग्रामीण इलाकों के लोगों की शिकायत है कि बुनियादी सुविधाएं उन तक नहीं पहुंची. इसलिए संभव है कि ग्रामीण इलाकों के वोटर शत्रुघ्न सिन्हा को वोट डालने से बिदक जाएं.

पटना साहिब सीट के अंतर्गत छह विधानसभा सीटें कुम्हरार, दीघा, फतुहा, बख्तियारपुर, पटना साहिब और बांकीपुर आती हैं. इनमें से पांच पर बीजेपी का कब्जा है एक सीट पर राजद काबिज है. अब यहां पर एक फैक्टर है जो शत्रुघ्न सिन्हा के पक्ष में जा रहा है. ये है बीजेपी में भितरघात की प्रबल आशंका.

जैसाकि बताया जा चुका है, पहले यह सीट कारोबारी व बीेजेपी के राज्यसभा सांसद आर.के. सिन्हा को दिया जाना था लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला. इससे सिन्हा व उनके समर्थकों में खासी नाराजगी है. ये नाराजगी पिछले दिनों खुलकर सामने आ गई थी, जब रविशंकर प्रसाद पटना आए थे. पटना एयरपोर्ट पर रविशंकर प्रसाद गुट और आर.के.सिन्हा गुट के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो गई थी.

वहीं पिछले दिनों जब बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने रविशंकर प्रसाद के समर्थन में पदयात्रा की थी तो पार्टी के सभी बड़े नेता इस पदयात्रा में शामिल हुए थे सिवाय आरके सिन्हा के. पदयात्रा में उनकी गैर-मौजूदगी से इस आशंका को भी मजबूती मिली है कि वह पार्टी नेतृत्व से नाराज चल रहे हैं. हालांकि, उन्होंने पार्टी हाईकमान से किसी तरह नाराजगी होने से इनकार किया है. इन सभी पहलुओं पर बारीकी से नजर डाली जाए तो शत्रुघ्न सिन्हा के लिए पटना साहिब से जीत की हैट्रिक लगाना उतना आसान नहीं होगा.

अमित शाह को क्लीन चिट मामले में आयुक्त और मुख्य आयुक्त आमने-सामने

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लोकसभा चुनावों में आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में चुनाव आयोग में मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं. इस मामले में अब चुनाव आयुक्त अशोक लवासा और मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा आमने-सामने हो गए हैं. आयोग के आचार संहिता उल्लंघन के कई मामलों में असहमति देने वाले चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने सुनील अरोड़ा को पत्र लिखकर आचार संहिता मामले में आयोग के फैसलों में आयुक्तों के बीच मतभेद को भी आधिकारिक रिकॉर्ड पर शामिल करने की मांग की है.

बता दें, लोकसभा चुनाव में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा आयोग के लगातार अमित शाह और नरेंद्र मोदी को आचार संहिता उल्लघंन मामले में क्लीन चिट देने और और विरोधी दलों के नेताओं को नोटिस थमाए जाने के नाराज बताए जा रहे हैं.

लवासा के पत्र लिखने के मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा कि चुनाव आयोग में 3 मेंबर होते हैं और तीनों एक-दूसरे के क्लोन नहीं हो सकते. यह जरुर नहीं कि तीनों सदस्यों की राय एक जैसी हो. मैं किसी भी तरह के बहस से नहीं भागता. हर चीज का समय होता है. सीधे तौर पर कहा जाए तो अरोड़ा ने इस मामले में पूरी तरह अपनी चुप्पी साध ली है.

गौरतलब है कि वर्तमान लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग की भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. विपक्ष खुलकर आयोग पर आरोप लगा रहा है कि वह निष्पक्ष रूप से फैसले नहीं ले रहा. बंगाल में अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के बाद तय समय से 20 घंटे पहले ही चुनाव प्रचार पर बैन को लेकर भी आयोग की तीखी आलोचना हुई थी. वहीं बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि चुनाव आयोग मोदी और शाह के इशारे पर काम कर रहा है. वहीं दूसरी पार्टियां भी आयोग पर लगातार ऐसे आरोप जड़ रही है.

मैंने पीएम से बहस करने की कई बार मांग की, उन्होंने हर बार मना कर दिया: राहुल गांधी

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देश में 7वें और अंतिम चरण के मतदान के लिए चुनाव प्रचार आज शाम पांच बजे समाप्त हो गया. प्रचार समाप्त होने के कुछ समय पूर्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने प्रेस कॉन्फेंस की. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मीडिया को उनके सवालों के जवाब दिए. एक ओर जहां पीएम मोदी ने पिछले पांच साल के कार्यकाल के दौरान पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की. हालांकि उन्होंने किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया. वहीं राहुल गांधी ने मीडियाकर्मियों के सामने मोदी और बीजेपी पर जमकर जवाबी हमले किए. प्रेस कॉन्फ्रेंस की शुरूआत करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि नरेंद्र मोदी … Read more