Congress
The Indian National Congress is a political party in India with widespread roots. Founded in 1885, it was the first modern nationalist movement to emerge in the British Empire in Asia and Africa.
क्या गोरखपुर में ‘मुनियाद’ गठ़जोड़ को पार कर पाएंगे योगी आदित्यनाथ
गोरखपुर की सियासत की बात हो और चर्चा के केंद्र में ‘मठ’ न हो, ऐसा होना मुनासिब नहीं. गोरखपुर की तो सियासत ही मठ के इर्द-गिर्द घूमती है. चाहे समय हो महंत दिग्विजयनाथ का या फिर महंत अवैधनाथ का, मठ ने कई बार गोरखपुर को उसका सांसद दिया है. 1991 से लेकर 2018 तक तो गोरखपुर की सियासत पर मठ का एकछत्र राज रहा है. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस सीट से 6 बार लगातार सांसद चुने गए. योगी के यूपी का मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनाव में बीजेपी को यहां 27 साल के बाद हार का सामना करना पड़ा. वो भी उस समय जब देश और प्रदेश … Read more
जेडीएस-कांग्रेस में फिर ‘तू तू मैं मैं’ कांग्रेस नेता ने जेडीएस अध्यक्ष को कहा ‘कुत्ता’
कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भी दोनों पार्टियों के नेताओं में जुबानी जंग कम नहीं हुई है. बीच-बीच में दोनों पार्टियों में शब्दों की जंग जारी रहती है जबकि जेडीएस नेता और मुख्यमंत्री कुमारस्वामी पार्टी में कुछ भी गलत न होने का बार-बार दम भरते हैं. आज जो बयानबाजी हुई, उसके बाद फिर से लगने लगा है कि दोनों दलों के गठबंधन के हालात सामान्य नहीं हैं. आज कर्नाटक जेडीएस के अध्यक्ष विश्वनाथ ने प्रदेश के पूर्व सीएम और कांग्रेस नेता सिद्धारमैया पर जमकर प्रहार किए. विश्वनाथ ने कहा, ‘सिद्धारमैया पांच साल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. वो इसी की शेखी बघारते फिरते है. अगर उनका कार्यकाल इतना … Read more
पंजाब: बदले सियासी माहौल के बाद दिलचस्प होंगे चुनावी नतीजे
देश में लोकसभा चुनाव अपने अंतिम पड़ाव पर है. 19 मई को आखिरी दौर की 59 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. इसी चरण में पंजाब की सभी 13 सीटों पर एक चरण में मतदान होंगे. पंजाब में सत्ता परिवर्तन के बाद अकाली-बीजेपी गठबंधन के लिए यह चुनाव बहुत मुश्किल दिख रहा है. विधानसभा चुनावों के बाद राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल गए हैं. 2014 लोकसभा चुनाव के समय प्रदेश की कमान अकाली-बीजेपी गठबंधन के पास थी. तो चुनावी नतीजे भी गठबंधन के पक्ष में रहे थे. उस समय अकाली-बीजेपी गठबंधन ने 13 में से 6 सीटों पर जीत हासिल की थी. कांग्रेस के हाथ तीन सीट लगीं जबकि चार … Read more
सिख दंगों की इस कहानी से अधिकतर लोग हैं बेखबर
सैम पित्रोदा के ‘हुआ तो हुआ’ वाले बयान ने देशभर में फिर से 1984 में हुए सिख दंगों की यादों को ताजा कर दिया. पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद भड़के उन दंगों ने देश में एक बाद फिर से राजनीति में भूचाल सा ला दिया है. असल में उन दंगों के पीछे एक कहानी है जो अधिकतर लोगों को पता ही नहीं है. 1978 के एसजीपीसी चुनावों में कांग्रेस के नेता ज्ञानी जैल सिंह ने एक भस्मासुर को समर्थन दिया था. यह भस्मासुर कोई और नहीं बल्कि दल खालसा का चीफ जरनैल सिंह भिंडरांवाले था.
जरनैल सिंह भिंडरांवाले कोई देवता नहीं बल्कि उस वक्त भारत को तोड़कर अलग खालिस्तान की मांग कर रहा था. वैसे ही जैसे आज कश्मीर के अलगाववादी कर रहे हैं. 1971 के युद्ध के बाद उसकी अलग खालिस्तान की मांग को पाकिस्तान परोक्ष रूप से समर्थन दे रहा था. देश के भीतर अकाली दल उसके साथ खड़ी थी.
1982 में भिंडरावाले ने हरमंदिर साहिब स्थित सिखों की प्रतिष्ठित संस्था दमदमी टकसाल पर कब्जा कर लिया और अकाली दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया. अकाली दल के साथ उसका यह गठबंधन एक तरह से आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पर जनादेश की मांग था जहां अलग खालिस्तान का समर्थन किया गया था.
खैर, वह अपनी इस योजना में सफल नहीं हो सका. हरमंदिर साहब में सेना ने घुसकर भिंडरावाले को खत्म कर दिया. लेकिन भिंडरावाले तो भस्मासुर था और उसके रक्तबीज आज भी मौजूद हैं. इतने सालों बाद भी अलग खालिस्तान की मांग खत्म नहीं हुई है. आज भी सिखों का एक वर्ग ऐसा है जो भिंडरावाले को ‘संत’ मानता है. उस वक्त भिंडरावाले को खत्म करने की कीमत इंदिरा गांधी को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी थी.
दिल्ली में 1984 का सिख विरोधी दंगा इसी पृष्ठभूमि में हुआ था. आप कल्पना कर सकते हैं लोगों के मन-मानस में सिखों के प्रति कितना गुस्सा रहा होगा. अगर आज कश्मीर के अलगाववादियों के खिलाफ इतना गुस्सा है तो इससे कई गुना ज्यादा गुस्सा उस वक्त सिख अलगाववादियों के खिलाफ था. इसकी वजह रही कि सिखों से किसी को उम्मीद नहीं रही थी कि वो देश को तोड़ने की बात करेंगे.
इसी दबे हुए गुस्से को हवा दे दी इंदिरा गांधी की हत्या ने. दिल्ली में सिखों का कत्लेआम हुआ, ये बात सही है लेकिन इस परिस्थिति के लिए सिखों का एक वर्ग भी जिम्मेदार था. क्रिया प्रतिक्रिया का ये दौर करीब डेढ़ दशक तक चलता रहा. बाद के दिनों में एक सिख पुलिसवाले ने ही पंजाब से इस खालिस्तानी आतंकवाद को खत्म करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई, ये भी उतना ही सच है.
सिख दंगों का घोषित परिणाम ये हुआ कि देशभर में सिख अलगाववाद खत्म हो गया. वहीं अघोषित परिणाम ये हुआ कि चौरासी के चुनाव में राजीव गांधी को अभूतपूर्व बहुमत मिला. तीन चौथाई सीटें कांग्रेस को मिली. यह फायदा कुछ वैसा ही था जैसे 2002 के दंगों का फायदा आज तक मोदी को मिल रहा है. बात कड़वी है लेकिन सच्चाई यही है. अगर गुजरात का मुस्लिम विरोधी दंगा क्रिया की प्रतिक्रिया थी तो दिल्ली का सिख विरोधी दंगा भी क्रिया की प्रतिक्रिया ही थी. दोनों जगहों पर सामाजिक प्रतिक्रिया मुखर हुई जिसका राजनीतिक दलों ने अपने-अपने लाभ के मुताबिक समर्थन या विरोध किया.
खैर… वो इतिहास का ऐसा काला अध्याय है जिसके पन्ने पलटने से कुछ हासिल नहीं होगा. लेकिन आज राजनीतिक रूप से जो बीजेपी सिख दंगों के लिए कांग्रेस को दोषी करार दे रही है, उस वक्त कांग्रेस बीजेपी पर आरोप लगा रही थी कि वह देश के टुकड़े करने वालों का साथ दे रही है. कर्नाटक के शिमोगा की एक रैली में राजीव गांधी ने कहा था, ‘बीजेपी न जाने क्यों देश को तोड़ने की बात करने वालों का साथ दे रही है. फिर चाहे वह सीपीआईएम हो या अकाली दल.’
राजीव गांधी के इस बयान का उस वक्त कितना खतरनाक मतलब था, इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं जैसे कोई राजनीतिक दल आज कश्मीर में सैयद अली शाह गिलानी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतर जाए.
फिर एक बड़ी भूमिका में नजर आएंगेे गहलोत, आलाकमान ने सौंपी बड़ी जिम्मेदारी
इस बार का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए करो या मरो जैसा है. इसी के चलते सियासत के जादूगर और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को चुनावी परिणाम आने से पहले कांग्रेस आलाकमान ने एक और अहम जिम्मेदारी दी है. राहुल गांधी ने खास टास्क देते हुए गहलोत को यूपीए के दलों और अन्य विपक्षी दलों से बातचीत करते हुए उन्हें साधने की जुगत में लगा दिया है. गहलोत के साथ कोषाध्यक्ष अहमद पटेल को भी इस काम में शामिल किया है. लिहाजा गहलोत ने दिल्ली में दो दिन डेरा डालते हुए इस रणनीति पर काम शुरु कर दिया है. हालांकि गहलोत अब जयपुर लौट आए हैं लेकिन फोन के जरिए लगातार अन्य दलों के प्रमुख नेताओं से संपर्क में बने हुए हैं.
दिल्ली में गहलोत ने अहमद पटेल से पहले हर राज्य के संभावित परिणाम पर मंत्रणा की. उसके बाद जोधपुर हाउस में कईं अन्य दलों के नेताओं से गुप्त मुलाकात भी की. बता दे कि कर्नाटक और गुजरात सहित कई राज्यों में गहलोत संकटमोचक की भूमिका में पार्टी के लिए उभरकर सामने आए थे, जिनकी बदौलत उन्हें फिर से राजस्थान का मुख्यमंत्री का दायित्व सौंपा गया.
केंद्र में कांग्रेस की संभावित सरकार बनाने के आधार में जुटे गहलोत
दिल्ली में अहमद पटेल से चर्चा करने के बाद चाणक्य गहलोत यूपीए सरकार बनाने के आंंकड़े पर काम में जुट गए हैं. गहलोत सहित कांग्रेस के कद्दावर नेताओं का मानना है कि बीजेपी इस बार केवल 200 सीटें ही जीत पाएगी. ऐसे में यूपीए के अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई जा सकती है. सहयोगी दलों की सीटें कम पड़ने पर गैर यूपीए-एनडीए दल या फिर एनडीए के साथ वाली पार्टियों को कैसे तोड़ा जाए, इस कार्य में सियासी जादूगर का अनुभव और सहयोग लिया जाए. अगर कांग्रेस की उम्मीदों के तहत बीजेपी की गाड़ी 200 सीटों पर अटक जाती है तो फिर गहलोत जैसे वरिष्ठ नेताओं का लंबा सियासी तजुर्बा और उनकी अन्य दलों से ट्यूनिंग यूपीए की सरकार बनानेे में मददगार साबित होगी.
अगर बीजेपी 225 सीटों का आंकड़ा पार करती है तो नरेंद्र मोदी को पीएम बनने से कैसा रोका जाए, इसमें जादूगर के दांवपेंच बेहद काम आ सकते हैं. गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता ही अन्य दलों को बीजेपी के किसी अन्य नेता को पीएम प्रोजेक्ट के लिए आगे करने की शर्त के लिए तैयार करा सकते हैं.
गहलोत के साथ अन्य वरिष्ठ नेता भी देखेंगे काम
अशोक गहलोत के साथ कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को भी ऐसी जिम्मेदारियां दी गई हैं. गहलोत के साथ अहमद पटेल, एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल, पी.चिदंबरम, मुकुल वासनिक और गुलाम नबी आजाद आदि उन प्रमुख नेताओं की लिस्ट में शामिल हैं जो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के निर्देश पर चुनावी गणित के आंकड़ों को देख रहे हैं. गहलोत ने दो दिन दिल्ली में नेताओं के साथ बंद कमरे में बैठक करते हुए गहनता से हर राज्य की लोकसभा सीटों के संभावित परिणाम को लेकर फीडबैक जुटाया है. वैसे भी गहलोत के राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं से अच्छे रिश्ते जगजाहिर हैं.
कर्नाटक-गुजरात में गहलोत ने दिखाया था जलवा
बताया जा रहा है कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद जेडीएस को देने का आईडिया अशोक गहलोत ने ही दिया था. इस पर आलाकमान ने उन्हें फ्री हैंड दे दिया. उसके बाद गहलोत ने कर्नाटक में कई दिनों तक डेरा डालते हुए कांग्रेस के समर्थन से जेडीएस की सरकार बना डाली. उससे पहले गुजरात के प्रभारी रहते हुए उन्होंने पीएम मोदी के गृहराज्य में मजबूती से विधानसभा चुनाव लड़ते हुए एक बार तो बीजेपी के छक्के छुड़ा दिए थे. यह गहलोत की रणनीति का ही कमाल था कि कांग्रेस 80 सीटों तक पहुंच गई. उसके बाद से गहलोत आलाकमान के लिए एक बार फिर आंखों का तारा बन गए.
छठे चरण में 63 फीसदी मतदान, पश्चिम बंगाल ने फिर मारी बाजी
लोकसभा चुनाव के छठे चरण में सात राज्यों की 59 सीटों पर 63.43 फीसदी मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया. पश्चिम बंगाल में 80.35 प्रतिशत वोटिंग हुई जबकि उत्तर प्रदेश में मात्र 54.72 फीसदी वोट पड़े. छठा चरण पूरा होने के साथ ही देश की 484 सीटों पर चुनाव पूरा हो गया है. छठे चरण के दौरान पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में कुछ जगहों पर हिंसा भी हुई. पश्चिम बंगाल में बीजेपी प्रत्याशी भारती घोष पर हमला हुआ, वहीं उत्तर प्रदेश में बीजेपी विधायक के साथ झड़प हुई. कई जगह पर ईवीएम में खराबी और फर्जी मतदान की शिकायत भी मिली. छठे चरण में दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, … Read more
छठा चरण: दिल्ली में धीमी रफ्तार तो बंगाल-झारखंड में बंपर वोटिंग
लोकसभा चुनाव के रण में आज छठे चरण के अंतर्गत सात राज्यों की 59 सीटों पर मतदान हो रहा है. पश्चिम बंगाल और झारखंड में बंपर वोटिंग हो रही है जबकि दिल्ली में वोट डालने की रफ्तार धीमी है. कई जगह ईवीएम में खराबी की शिकायत आ रही है. हिंसा की छिटपुट घटनाओं को छोड़कर मतदान शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है. राष्ट्रीय रामनाथ कोविंद, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी, कांग्रेस उपाध्यक्ष प्रियंका गांधी और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित सहित कई बड़े नेता मताधिकार का प्रयोग कर चुके हैं. आपको बता दें कि छठे चरण में उत्तर प्रदेश में सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, … Read more
अलवर की बेटी के साथ रेप होने पर अवॉर्ड वापसी गैंग चुप क्यों: मोदी
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और राजस्थान सरकार पर जमकर धावा बोला. पीएम मोदी ने अलवर में एक महिला के साथ गैंग रेप मामले को याद दिलाते हुए कहा, ‘बीते दो-तीन दिन से राजस्थान के अलवर की एक खबर आप पढ़ रहे होंगे. वहां एक दलित बेटी के साथ दो हफ्ते पहले कुछ दरिंदों ने बलात्कार किया. लेकिन उन दरिंदों को पकड़ने के बजाय वहां की पुलिस और वहां की कांग्रेस सरकार इस केस को ही छिपाने-दबाने में जुट गई. राजस्थान में भी चुनाव थे इसलिए वहां की कांग्रेस सरकार उस बिटिया को न्याय दिलाने के बजाय चुनाव बीतने … Read more