ईवीएम बवाल मामले में विपक्ष लामबंद, 21 दलों की दिल्ली में बैठक

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लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण के साथ ही अब हर किसी को नतीजों का बेसब्री से इंतजार है. इसी बीच आए विभिन्न न्यूज चैनल्स व सर्वे एजेंसियों के एग्जिट पोल ने सियासत को गर्मा दिया है. एनडीए एग्जिट पोल में मिल रही बढ़त के चलते उत्साहित है तो वहीं यूपीए इसे नकारते हुए असल परिणामों के इंतजार में लगा है. वहीं आज सुप्रीम कोर्ट द्वारा ईवीएम व वीवीपैट की पर्चियों के मिलान की याचिका खारिज करने के बाद पूरा विपक्ष दिल्ली में जुटा है. जहां ईवीेएम से वीवीपैट पर्चियों के मिलान पर गहन चर्चा की गई. दूसरी ओर पीएम नरेंद्र मोदी की कैबिनेट मंत्रियों के साथ बैठक है. साथ ही … Read more

नतीजों से पहले EVM पर दंगल, कांग्रेस के बाद ‘आप’ और महबूबा ने भी उठाए सवाल

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देश में लोकसभा चुनाव के बाद आए एग्ज़िट पोल ने विपक्ष की नींदे उड़ा दी है. अभी परिणाम आने शेष हैं लेकिन उससे पहले ही ईवीएम मशीन पर दंगल शुरू हो गया है. एग्ज़िट पोल ने केंद्र में एनडीए की सरकार क्या बनाई, पहले कांग्रेस और अब शेष विपक्ष के दलों ने लामबंध होकर ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. कांग्रेस के बाद आप पार्टी और महबूबा ने भी ईवीएम पर सवालिया निशान लगाया है. वहीं दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम-वीवीपैट पर फिर से सुनवाई से इनकार कर दिया है. कई दलों ने ईवीएम की गणना का मिलान 100 फीसदी वीवीपैट की पर्चियों से करने … Read more

प्रियंका गांधी ने नकारा एग्ज़िट पोल, कार्यकर्ताओं को दी यह नसीयत

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लोकसभा चुनाव के सभी चरणों के समाप्त होने के बाद आए ​एग्ज़िट पोल्स ने कांग्रेस सहित सभी नेताओं की नींद उड़ाकर रख दी है. ऐसे में समय पर कुछ कांग्रेसी नेता ईवीएम का रोना रो रहे हैं तो कुछ दिलासा देने में लगे हैं. ऐसे भी कुछ लीडर्स हैं जो अभी भी एग्ज़िट पोल को नकार रहे हैं. पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी भी उन्हीं में से एक हैं जो कार्यकर्ताओं को एग्ज़िट पोल पर भरोसा न करने को लेकर नसीयत दे रही हैं. बता दें, लोकसभा चुनाव का परिणाम 23 मई को आना है. प्रियंका ने कार्यकर्ताओं से अफवाहों और एग्ज़िट पोल पर ध्यान न देने को कहा है. साथ … Read more

सचिन पायलट बने रहेंगे पीसीसी चीफ, खुद दिए संकेत

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कांग्रेस गलियारों में आजकल यह चर्चा तेज है कि क्या लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद सचिन पायलट को पीसीसी चीफ पद पर बरकरार रखा जाएगा या हटाया जाएगा. इन कयासों पर खुद सचिन पायलट ने एक बयान के जरिए ब्रेक लगाने की कोशिश की है. पायलट ने कहा कि बदलाव हर जगह होते रहते हैं.चुनाव में हार-जीत चलती रहती है लेकिन उनका लक्ष्य अगले पंचायत चुनाव की तैयारी में जुट जाना है.

साफ है कि उनके इस बयान से संकेत गया है कि पंचायती चुनाव तक वें ही पीसीसी चीफ की कमान संभालते रहेंगेे. सचिन पायलट करीब साढ़े पांच साल से इस पद पर विराजमान हैं. लंबे समय तक प्रदेशाध्यक्ष रहने वालों की सूची में पायलट तीसरे नंबर पर हैं. इस लिस्ट में पहले नंबर पर परसराम मदेरणा हैं जिन्होंने करीब छह साल तक पीसीसी चीफ का पदभार संभाला है.

खुद ने दिए पद पर बने रहने के संकेत
जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद ही यह तस्वीर साफ होगी कि पायलट प्रदेशाध्यक्ष पद पर बने रहेंगे या दूसरे नेता को मौका दिया जाएगा. कुछ का कहना है कि सीएम और डिप्टी सीएम बनाने के फॉर्मूले के दौरान आलाकमान के साथ बंद कमरे में क्या बातें हुई, उन पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा. इन तमाम कयासों के बीच सचिन पायलट ने शुक्रवार को पीसीसी में एक प्रेस कॉन्फ्रेस में एक बयान से सबको चौंका दिया. पायलट ने कहा, ‘परिवर्तन होते रहते हैं हर जगह. मेरा ध्यान पंचायत चुनाव की तैयारी में जुट जाना है.’ बता दें, राजस्थान में अगले साल यानि 2020 में पंचायत के चुनाव होंगे.

विधानसभा चुनाव में किया था खुद को साबित
पीसीसी चीफ बनने के बाद सचिन पायलट ने पांच साल काम करते हुए कांग्रेस को सत्ता में लाने की पहली अग्निपरीक्षा तो पास कर ली. अब उनकी असली परीक्षा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा सीटें दिलाने की होगी. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल सका था. ऐसे में कांग्रेस के पक्ष में परिणाम लाना पायलट के लिए बड़ा टास्क था. हालांकि राज्य में सरकार कांंग्रेस की है. ऐसे में संगठन के साथ सरकार का भी रिपोर्ट कार्ड मायने रखेगा.

खैर…पायलट प्रदेशाध्यक्ष पद पर रहेंगे या नहीं रहेंगे, यह चर्चा तो लोकसभा चुनाव के परिणाम और उसके कईं दिनों बाद भी जारी रहेगी. हालांकि तमाम बातें सीटों के आंकड़ों पर निर्भर रहेगी. सीटे कम या ज्यादा आने पर बहुत कुछ निर्भर करेगा.

चुनाव परिणाम बाद कांग्रेस में बदले जाएंगे करीब 13 जिलाध्यक्ष

लोकसभा चुुनाव के परिणाम के बाद प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी से लेकर जिला संगठन में बदलाव होने तय हैं, फिर चाहे परिणाम कुछ भी रहे. वजह है कईं पीसीसी पदाधिकारी और जिलाध्यक्ष मंत्री-विधायक बन गए. ऐसे में निकाय चुनाव से पहले संगठन को चुस्त और दुरुस्त बनाने के लिए यह बदलाव किया जाएगा. विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मेहनत करने वाले नेताओं को कार्यकारिणी में मौका दिया जा सकता है. बदलाव के मद्देनज़र सियासी और जातिगत समीकरण तो साधे ही जाएंगे, मंत्रियों, विधायकों और लोकसभा चुनाव में जीतने वाले प्रत्याशियों की राय को भी तवज्जो दी जाएगी.

करीब एक दर्जन जिलों में नए जिलाध्यक्ष बनाए जा सकते हैं. वहीं मंत्री और विधायक बनने वाले पीसीसी पदाधिकारियों को एक व्यक्ति-एक पद के फॉर्मूले के आधार पर हटाया जाएगा. बदलाव की आहट के साथ ही नेताओं ने लॉबिंग भी शुरु कर दी है. इसके लिए कार्यकर्ता और नेता बड़े नेताओं के धोक लगा रहे हैं.

इन जिलों में बनेंगे नए जिलाध्यक्ष

अलवर
अलवर कांग्रेस के मौजूदा जिलाध्यक्ष टीकाराम जूली राज्य सरकार में मंत्री बन चुके हैं. हालांकि विधानसभा चुुनाव के दौरान ही यहां दो कार्यकारी जिलाध्यक्ष बना दिए गए थे. ऐसे में यहां नया जिलाध्यक्ष बनना तय है. डॉ. करण सिंह यादव को नया जिलाध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा है. भंवर जितेंद्र सिंह की नए जिलाध्यक्ष बनाने में एक बार फिर बड़ी भूमिका हो सकती है.

भीलवाड़ा
भीलवाड़ा जिलाध्यक्ष रामपाल शर्मा का हटना तय है क्योंकि उन्हें लोकसभा का टिकट दे दिया गया था. हारे या जीते, दोनों ही स्थितियों में शर्मा की विदाई तय है. शर्मा के लोकसभा चुनाव हारने के आसार पूरे-पूरे हैं. इसके चलते हारे हुए नेता को जिलाध्यक्ष पद पर रखने से अच्छा संदेश नहीं जाने की सोच के चलते उन्हें पद पर नहीं रखा जाएगा.

बूंदी
बूंदी में अभी कांग्रेस में जिलाध्यक्ष का पद खाली पड़ा है क्योंकि सीएल प्रेमी ने बगावत करके विधानसभा चुनाव लड़ लिया था. इसके चलते पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था. पिछले छह माह से जिलाध्यक्ष का पद खाली चल रहा है. नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति में मंत्री अशोक चांदना का अहम रोल रहेगा.

बीकानेर और देहात
बीकानेर शहर और देहात के दोनों जिलाध्यक्ष बदले जाने की पूरी संभावना है. शहर जिलाध्यक्ष यशपाल गहलोत को दो बार विधानसभा टिकट देने के बावजूद आखिर में बेटिकट कर दिया गया था. उसके बाद मंत्री बीडी कल्ला से गहलोत के मतभेद गहरे हो गए. लिहाजा कल्ला अब अपने खास नेता को नया अध्यक्ष बनाने में जुट गए हैं. देहात में महेंद्र गहलोत को हटाए जाने की पूरी संभावना है क्योंकि नोखा से रामेश्वर डूडी की हार में गहलोत को जिलाध्यक्ष बनाने का समीकरण हावी रहा था. लिहाजा किसी जाट को यहां जिलाध्यक्ष बनाया जा सकता है.

चूरु
चूरु जिलाध्यक्ष भंवरलाल पुजारी की रतनगढ़ से विधानसभा चुनाव में करारी हार हो गई थी. हार के बाद से ही पुजारी यहां सक्रिय नहीं हैं. ऐसे में नए जिलाध्यक्ष बनाने की कवायद यहां जारी है.

धौलपुर
धौलपुर जिलाध्यक्ष अशोक शर्मा ने पाला बदलकर बीजेपी का दामन थाम लिया है. ऐसे में कांग्रेस ने साकेत शर्मा को कार्यकारी जिलाध्यक्ष बनाया. अब कांग्रेस किसी ब्राह्मण को ही नया जिलाध्यक्ष बनाने पर विचार कर रही है.

जयपुर देहात
जयपुर देहात के जिलाध्यक्ष राजेंद्र यादव मंत्री बन चुके हैं. हालांकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने संदीप चौधरी और अशोक तंवर को कार्यकारी जिलाध्यक्ष बनाया था लेकिन अब स्थायी जिलाध्यक्ष बनाया जा सकता है. किसी जाट या यादव समाज के नेता को यहां जिलाध्यक्ष बनाया जा सकता है.

जयपुर शहर
जयपुर शहर जिलाध्यक्ष प्रताप सिंह भी मंत्री बन चुके है. लिहाजा उनकी जगह अब किसी मुस्लिम या ब्राह्मण को जिलाध्यक्ष बनाने पर मंथन चल रहा है.

जालौर
जालौर जिलाध्यक्ष डॉ.समरजीत सिंह विधानसभा चुनाव में हार गए थे. ऐसे में पारसराम मेघवाल को कार्यकारी जिलाध्यक्ष बनाया गया था. बताया जा रहा है कि यहां भी पार्टी नए जिलाध्यक्ष बनाने पर मंथन कर रही है.

राजसमंद
जिलाध्यक्ष देेवकीनंदन काका को लोकसभा का टिकट दे दिया गया था. यहां भी काका की हार हो या जीत, अध्यक्ष पद से विदाई लगभग तय हैै. सीपी जोशी की पसंद पर नए जिलाध्यक्ष की ताजपोशी होना यहां तय है.

सिरोही
सिरोही जिलाध्यक्ष जीवाराम आर्य भी विधानसभा चुनाव हार गए थे. लिहाजा सिरोही भी कार्यकारी जिलाध्यक्ष के भरोसे है. यहां नए जिलाध्यक्ष बनाने जाने की तैयारी शुरु हो गई है.

झुंझुनूं
झुंझुनूं जिलाध्यक्ष जितेंद्र गुर्जर विधायक बन चुके हैं. ऐसे में उनको भी इस पद से हटाए जानेे की पूरी संभावना है. नए जिलाध्यक्ष बनाने में अब विधायक बृजेन्द्र ओला की राय को तवज्जो दी जा सकती है.

पीसीसी कार्यकारिणी में भी होगा फेरबदल
जिलाध्यक्षों की तरह पीसीसी कार्यकारिणी में भी बदलाव तय है. करीब 40 पदाधिकारी मंत्री या फिर विधायक बन गए जबकि कुछ हार गए. ऐसे में इनको पीसीसी से रवाना किया जा सकता है. लिहाजा उनकी जगह दूसरे नेताओें और कार्यकर्ताओं को पीसीसी में शामिल किया जाएगा. पीसीसी में बदलाव अगस्त में होने की संभावना जताई जा रही है.

लोकसभा चुनाव: अंतिम चरण की 59 सीटों पर थम गया प्रचार का शोर

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देश में आज शाम पांच बजते ही लोकसभा चुनाव के प्रचार का शोर पूरी तरह से बंद हो गया है. सातवें और आखिरी चरण में देश की 59 लोकसभा सीटों पर 19 मई को वोट डाले जाएंगे. इससे पहले पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग ने हिंसा के कारण कल रात 10 बजे चुनाव प्रचार पर रोक लगा दी थी. इस वजह से वहां तय समय से एक दिन पूर्व ही चुनाव प्रचार बंद हो गया था. बता दें, पश्चिम बंगाल के कोलकाता में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हिंसा भड़क गई थी. असके बाद चुनाव आयोग ने अनुच्छेद-324 का इस्तेमाल करते हुए चुनाव प्रचार के समय … Read more

क्या यूपी में गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ है?

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सपा और बसपा का साथ आना यूपी की सियासत में ‘दो ध्रुवों का एक साथ’ हो जाने जैसा रहा. इसकी चर्चा पूरे देश में है. जाहिर है कि जब चर्चा इतना असर दिखाए तो वोटर्स का प्रभावित होना लाज़मी है. अब तक हुए छह चरणों के चुनाव में कुछ ऐसा ही देखने को मिला. कुछ एक सीटों को छोड़ दें तो गठबंधन के ज्यादातर प्रत्याशी खुद-ब-खुद यह संदेश देने में सफल रहे कि बीजेपी से मुकाबले में वही हैं. कांग्रेस के बड़े नाम तो पूरी लड़ाई में यही साबित करने में रह गए कि वे भी चुनाव लड़ रहे हैं.

शुरुआत अमरोहा के चुनाव से करते हैं. यहां से कांग्रेस ने राशिद अल्वी को टिकट दिया था. टिकट मिलने के कुछ दिन के भीतर ही उन्होंने निजी कारणों से के चलते अपना टिकट वापस कर दिया. कांग्रेस को बाद में यहां से सचिन चौधरी को मैदान में उतारना पड़ा. ऊपरी तौर पर भले ही यह कहा गया हो कि उन्होंने निजी कारणों से टिकट वापस किया, लेकिन भितरखाने के लोग हकीकत बयां करते हैं कि गठबंधन के प्रत्याशी के सामने लोग उन्हें ‘वोट कटवा’ मान रहे थे. ऐसे में उन्होंने चुनाव न लड़ना ही मुनासिब समझा.

इसी तरह, सहारनपुर में कांग्रेस उम्मीदवार रहे इमरान मसूद की भी सारी ताकत यही साबित करने में लगी रही कि वह बीजेपी के उम्मीदवार राघव लखनपाल से सीधे मुकाबले में हैं. दूसरी तरफ गठबंधन के उम्मीदवार हाजी फजलुर्रहमान को वोटर्स में यह संदेश देना आसान था कि उनके पास वोटर्स का अंकगणित कहीं अधिक मजबूत है.

सपा-बसपा और आरएलडी के अपने बेस वोट बैंक हैं जबकि कांग्रेस के पास इस तरह के वोट बैंक की कमी है. ऐसे में साफ है कि बेस वोट बैंक का अंकगणित महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में गया है. इस संगठन से जो भी मैदान में उतरा, उसके पास सपा, बसपा और आरएलडी के वोट एकमुश्त थे. ऐसे में उसे केवल मजबूती से चुनाव लड़ना है. बाकी की राह उसके लिए कांग्रेस प्रत्याशी के मुकाबले आसान रही.

वहीं, कांग्रेस का सिंबल पाने वाले नेताओं को भी यह साबित करना कठिन रहा कि वह गठबंधन के बेस वोट के बावजूद ज्यादा मजबूत हैं. कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर जगहों पर यही स्थिति बनी रही. उन्नाव सीट पर कांग्रेस की अन्नू टंडन, कानपुर सीट पर श्रीप्रकाश जायसवाल आदि नेताओं की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा केवल गठबंधन उम्मीदवार के वोटों के अंकगणित से भारी दिखाने में लगा.

वैसे भी सपा, बसपा और बीजेपी के इतर कांग्रेस को मूवमेंट बेस्ड पार्टी माना जाता है. अगर चुनाव के समय कांग्रेस अपने मूवमेंट से लोगों को जोड़ पाती है तो परिणाम बेहतर दिखाई देते हैं. अन्यथा उसके पास करने के लिए कुछ खास नहीं होता है. 2009 में किसानों की कर्जमाफी की बात को जिस तरह से कांग्रेस ने ऊपर तक पहुंचाया था, उसका असर परिणाम के रूप में भी मिला. पार्टी यूपी में 21 सीटें जीतने में कामयाब रही.

इस बार कांग्रेस ने चुनाव मैदान में जाते हुए जनता के लिए न्यूनतम आय योजना का बड़ा वादा किया. लेकिन स्थिति यह रही कि वह इस वादे के बारे में जनता को पूरी तरह बता पाने में ही असफल रह गई. अधिकतर लोग इस योजना के बारे में अनभिज्ञ हैं जिससे वोटर्स के साथ कांग्रेस का जुड़ाव उस हद तक नहीं हो सका जितना उसे अपना असर छोड़ने के लिए जरूरी था.

वहीं, दूसरी तरफ गठबंधन का उम्मीदवार अपने जातीय अंकगणित से अपने लिए वोटर्स में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा. उसका मजबूत कैडर बैकअप भी उसके लिए जनता के बीच पहुंचा. इस तरह से गठबंधन का उम्मीदवार बीजेपी से मुकाबले में दिखा जबकि कांग्रेस ऐसा नहीं कर सकी और लड़ाई बीजेपी बनाम गठबंधन के तौर पर वोटर्स के बीच पहुंच गई.

लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राजस्थान में बदलेगा सत्ता-संगठन का चेहरा

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कांग्रेस के गलियारों में इन दिनों बस दो ही चर्चाएं जोरों पर है. एक तो ये कि लोकसभा में कांग्रेस की कितने सीटें आएंगी. दूसरी- परिणाम के आधार पर क्या मंंत्रीमंडल और पार्टी संगठन में बदलाव होगा? सूत्रों की मानें तो लोकसभा परिणाम के बाद राजस्थान सरकार और कांग्रेस संगठन में फेरबदल देखने को मिल सकता है. यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि इस बदलाव के संकेत खुद राजस्थान प्रभारी महासचिव अविनाश पांडेय ने दिए हैं.

पांडेय ने आलाकमान के निर्देशों के तहत राजस्थान में लोकसभा चुनाव के दौरान एक-एक गतिविधियों की खुफिया रिपोर्ट तैयार की है जिसे वे राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को सौपेंगे. रिपोर्ट में राहुल गांधी को वॉर रूम से लेकर चुनाव प्रचार, मंत्रियों और विधायकों का रोल जैसे फीडबैक दिए जाएंगे. यह रिपोर्ट पर्यवेक्षकों और प्रत्याशियों से मिले फीडबैक के आधार पर तैैयार की गई है. देश में अंतिम चरण का मतदान खत्म होने के बाद पांडे्य यह रिपोर्ट राहुल को हैंडओवर कर देंगे.

आलाकमान से होगी चर्चा
रिपोर्ट आने के बाद राहुल गांधी अपने लेवल पर इसका मंथन करेंगे. उसके बाद प्रभारी अविनाश पांडेय, सीएम अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ सचिन पायलट के साथ सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेेल को लेकर चर्चा होगी. रिपोर्ट के तहत जिन विधायकों और मंंत्रियों की परफॉर्मेंस अच्छी होगी, उन्हें पदोन्नत किया जाएगा.

वहीं जिन्होंने भितरघात किया, उनके खिलाफ कड़ा एक्शन लेते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने के पूरे आसार हैं. यानी भितरघात करने वाले विधायकों के मंत्री बननेे के चांस बेहद कम हो जाएंगे. मंत्रियों पर मंत्रिमंडल से बाहर होने की तलवार भी लटक सकती है.

परफोर्मेंस बनेगा पैमाना
अगर प्रभारी के संकेतों को समझा जाए तो यही निकलकर सामने आ रहा है कि गहलोत मंत्रिमंडल में फेरबदल या विस्तार तय है. परफॉर्मेंस देने वाले विधायकों को मंत्री बनाया जाएगा और नहीं देने वालों को हटाया जाएगा. हालांकि मंत्रिमंडल में फेरदबल और विस्तार में इतनी जल्दबाजी नहीं होने की बातेें भी सामने आ रही है. ऐसे में अंदेशा यही है कि यह फेरबदल दिवाली तक हो सकता है. यह भी माना जा रहा है कि मंत्रियों की फेहरिस्त में कई नए चेहरों को भी शामिल किया जा सकता है. वहीं कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जाने के आसार हैं.

मिलेगा नया पीसीसी चीफ
चुनावी परिणाम से पहले यह चर्चा भी कांग्रेस में गर्म हैं कि क्या अब पीसीसी को नया मुखिया मिलेगा, क्योंकि सचिन पायलट को इस पद पर रहते हुए पांच साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है. जानकारों का यह भी कहना है कि सचिन पायलट खुद इस पद पर रहने को लेकर ज्यादा इच्छुक नहीं हैं. इसकी वजह है- पायलट के पास डिप्टी सीएम होने के साथ अन्य विभाग भी हैं.

हालांकि इन बातों की पुष्टि अभी कोई नहीं कर रहा है. कईं नेताओं का ऑफ द रिकॉर्ड कहना है कि जुलाई बाद नया पीसीसी चीफ जरुर बनेगा.

राहुल ने मोदी पर ली चुटकी, पूछा- क्या बारिश में सभी विमान हो जाते हैं रडार से गायब?

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सियासत में बयानों का बड़ा महत्व है. कई बार ऐसा होता है कि बयान नेता के लिए परेशानी का सबब बन जाता है. ऐसा ही कुछ प्रकरण प्रधानमंत्री नरेंद मोदी के साथ हुआ है. पीएम मोदी ने एक चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान बादल छाए रहने से भारतीय वायुसेना के विमानों को रडार से बचने में मदद मिली थी. उनके इस बयान पर राहुल गांधी ने चुटकी ली है. राहुल गांधी ने बयान पर कहा, ‘मोदीजी के अनुसार जब भी भारत में तुफान और बारिश आती है तो सारे विमान रडार की रेंज से बाहर हो जाते है.’ अभिनेता अक्षय कुमार को … Read more