राजस्थान में वसुंधरा ही बीजेपी है और बीजेपी ही वसुंधरा है

राजस्थान में लोकसभा चुनाव प्रचार में लगी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रदेश की दो सीटों पर न जाने की बात पॉलिटॉक्स के बहाने बाहर क्या आई, सियासी गलियारों से होती हुई बीजेपी नेतृत्व तक भी पहुंच गई. खबर का असर हुआ और बीजेपी आलाकमान के दखल के बाद राजे जोधपुर में गजेंद्र सिंह के चुनाव प्रचार में आ खड़ी हुई. हाल ही में राजे ने यहां एक रोड शो कर गजेंद्र सिंह शेखावत के लिए वोट अपील की. अब राजनीतिक गलियारों से यह खबर भी आ रही है कि जोधपुर के बाद वसुंधरा राजे बीकानेर में अर्जुन मेघवाल के लिए भी वोट अपील करते हुए नजर आने वाली हैं.

सूत्रों की माने तो राजे 4 मई को श्रीडूंगरगढ़ का दौरा कर सकती हैं. यहां उनका एक जनसभा को संबोधित करने का कार्यक्रम प्रस्तावित है. हालांकि उनके दौरे की तिथि अभी तय नहीं हुई है लेकिन 3 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीकानेर में सभा है. ऐसे में चुनाव प्रचार खत्म होने से एक दिन पहले यानि 4 मई को उनके बीकानेर आने की पूरी-पूरी संभावना है.

दरअसल, वसुंधरा राजे का जोधपुर और बीकानेर में चुनावी प्रचार न करना चर्चा में बना हुआ था. राजे के साथ गजेंद्र सिंह और अर्जुन मेघवाल की अदावत को भले ही पार्टी के नेता खुले तौर पर स्वीकार न करते हों लेकिन इस बात को गलत ठहराने के प्रयास भी कभी नहीं हुए. मतलब साफ है कि दिल्ली दरबार के इन दोनों खास मंत्रियों ने न केवल राजस्थान की राजनीति में राजे का विकल्प बनने की कोशिश की, बल्कि बीजेपी का एक गुट इनकी चर्चा भी करने लग गया था.

यही कारण है कि मौके की तलाश में चुप रही राजे ने विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के बाद लोकसभा चुनाव का इंतज़ार करना बेहतर समझा. राजे ने जिस तरह से दिल्ली दरबार को प्रदेश के चुनावी प्रचार में अपनी हैसियत और राजनीतिक कद का अहसास कराया है, उसके बाद कहीं ना कहीं यह साफ हो गया है कि राजस्थान में आज भी वसुंधरा ही बीजेपी है और बीजेपी ही वसुंधरा है.

शशि थरूर कोर्ट में तलब, पीएम मोदी पर दिया था ये बयान

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लोकसभा चुनाव की सरगर्मियों के बीच विवादित बयान देकर कई नेता चुनाव आयोग व कोर्ट की कार्रवाई झेल चुके हैं. अब कांग्रेस नेता शशि थरूर द्वारा पीएम नरेंद्र मोदी पर ‘बिच्छू’ संबंधी दिये गए एक बयान को लेकर चर्चा में हैं. बीते साल अक्टूबर में दिये गए इस बयान पर थरूर को दिल्ली की एक अदालत ने तलब किया है. कोर्ट ने कांग्रेस नेता थरूर को 7 जून को पेश होने के लिए कहा है. मालूम हो कि कोर्ट ने इसी 22 अप्रैल को पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ शशि थरूर के कथित बिच्छू वाले बयान पर उन्हें समन भेजने के मामले में अपना आदेश सुरक्षित रखा था. गौरतलब है … Read more

चौथे चरण का चुनाव प्रचार बंद, 71 सीटों पर मतदाता चुनेंगे सांसद

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लोकसभा चुनाव में तीन चरण का मतदान हो चुका है. चौथे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होने जा रहा है जिसमें 9 राज्यों की 71 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. यह चरण बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए ही बहुत महत्वपूर्ण है. क्योकिं 2014 में इन सीटों पर बीजेपी को जबरदस्त कामयाबी मिली थी. वही कांग्रेस के हाथ निराशा लगी थी. इस चरण में बीजेपी के सामने अपने किले को बचाने की चुनौती है जबकि कांग्रेस यहां 2009 की तरह अच्छा प्रदर्शन करना चाहती है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में दोबारा वापसी के लिए दिन रात एक कर रहे हैं. वही राहुल गांधी अपनी खोई … Read more

प्रज्ञा ठाकुर नहीं लड़ेंगी चुनाव, भोपाल से नामांकन लिया वापस

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सबसे हॉट सीटों में शूमार मध्य प्रदेश की भोपाल संसदीय सीट से प्रज्ञा ठाकुर ने अपना नामांकन वापस ले लिया है, लेकिन चौंकिए मत, ये बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर नहीं है बल्कि निर्दलीय प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर है. इसी सीट पर उनकी हमनाम प्रज्ञा ठाकुर ने भी नामांकन भरा था. एक जैसे नाम की वजह से बीजेपी को इस बात की आशंका थी कि किसी गलतफहमी में मतदाता साध्वी प्रज्ञा ठाकुर की बजाय प्रज्ञा ठाकुर के नाम के आगे वाला बटन ना दबा दें. जिसे लेकर बातचीत के बाद प्रज्ञा ठाकुर ने भोपाल लोकसभा सीट से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के समर्थन में अपना नाम वापस ले लिया है. … Read more

गौतम गंभीर पर मुकदमा दर्ज, बिना अनुमति चुनावी सभा करने का आरोप

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क्रिेकेट की क्रीज पर रिकॉर्ड पारी खेलने के बाद हाल ही में राजनीति के दंगल में कदम रखने वाले क्रिकेटर गौतम गंभीर बीजेपी की टिकट पर पूर्वी दिल्ली लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं और जमकर चुनाव प्रचार में भी लगे हैं. गंभीर पर आरोप है कि प्रचार के दौरान बीती 25 अप्रैल को वे पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के जंगपुरा में चुनावी करने पहुंचे लेकिन इसके लिए अनुमति नहीं ली गई. जिसके बाद गौतम गंभीर पर मुकदमा दर्ज किया गया है.

बता दें कि क्रिकेट की पारी के बाद बीजेपी के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे गौतम गंभीर के खिलाफ यह पहली शिकायत नहीं है बल्कि गंभीर के नामांकन से लेकर अब तक उनके खिलाफ कई शिकायतें की जा चुकी हैं. वहीं अब गंभीर के खिलाफ बिना अनुमति चुनावी रैली करने के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई है. गंभीर पूर्वी दिल्ली से अपना नामांकन भर कर दिन-रात चुनाव प्रचार में जुटे हैं. इसी क्रम में 25 अप्रैल को वो पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले जंगपुरा इलाके में पहुंचे थे. यहां गंभीर ने सुबह करीब 11 बजे एक जनसभा की थी.

हालांकि, इस जनसभा की इजाजत नहीं ली गई थी. बिना परमिशन जनसभा करने की शिकायत चुनाव आयोग तक पहुंची, जिस पर आयोग ने संज्ञान लिया है. जिसके बाद पूर्वी दिल्ली के निर्वाचन अधिकारी के. महेश ने गंभीर की जनसभा को चुनाव आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना और दिल्ली पुलिस को एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए. चुनाव आयोग के निर्देश के बाद दिल्ली पुलिस ने लाजपत नगर थाने में गौतम गंभीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली है.

पूरे मामले को लेकर पुलिस का कहना है कि बीजेपी प्रत्याशी गौतम गंभीर के खिलाफ शिकायत मिली है, जिसमें जॉइंट सीपी साउथ देवेश श्रीवास्तव ने बताया कि मामले में डीपी एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है, जिसमें सजा के तौर पर जुर्माने का प्रावधान है. जुर्माना न भरने की स्थिति में न्यायालय द्वारा सजा का भी प्रावधान है.

गौरतलब है कि गौतम गंभीर को लेकर यह विवाद नया नहीं है. इससे पहले गौतम गंभीर नामांकन में दी गई जानकारी को लेकर भी विवादों में रहे थे. इसके अलावा गंभीर पर दो वोटर आईडी कार्ड रखने के भी आरोप लगाए जा चुके हैं. गंभीर के सामने चुनाव लड़ रहीं आम आदमी पार्टी प्रत्याशी अतिशि ने तीस हजारी कोर्ट में गौतम गंभीर पर दो वोटर आईडी कार्ड रखने की शिकायत दर्ज कराई है. इन तमाम शिकायतों के बाद अब बिना अनुमति के जनसभा करने के आरोप में गंभीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई है.

फिर निशाने पर आए शत्रुध्न सिन्हा, जिन्ना को बताया ‘कांग्रेस परिवार’ का हिस्सा

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बीजेपी छोड़ कांग्रेस में शामिल हुए शत्रुध्न सिन्हा लगातार सुर्खियों में बने हुए हैं. हाल ही में शत्रु सपा-बसपा महागठबंधन से लखनऊ चुनावी प्रत्याशी पूनम सिन्हा का प्रचार करने पहुंच गए थे जिसपर कांग्रेस प्रत्याशी ने ऐतराज जताया था. शत्रु अब जिन्ना का भूत लेकर फिर से सुर्खियों में हैं. दरअसल शत्रुध्न सिन्हा मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में एमपी के मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ के प्रचार में पहुंचे थे. यहां उन्होंने जिन्ना को ‘कांग्रेस परिवार’ का सदस्य बताया है. अपने भाषण में शत्रु ने कहा, ‘कांग्रेस परिवार महात्मा गांधी से लेकर सरदार वल्लभ भाई पटेल तक, मोहम्मद अली जिन्ना से लेकर जवाहर लाल नेहरू तक, इंदिरा गांधी से लेकर … Read more

ग्राउंड रिपोर्ट: अजमेर में मोदी भरोसे बीजेपी, कांग्रेस को उपचुनाव जैसी आस

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पिछले लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 25 सीटों पर बीजेपी ने कब्जा जमा लिया था लेकिन उपचुनाव में अजमेर और अलवर सीटें फिर से कांग्रेस के खाते में आ गईं. इस बार अजमेर संसदीय सीट पर उद्योगपति से सियासी गलियारों में कदम रखने वाले रिजु झुनझुनुवाला कांग्रेस की तरफ से मैदान में हैं. हालांकि पिछले साल सूबे में बीजेपी की सत्ता होने के बावजूद कांग्रेस यह सीट निकालने में कामयाब हुई थी लेकिन सर्जिकल स्ट्राइक से अजमेर के समीकरण बदल गए. लिहाजा पीसीसी चीफ सचिन पायलट और मंत्री रघु शर्मा जैसे दिग्गज़ों ने यहां से चुनाव लड़ने से मना कर दिया था. अब रिजु ने पैसों की चमक और शहर की दिवारों पर लगे आकर्षक स्लोगन के दम पर खूब माहौल बनाने के प्रयास किए लेकिन मोदी लहर पर सवार भागीरथ चौधरी को टक्कर नहीं दे पा रहे हैं. बाहरी उम्मीदवार होने की वजह से स्थानीय नेताओं का भी रिजु को सहयोग नहीं मिल रहा. ऐसी स्थिति में उनकी सास बीना काक ने अपने दामाद के प्रचार की कमान संभाली हुई है.

जातीय समीकरण पर किसका पलड़ा भारी
जातीय समीकरणों पर गौर करें तो भागीरथ यहां भी रिजु झुनझुनवाला से ज्यादा मजबूत हैं. अजमेर उत्तर, अजमेर दक्षिण, उत्तर, पुष्कर, नसीराबाद, किशनगढ़, दूदू और केकड़ी में फिलहाल बीजेपी मजबूत स्थिति में दिख रही है. इस सीट पर SC/ST की आबादी लगभग 22 फीसदी है. जाटों की संख्या 16 से 17 फीसदी है. मुस्लिम आबादी 12 फीसदी और कुछ क्षेत्रों में राजपूत, वैश्य समुदाय का दबदबा है. 2018 के चुनाव के मुताबिक इस संसदीय सीट पर मतदाताओं की संख्या 18 लाख 42 हजार 992 है. इसमें पुरूष मतदाताओं की संख्या 9 लाख 43 हजार 546 और 8 लाख 99 हजार 424 महिला मतदाता हैं.

मौजूदा सियासी जमीनी हकीकत
रिजु का नाम प्रत्याशियों की लिस्ट में काफी बाद में आया. ऐसे में प्रचार की दौड़ में दस दिन पिछड़ने के बाद कांग्रेस के रिजु ने आर्थिक संसाधनों के बूते माहौल को गरमाहट दे दी है. लेकिन आंतरिक कलह और देरी से टिकट की घोषणा होने के फैक्टर उनपर भारी पड़ रहे हैं. वहीं भागीरथ चौधरी स्थानीय होने के साथ-साथ बीजेपी के मजबूत संगठन का भरपूर फायदा उठाते दिखाई दे रहे हैं.

अजमेर की राजनीतिक पृष्ठभूमि
अजमेर लोकसभा सीट पर 1998-99 छोड़ दें तो 1989 से बीजेपी के रासा सिंह रावत पांच बार सांसद रहे. 2009 के आम चुनावों में सचिन पायलट ने बीजेपी की किरण माहेश्वरी को हराकर इस सीट पर कब्जा जमाया. 2014 की मोदी लहर में पायलट यह सीट बीजेपी के जाट नेता सांवरलाल जाट के हाथों गंवा बैठे. केंद्रीय मंत्री सांवर लाल जाट के निधन के बाद इस सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर वापसी की. रघु शर्मा फिलहाल केकड़ी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं.

जीत का यह रहेगा फॉर्मूला
इस सीट पर मोदी लहर और राष्ट्रवाद हावी है. ऐसे में रिजु हो या फिर भागीरथ चौधरी, जो भी उम्मीदवार एससी-एसटी, मुस्लिम और राजपूत वोटरों को जो अपने पक्ष में कर पाया, वही इस मुकाबले में सिरमौर बनेगा. एंटी जाट वोट बैंक का ध्रुवीकरण भी खेल बदल सकता है. सचिन पायलट, अशोक गहलोत और राहुल गांधी की जनसभा भी रिजु के पक्ष में माहौल बना सकती है.

उत्तरप्रदेश: मैदान में नहीं, फिर भी इन नेताओं की प्रतिष्ठा दांव पर लगी

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यूपी के लोकसभा चुनाव में कई सियासी धुरंधर ऐसे हैं जो खुद तो चुनावी दंगल में नहीं उतरे लेकिन उनके परिवार के सदस्य या नजदीकी के मैदान में होने से उनकी प्रतिष्ठा दांव पर है. हालात कुछ ऐसे हैं कि खुद चुनाव लड़ने पर वह जितनी मेहनत करते, उससे कहीं ज्यादा मेहनत उन्हें अपने ‘प्रियजन’ की कामयाबी के लिए करनी पड़ रही है. ऐसे ही कुछ नेताओं के बारे में यहां बताया जा रहा है.

राम गोपाल यादव – समाजवादी पार्टी
राम गोपाल यादव को समाजवादी पार्टी का थिंक टैंक माना जाता है. राम गोपाल यादव वर्तमान में राज्यसभा सदस्य हैं. मुलायम सिंह की तरह चुनाव के दौरान पार्टी के प्रचार की जिम्मेदारी उनके कंघों पर भी होगी लेकिन फिरोजाबाद सीट उनके लिए भी अहम बन गई है. यहां से उनके पुत्र अक्षय यादव सपा के टिकट पर मैदान में हैं. हालांकि, अक्षय इस सीट से मौजूदा सांसद भी हैं लेकिन इस बार उनकी टक्कर किसी और से नहीं बल्कि अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव से है.

कल्याण सिंह – बीजेपी
राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह भले ही संवैधानिक पद पर हों, लेकिन यूपी की एटा सीट उनकी प्रतिष्ठा से जोड़ कर देखी जा रही है. दो बार यूपी के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह के बेटे राजवीर एटा संसदीय सीट से एक बार फिर चुनाव मैदान में हैं. 2014 का लोकसभा चुनाव राजवीर अपने पिता कल्याण सिंह की सीट एटा से जीत चुके हैं. वर्तमान में राजवीर इसी सीट से सांसद हैं. मैदान में भले ही राजवीर सिंह हों लेकिन दांव पर इज्जत कल्याण सिंह की लगी हुई है.

स्वामी प्रसाद मौर्य – बीजेपी
बसपा छोड़ कर भारतीय जनता पार्टी में आए स्वामी प्रसाद मौर्य योगी सरकार में मंत्री हैं. उनके ऊपर भी लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी है. फिलहाल उनका पूरा ध्यान बदायूं सीट पर केंद्रित है. दरअसल इस सीट से बीजेपी ने मौर्य की बेटी संघमित्रा को उतारा है. उसके साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि बदायूं सीट समाजवादियों का गढ़ है और अखिलेश के भाई धर्मेंद्र यादव इस सीट से लगातार चुनाव जीतते आए हैं. ऐसे में संघमित्रा की सफर बदायूं सीट पर आसान नहीं होगा.

पीएल पुनिया – कांग्रेस
रिटायर्ड आईएएस पीएल पुनिया सपा और बसपा के करीबी संबंध होने के बावजूद कांग्रेस से राजनीति कर रहे हैं. वर्तमान में राज्यसभा सदस्य होने के साथ वह छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमिटी के प्रभारी भी हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में पीएल पुनिया राजधानी से सटी बाराबंकी सीट से सांसद रहे लेकिन पिछली बार मोदी लहर में हार गए. इस बार बाराबंकी से उनके पुत्र तनुज पुनिया कांग्रेस के टिकट से मैदान में हैं. अब यह सीट पुनिया के लिए नाक का सवाल बनी हुई है.

राम लाल राही – कांग्रेस
1991 में कांग्रेस की नरसिंम्हा राव सरकार में गृह राज्य मंत्री रहे रामलाल राही मिश्रिख संसदीय सीट से दो बार सांसद रहे. उनके पुत्र बीजेपी में हैं और वर्तमान में हरगांव सीट से विधायक हैं. रामलाल राही ने पिछले दिनों फिर कांग्रेस में वापसी की. कांग्रेस ने राही की पुत्रवधु मंजरी राही को उनकी लोकसभा सीट मिश्रिख से मैदान में उतारा है. चुनाव भले ही बहू लड़ रही है लेकिन प्रतिष्ठा तो रामलाल राही की ही दांव पर है.

अमर सिंह – बीजेपी
भारतीय राजनीति में अमर सिंह कोई अनजाना नाम नहीं है. यूपी से अपना सियासी सफर शुरू करने वाले अमर सिंह कभी मुलायम सिंह के दाहिने हाथ माने जाते थे अब उनका हाथ बीजेपी के साथ है. अमर सिंह की खास मानी जाने वाली अभिनेत्री जया प्रदा ने भी हाल ही में सपा का साथ छोड़ बीजेपी का दामन थामा है और पार्टी के टिकट पर रामपुर से मैदान में हैं. हालांकि वह पूर्व में भी इसी सीट से सपा सांसद रह चुकी हैं. सीधी टक्कर सपा के आजम खान से है. अगर जया प्रभा यहां से चुनाव हारती हैं तो किरकिरी तो अमर सिंह की ही होगी न.

करौली-धौलपुर सीट पर आसान नहीं है राजोरिया की सियासी डगर

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लोकसभा चुनाव की चौसर बिछी हुई है. करौली-धौलपुर सीट पर कुल पांच प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं. बीजेपी ने मौजूदा सांसद मनोज राजोरिया पर फिर से दांव खेला है तो कांग्रेस ने धौलपुर जिले में सरमथुरा निवासी युवा उम्मीदवार संजय जाटव को प्रत्याशी बनाया है. प्रमुख तौर पर देखा जाए तो कांग्रेस के संजय जाटव और बीजेपी के डॉ.मनोज राजोरिया ही मुकाबले में है. बसपा प्रत्याशी राम कुमार बैरवा नामांकन दाखिल करने के बाद से ही मैदान में नजर ही नहीं आ रहे. हालांकि राजोरिया मौजूदा सांसद हैं लेकिन इस बार चुनाव में उनकी राह आसान नजर नहीं आ रही है.
वजह है- पार्टी की गुटबाजी और अंतर्कलह राजोरिया पर भारी पड़ रही है. विगत पांच सालों में पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं से उनकी दूरी भी अब उनके गले की फांस बन गई है. करौली में बीजेपी का प्रधान कार्यालय तो खोल दिया गया है लेकिन कार्यकर्ताओं के अभाव में सूना नजर आ रहा है. करौली रेल लाइन का मुद्दा भी राजोरिया के पसीने छुड़ा रहा है. हालात यह हैं कि रेल लाइन के मुद्दे को लेकर लोग गले ना पड़ जाए, इस कारण राजोरिया ने करौली जिला मुख्यालय सहित क्षेत्र में अभी एक बार भी जनसंपर्क करने की हिम्मत नहीं जुटा सके हैं.
वहीं कांग्रेस प्रत्याशी संजय जाटव पर करौली जिले में कैबिनेट मंत्री रमेश मीणा का वरद हस्त माना जा रहा है. रमेश मीणा स्वयं विगत तीन दिन से उनके साथ जनसंपर्क में जुटे हुए हैं, वहीं बाड़ी क्षेत्र में विधायक गिर्राज मलिंगा कांग्रेस की विजयश्री के प्रयास में लगे हुए हैं.
संसदीय क्षेत्र के जातिगत समीकरणों का विश्लेषण करें तो संजय जाटव अपने तीन लाख सजातीय जाटव बैरवा मतों के साथ काफी मजबूत दिख रहा है. इसके अलावा मीणा माली मुस्लिम और गुर्जर मतों का कांग्रेस के पक्ष में होना जीत का प्रमुख आधार माना जा रहा है.
विश्लेषकों का कहना है कि इस बार गुर्जर कांग्रेस के साथ नहीं हैं लेकिन क्षेत्र में सचिन पायलट की पकड़ कांग्रेस प्रत्याशी को मजबूत किए हुए है. इधर बीजेपी के मनोज राजोरिया के पास उनके जातिगत वोटों की संख्या केवल 15 से 20 हजार है. राजपूत, जाट और सामान्य वर्ग के वोट बैंक बीजेपी के साथ जा सकते हैं लेकिन रेल के मुद्दे ने इन मतों को विभाजित किया हुआ है. विपक्ष भी रेल के मुद्दे पर राजोरिया को घेर रही है. वहीं रेल विकास समिति और प्रबुद्ध लोग भी इस मुद्देेे को छोड़ते नहीं दिख रहे.
बता दें, पिछले लोकसभा चुनाव में राजोरिया को करौली जिले से हार का सामना करना पड़ा था. इसकी वजह  वसुंधरा राजे की धौलपुुर क्षेत्र में मजबूत पकड़ रही. पिछले लोकसभा चुनाव में वसुंधरा राजे ने 3 दिन तक धौलपुर में डेरा डाले रखा था और सभी समाज वर्ग के लोगों पर दबाव बनाकर राजोरिया के पक्ष में मोड़ने में सफल रहीं.
लेकिन इस बार के चुनावों में स्थिति थोड़ी अलग जाती दिख रही है. स्थानीय लोगों का मानना है कि इस बार प्रदेश की सत्ता से बाहर हो चुकी वसुंधरा राजे उस फिज़ा को बरकरार नहीं रख पाई हैं. ऐसे में बीजेपी के लिए यहां पार पाना पिछली बार के मुकाबले आसान नहीं होगा. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि करौली-धौलपुर सीट कांग्रेस के लिए जितनी आसान नजर आ रही है, उतनी ही बीजेपी को मौजूदा परिस्थितियां अपने पक्ष में करने के लिए जमकर पसीना बहाना पड़ेगा.