स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी को कैसे किया चारों खाने चित?

लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोर रही है. पार्टी ने 2014 से भी ज्यादा सीटें जीतकर इतिहास रचा है. बीजेपी के 303 उम्मीदवार चुनाव जीते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत की. उन्होंने गांधी परिवार का गढ़ मानी जाने वाली उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पटकनी देकर सबको चौंका दिया है. स्मृति ने राहुल गांधी को 55,122 वोटों के अंतर से शिकस्त दी.

यह दूसरा मौका है जब अमेठी से गांधी परिवार के किसी सदस्य को हार झेलनी पड़ी है. इससे पहले 1977 के लोकसभा चुनाव में संजय गांधी को हार का सामना करना पड़ा था. तब जनता पार्टी के रविंद्र प्रताप सिंह ने संजय गांधी को पटकनी दी थी. हालांकि राजनीतिक विश्लेषक 1977 के चुनाव में संजय गांधी की हार को राहुल गांधी के मुकाबले अप्रत्याशित नहीं मानते, क्योंकि उस समय आपातकाल लागू करने की वजह से पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा था. तब लोग संजय गांधी को ही आपातकाल का सूत्रधार मानते थे.

कई लोग अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत की तुलना 1977 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली से इंदिरा गांधी के खिलाफ राजनारायण की जीत से कर रहे हैं. अलबत्ता राजनारायण की जीत में उनकी मेहनत से ज्यादा इंदिरा गांधी के खिलाफ आपातकाल लगाने का गुस्सा था. इस लिहाज से देखें तो स्मृति ईरानी की जीत राजनारायण और रविंद्र प्रताप सिंह से बड़ी है. इस बार के चुनाव में मोदी की आंधी तो थी, लेकिन राहुल गांधी या कांग्रेस के खिलाफ गुस्से जैसी कोई बात नहीं थी.

अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत विशुद्ध रूप से पांच साल तक सक्रियता, कड़ी मेहनत और रणनीति का नतीजा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में हारने के बावजूद स्मृति ईरानी अमेठी से ठीक वैसे ही जुड़ी रहीं, जैसे वे ही वहां की सांसद हों. 2014 से 2019 के बीच उन्होंने करीब 60 बार अमेठी का दौरा किया जब​कि अमेठी से सांसद चुने गए राहुल गांधी इस दौरान 20 बार भी वहां नहीं गए.

केंद्र में मंत्री होने बावजूद स्मृति ईरानी ने अमेठी को पूरा समय दिया. इस दौरान उन्होंने बीजेपी के स्थानीय नेताओं और संघ के स्वयंसेवकों को साथ लेकर संगठन को मजबूत किया. खासकर कांग्रेस के दलित और पिछड़ी जातियों के वोट बैंक में सेंध लगाई. साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने जोर—शोर से प्रचार किया. उनकी मेहनत नतीजों में साफतौर पर दिखाई दी. अमेठी की पांच में चार सीटों पर बीजेपी ने फतह हासिल की.

विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ ‘गुमशुदा सांसद’ का नारा दिया. वे जब भी अमेठी गईं, उन्होंने लोगों को यह समझाया कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के यहां से जीतने के बावजूद क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ा हुआ है. स्मृति की अगुवाई में बीजेपी अमेठी में इतना सब करती रही और इस दौरान कांग्रेस हाथ पर हाथ रखकर बैठी रही. दरअसल, कांग्रेस को यह भरोसा था कि अमेठी गांधी परिवार का गढ़ है और स्मृति ईरानी यहां कितने भी हाथ-पैर मार लें, चुनाव में जीत राहुल गांधी की ही होगी.

अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत में उनके चुनाव प्रबंधन का बड़ा योगदान है. एक ओर कांग्रेस ने यह सोचकर चुनाव लड़ा कि यह सीट तो पार्टी का गढ़ है तो दूसरी ओर स्मृति ईरानी ने एक-एक बूथ के हिसाब से रणनीति तैयार की. सूत्रों के अनुसार उन्होंने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए कई डमी प्रत्याशी भी खड़े किए. आपको बता दें कि अमेठी में स्मृति ईरानी और राहुल गांधी के अलावा 25 दूसरे उम्मीदवार भी मैदान में थे. इन्हें मिले वोटों का जोड़ स्मृति की जीत के अंतर के आसपास ही है.

स्मृति ईरानी की मेहनत और रणनीति के अलावा राहुल गांधी की हार में उन नेताओं की भी कम भूमिका नहीं है, जिनके भरोसे कांग्रेस आलाकमान ने अमेठी को छोड़ रखा था. इनमें सबसे बड़ा नाम चंद्रकांत दुबे का है, जो अमेठी में राहुल गांधी के अघोषित नुमाइंदे थे. कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि दुबे ने उनकी बात राहुल गांधी तक नहीं पहुंचाई. अपनी उपेक्षा से आहत इन कार्यकर्ताओं ने चुनाव में अनमने ढंग से काम किया. नतीजतन राहुल गांधी न सिर्फ चुनाव हारे, बल्कि उन्हें किसी भी विधानसभा सीट पर बढ़त नहीं मिली. वे वोटों की गिनती में एक बार भी स्मृति ईरानी से आगे नहीं निकले.

कारण चाहे जो भी रहे हों, फिलहाल हकीकत यह है कि गांधी परिवार का गढ़ कही जाने वाली अमेठी सीट कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी है. गौरतलब है कि अमेठी के साथ कांग्रेस का सुनहरा अतीत जुड़ा रहा है. यह सिलसिला 1967 से शुरू हुआ था जब कांग्रेस के विद्याधर वाजपेयी ने अमेठी में पार्टी की जीत की नींव रखी थी. 1967 और 1971 के लोकसभा चुनाव में भी वाजपेयी यहां से चुनाव जीते. 1977 के चुनाव में जनता पार्टी के रविंद्र प्रताप सिंह ने संजय गांधी को हराकर इस सीट पर फ​तह हासिल की.

अमेठी की बागडोर असली रूप से गांधी परिवार के हाथ में 1980 के लोकसभा चुनाव में आई. संजय गांधी ने यहां से जीत दर्ज की, लेकिन उनकी विमान हादसे में मौत हो गई. 1981 में राजीव गांधी ने यहां से चुनाव लड़ा और 1991 तक यहां से सांसद रहे. बम धमाके में राजीव गांधी के निधन के बाद कांग्रेस ने यहां से सतीश शर्मा को मैदान में उतारा. वे 1991 से लेकर 1998 तक यहां से सांसद रहे. 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के संजय सिन्हा ने सतीश शर्मा को शिकस्त दी.

1999 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी अमेठी से मैदान में उतरीं. उन्होंने बीजेपी के संजय सिन्हा को चुनाव में हराया और 2004 तक अमेठी की सांसद रहीं. 2004 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी यहां से मैदान में उतरे और लगातार तीन बार चुनाव जीते. 2019 के लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी हो हराकर अमेठी में गांधी परिवार के किले को ढहा दिया है.

इस बड़ी जीत के बाद स्मृति ईरानी का केंद्र की मोदी सरकार में कद बढ़ना तय माना जा रहा है. यह देखना रोचक होगा कि कद बढ़ने के बाद वे अमेठी पर कितना ध्यान देती हैं. यदि वे पिछले पांच साल की तरह ही यहां सक्रिय रहीं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इस सीट पर कांग्रेस के लिए वापसी करना मुश्किल हो जाएगा. वहीं अमेठी के एक बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या के बाद जिस तरह से स्मृति वहां पहुंची और उनकी अर्थी को कंधा दिया, उसे देखकर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गांधी परिवार की तरह वे भी इस सीट को अपना स्थायी ठिकाना बनाना चाहती हैं.

छात्र राजनीति से निकले गजेंद्र सिंह शेखावत ने कैसे दी जादूगर को शिकस्त

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अशोक गहलोत. राजस्थान की राजनीति का वो चेहरा, जिसके आगे कोई नहीं टिका. उन्होंने राजस्थान में सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बाद कई नेताओं को ठिकाने लगाया. लेकिन राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत को इस बार लोकसभा चुनाव में एक ऐसे प्रत्याशी ने मात दी जो पांच साल पहले ही सक्रिय राजनीति में आया है. वो नाम है गजेंद्र सिंह शेखावत. हम यहां अशोक गहलोत की हार इसलिए बता रहे हैं क्योंकि जोधपुर संसदीय सीट पर उनके पुत्र वैभव गहलोत सिर्फ शारीरिक रुप से चुनाव लड़ रहे थे. यहां साख पूरी तरह से अशोक गहलोत की दांव पर थी.

अशोक गहलोत पांच बार जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं. वहां उनका जनाधार काफी मजबूत माना जाता है. यही वजह है कि अशोक गहलोत ने अपने वैभव के राजनीतिक पर्दापण के लिए जोधपुर को चुना. हालांकि पहले ये चर्चा थी कि वैभव गहलोत टोंक-सवाई माधोपुर से चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने पिछले काफी समय से यहां तैयारी भी की लेकिन अंत में अशोक गहलोत की तरफ से वैभव को जोधपुर से ही चुनाव लड़ाने का फैसला हुआ. लेकिन जिसने गहलोत के चूलें हिलाई, वैभव को उनके गढ़ में मात दी, वो गजेंद्र शेखावत कौन है. हम उनके जीवन परिचय के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं…

साल था 1967. जैसलमेर के शंकर सिंह शेखावत और मोहन कंवर के घर पुत्र का जन्म हुआ. नाम रखा गया गजेंद्र सिंह. गजेंद्र सिंह की शुरुआती शिक्षा जैसलमेर में हुई. स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद गजेंद्र सिंह कॉलेज शिक्षा के लिए जोधपुर आए. जोधपुर आना उनके जीवन का टर्निंग पांइट साबित हुआ. यहां आने के बाद वो बीजेपी के छात्र संघटन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े. छात्रों की समस्याओं को लेकर वो लगातार जोधपुर में संघर्षरत रहे.

1992 के जोधपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में गजेंद्र की लोकप्रियता को देखते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उन्हें अध्यक्ष पद का उम्मीदवार घोषित किया. नतीजे सामने आए तो गजेंद्र सिंह शेखावत ने इतिहास रच दिया था. वो सबसे ज्यादा मतों से जीतने का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके थे. उनकी जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि जब वे छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए, जोधपुर संसदीय सीट पर कांग्रेस का कब्जा था. अशोक गहलोत खुद सांसद थे. वो खुद छात्र राजनीति के दम पर मुख्य सियासत में आए थे. लेकिन तब किसी को यह इल्हाम नहीं था कि आने वाले समय में यह छात्र नेता जोधपुर की सियासत में एक नई इबारत लिखेगा.

गजेंद्र सिंह की जीत बड़ी थी तो जश्न भी बड़ा होने वाला था. उनके शपथ ग्रहण में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत पहुंचे थे. उस दौर में छात्रसंघ के कार्यालय उद्घाटन में मुख्यमंत्री का पहुंचना बहुत बड़ी बात थी. गजेंद्र ने अपने छात्रसंघ कार्यकाल में छात्रों के कल्याण के अनेक कार्य किए जिनमें अखिल भारतीय छात्र नेता सम्‍मेलन आयोजित किया जाना, विभिन्‍न सांस्‍कृतिक और खेलकूद के कार्यक्रम आयोजन किया जाना शामिल रहा.

इसके बाद वो 2001 में चोपासनी शिक्षा समिति की शिक्षा परिषद के सदस्‍य के रुप में सर्वाधिक मतों से निर्वाचित हुए. स्‍वदेशी जागरण मंच के तत्‍वाधान में 2000 से 2006 तक जोधपुर में स्‍वदेशी मेले का आयोजन किया गया. इन कार्यक्रमों की जिम्मेदारी गजेंद्र सिंह ने भी संभाली. इन कार्यक्रमों में लगभग 10 लाख लोग आए जिसके परिणामस्‍वरूप स्‍वदेशी उद्योग की चीजों की भारी बिक्री हुई. स्‍वदेशी मेले को काफी पसंद किया गया. इन कार्यक्रमों में गजेंद्र सिंह की पहचान जोधपुर के बाहर भी बनाई.

2012 में उन्हें बीजेपी प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया. 2014 में बीजेपी जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से मजबूत उम्मीदवार की तलाश में थी जो चंद्रेश कुमारी को मात दे सके. बीजेपी की खोज गजेंद्र सिंह पर आकर रुकी. गजेंद्र मोदी लहर पर सवार होकर संसद पहुंचे. उन्होंने कांग्रेस की चंद्रेश कुमारी कटोच को भारी अन्तर से हराया.

उन्हें शुरुआत में लोकसभा की प्रमुख कमेटियों का सदस्य बनाया गया. लेकिन 2017 का साल उनके लिए बड़ी खुशी लेकर आया. उन्हें नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में जगह मिली. गजेंद्र सिंह को कृषि और किसान कल्याण विभाग का राज्य मंत्री बनाया गया. इसके बाद वो अपने काम के दम पर पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के चहेते हो गए.

2018 में राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष अशोक परनामी के इस्तीफा देने के बाद अमित शाह ने गजेंद्र सिंह शेखावत को पार्टी का अध्यक्ष पद बनाने का मन बनाया. लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनके नाम का विरोध किया. अमित शाह जानते थे कि वो वसुंधरा राजे के खिलाफ जाकर गजेंद्र को अध्यक्ष तो बना देंगे लेकिन इससे पार्टी के बीच आंतरिक कलह हो सकती है. इसलिए फिर बाद में राज्यसभा सांसद मदनलाल सैनी को प्रदेश अध्यक्ष के लिए चुना गया.

2019 के चुनाव में गजेंद्र सिंह शेखावत ‘ज्वॉइंट किलर’ बनकर उभरे. उन्होंने अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत को भारी अंतर से हराया. यह हार वैभव गहलोत की नहीं अपितु अशोक गहलोत की है क्योंकि गहलोत इस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं. इसके बावजूद उनके पुत्र को करारी हार का सामना करना पड़ा. गजेंद्र सिंह शेखावत की इस बार की जीत उनका कद पार्टी के बीच बढ़ाएगी, इसमें कोई दोराय नहीं है. इस बार के मोदी मंत्रिमंडल में या तो गजेंद्र कैबिनेट मंत्री बनेंगे या फिर राजस्थान बीजेपी की कमान उनके हाथ में होगी, यह निश्चित है.

तो क्या ये हिन्दुत्व की जीत है…

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लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्यसभा सांसद स्वप्न दास गुप्ता ने ट्वीट किया, ‘पश्चिम बंगाल में 40 फीसदी वोटों के साथ बीजेपी बंगाली हिंदुओं की पसंदीदा पार्टी बन गई है. टीएमएसी दूसरे समुदायों की पसंदीदा पार्टी है. इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा.’ तो क्या मोदी की अगुवाई में बीजेपी की यह अभूतपूर्व जीत हिंदुत्व की जीत है? दिल्ली यूनिवर्सिटी के राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रोफेसर सुनील कुमार चौधरी कहते हैं, ‘इतने बड़े नतीजों की बुनियाद किसी एक वजह पर नहीं बनती है. लेकिन, जनता का संदेश साफ है या तो आप परफॉर्म करिए या हाशिए पर जाइए! आपकी जो भी भूमिका जनता ने चुनी है, उसे निभाना पड़ेगा. विपक्ष … Read more

बीजेपी से बगावत पड़ी महंगी, जनता ने नकारे सात पूर्व सांसद

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प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कर रही बीजेपी चुनाव नतीजों के चलते खुशियां मनाने में लगी है. साल 2014 से भी बड़ी विजय हासिल करने वाली बीजेपी ने ‘मोदी है तो मुमकिन है’ पर मुहर लगा दी है. बड़ी जीत के उत्साह के बीच हाल ही में बीजेपी से बगावत करने वाले नेताओं के पास अब हाथ मलने के अलावा कोई चारा नहीं है. जनता ने इस चुनाव में इन्हें सिरे से नकार दिया है जबकि 2014 में इसी पार्टी से जीतकर वे लोकसभा पहुंचे थे. जीत के उत्साह में डूबी बीजेपी के मोदी नेतृत्व को सत्ता से दूर करने की विपक्ष ने भरपूर कोशिश की. पूरे यूपीए … Read more

बिहार में चला NDA का जादू, तिनके की तरह उड़ा विपक्ष

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बिहार के चुनावी नतीजे आ चुके हैं. एनडीए ने बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 39 सीटों पर जीत हासिल की है. यह एनडीए का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है. नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में बीजेपी-जदयू-लोजपा गठबंधन के सामने महागठबंधन कहीं खड़ा नहीं दिखाई दिया. लेकिन मोदी के लिए इस बार बिहार की चुनौती आसान नहीं थी. हम आपको चुनाव से पहले की चुनौतियों के बारे में बता रहे हैं जिन्हें बीजेपी ने केवल नरेंद्र मोदी की वजह से पार किया.

2014 की मोदी लहर में पुराने साथी जदयू के साथ छोड़ने के बावजूद बीजेपी ने बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया था. उसके बाद 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा. यह संगठन के लिए एक झटके की तरह था. चुनाव हारने का मुख्य कारण राजद-जदयू का गठबंधन रहा.

लेकिन बीजेपी ने इसका बदला 2018 में अपनी तरह से लिया. उन्होंने नीतीश कुमार को अपने पाले में लाने के लिए मना लिया. नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. अगले दिन बीजेपी ने जेडीयू सरकार के समर्थन का ऐलान कर दिया. बीजेपी सरकार में सहयोगी बनी और पुरानी सरकारों की तरह बीजेपी नेता सुशील मोदी को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया.

लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी को केंद्रीय मंत्री और रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाह ने झटका दे दिया. वो एनडीए का साथ छोड़कर चले गए. यह बीजेपी के लिए एक बड़ा झटका था. मोदी को घेरने के लिए तेजस्वी यादव ने बिहार में सामाजिक समीकरणों को साधते हुए महागठबंधन का निर्माण किया. महागठबंधन में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, जीतनराम मांझी की ‘हम’ और मुकेश साहनी की ‘वीआईपी’ पार्टी शामिल थीं.

बिहार में चुनाव से पूर्व यह अनुमान था कि इस बार के चुनाव में बीजेपी-जदयू गठबंधन को महागठबंधन से कड़ी चुनौती मिलेगी. लेकिन आए नतीजों ने इस संभावना को सिरे से खारिज कर दिया. मोदी के करिश्माई नेतृत्व में बीजेपी-जदयू-लोजपा गठबंधन ने प्रचंड जीत हासिल की.

मोदी ने यहां सारे जातीय समीकरणों को तोड़ा है. मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र अररिया से भी बीजेपी के उम्मीदवार प्रदीप कुमार ने जीत हासिल की है. प्रदीप यादव की जीत ही बिहार में मोदी मैजिक की स्थिति का आलम बयां करती है.

मोदी के इस तुफान में बिहार के कई दिग्गजों के किले धवस्त हो गए. पाटलिपुत्र से लालु यादव की पुत्री मीसा भारती को बीजेपी के रामकृपाल यादव ने हराया. वहीं बेगूसराय में मोदी की आंधी में सीपीआई के कन्हैंया कुमार उड़ गए. कन्हैंया कुमार को गिरिराज सिंह ने करीब चार लाख वोटों से पटखनी दी. राजद के उम्मीदवार तनवीर हसन तीसरे स्थान पर रहे.

लालु यादव के संसदीय क्षेत्र से इस बार उनकी पत्नी राबड़ी देवी के स्थान पर तेजप्रताप यादव के ससूर चंद्रिका राय चुनाव मैदान में थे. उनको यहां बीजेपी के राजीव प्रताप रुडी से हार का सामना करना पड़ा. बिहार के उजियारपुर लोकसभा क्षेत्र से रालोसपा के उप्रेन्द्र कुशवाह को बीजेपी के नित्यानंद राय से हार का सामना करना पड़ा है.

बिहार की सबसे चर्चित सीट पटना साहिब से बीजेपी के रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस के शत्रुघ्न सिन्हा को भारी अंतर से हराया. वीआईपी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मुकेश साहनी को भी अपने पहले चुनाव में मोदी लहर के कारण हार का सामना करना पड़ा. उनको लोजपा के महबूब अली कैसर ने हराया. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को भी इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है.

यूपी में एक दर्जन से अधिक सीटों पर अटकी हुई है दिग्गजों की सांसें

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एक्जिट पोल्स ने जहां एक ओर विपक्ष की नींदें उड़ा रखी हैं, वहीं राजनीति का गढ़ कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश में कई संसदीय सीटें ऐसी हैं जहां दिग्गजों की सांसे आखिरी समय तक अटकी हुई हैं. इन सीटों पर सभी प्रमुख पार्टियों की नजरें तो गढ़ी ही हैं, वोटर्स का भी खास फोकस है. आजमगढ़ से अमेठी और फिरोजाबाद से गोरखपुर तक एक दर्जन से अधिक सीटें हैं जिनका परिणाम हर कोई जानना चाहता है. यहां के नतीजे और अंतर कई दिग्गजों का सियासी भविष्य बनाने और बिगाड़ने में अहम भूमिका निभाएंगे. आइए बात करते हैं यूपी की कुछ ऐसी ही सीटों के बारे में … लखनऊ : यूपी … Read more

देश की वो सीटें जहां मुकाबला एक्जिट पोल में भी फंसा हुआ है…

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लोकसभा चुनाव के परिणाम 23 मई को जारी होंगे. उससे पहले आए एक्जिट पोल्स में बीजेपी की सरकार बनती दिखाई दे रही है. लेकिन देश की कई सीटें ऐसी है जहां मुकाबला कड़ा है. अगर यहां के नतीजे अपेक्षा से उलट हुए तो एक्जिट पोल जमीदोंज हो सकते है. गोरखपुरः गोरखपुर बीजेपी का गढ़ रहा है. लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनाव में यहां सपा ने जीत हासिल की थी. इस बार यहां मुकाबला काफी कड़ा है. बीजेपी की तरफ से भोजपुरी अभिनेता रविकिशन मैदान में है. उनका मुकाबला सपा के रामभुआल निषाद से है. सहारनपुरः वैसे तो यह मुस्लिम बाहुल्य सीट है लेकिन यहां बसपा … Read more