Amit Shah
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मोदी-शाह से मिले जगन रेड्डी, एनडीए में शामिल होगी वाईएसआर कांग्रेस!
लोकसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद सियासी समीकरणों के बनना-बिगड़ना शुरू हो गया है. रविवार को आंध्र प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात की. इस दौरान जगन ने पीएम मोदी को जीत की बधाई देते हुए आंध्रप्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के साथ ही केंद्र सरकार से अतिरिक्त फंड जारी करने की मांग की. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार जगन मोहन रेड्डी ने पीएम मोदी को आंध्र प्रदेश की आर्थिक स्थिति के बारे में बताया और 30 हजार करोड़ रुपये के बकाए बिल का भुगतान करने का अनुरोध किया. इसके साथ ही दोनों नेताओं के … Read more
तो क्या ये हिन्दुत्व की जीत है…
लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद राज्यसभा सांसद स्वप्न दास गुप्ता ने ट्वीट किया, ‘पश्चिम बंगाल में 40 फीसदी वोटों के साथ बीजेपी बंगाली हिंदुओं की पसंदीदा पार्टी बन गई है. टीएमएसी दूसरे समुदायों की पसंदीदा पार्टी है. इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा.’ तो क्या मोदी की अगुवाई में बीजेपी की यह अभूतपूर्व जीत हिंदुत्व की जीत है? दिल्ली यूनिवर्सिटी के राजनीतिशास्त्र विभाग के प्रोफेसर सुनील कुमार चौधरी कहते हैं, ‘इतने बड़े नतीजों की बुनियाद किसी एक वजह पर नहीं बनती है. लेकिन, जनता का संदेश साफ है या तो आप परफॉर्म करिए या हाशिए पर जाइए! आपकी जो भी भूमिका जनता ने चुनी है, उसे निभाना पड़ेगा. विपक्ष … Read more
Result 2019: इन राज्यों में नहीं खुला BJP का खाता
देश में आए लोकसभा चुनाव के नतीजों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में बीजेपी ने विशाल जीत हासिल की है. भारत के चुनावी इतिहास में किसी गैर कांग्रेसी दल ने सबसे ज्यादा सीटों पर जीत हासिल की. बीजेपी ने कुल 542 में से 352 सीटों पर विजयश्री हासिल की है. बीजेपी ने कई राज्यों में तो विपक्ष का सूपड़ा ही साफ कर दिया. लेकिन मोदी की इस प्रचंड सुनामी के बावजूद बीजेपी को कई राज्यों से निराशा हाथ लगी. इन राज्यों में तो बीजेपी का खाता तक नहीं खुल सका. यह आंकड़े बीजेपी के उस दावे को झटका देते हैं जिसमें बीजेपी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी होने … Read more
देश में लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा उपचुनावों में भी लहराया BJP का परचम
देश में बुधवार को लोकसभा चुनाव के परिणाम के साथ-साथ कई राज्यों में विधानसभा उपचुनावों के नतीजे भी सामने आए. यहां बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के परिणामों की तरह ही विधानसभा उपचुनावों में भी अपना परचम लहराया है. जिन राज्यों में बीजेपी ने यह कारनामा किया है उस लिस्ट में बिहार, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, एमपी, यूपी और पं.बंगाल जैसे कई प्रदेश शामिल हैं. निम्न सीटों पर विधानसभा उपचुनावों के परिणाम बुधवार को घोषित हुए हैं. बिहारः बिहार में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा की दो सीटों के लिए चुनाव हुआ. इनके नतीजों में जदयू-बीजेपी गठबंधन ने महागठबंधन का सूपड़ा साफ कर दिया. डिहरी सीट पर बीजेपी के सत्यनारायण सिंह ने राजद … Read more
मोदी-शाह की जोड़ी ने पश्चिम बंगाल में कैसे लगाई दीदी के किले में सेंध?
यदि किसी राजनीतिक दल को लोकसभा चुनाव में 42 में से महज दो सीटों पर जीत हासिल हो तो उसे अगले चुनाव से ही मृतप्राय: मान लिया जाता है, लेकिन बीजेपी ने इस बदतर स्थिति को चुनौती में बदलकर जीत की नई इबारत लिख दी है. जी हां, पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने वो करिश्मा कर दिखाया है, जिसकी कल्पना कोई राजनीतिक दल सपने में भी नहीं कर सकता.
आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं. 2014 की मोदी लहर के बावजूद बीजेपी ने यहां महज दो सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि तृणमूल कांग्रेस ने 34, कांग्रेस ने चार और वाम दलों ने दो सीटों पर फतह हासिल की थी. जबकि 2016 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की 294 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस को 211 सीटों पर जीत मिलीं और बीजेपी को महज तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा.
दोनों चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले में बीजेपी कहीं नहीं थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी—शाह की जोड़ी ने ममता बनर्जी के किले में सेंध लगा दी है. तृणमूल कांग्रेस को 22 सीटों पर जीत मिली है जबकि बीजेपी ने 18 सीटों पर फतह हासिल की. बीजेपी का यह प्रदर्शन पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के उस दावे के आसपास है, जो उन्होंने चुनाव से पहले किया था. आपको बता दें कि शाह ने पश्चिम बंगाल में 23 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा किया था.
जिस समय अमित शाह ने 23 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा किया तो राजनीति के जानकारों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. सबने यह माना कि पश्चिम बंगाल में वाम दलों के किले को ध्वस्त कर सत्ता पर काबिज हुईं ममता बनर्जी को मात देना नामुमकिन है, लेकिन बीजेपी ने यह करिश्मा कर दिखाया है. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के किले में सेंध कैसे लगाई.
असल में 2014 के लोकसभा चुनाव और 2016 में विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद पश्चिम बंगाल की कमान संघ ने अपने हाथों में ली. बीते तीन साल में पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए जमीन तैयार करने में संघ ने बड़ी भूमिका निभाई. इस दौरान प्रदेश में संघ का नेटवर्क तेजी से बढ़ा. शाखाओं की संख्या इसकी मुनादी करती है. गौरतलब है कि संघ की शाखाओं में 2016 में पश्चिम बंगाल में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. 2016 में इनकी संख्या 700 के आसपास थी, जो अब बढ़कर 2000 को पार कर चुकी है.
पश्चिम बंगाल में संघ की शाखाएं बढ़ने का असर यह हुआ कि सूबे में ममता बनर्जी की कार्यशैली का विरोध करने के लिए एक संगठित शक्ति बीजेपी को मिल गई. इसका फायदा पश्चिम बंगाल में पार्टी के प्रभारी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने बखूबी उठाया. 2017 में बशीरहाट में एक फेसबुक पोस्ट से भड़के दंगे ने उनके लिए ध्रुवीकरण की जमीन तैयार की. राजनीति के जानकारों ने उसी समय यह भविष्यवाणी कर दी थी कि बशीरहाट पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव का बैरोमीटर बनेगा. ऐसा हुआ भी.
आपको बता दें कि बशीरहाट में लगभग 10 लाख मुसलमान रहते हैं. यहां कथित रूप से बांग्लादेश से घुसपैठ और सीमापार गाय की तस्करी होने का आरोप बीजेपी लगाती है. पार्टी के नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान खुलेआम यह कहा कि बशीरहाट और आसपास के इलाकों में यह सब ममता बनर्जी के संरक्षण में होता है. बीजेपी के इस आरोप का बंगाल के हिंदुओं में व्यापक असर दिखा. इसके अलावा ‘इमामों को मिल रहे भत्ते’ और स्कूलों में ‘उर्दू थोपने’ का मामला भी बीजेपी एजेंडे में शामिल रहा. असम की तरह पश्चिम बंगाल में भी एनआरसी लागू करने के बीजेपी के वादे ने हिंदुओं को आकर्षित किया.
इसकी काट के लिए ममता बनर्जी भी ध्रुवीकरण की रणनीति पर चलीं. यानी लोकसभा चुनाव में बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस, दोनों की रणनीति ध्रुवीकरण की रही. बीजेपी नेतृत्व का यह आकलन था कि ध्रुवीकरण के खुले खेल में उनकी पार्टी को सबसे बड़ा फायदा होगा, क्योंकि मुस्लिम वोट तृणमूल कांग्रेस, वाम दलों और कांग्रेस के बीच बंटेंगे जबकि हिंदुओं के वोट सिर्फ उसे मिलेंगे. बीजेपी की 18 सीटों पर जीत इसकी पुष्टि करते हैं.
बीजेपी को एक आकलन यह भी था कि तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के आतंक से त्रस्त वाम दलों और कांग्रेस के समर्थक इस उम्मीद से उनके साथ आएंगे कि बीजेपी ही ममता बनर्जी से मुक्ति दिला सकती है. चुनाव नतीजे इस ओर साफ इशारा करते हैं. पश्चिम बंगाल में वाम दलों को एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई जबकि कांग्रेस को महज एक सीट पर संतोष करना पड़ा.
बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 18 सीटों पर सिर्फ जीत ही दर्ज नहीं की है, बल्कि 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस के सामने तगड़ी चुनौती पेश कर दी है. लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को जहां 43.36 प्रतिशत वोट मिले हैं, वहीं बीजेपी को 40.23 प्रतिशत वोट मिले हैं. लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद आत्मविश्वास से लबरेज बीजेपी के लिए इस अंतर को पाटना मुश्किल काम नहीं है.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी दूसरे नंबर पर तो लोकसभा चुनाव के पहले ही आ गई थी. पंचायत चुनाव के नतीजे इसकी गवाही देते हैं. आपको बता दें कि राज्य की 9214 पंचायत समितियों में से तृणमूल कांग्रेस को 8062 और दूसरे स्थान पर रही बीजेपी को 769 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं, 133 सीटें लेकर कांग्रेस तीसरे और 110 सीटों के साथ वाम दल चौथे स्थान पर रहे. इसी तरह 49 हजार 636 ग्राम पंचायतों में तृणमूल कांग्रेस को 38 हजार 118, बीजेपी को 1483, कांग्रेस को 1066 और माकपा को 1483 सीटें मिली.
तृणमूल कांग्रेस के कई नेता भी यह मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी इसी गति से आगे बढ़ती रही तो विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के लिए खतरा बन सकती है. हालांकि वे बीजेपी के इस उभार के लिए ममता बनर्जी को ही जिम्मेदार मानते हैं. अनौपचारिक बातचीत में वे यह खुलकर स्वीकार करते हैं कि प्रदेश में बीजेपी की सबसे बड़ी प्रमोटर उनकी नेता ही हैं. यदि यहां बीजेपी पैर पसार रही है तो इसके लिए खाद—पानी ममता बनर्जी ने ही मुहैया करवाया है.
लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी की अगली रणनीति तृणमूल कांग्रेस में तोड़फोड़ करने की है. कभी ममता बनर्जी के करीबी रहे मुकुल रॉय सहित कई नेता बीजेपी में आ चुके हैं. असल में तृणमूल कांग्रेस के कई नेता यह मानते हैं कि ममता बनर्जी पार्टी को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चला रही हैं. ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी में अपने उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाना कई वरिष्ठ नेताओं को अखर रहा है.
लोकसभा चुनाव में बीजेपी का अच्छा प्रदर्शन ममता बनर्जी पर दबाव और बढ़ाएगा. इस माहौल को बीजेपी मौके की तरह लेगी. केंद्र में सत्ता में लौटने के बाद बीजेपी की ताकत वैसे ही बढ़ गई है. अब तो तृणमूल कांग्रेस के नेता ही यह मानने लगे हैं कि यदि बीजेपी इसी रणनीति और गति से आगे बढ़ी तो पार्टी पश्चिम बंगाल में परचम फहराने के करीब पहुंच सकती है.
देश की वो सीटें जहां मुकाबला एक्जिट पोल में भी फंसा हुआ है…
लोकसभा चुनाव के परिणाम 23 मई को जारी होंगे. उससे पहले आए एक्जिट पोल्स में बीजेपी की सरकार बनती दिखाई दे रही है. लेकिन देश की कई सीटें ऐसी है जहां मुकाबला कड़ा है. अगर यहां के नतीजे अपेक्षा से उलट हुए तो एक्जिट पोल जमीदोंज हो सकते है. गोरखपुरः गोरखपुर बीजेपी का गढ़ रहा है. लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनाव में यहां सपा ने जीत हासिल की थी. इस बार यहां मुकाबला काफी कड़ा है. बीजेपी की तरफ से भोजपुरी अभिनेता रविकिशन मैदान में है. उनका मुकाबला सपा के रामभुआल निषाद से है. सहारनपुरः वैसे तो यह मुस्लिम बाहुल्य सीट है लेकिन यहां बसपा … Read more
अगर फिर बनी पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार तो रचा जाएगा नया इतिहास
देश में लोकसभा चुनाव के बाद आए एग्ज़िट पोल पूर्ण बहुमत की बीजेपी सरकार रच रहे हैं. अगर यह सच साबित होता है तो भारतीय राजनीति में एक बार फिर इतिहास रचा जाएगा. जवाहर लाल नेहरु और इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली यह तीसरी सरकार होगी जो सत्ता में वापसी करेगी. बीजेपी 2014 में भी केंद्र में विराजमान हो चुकी है.
इससे पहले जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेस ने लगातार 15 साल तक सत्ता पर अपना कब्जा कायम रखा था. उन्होंने 1952, 1957 और 1962 में लगातार कांग्रेस की सत्ता में भारी बहुमत के साथ वापसी करायी. कांग्रेस ने नेहरु के नेतृत्व में 1952 के चुनाव में 364 सीटों पर जीत हासिल की. 1957 के चुनाव में नेहरु के दमदार नेतृत्व के दम पर कांग्रेस की सीटें 364 से बढ़कर 371 हो गई. 1962 के चुनाव में नेहरू ने अपने शासन के दम पर बहुमत की हैट्रिक लगाई. इस बार कांग्रेस को 361 सीटें मिलीं.
मई, 1964 में नेहरु का निधन हो गया. कांग्रेस के भीतर सत्ता के शीर्ष को लेकर संघर्ष शुरु हुआ. आखिरकार लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर सहमति बनी. लेकिन डेढ़ साल के भीतर उनका भी निधन हो गया.
शास्त्री के निधन के बाद कांग्रेस में फिर से सत्ता संघर्ष स्वभाविक था. अंत में प्रधानमंत्री पद के दो दावेदार सामने आए. एक तरफ मोरारजी देसाई तो दूसरी तरफ जवाहर लाल नेहरु के बेटी इंदिरा गांधी.
यह मामला तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष कामराज के लिए कठिन परीक्षा का दौर था. उन्हें पार्टी में बगैर किसी विरोध के दोनों में से किसी एक के नाम पर सहमति बनानी थी. उन्होंने मोरारजी देसाई को समझाने की तमाम कोशिशें की लेकिन मोरारजी वोटिंग पर अड़ गए. बाद में वोटिंग पर सहमति बनी और यहां इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को पॉपुलर्टी की रेस में काफी पीछे छोड़ दिया.
1967 का संसदीय चुनाव इंदिरा गांधी के नेतृत्व में लड़ा गया. इंदिरा ने पार्टी में आंतरिक विरोध होने के बावजूद अपने नेतृत्व में दमदार वापसी की. कांग्रेस को इस चुनाव में 284 सीटों पर जीत मिली. हालांकि वह दौर कांग्रेस के लिए सुखद नहीं था. इसके बावजूद पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ. 1971 में इंदिरा गांधी ने फिर से सत्ता में वापसी की और अपने नेतृत्व में कांग्रेस को 352 सीटें दिलाईं.
2014 के चुनाव में मोदी के करिश्माई नेतृत्व में बीजेपी ने 282 सीटों पर फतेह हासिल की थी. उस समय नतीजे देखने वालों के लिए एक चमत्कार से कम नहीं था. देश के इतिहास में बीजेपी पहली गैर-कांग्रेसी पूर्ण बहुमत सरकार थी. कांग्रेस का इस चुनाव में लगभग सूपड़ा साफ हो गया था.
हालात यह रहे कि देश का सबसे बड़ा राजनीतिक दल केवल 44 सीटों पर सिमट कर रह गया. राजस्थान, गुजरात, उतराखंड़, गोवा और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला पाया. अब अगर बीजेपी फिर से सत्ता वापसी करती है तो नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद तीसरी पूर्ण बहुमत सरकार होगी जो सत्ता में वापसी करेगी.
अमित शाह को क्लीन चिट मामले में आयुक्त और मुख्य आयुक्त आमने-सामने
लोकसभा चुनावों में आचार संहिता के उल्लंघन के मामलों में चुनाव आयोग में मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं. इस मामले में अब चुनाव आयुक्त अशोक लवासा और मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा आमने-सामने हो गए हैं. आयोग के आचार संहिता उल्लंघन के कई मामलों में असहमति देने वाले चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने सुनील अरोड़ा को पत्र लिखकर आचार संहिता मामले में आयोग के फैसलों में आयुक्तों के बीच मतभेद को भी आधिकारिक रिकॉर्ड पर शामिल करने की मांग की है.
बता दें, लोकसभा चुनाव में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा आयोग के लगातार अमित शाह और नरेंद्र मोदी को आचार संहिता उल्लघंन मामले में क्लीन चिट देने और और विरोधी दलों के नेताओं को नोटिस थमाए जाने के नाराज बताए जा रहे हैं.
लवासा के पत्र लिखने के मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कहा कि चुनाव आयोग में 3 मेंबर होते हैं और तीनों एक-दूसरे के क्लोन नहीं हो सकते. यह जरुर नहीं कि तीनों सदस्यों की राय एक जैसी हो. मैं किसी भी तरह के बहस से नहीं भागता. हर चीज का समय होता है. सीधे तौर पर कहा जाए तो अरोड़ा ने इस मामले में पूरी तरह अपनी चुप्पी साध ली है.
गौरतलब है कि वर्तमान लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग की भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे हैं. विपक्ष खुलकर आयोग पर आरोप लगा रहा है कि वह निष्पक्ष रूप से फैसले नहीं ले रहा. बंगाल में अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के बाद तय समय से 20 घंटे पहले ही चुनाव प्रचार पर बैन को लेकर भी आयोग की तीखी आलोचना हुई थी. वहीं बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दावा किया कि चुनाव आयोग मोदी और शाह के इशारे पर काम कर रहा है. वहीं दूसरी पार्टियां भी आयोग पर लगातार ऐसे आरोप जड़ रही है.