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मध्यप्रदेश की सियासत: क्या जीतू पटवारी की रणनीति कांग्रेस पर पड़ेगी भारी?

23 मई 2026
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मध्यप्रदेश की सियासत: क्या जीतू पटवारी की रणनीति कांग्रेस पर पड़ेगी भारी?

संगठन में ‘पट्ठाबाज’ हावी होने के आरोपों से गरमाई सियासत, MP कांग्रेस में बढ़ते असंतोष से चुनावी रणनीति पर मंडराया खतरा, विशाल मालवीय के इस्तीफे ने अंदरूनी खींचतान को किया उजागर


MadhyaPradesh Politics: मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों अंदरूनी खींचतान और असंतोष का दौर खुलकर सामने आने लगा है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी (jitu patwari) की कार्यशैली को लेकर पार्टी के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं. कई वरिष्ठ और जमीनी नेता संगठन में उपेक्षा, निर्णयों में मनमानी और क्षेत्रीय नेताओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिलने की शिकायत कर रहे हैं. यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर बढ़ती नाराजगी अब राजनीतिक गलियारों में बड़े 'खेला' की चर्चा को हवा दे रही है.

सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस के कुछ नेता पार्टी नेतृत्व से नाराज होकर दूसरे राजनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं. इनमें से अधिकांश का झुकाव सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की ओर है. बीजेपी भी इस मौके को राजनीतिक रूप से भुनाने की रणनीति पर काम कर रही है. ऐसे में आने वाले समय में कांग्रेस को मध्यप्रदेश में बड़ा राजनीतिक झटका लग सकता है.

इसी घटनाक्रम में मध्यप्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री रहे स्वं राधाकिशन मालवीय के पोते विशाल मालवीय ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. विशाल फिलहाल इंदौर जनपद पंचायत में सदस्य हैं और देवास-शाजापुर से लोकसभा चुनाव लड़ने वाले राजेंद्र मालवीय के बेटे हैं. विशाल बीजेपी के वरिष्ठ एवं कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत के दामाद भी हैं. ऐसे में उनकी भी बीजेपी के साथ जाने की संभावनाएं जोर पकड़ रही है.

विशाल मालवीय ने एक ओर जहां कांग्रेस पार्टी में पट्ठाबाज हावी और सुनवाई न होने से नाराजगी दिखाई, वहीं प्रदेशाध्यक्ष जीतू पटवारी की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं. मालवीय के इस्तीफे के बाद एक बार फिर इंदौर में राजनीतिक हलचल देखी जा रही है.

विशाल ने अपने इस्तीफे में लिखा, 'जो लोग केवल नेताओं के आगे पीछे घूमकर व्यक्तिगत लाभ साधने में लगे हैं, उन्हें संगठन में पद व प्रतिष्ठा प्रदान की जा रही है. वर्षों से पार्टी के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं को लगातार उपेक्षित कर हाशिये पर धकेला जा रहा है. संगठन में आज स्वयं को उपेक्षित व असहज महसूस करना अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है.'

स्व. राधाकिशन मालवीय का जिक्र करते हुए उन्होंने ये भी लिखा, 'वे 10 सालों से समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं. दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि चाटुकारिता और व्यक्तिगत समीकरणों को अधिक महत्व दिया जा रहा है. समर्पित कार्यकर्ता को हाशिए पर धकेला जा रहा है. इससे मेरा आत्मसम्मान आहत हो रहा है. ऐसे में मेरा इस्तीफा स्वीकार करें.'

हालांकि यह पहली बार नहीं है कि किसी वरिष्ठ नेता की नाराजगी सामने आयी है. कांग्रेस के कई अन्य वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि संगठनात्मक फैसलों में अनुभव की अनदेखी की जा रही है. जिलों और ब्लॉक स्तर पर नियुक्तियों को लेकर भी विवाद सामने आए हैं. कुछ नेताओं का आरोप है कि फैसले सीमित लोगों की सलाह पर लिए जा रहे हैं, जिससे पुराने कार्यकर्ता खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं. यही कारण है कि कई जगहों पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल की कमी दिखाई देने लगी है.

इससे पहले विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी जीतू पटवारी को सौंपी गई थी. पार्टी नेतृत्व को उम्मीद थी कि युवा चेहरा होने के कारण वह संगठन में नई ऊर्जा भरेंगे और कार्यकर्ताओं को एकजुट करेंगे. शुरुआत में उन्होंने आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाने की कोशिश भी की, लेकिन समय बीतने के साथ पार्टी के भीतर असंतोष की आवाजें तेज होने लगीं.

हालांकि कांग्रेस नेतृत्व लगातार यह दावा कर रहा है कि पार्टी पूरी तरह एकजुट है और विरोध की खबरें बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जा रही हैं. पार्टी नेताओं का कहना है कि संगठन में बदलाव की प्रक्रिया चल रही है और इससे कुछ असंतोष स्वाभाविक है. इसके विपरीत राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि यदि नाराज नेताओं को समय रहते साधा नहीं गया, तो आने वाले चुनावों से पहले मध्यप्रदेश की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस समय रहते अंदरूनी मतभेदों को नियंत्रित नहीं कर पाई, तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलना निश्चित है. बीजेपी पहले से ही मजबूत संगठन और सत्ता का लाभ लेकर प्रदेश में अपनी पकड़ बनाए हुए है. ऐसे में कांग्रेस के भीतर बढ़ती अस्थिरता विपक्ष को और कमजोर कर सकती है.

अब मध्यप्रदेश की सियासत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जीतू पटवारी अपनी रणनीति और नेतृत्व क्षमता से कांग्रेस को एकजुट रख पाएंगे या फिर बढ़ती नाराजगी पार्टी को और कमजोर कर देगी. फिलहाल मध्यप्रदेश की राजनीति में सस्पेंस और सियासी अटकलों का दौर जारी है.

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