मंत्री बनने की चाह में चाचा पारस ने भतीजे चिराग को लगाया किनारे, जदयू ने लिखी सियासी पटकथा

सत्ता का सुख और मंत्री पद की लालसा के आगे न कोई चाचा है न भतीजा, संकेत पहली बार पिछले साल उस वक्त सामने आए जब चिराग ने सार्वजनिक तौर पर चाचा पशुपति कुमार पारस के खिलाफ नाराजगी जाहिर की थी, आज दिल्ली में जब चिराग चाचा पारस से मिलने उनके आवास पहुंचे तो उन्होंने मुलाकात तक नहीं की और डेढ़ घण्टे खड़े रहने के बाद चिराग को वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा

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मंत्री बनने की चाह में चाचा पारस ने भतीजे चिराग को लगाया किनारे
मंत्री बनने की चाह में चाचा पारस ने भतीजे चिराग को लगाया किनारे
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Politalks.News/BiharPolitics. जून का महीना राजनीति को ‘अस्थिर‘ करने में लगा हुआ है. उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में सियासी हलचलें तेज हो रखीं हैं, इन सबके बीच बिहार में भी सियासी बवाल मच गया है. सत्ता का सुख और मंत्री पद की लालसा के आगे न कोई चाचा है न भतीजा, ऐसा ही एक बड़ा सियासी ड्रामा बिहार में देखने को मिल रहा है. आपको बता दें, करीब 5 वर्ष पहले उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान सत्ता के लिए चाचा-भतीजे की लड़ाई इतनी आगे बढ़ गई थी कि चाचा शिवपाल को अपनी अलग पार्टी भी बनानी पड़ी थी और आज भी पूर्व मुख्यमंत्री और सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव और चाचा शिवपाल के बीच तनातनी चली आ रही है.

अब बात को आगे बढ़ाते हैं और बात करते हैं लोकजनशक्ति पार्टी की, पूर्व केंद्रीय मंत्री दिवंगत रामविलास पासवान ने एलजेपी का गठन किया था. पासवान लोक जनशक्ति पार्टी को बिहार में ‘मजबूत‘ करते चले गए. रामविलास पासवान की बदौलत ही साल 2019 के लोकसभा चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी ने लोकसभा की ‘छह सीटें‘ जीती थीं. यहां तक कि केंद्र में अभी भी एलजेपी एनडीए गठबंधन का हिस्सा है. मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भी रामविलास पासवान को केंद्रीय मंत्री बनाया गया.

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पिछले वर्ष साल 2020 में रामविलास पासवान के निधन हो गया था, लेकिन उससे पहले ही जब पासवान का स्वास्थ्य बहुत ज्यादा खराब होने लगा था और बिहार चुनाव सर पर आ रहे थे तब रामविलास पासवान ने अपनी सियासी विरासत अपने पुत्र चिराग पासवान को सौंपते हुए चिराग को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया दिया था. लेकिन ‘फिल्म लाइन से राजनीति जगत में कदम रखने वाले चिराग अपने पिता की तरह दूरदृष्टि की सियासत नहीं जान पाए‘. चिराग पासवान पिता की बनाई गई पार्टी को संभाल नहीं सके और एलजेपी लगातार ‘बिखरती‘ चली गई.

आपको बता दें, पिछले वर्ष अक्टूबर में बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान चिराग पासवान का बिहार में एनडीए से अलग होकर चुनाव लड़ना और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर सीधे हमला करना भारी पड़ गया. बिहार चुनाव में लोक जनशक्ति पार्टी के एकमात्र विधायक राजकुमार सिंह ही चुनाव जीत सके. उसके कुछ समय बाद ही एलजेपी के विधायक और कई बड़े नेताओं ने चिराग का साथ छोड़ जेडीयू में शामिल हो गए. लेकिन अभी भी नीतीश कुमार को चिराग पासवान ‘खटक‘ रहे थे. अब इस बार जेडीयू के नेताओं ने लोजपा से चिराग को अलग करने के लिए ‘पटकथा‘ लिखी गई.

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वहीं पशुपति कुमार पारस पिछले कुछ दिनों से लगातार जेडीयू सांसद ललन सिंह के संपर्क में थे.‌ हाल ही में पटना में दोनों के बीच मुलाकात भी हुई थी, इसमें बड़ा रोल राम विलास पासवान के रिश्तेदार और जेडीयू के वरिष्ठ नेता महेश्वर हजारी ने किया. बिहार की राजनीति में कभी सत्ता की चाबी रखने वाली लोक जनशक्ति पार्टी अब दो फाड़ हो चुकी है. चाचा-भतीजे के बीच में पैदा हुआ मनमुटाव वक्त के साथ इतना बढ़ गया कि अब दोनों की राहें अलग-अलग हो चुकी है. पार्टी में जो कुछ आज हो रहा है उसके संकेत पहली बार पिछले साल उस वक्त सामने आए थे जब चिराग ने सार्वजनिक तौर पर चाचा पशुपति कुमार पारस के खिलाफ नाराजगी जाहिर कर दी थी. आज दिल्ली में जब चिराग चाचा पारस से मिलने उनके आवास पहुंचे तो उन्होंने मुलाकात तक नहीं की और डेढ़ घण्टे खड़े रहने के बाद चिराग को वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा.

एलजेपी के सांसद पशुपति पारस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के रहे हैं करीबी
बता दें कि रामविलास पासवान के छोटे भाई और सांसद पशुपति पारस पासवान के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से शुरू से ही करीबी संबंध रहे हैं. पिछले कार्यकाल में नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में पारस मंत्री भी रहे थे. पारस भी पिछले कुछ समय से अपने भतीजे चिराग के फैसलों को लेकर नाराज चल रहे थे. एलजेपी के छह में से पांच सांसदों ने चिराग पासवान के खिलाफ बागी रुख अपनाते हुए पासवान के छोटे भाई पशुपति पारस को अपना नेता मान लिया है. पारस के भतीजे चिराग को किनारे लगाने के पीछे बड़ा कारण मोदी सरकार में होने जा रहा मंत्रिमंडल विस्तार भी माना जा रहा है.

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यहां हम आपको बता दें कि चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी में बगावत ऐसे समय हुई है, जब केंद्र की मोदी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार के लिए ‘स्टेज‘ सजने लगी है. रामविलास पासवान की जगह चिराग पासवान मंत्री बनने के लिए अपने आप को तैयार कर रहे थे. ऐसे में एलजेपी के 5 सांसदों ने चिराग को अपना नेता मानने से इनकार कर दिया है. बागी पांचों सांसदों में पशुपति पारस, प्रिंस पासवान, वीणा सिंह, चंदन कुमार और महबूब अली कैसर हैं. बता दें कि पशुपति कुमार पारस और एलजेपी के पूर्व सांसद सूरज भान सिंह दिल्ली आ गए. सूरजभान सिंह के भाई और नवादा से एलजेपी सांसद चंदन सिंह को भी दिल्ली बुलाया गया. वैशाली सांसद वीणा सिंह, खगडिया से सांसद महबूब अली कैसर, प्रिंस राज पहले से ही दिल्ली में मौजूद थे. इस दौरान सभी नेताओं की बैठक बुलाई गई, जिसमें पार्टी के पांचों सांसदों ने राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को सभी पदों से हटा दिया. साथ ही चिराग के चाचा पशुपति कुमार पारस को अपना नेता चुन लिया.

यही नहीं लोजपा के इन पांचों सांसदों ने रविवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मुलाकात की और उन्हें पार्टी में नए घटनाक्रम के बारे में एक पत्र सौंपा. उन्होंने उनसे पशुपति कुमार पारस को लोकसभा में लोजपा का नया नेता मानने का अनुरोध किया है. एलजेपी में असंतोष की एक बड़ी वजह रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत पर कब्जे को लेकर परिवार का अंदरूनी विवाद भी था. यही वजह है कि चिराग पासवान के खिलाफ उनके चाचा पशुपति पारस और रामविलास पासवान के बड़े भाई के लड़के प्रिंस राज ने भी बागी रुख अपना लिया है. यानी आज चिराग पिता की बनाई गई पार्टी में ही अलग-थलग पड़ गए हैं. ‌

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