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विशेष रिपोर्ट

'उड़ता संगरिया' बदल रहा सरहद का मिजाज! खेतों की खुशहाली निगल रहा नशे का सिंडिकेट, दांव पर युवाओं का भविष्य

15 मई 2026
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'उड़ता संगरिया' बदल रहा सरहद का मिजाज! खेतों की खुशहाली निगल रहा नशे का सिंडिकेट, दांव पर युवाओं का भविष्य

सुलगता संगरिया! बुझ रहे घरों के चिराग, बिक रही जमीनें; नशा माफिया के खिलाफ कब जागेगा समाज?


Rajasthan: क्या पंजाब की तरह राजस्थान का सरहदी इलाका भी नशे के खूनी दलदल में धंसता जा रहा है? जिस धरती की पहचान कभी लहलहाते खेतों, बेमिसाल भाईचारे और मेहनतकश इंसानों से हुआ करती थी, आज वही शांत मरुभूमि नशे के बढ़ते सिंडिकेट और काले कारोबार के कारण सिसक रही है. विशेष रूप से संगरिया और इसके सीमावर्ती क्षेत्रों में नशा तस्करी का जाल किसी साइलेंट किलर की तरह फैल चुका है। यह अब सिर्फ पुलिस थानों की फाइलों और कानून-व्यवस्था तक सीमित मामला नहीं रह गया, बल्कि यह गांवों की रगों में 'सफेद जहर' घोलकर हमारी पूरी एक पीढ़ी को जिंदा दफन करने की खौफनाक साजिश बन चुका है.

इस गंभीर मुद्दे पर वरिष्ठ समाजसेवी और जागरूक नागरिक बलकौर सिंह ढिल्लों ने गहरी चिंता व्यक्त की है. ढिल्लों का कहना है कि यह अब सिर्फ पुलिस और कानून-व्यवस्था की फाइलों तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि यह गांवों की रगों में जहर घोलकर हमारी पूरी एक पीढ़ी की नींव को खोखला कर रहा है.


अंधकार में डूबता युवाओं का भविष्य

किसी भी समाज की सबसे बड़ी रीढ़ और ताकत उसके युवा होते हैं, लेकिन संगरिया क्षेत्र में यही रीढ़ टूटती नजर आ रही है. गांवों और कस्बों में स्कूल-कॉलेज जाने वाले कम उम्र के लड़के इस जानलेवा लत का आसान शिकार बन रहे हैं. शुरुआत अक्सर शौक या दोस्तों के दबाव से होती है, जो धीरे-धीरे एक लाइलाज दलदल में बदल जाती है.

बलकौर सिंह ढिल्लों ने युवाओं के इस दर्द को बयां करते हुए बताया कि नशे की इस गिरफ्त में फंसकर युवाओं की पढ़ाई छूट रही है, रोजगार की क्षमता खत्म हो रही है और वे मानसिक व शारीरिक रूप से पंगु हो रहे हैं. जिन कंधों पर माता-पिता ने बुढ़ापे का सहारा बनने और डॉक्टर, शिक्षक या अफसर बनने का सपना देखा था, वे आज नशे की खुराक के लिए तड़पते दिखाई देते हैं.

बर्बाद होते घर: एक व्यक्ति की लत, पूरे परिवार पर दुखों का पहाड़

नशे की कीमत सिर्फ नशा करने वाला नहीं, बल्कि उसका पूरा हंसता-खेलता परिवार अपनी खुशियां और इज्जत बेचकर चुकाता है. क्षेत्र के कई घरों में इस लत के कारण पुश्तैनी जमीन-जायदाद तक बिक चुकी है.

आर्थिक तंगी, रोज-रोज के घरेलू क्लेश और सामाजिक बदनामी ने परिवारों को उजाड़ दिया है. मां-बाप अपने बच्चों को इस नरक से बचाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं. कई माताएं रात-रात भर सिर्फ इसलिए नहीं सो पातीं कि उनका बेटा घर लौटेगा भी या नहीं, या कहीं कोई गलत कदम ना उठा ले। छोटे भाई-बहनों का भविष्य भी इस मानसिक दबाव के साए में घुट रहा है.


अपराध का नया गढ़: लत पूरी करने के लिए गलत रास्ते पर युवा

नशे की लत सिर्फ सेहत नहीं बिगाड़ रही, बल्कि संगरिया में अपराध के ग्राफ को भी तेजी से ऊपर ले जा रही है. अपनी लत की खुराक खरीदने के लिए पैसे न होने पर युवा चोरी, झपटमारी, लूटपाट और हिंसक वारदातों को अंजाम देने से भी नहीं हिचकिचा रहे हैं.

सीमावर्ती इलाका होने के कारण यहां नशा तस्करों का एक मजबूत नेटवर्क सक्रिय है। स्थानीय लोगों के बीच अब यह बड़ा सवाल उठने लगा है कि आखिर इतनी पाबंदियों के बावजूद इतनी बड़ी मात्रा में प्रतिबंधित नशीले पदार्थ युवाओं तक कैसे पहुंच रहे हैं?


प्रशासन और समाज की साझी जिम्मेदारी

इस काले कारोबार को सिर्फ पुलिस की लाठी या जेल के दम पर नहीं रोका जा सकता. इसके लिए प्रशासन, सामाजिक संगठनों, शिक्षकों और माता-पिता को एक मंच पर आना होगा. बलकौर सिंह ढिल्लों ने इस जहर के खिलाफ युद्ध स्तर पर निम्नलिखित कड़े कदम उठाने की मांग की है:

तस्करों पर कड़ा प्रहार: पुलिस प्रशासन बिना किसी राजनीतिक या रसूखदार दबाव के नशा तस्करों के खिलाफ लगातार और निष्पक्ष कार्रवाई करे.


युवाओं को मिले सही विकल्प: युवाओं के लिए खेल मैदान, जिम, पुस्तकालय और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं, ताकि उनकी ऊर्जा सही दिशा में लगे.


पुनर्वास केंद्रों की मजबूती: सरकारी स्तर पर बेहतर और सुलभ नशामुक्ति केंद्रों की सुविधा मजबूत हो.

विलेज कमिटी: गांव स्तर पर निगरानी समितियां बनाई जाएं जो संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखें.


निष्कर्ष: "दूसरे के घर की आग" समझना बंद करना होगा


अक्सर समाज इस समस्या को तब तक नजरअंदाज करता है जब तक कि वह उनके अपने घर का दरवाजा नहीं खटखटा देती. संगरिया का वर्तमान हालात इशारा कर रहे हैं कि अब चुप रहने का वक्त निकल चुका है. अगर आज समाज और शासन ने मिलकर सख्त कदम नहीं उठाए, तो आने वाले वर्षों में इसके परिणाम और भयावह होंगे। यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि राजनीति से ऊपर उठकर संगरिया के वजूद और अपनी आने वाली नस्लों को बचाने की सामूहिक लड़ाई है.

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