खींवसर-मंडावा में बीजेपी के स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी का कांग्रेस को मिल सकता है फायदा

खींवसर-मंडावा उपचुनाव में स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी भाजपा को पड़ सकती है भारी, स्टार प्रचारक नदारद, स्थानीय नेताओं के भरोसे कमान

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खींवसर (Khivansar) और मंडावा (Mandawa) उपचुनाव में बीजेपी के स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी का बड़ा फायदा कांग्रेस को मिल सकता है और बीजेपी की जीत की उम्मीदों पर फिर सकता है पानी. दोनों ही विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर पार्टी ने गैर भाजपा विचारों वाले प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारा है. खींवसर में भाजपा ने हनुमान बेनीवाल से गठबंधन के तहत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के लिए सीट खाली छोड़ी जिस पर नारायण बेनीवाल चुनाव लड़ रहे है तो वहीं मंडावा में पार्टी ने कांग्रेस छोड भाजपा में शामिल हुई सुशीला सिंगड़ा को टिकट दे दिया, जिससे भाजपा के स्थानीय कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है. साथ ही इन दोनों सीट पर भाजपा के 40 स्टार प्रचारकों में से कुछ एक को छोडकर पार्टी के अन्य नेताओं के नहीं आने से भी कार्यकर्ताओं का जोश यहां ठंडा पड़ता दिखाई दे रहा है.

खींवसर (Khivansar) में भाजपा-रालोपा गठबंधन प्रत्याशी नारायण बेनीवाल के सामने कांग्रेस से पूर्व मंत्री हरेंद्र मिर्धा मैदान में हैं जो कि कांग्रेस के दिग्गज मिर्धा परिवार के वंशज है. मिर्धा परिवार की राजनीतिक ताकत के कारण ही नागौर को जाट राजनीति का मुख्यालय कहा जाता है. इस चुनाव में मिर्धा परिवार की प्रतिष्ठा तो दांव पर है ही साथ ही अतीत का मुकाबला वर्तमान में नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल के छोटे भाई नारायण बेनीवाल से है जिन्हें भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं का साथ मिलता दिखाई नहीं दे रहा है.

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खींवसर विधानसभा सीट पर भाजपा-रालोपा का गठबंधन भाजपा के लिए गले की फांस बनता नजर आ रहा है. गठबंधन के बाद रालोपा के नारायण बेनीवाल को उम्मीदवार बनाए जाने से नाराज भाजपा नेता दुर्गसिंह चौहान जहां पहले ही भाजपा की सदस्यता छोड़ चुके हैं. वहीं इस गठबंधन से आहत होकर भाजपा मंडल अध्यक्ष सहित लगभग 50 से ज्यादा कार्यकर्ताओं ने पिछले दिनों गुरुवार को कांग्रेस का हाथ थाम लिया था. वहीं खींवसर (Khivansar) ग्रामीण के पूर्व मंडल अध्यक्ष शंकरलाल चांडक ने भी कांग्रेस को वोट देने की बात कही और भाजपा को अलविदा कहते हुए कांग्रेस का दामन थाम लिया. इन सभी ने पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा, नागौर जिला अध्यक्ष जाकिर हुसैन सहित अन्य पदाधिकारियों की मौजूदगी में कांग्रेस का दामन थामा.

पॉलिटॉक्स से खास बातचीत में भाजपा के नाराज पदाधिकारियों ने बताया कि पार्टी कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद भाजपा का प्रत्याशी नहीं उतारकर रालोपा के लिए सीट छोड़ दी. जिससे भाजपा के मूल कार्यकर्ताओं की भावनाओं को ठेस पहुंची. उन्होंने बताया कि पार्टी कार्यकर्ताओं की भावना के विपरीत कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज किया गया. इसलिए भाजपा को अलविदा कहते हुए हमनें हाथ (कांग्रेस) को मजबूत करने का मन बनाया है. इसके साथ ही नाराज कार्यकर्ताओं ने भाजपा नेताओं पर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें मंडल कार्यकर्ताओं की भावना की कदर नहीं है. इसी वजह से पिछले दिनों बड़ी संख्या में कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की है.

इसी तरह मंडावा (Mandawa) में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आई सुशीला सिंगड़ा के सामने कांग्रेस की रीटा चौधरी मैदान में है. रीटा चौधरी कांग्रेस की परंपरागत उम्मीदवार है. इस सीट पर कांग्रेस का दबदबा रहा है. रीटा चौधरी के पिता रामनारायण चौधरी यहां से कई बार विधायक रहे हैं रीटा खुद भी यहाँ से विधायक रह चुकी है. भाजपा प्रत्याशी सुशीला सिंगड़ा पूर्व में कांग्रेस से ही प्रधान रही हैं उनके पिता जिला प्रमुख रह चुके हैं. पूर्व में कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में रही सुशीला सिंगड़ा का यहां खुलकर तो विरोध नहीं है लेकिन अंदरखामें कार्यकर्ताओं की गुटबाजी व नाराजगी का भारी नुकसान यहां भाजपा को हो सकता है.

मंडावा में कांग्रेस की सुशीला सिंगडा को भाजपा से टिकट देने के पीछे पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंडावा (Mandawa) विधानसभा क्षेत्र प्रभारी राजेंद्र राठौड की अहम भूमिका रही. सुशीला सिंगडा को टिकट देने में राठौड की सोच थी जाट बाहुल्य इस सीट पर सिंगडा को टिकट देने से जाट वोट तो हासिल करेंगे ही, साथ ही कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी करने में भी कामयाब हो जायेंगे. लेकिन मौजूदा हालातों में भाजपा को यहां जीत के लिए जूझना पड रहा है और भितरघात व अंदरूनी गुटबाजी खत्म करनेे के साथ ही भाजपा यहां कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी करने में भी नाकामयाब होती नजर आ रही है.

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मंडावा उपचुनाव पर वरिष्ठ राजनीतिक विशलेशकों का कहना है कि यह सीट परंपरागत रूप से कांग्रेस का गढ रही है. 2018 विधानसभा चुनाव में पहली बार यहां भाजपा से मौजूदा झुंझुनू सांसद नरेंद्र कुमार ने कमल खिलाया था. इससे पहले 2013 के चुनाव में नरेंद्र ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में यहां से जीत दर्ज की थी और भाजपा इस चुनाव में तीसरे स्थान पर रही थी. इस उपचुनाव में नरेंद्र कुमार अपने बेटे अतुल खींचड को टिकट दिलवाना चाहते थे लेकिन मंडावा (Mandawa) प्रभारी राजेंद्र राठौड ने उनकी पैरवी नहीं कि इसलिए नरेंद्र कुमार अंदरूनी रूप से नहीं चाहते कि कोई अन्य नेता यहां से जीत दर्ज करे और उनके या उनके बेटे के लिए आगे भविष्य में मुसीबत बने. हांलाकि मंडावा में नरेंद्र कुमार दिखावे के लिए सिंगडा का प्रचार अवश्य कर रहे है.

खींवसर (Khivansar) में एक के बाद एक भाजपा कार्यकर्ताओं के कांग्रेस में शामिल होने से यहां कांग्रेस मजबूत होती नजर आ रही है. बीजेपी कार्यकर्ताओं के लगातार पार्टी से इस्तीफे के बाद रालोपा प्रत्याशी नारायण बेनीवाल के जीत की दावेदारी पर संकट के बादल छा गए है. इस बारे में पूछे जाने पर भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि ‘कांग्रेस खुद बसपा की बैसाखी पर खड़ी है, ऐसी स्थिति में कांग्रेस में कौन जाएगा’.

वहीं मंडावा (Mandawa) में पार्टी की आंतरिक कलह पर पार्टी नेताओं का कहना है कि ऐसा कुछ नहीं है बल्कि हमने भाजपा कार्यकर्ताओं से राय मशवरे के बाद ही सुशीला सिंगड़ा को प्रत्याशी बनाया है जो कि पिछले 20 साल से कांग्रेस पार्टी की तरफ से क्षेत्र में राजनीति कर रही हैं.

इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी ने खींवसर (Khivansar)-मंडावा (Mandawa) दोनों उपचुनावों के लिए 30 सितंबर को 40 स्टार प्रचारकों की लिस्ट जारी की थी, जिसमें पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं सहित प्रदेश के बडे नेताओं के नाम शामिल थे. लेकिन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियां, केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल, गजेंद्र सिंह शेखावत, कैलाश चौधरी के अलावा कोई अन्य बडा नेता यहां दिखाई नहीं दिया है. वहीं मंडावा प्रभारी राजेंद्र राठौड, खींवसर प्रभारी अरूण चतुर्वेदी ने वहीं डेरा डाला हुआ और स्थानीय नेताओं के दौरे क्षेत्र में हो रहे है. चूंकि इस उपचुनाव से विपक्ष में बैठी भाजपा को जीत हार का कोई विशेष असर नहीं होने वाला लिहाजा स्थानीय नेताओं के दम पर ही दोनों उपचुनाव में प्रचार हो रहा है और भाजपा के बडे नेता राजस्थान के उपचुनाव छोड हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में व्यस्त हैं.

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