तो क्या मोदी को इन नेताओं को भी देनी चाहिए सख्त हिदायत ?

PoliTalks news

हाल ही में इंदौर नगर निगम में अधिकारी पर बल्ले से वार करने को लेकर विवादों में आए बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सख्ती जताई. उसके बाद तमाम जगह ये खबर चली कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसको लेकर काफी नाराज हैं और वो इस तरह की अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं करेंगे लेकिन इस पूरे मामले में क्या सच में कोई एक्शन लिया गया है अब तक ?

आपको बता दें कि पीएम मोदी ने कहा था कि वो इसलिए इतनी मेहनत नहीं कर रहे कि कोई भी अपनी मनमानी करे. उन्होंने सख्ती दिखाते हुए कहा कि ऐसा व्यवहार करने वालों को बाहर का रास्ता दिखाना चाहिए. इसका साफ मतलब है कि पीएम इस तरह के व्यवहार के खिलाफ हैं लेकिन जब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते तब तक क्या इस तरह के वाकयों पर लगाम लग पाएगी.

अब सवाल ये है कि क्या ये सख्ती भर है. ये पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी जुबान के बल्ले से कई बार वार किए गए हैं लेकिन किसी भी तरह का कोई एक्शन नहीं लिया गया है और ये फेहरिस्त थोड़ी लम्बी है. अपनी जुबान वार से नफरत फैलाने और कड़वी बात बोलने वाले नेताओं की ये लिस्ट काफी लम्बी है.

इस कड़ी में सबसे पहला नाम आता है साक्षी महाराज का, जो हमेशा कुछ ना कुछ विवादित बोल जाते हैं. एक रैली के दौरान उन्होंने गांधीजी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को मात्रभूमि भक्त और शहीद तक कह दिया था जिसकी वजह से काफी विवाद हुआ. साथ ही हिन्दु महिलाओं को चार बच्चे करने और गौतस्करों को मौत की सजा जैसे भी कई विवादित बयान दे चुके है महाराज.

वहीं गोडसे बयान को लेकर विवादों में रही साध्वी प्रज्ञा को लेकर तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ये तक कह दिया था कि चाहे वो इस मामले को लेकर माफी मांग लें लेकिन वो कभी उन्हें दिल से माफ नहीं कर पाएंगे. भड़कीले बयान के लिए जाने जाने वाली निरंजन ज्योति भी काफी विवादों में रहती हैं. सरकार को लेकर उन्होंने एक बार बयान दिया था कि रामजादों की सरकार बनेगी ना कि हरामजादों की जिसको लेकर काफी विवाद हुआ. इनकी भी जुबान अक्सर फिसल जाती है.

इस फेहरिस्त में ज्ञानदेव आहूजा भी पीछे नहीं है. आहूजा लव-जिहाद को लेकर कई बार विवादित बयान दे चुके है. साथ ही गौतस्करी को लेकर भी मीडिया में बोले बोल से विवादों के घेरे में आ चुके हैं.

अनंत कुमार हेगडे भी मोदी सरकार का हिस्सा रहे हैं. इनका एक वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें ये एक डॉक्टर की पिटाई करते नजर आए थे. साथ ही हेगड़े ने संविधान को बदलने को लेकर भी विवादित बयान दिया था जिसके लिए उनका इस्तीफा तक मांग लिया गया था.

गिरीराज सिंह भी आए दिन अपने भड़कीले बयानों की वजह से सुर्खियों में रहते हैं. वहीं अनिल विज हरियाणा की राजनीति में अपने आक्रामक बयानों के लिए जाने जाते है. विज राहुल गांधी और ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत टिप्पणी कर चुके हैं. विनय कटियार भी महिला विरोधी टिप्पणी कर के विवादों में आ चुके है.

इस लिस्ट में और भी कई नेता शामिल है लेकिन क्या महज नाराजगी भर जताने से इस तरह के व्यवहार पर लगाम लगाई जा सकती है ? मारपीट से लेकर अमर्यादित बयान देने पर क्या कोई सख्त कदम उठाने की जरूरत नहीं है ताकि ये नजीर बन सके.
क्योंकि इस तरह के बयानों को लेकर ना केवल पार्टी की छवि पर असर पड़ता ही है बल्कि समाज में भी माहौल खराब होता है.

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव तक कहां पहुंचेंगे बीजेपी-शिवसेना के रिश्ते?

महाराष्ट्र में मॉनसून की आगवानी ने पारा चाहे नीचे गिरा दिया हो, लेकिन सियासी सरगर्मियां तेज हैं. अक्टूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए हर मोर्चे पर तैयारी जोर-शोर से है. एक समय में कांग्रेस का गढ़ माने जाने वाले महाराष्ट्र में बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में धुंआधार एंट्री की और कांग्रेस के किले को ध्वस्त कर दिया.

वहीं इस बार लोकसभा चुनाव में शिवसेना के साथ एलायंस ने उन्हें बड़े भाई की भूमिका में ला दिया. लोकसभा में शानदार जीत के बाद अब सबकी नजर विधानसभा में इस जोड़ी के प्रदर्शन पर है.

हालांकि पिछला विधानसभा चुनाव दोनों ने अलग-अलग लड़ा था और उसके बाद से पांच साल तक शिवसेना अपने विचारों को लेकर काफी बेबाक नजर आई. कई बार जुबानी हमले किए गए और इनके बीच की ये अंदरूनी रार भी किसी से छुपी नहीं है. लेकिन इस बार शिवसेना के मुखपत्र सामना में जिस तरह से सीएम पद को लेकर लिखा गया, मतलब साफ है कि शिवसेना अब छोटा भाई बनकर नहीं, बल्कि बराबरी चाहती है. ढाई-ढाई साल के फॉमूले को चाहती है.

हालांकि हाल ही में आलाकमान की तरफ से ये सख्त निर्देश दिए गए है कि दोनों ही दलों के मुखिया के अलावा मीडिया में कोई और बयान नहीं दिया जाएगा और ये चुनाव साथ मिलकर लड़ा जाएगा.

इन सबके बीच दिलचस्प सवाल ये है कि क्या शिवसेना सीएम पद के चेहरे के रूप में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को उतारने की तैयारी मे है? क्या ठाकरे परिवार के चिराग इस बार चुनाव लड़ेंगे? हालांकि चुनाव लड़ना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन शिवसेना में अगर ऐसा होता है तो ये एक बड़ा बदलाव होगा. बड़ा इसलिए क्योंकि अब तक ठाकरे परिवार सिर्फ परदे के पीछे से काम करता आया है. ये सत्ता का हिस्सा न बनकर संगठन के लिए काम करते आए हैं. इस परिवार से कभी किसी ने चुनाव नहीं लड़ा है.

वैसे आदित्य ठाकरे युवा विंग को लेकर काफी सक्रिय रहे हैं लेकिन बाला साहब ठाकरे से लेकर आदित्य ठाकरे तक किसी ने चुनाव नहीं लड़ा है. ऐसे में इस बार मैदान में आना नीतियों में बदलाव जरूर है. हालांकि ये कयास ही है. इससे पहले भी बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन के समय खबरें थीं कि ठाकरे लोकसभा चुनाव लड़ सकते है पर ऐसा नहीं हुआ.

लेकिन इस बार शिवसेना प्रवक्ता और सांसद संजय राउत ने जिस तरह से आदित्य ठाकरे को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठाई, तब से ही चर्चाएं तेज हैं. उन्होंने हाल ही में कहा कि लोग चाहते हैं कि आदित्य ठाकरे महाराष्ट्र के सीएम हो. हालांकि ये भविष्य के गर्भ में है.

लेकिन जिन मुद्दो को लेकर शिवसेना शुरू से आक्रामक रही है, उससे तो साफ है कि सिर्फ क्षेत्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पटल पर भी आने की तैयारी है. उद्दव ठाकरे शुरू से ही राम मंदिर और राष्ट्रवाद को लेकर बेबाक रहे हैं. ये सब जानते हैं कि इसके जरिए बीजेपी ने पूरे चुनाव लड़े और अब तक विजय पताका फहरा रही है.

ये विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए भी बड़ी चुनौती है. अपनी खोई हुई जमीन को पाने और मेन स्ट्रीम राजनीति में वापस आने का एक सुनहरा मौका है, लेकिन कांग्रेस के लिए यहां चुनौती सिर्फ बीजेपी-शिवसेना गठबंधन ही नहीं, बल्कि प्रकाश अंबेडकर की वीबीए और औवेसी की एआईएमआईएम भी है.

हालांकि बीजेपी को लेकर आक्रामक रहने वाले दोनों ही दल वोटिंग स्ट्रेटजी में कांग्रेस-एनसीपी के लिए मुसीबत बन सकते हैं. इन दलों की वजह से लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-एनसीपी को सात से आठ सीटों का नुकसान हुआ है और वोट प्रतिशत गिर गया. दो बड़े कांग्रेस दिग्गज सोलापुर और नादेंड से चुके हैं इसलिए इस बार कांग्रेस विधानसभा में ऐसा बिल्कुल नहीं चाहेगी. वैसे भी विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों और लोकल चेहरों पर लड़े जाते हैं. ऐसे में इन दोनों ही दलों का वर्चस्व कुछ इलाकों में जरूर है.

इसका अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि 2014 विधानसभा चुनाव और हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में एआईएमआईएम अपनी सीटें निकालने में कामयाब रहीं और इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हुआ.

कांग्रेस को फिलहाल गठबंधन करने से पहले सोचना पड़ेगा कि क्या वो अंबेडकर की सारी मांगें मानकर गठबंधन में शामिल करे या फिर अलग से चुनाव लड़े. खैर महाराष्ट्र में फिलहाल एलायंस की राजनीति है. लेकिन क्या ये चुनाव एक महागठबंधन तैयार करेगा, ये देखना अभी बाकी है.

क्षत्रपों और बीजेपी की आपसी ठनक चरम पर, यूपी-महाराष्ट्र-बंगाल में हालात सबसे खराब

politalks

ये पहला मौका नहीं है जब बीजेपी और क्षत्रपों में आपसी ठनक देखी गई है. 2014 के आम चुनाव के बाद जिस तरह से नरेंद्र मोदी की लहर उठी, उस लहर में विपक्ष पूरी तरह से बहता चला गया. इनके बीच क्षत्रपों की नींव भी कहां बचने वाली थी. इसका परिणाम निकला कि उत्तरप्रदेश में बीजेपी बहुमत के साथ सत्ता पर आसीन हुई. कई मायनों में ये जीत खास रही. बीजेपी की इस जीत ने मायावती और मुलायम सिंह यादव की पकड़ को यूपी में खत्म करके रख दिया.

महाराष्ट्र में भी कमोबेश यही स्थि​ति देखने को मिल रही है. हालांकि लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जिस तरह से शिवसेना और बीजेपी में लंबी बातचीत हुई, मसलों को सुलझाया गया, उसके बाद दोनों पार्टियों में गठबंधन हुआ. दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा और प्रचड़ जीत भी हासिल की.

यह भी किसी से छुपा नहीं है कि मुख्यमंत्री पद के विवाद को लेकर यहां आने वाले विधानसभा चुनाव में शायद स्थिति कुछ और ही दिख सकती है. आए दिन किसी न किसी बात को लेकर दोनों के बीच टकराव बना ही रहता है. दोनों ही दल विधानसभा चुनाव में पूरा जोर लगाने में लगे हैं.

बीजेपी के साथ ममता दीदी के बीच टकराव भलां कौन भूल सकता है. पिछले एक साल में जिस तरह की तल्खि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बीजेपी में देखने को मिली है, वो शायद इतिहास में कभी नहीं हुआ. मामला इतना गर्मा गया कि बंगाल में हिंसक घटनाएं तक पनपी.

ममता बनर्जी ने न केवल जुबानी तीर चलाए बल्कि चुनावी रैलियों में बीजेपी के दिग्गजों को वहां आने तक की इजाजत नहीं दी. आए दिन हिंसक घटनाएं, जुलूस, विरोध प्रदर्शन इस स्थिति को विकट बना रहे थे. निकाय चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप की राजनीति के बाद अब नौबत यहां तक आ पहुंची है कि इन सबके बीच कई कार्यकर्ताओं की जिंदगी तक चली गई. बंगाल अभी तक शांत नहीं हुआ है.

बिहार में भी सियासी हलचल चरम पर है. पिछले दिनों बीजेपी के दिग्गज़ नेता का जदयू के नेताओं पर सवाल उठाना, इफ्तार पार्टी में शामिल न होना और मंत्रिमंडल विस्तार में बीजेपी का कोई रोल नहीं होना, सभी बातें केवल इस ओर इशारा करती हैं कि बीजेपी और जेडीयू में सब ठीक-ठाक तो नहीं है. हालांकि दोनों ने ही इस बात को कभी स्वीकारा नहीं है.

फिलहाल संसद भवन में हुए अभिभाषण में जिस तरह से बीजेपी ने अपने वायदों को सामने रखा, उसमें ये देखना होगा जब उनके खुद के ही घटक दल और अन्य दलों के साथ खटास चरम पर है तो कैसे सबका साथ लेकर कोई बिल ला पाएंगे और कैसे उन वायदों को पूरा कर पाएंगे.

ममता बनर्जी के तल्ख तेवर पश्चिम बंगाल की राजनीति को किस दिशा में ले जाएंगे?

politalks.news

लोकसभा चुनाव-2019 कई मायनों में खास रहा. चाहे वो बीजेपी की प्रचंड जीत हो या फिर विपक्ष का पूरी तरह से बैकफुट पर होना. जातिगत राजनीति से ऊपर उठ कर जनता का वोट करना हो या फिर कैबिनेट में बदले चेहरे को बड़ी जिम्मेदारी सौंपना. लेकिन इन सबके बीच चुनाव से पहले और बाद में भी जो सबसे ज्यादा चर्चा में बना हुआ है, वो है ममता बनर्जी का गढ़ और उनकी सियासत.

थोड़ा इतिहास में जाए तो ममता बनर्जी एक ऐसी सियासी हस्ती हैं जिन्होंने अकेले बंगाल के गढ़ को जीतने के लिए सालों से बंगाल पर एकछत्र सरकार चला रहे सियासी दल को उखाड़ फैंका था. उन्होंने ही वाममोर्चा सरकार को अर्श से फर्श तक पहुंचा दिया था. जिस पार्टी से उनका उदय हुआ, उसकी नीतियों के खिलाफ जाकर इस मुकाम पर पहुंचना अपने आप में एक बड़ी चुनौती रही.

सादा व्यक्तित्व, भरपूर उर्जा और ईमानदार छवि वाली नेता मानी जाती है ममता बनर्जी. उनकी हिम्मत और दंबगई का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि एक तरफ जहां विपक्ष पूरी तरह से टूट चुका है, ममता लगातार केन्द्र सरकार के सामने बिल्कुल अडिग खड़ी हैं.

मोदी सरकार इस बात को लेकर पहले से ही आश्वस्त थी कि बंगाल के गढ़ को जीतना इतना आसान नहीं है. यही वजह है कि बीजेपी ने अपनी तैयारी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और पहले से ही बंगाल के किले को फतह करने के लिये सिपेहसालार लगा दिए. इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो यही था कि पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह खुद निकाय चुनाव के समर में कूद गए जो इससे पहले कभी नहीं देखने को मिला. हालांकि परिणाम भी लाभदायक रहा. यहीं से ममता दीदी को भी संकेत मिल गए कि बीजेपी अब उनके किले में सेंध लगाने वाली है.

एक लंबा बयानबाजी का दौर चला जो आज दोनों पार्टियों के प्रमुखों के बीच जुबानी लड़ाई बन चुका है. आए दिन सोशल मीडिया पर दोनों की ओर से तीखी टिप्पणियां देखने को मिल रही है. पूरे चुनावों के दौरान बीजेपी लगातार टीएमसी पर अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पीटने और धमकाने का आरोप लगाती रही. हिंसा के अलावा बंगाल में इन चुनावों के दौरान दीदी के तेवरों की भी खूब चर्चा हुई. माना जा रहा है कि जितनी पीएम नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी के बीच सियासी बयानबाजी हुई है, उतनी शायद ही किसी ओर से हुई हो.

इन सबके बीच दीदी की आकांक्षाएं भी किसी से छुपी नहीं है. मेन स्ट्रीम राजनीति में आने और देश की बागड़ोर संभालने का ख्वाब अक्सर उनके जेहन में आता रहता है. तभी तो चुनाव से ऐन पहले जिस तरह से उन्होंने विपक्ष और क्षत्रपों को एक जुट कर मोदी के खिलाफ लड़ने का अभियान छेड़ा. इससे तो ये साफ है कि दीदी अपने आप को ऐसे चेहरे के रूप में स्थापित करना चाह रही हैं कि दिल्ली उनसे दूर नहीं. खैर ये तो विपक्ष के हतोत्साहित होने का ही नतीजा रहा कि वह उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाया और दीदी अकेली रह गईं.

जिस तरह से बंगाल के परिणाम आए, दीदी की घबराहट लाजमी है. कुल 42 सीटों पर हुए मतदान में टीएमसी को 22, बीजेपी को 18 और कांग्रेस को दो सीटें मिली हैं. 18 सीटों पर विजयी होना मतलब बीजेपी का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन. अब पार्टी की नजरें पूरी तरह से बंगाल विधानसभा चुनाव पर हैं. 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मात देने के लिए बीजेपी पूरी तरह से तैयार है.

हालांकि इसके कारण बहुत ही साफ हैं कि बीजेपी पहले से ही यहां कमर कस चुकी थी. 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही बीजेपी वहां सक्रिय थी और सोशल मीडिया के माध्यम से लगातार अपनी पैठ बना रही थी. बीजेपी आईटी सेल यहां बेहद सतर्क रही और इसका नतीजा ये हुआ कि बीजेपी बंगाल में सेंध लगाने में कामयाब रही. शायद यही दीदी के बौखलाहट का कारण भी माना जा रहा है.

ये तो साफ है कि इस चुनाव में हिंदुत्व का रंग जमकर चढ़ाया गया है और विकास की बात पीछे छूट गई. जिस तरह से जय श्री राम को लेकर राजनीति हुई, जाहिर रूप से इसका फायदा बीजेपी को मिला. हिन्दू वोट पूरी तरह से बीजेपी के खाते में गए.

यहां सीपीएम का पूरी तरह से पतन हो चुका है जिसका सीधा फायदा बीजेपी को हुआ. टीएमसी विरोधी सारे वोट बीजेपी की झोली में आ गिरे. माना जा रहा है कि कम्युनिस्ट वोट कम होने का कारण ये भी है कि बंगाल के कई हिस्सों में टीएमसी के कार्यकर्ताओं का दबाव इस कदर है कि कुछ सीपीआईम के कार्यकर्ताओं ने तो टीएमसी को हराने के लिए ही बीजेपी का दामन थाम लिया.

इसके अलावा, जातिवाद ने भी चुनावों में अहम रोल अदा किया. हालांकि परिणामों से तो लगता है कि अल्पसंख्यकों ने जरूर ममता बनर्जी का साथ दिया लेकिन पश्चिमी और उत्तर बंगाल में आदिवासियों ने बीजेपी के समर्थन में जमकर वोट किया जो आने वाले समय में दीदी के लिए चिंता की खबर है.

इतना होने के बाद भी ममता बनर्जी के तीखे तेवरों की चर्चा आम है. कहा जाता है कि जोश में होश नहीं खोना चाहिए. शायद यही दीदी को अब सोचना होगा कि विधानसभा चुनाव में वो बीजेपी को आगे बढ़ने से कैसे रोकें. लोकसभा चुनाव के नतीजों को देखते हुए ये साफ है कि बंगाल के विधानसभा चुनावों में बीजेपी और टीएमसी की सीधी टक्कर होगी.

महाराष्ट्र: राजनीतिक जरूरत के चलते बनी जोड़ियां विधानसभा चुनाव में रहेगी हिट?

politalks.news

राजनीति संभावनाओं का खेल है और इस बार महाराष्ट्र में ये बखूबी देखने को मिला. लोकसभा चुनाव के दौरान जोड़ियों का जबरदस्त खेल चला. एक से भले दो और दो से भले तीन. कुछ इसी तरह का गठजोड़ से चल रही है महाराष्ट्र की ग्रुप पॉलिटिक्स. हो भी क्यूं न उत्तरप्रदेश के बाद सबसे ज्यादा सीटें हैं यहां. तभी तो खुद को लार्जेस्ट पार्टी बताने वाली और एक के बाद एक देशभर में लगातार धुंआधार जीत दर्ज करने वाली बीजेपी को भी यहां साथ की जरूरत महसूस हुई. ये भी किसी से छुपा नहीं है कि सालभर एक दूसरे पर जुबानी हमले करने वाली बीजेपी-शिवसेना महाराष्ट्र के किले को फतह … Read more

मोदी के नए जलशक्ति मंत्रालय को कितनी ‘शक्ति’ दे पाएंगे गजेंद्र सिंह शेखावत?

politalks.news

देश में जल प्रबंधन को लेकर ये गहरी चिंता की बात है कि ना केवल हम जल संकट से परेशान है बल्कि जो पानी है वो भी गुणवत्ता पर खरा नहीं उतर रहा है. इस कड़ी में बात करें महाराष्ट्र, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना बुंदेलखंड व विदर्भ की तो यहां इन दिनों पानी का भीषण संकट गहराता है. हर साल यहां के कुछ इलाकों को सूखे की मार इस तरह से झेलनी पड़ती है कि हर साल इस मार से कई किसान परिवार इसकी भेंट चढ़ जाते है. यही वजह है कि नरेंद्र मोदी ने जल शक्ति मंत्रालय का गठन किया है. इसमें जल संबंधी मुद्दों से निपटने के … Read more

गृह मंत्री अमित शाह कैसे बीजेपी को ‘अध्यक्ष’ से भी ऊंचे मुकाम पर ले जा सकते हैं?

politalks.news

अमित शाह ने कभी कहा था कि ‘बीजेपी के बिना मैं सार्वजनिक तौर पर कुछ भी नहीं हूं. अगर बीजेपी को मेरे जीवन से निकाल दिया जाए, तो सिर्फ़ ज़ीरो ही बचेगा. मैंने जो कुछ भी सीखा और देश को दिया है, सब बीजेपी का ही है.’ जाहिर है बीजेपी की सेवा उनका परम धर्म है और इसके लिए वे एड़ी-चोटी का जोर लगाने के साथ दिन-रात एक करते रहे हैं. लगातार दूसरी बार मोदी सरकार की केंद्र में वापसी में किसी भी लिहाज से इनकी भूमिका को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कमतर नहीं आंका जा सकता. अब जब अमित शाह देश के नये गृह मंत्री बन चुके हैं, तो … Read more

क्या देश की राजनीति से वामपंथ के विदा होने का वक्त आ गया है?

Politalks News

लोकसभा चुनाव में मोदी की आंधी में वैसे तो समूचा विपक्ष ही उड़ गया, लेकिन सबसे ज्यादा खराब प्रदर्शन लेफ्ट पार्टियों का रहा. 1952 के बाद से ये पहली बार हुआ है कि लेफ्ट दो अंकों तक भी नहीं पहुंच सका. इस बार महज 5 सीटें हासिल करने वाली वामपंथी पार्टियों के लिए यह सबसे शर्मनाक है कि किसी ज़माने में लेफ्ट का गढ़ माने जाने वाले पश्चिम बंगाल में उसका सूपड़ा साफ हो गया. लगातार 34 सालों तक पश्चिम बंगाल पर राज करने वाले लेफ्ट को 2014 के लोकसभा चुनाव में केवल 2 सीटों से संतोष करना पड़ा था, लेकिन इस बार तो ये सीटें भी उसके हाथों से … Read more