बिहार में सत्ता में होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी को बांकीपुर विधानसभा सीट पर मिली हार ने पार्टी के रणनीतिकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. बांकीपुर के नतीजे को लेकर पार्टी के भीतर हुई चर्चा में यूजीसी के नियमों के खिलाफ ऊंची जातियों के एक वर्ग की नाराजगी को भी हार की संभावित वजहों में गिना जा रहा है.
अब इस हार का सियासी असर उत्तर प्रदेश में तलाशा जा रहा है. यूपी में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने हैं और यहां बीजेपी पहले से ही यूजीसी के नए नियमों को लेकर विरोध का सामना कर रही है. पार्टी से जुड़े ब्राह्मण और ठाकुर समुदाय के कुछ नेताओं का कहना है कि सामान्य वर्ग के बीच इस मुद्दे को लेकर असंतोष बढ़ रहा है.
यूजीसी नियमों पर क्यों नाराज है सवर्ण समुदाय?
यूजीसी के प्रस्तावित नए नियमों को लेकर सामान्य वर्ग के
छात्रों और सवर्ण संगठनों की ओर से विरोध दर्ज कराया गया है. विरोध करने वालों का तर्क
है कि इन नियमों से विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत विभाजन और
बढ़ सकता है तथा सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ भेदभाव की स्थिति पैदा हो सकती है.
हालांकि इस नाराजगी का निशाना सीधे योगी आदित्यनाथ सरकार
के बजाय केंद्र सरकार को माना जा रहा है, क्योंकि यूजीसी और उससे जुड़े नियम केंद्र
के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. यही वजह है कि बीजेपी के लिए यह मुद्दा राजनीतिक रूप
से संवेदनशील बन गया है.
लोकसभा चुनाव के बाद फिर बढ़ी ठाकुर नाराजगी की चर्चा
उत्तर प्रदेश में बीजेपी के लिए सवर्ण असंतोष कोई नया राजनीतिक
संकेत नहीं है. 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान ठाकुर समुदाय के एक वर्ग में टिकट वितरण
और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर नाराजगी की चर्चा सामने आई थी. चुनाव नतीजों के बाद
बीजेपी के प्रदर्शन में आई गिरावट को लेकर इस असंतोष को भी एक कारण के तौर पर देखा
गया.
मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और कैराना जैसी सीटों पर बीजेपी की हार तथा मेरठ और मथुरा में जीत के अंतर में कमी को लेकर भी राजनीतिक विश्लेषण में ठाकुर वोटों के रुख की चर्चा हुई. पूर्वी उत्तर प्रदेश की कुछ सीटों पर भी इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठे. यही वजह है कि बांकीपुर में ब्राह्मण वोटों के संभावित ध्रुवीकरण और यूपी में ठाकुर समुदाय की पिछली नाराजगी को एक साथ जोड़कर देखा जा रहा है.
2027 से पहले बीजेपी के सामने सवर्ण वोट बैंक को साधने की
चुनौती
राजनीतिक तौर पर बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि
सवर्ण समुदाय की नाराजगी को किसी व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने से कैसे रोका जाए.
अभी विरोध अलग-अलग मुद्दों और अलग-अलग संगठनों के स्तर पर दिखाई दे रहा है, लेकिन चुनाव
के करीब आते-आते अगर ये मुद्दे एक साझा राजनीतिक नैरेटिव में बदलते हैं तो बीजेपी के
लिए मुश्किल बढ़ सकती है.
यूजीसी के नियमों को लेकर उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन हो चुके
हैं. लखनऊ में सवर्ण संगठनों की ओर से विरोध दर्ज कराया गया है. राजस्थान में भी राजपूत
करणी सेना के नेतृत्व में यूजीसी के नियमों के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं. जयपुर में
3 अगस्त को आयोजित रैली के दौरान प्रदर्शनकारियों को बीजेपी कार्यालय की ओर बढ़ने से
पुलिस ने रोक दिया था.
इन घटनाओं ने इस मुद्दे को सिर्फ शैक्षणिक नीति का विषय न
रखकर राजनीतिक बहस का हिस्सा बना दिया है.
पेपर लीक का मुद्दा भी बढ़ा सकता है सरकार की मुश्किल
यूजीसी के साथ पेपर लीक का मुद्दा भी केंद्र सरकार के लिए
चुनौती बनता दिखाई दे रहा है. दिल्ली के जंतर-मंतर पर लंबे समय तक चले प्रदर्शन को
लेकर सरकार की प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठे. प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में तत्कालीन
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग शामिल रही.
इस आंदोलन में अलग-अलग वैचारिक समूहों और सामाजिक वर्गों की भागीदारी बढ़ने से इसका दायरा भी विस्तृत हुआ. आंदोलन के दौरान सरकार की ओर से बातचीत की कोशिशें हुईं और बाद में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मुद्दा भी सामने आया. हालांकि इस्तीफे के बाद सामने आए आरोप-प्रत्यारोप ने विवाद को पूरी तरह खत्म करने के बजाय राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया.
कांग्रेस की तुलना वाला नैरेटिव बीजेपी के लिए खतरे की घंटी?
इस पूरे विवाद के बीच सवर्ण समुदाय के कुछ लोगों की ओर से
कांग्रेस शासन की तुलना में मौजूदा व्यवस्था को लेकर असंतोष जताए जाने की चर्चा भी
सामने आई है. राजनीतिक रूप से यह बीजेपी के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय
से सवर्ण समुदाय को पार्टी का मजबूत समर्थन आधार माना जाता रहा है.
अगर यह असंतोष केवल किसी एक नीति या मुद्दे तक सीमित रहता
है तो बीजेपी के लिए इसे संभालना आसान हो सकता है. लेकिन अगर यूजीसी, पेपर लीक, प्रतिनिधित्व
और टिकट वितरण जैसे अलग-अलग मुद्दे एक ही राजनीतिक असंतोष में बदलते हैं, तो 2027 के
चुनाव में इसका असर देखने को मिल सकता है.
बंद कमरे की बैठकों से लेकर सुधार के भरोसे तक
यूजीसी के नए नियमों को लेकर बीजेपी के भीतर भी पिछले दिनों
कई स्तरों पर चर्चा होने की खबरें सामने आईं. पार्टी नेतृत्व की ओर से नेताओं को यह
भरोसा दिलाने की कोशिश की गई कि नियमों के पीछे किसी समुदाय को नुकसान पहुंचाने की
मंशा नहीं है और जरूरत पड़ने पर इसमें सुधार किया जाएगा.
अब सवाल यह है कि क्या यह भरोसा जमीनी स्तर पर नाराजगी को
खत्म करने के लिए पर्याप्त होगा?
क्योंकि चुनावी राजनीति में सिर्फ नीति का उद्देश्य ही मायने
नहीं रखता, बल्कि उस नीति को लेकर समाज में बनी धारणा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है.
यूपी क्यों है बीजेपी के लिए सबसे अहम?
बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश की अहमियत सिर्फ विधानसभा चुनाव
तक सीमित नहीं है. लोकसभा चुनाव में यूपी की 80 सीटें राष्ट्रीय सत्ता की गणित को सीधे
प्रभावित करती हैं. यही कारण है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में
किसी भी बड़े सामाजिक या जातीय असंतोष को पार्टी हल्के में नहीं लेना चाहेगी.
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रदर्शन में गिरावट
के बाद पार्टी के सामने पहले ही सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की चुनौती है. ऐसे
में अगर सवर्ण समुदाय के भीतर भी नाराजगी बढ़ती है, तो पार्टी के लिए चुनावी समीकरण
और जटिल हो सकते हैं.
क्या बांकीपुर का संदेश यूपी तक पहुंचेगा?
बांकीपुर की हार को यूपी के चुनावी नतीजों का सीधा संकेत
मानना अभी जल्दबाजी होगी. बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं
और हर विधानसभा सीट का अपना स्थानीय समीकरण होता है.
लेकिन बांकीपुर ने बीजेपी के सामने एक अहम सवाल जरूर खड़ा
कर दिया है—अगर किसी मजबूत माने जाने वाले सामाजिक आधार में भी नीतिगत मुद्दों को लेकर
नाराजगी पैदा होती है, तो चुनाव में उसका असर कितना बड़ा हो सकता है?
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के लिए
यही सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह सवर्ण समुदाय के भीतर उठ रहे सवालों का राजनीतिक समाधान
किस तरह निकालती है. क्योंकि अगर यह नाराजगी व्यापक असंतोष में बदलती है, तो इसका असर
सिर्फ लखनऊ की सत्ता पर नहीं, बल्कि 2029 की दिल्ली की सत्ता के समीकरण पर भी पड़ सकता
है.









