बिहार की राजनीति में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और लालू प्रसाद यादव का नाम लंबे समय से एक-दूसरे के पर्याय के तौर पर देखा जाता रहा है. लेकिन अब पार्टी के भीतर और लालू परिवार में सामने आ रही राजनीतिक खींचतान ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं. सवाल यह है कि क्या परिवार के भीतर बढ़ता मतभेद आरजेडी की राजनीतिक विरासत के लिए चुनौती बनता जा रहा है?
पहले लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव की परिवार और पार्टी से दूरी ने सुर्खियां बटोरीं और अब तेजस्वी यादव और रोहिणी आचार्य के बीच सार्वजनिक तौर पर सामने आए मतभेदों ने एक बार फिर परिवार की अंदरूनी राजनीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले तेज प्रताप यादव से जुड़े विवाद और उसके बाद उनके पार्टी से अलग होने के घटनाक्रम ने आरजेडी को राजनीतिक तौर पर नुकसान पहुंचाया. चुनावी नतीजों ने भी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दीं. आरजेडी विधानसभा में 35 सीटों के आंकड़े तक ही पहुंच सकी. इसके बाद पार्टी के नेतृत्व और रणनीति को लेकर सवाल उठने लगे.
परिवार का विवाद अब पार्टी के भीतर भी दिखने लगा?
तेज प्रताप प्रकरण के बाद अब रोहिणी आचार्य के बयानों ने आरजेडी की आंतरिक राजनीति को फिर सुर्खियों में ला दिया है. रोहिणी ने हाल ही में पार्टी के निष्ठावान नेताओं और कार्यकर्ताओं की अनदेखी का आरोप लगाते हुए नेतृत्व के फैसलों पर सवाल उठाए हैं.
उनका यह बयान बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए छह उम्मीदवारों के ऐलान के बाद सामने आया. रोहिणी ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि लंबे समय से पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं को दरकिनार कर चुनाव से ठीक पहले पार्टी में आए अवसरवादी चेहरों को प्राथमिकता दी जा रही है. रोहिणी ने इसे निष्ठावान कार्यकर्ताओं के साथ वादाखिलाफी बताते हुए पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र, मूल सिद्धांतों और संगठन की मजबूती पर भी सवाल खड़े किए.
रोहिणी के निशाने पर कौन?
रोहिणी आचार्य ने अपने बयान में सीधे किसी नेता का नाम लिए बिना पार्टी नेतृत्व के फैसले पर सवाल उठाया. हालांकि, राजनीतिक तौर पर उनके बयान को तेजस्वी यादव के नेतृत्व और पार्टी की मौजूदा रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. यही वजह है कि आरजेडी के भीतर पारिवारिक मतभेद और संगठनात्मक असंतोष के बीच संबंधों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं.
लालू यादव ने जिस सामाजिक और राजनीतिक आधार पर आरजेडी को मजबूत किया था, उसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अब अगली पीढ़ी के नेताओं पर है. ऐसे में परिवार के सदस्यों के बीच मतभेद का सार्वजनिक होना पार्टी के लिए महज पारिवारिक मामला नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी बन सकता है.
बीजेपी ने आरजेडी पर साधा निशाना
रोहिणी आचार्य के बयान को लेकर बीजेपी ने भी आरजेडी पर हमला बोला है. बीजेपी नेता मृत्युंजय तिवारी ने एएनआई से बातचीत में दावा किया कि आरजेडी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है और पार्टी के अंदर गुट एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं.
बीजेपी ने इसे आरजेडी के कमजोर होते संगठन और नेतृत्व संकट से जोड़ते हुए दावा किया कि पार्टी जनता का विश्वास खो रही है. बीजेपी का कहना है कि बिहार की जनता अब सम्राट चौधरी के नेतृत्व वाली सरकार की ओर उम्मीद से देख रही है. हालांकि, यह बीजेपी का राजनीतिक आकलन है और इसे उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.
विधान परिषद चुनाव ने बढ़ाई अंदरूनी राजनीति की गर्मी
बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने तैयारियां तेज कर दी हैं. मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल नवंबर में पूरा होने वाला है. ऐसे में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में उम्मीदवारों को लेकर पार्टियों के भीतर भी राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं.
चार शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में पटना से बीजेपी के प्रो. नवल किशोर यादव, दरभंगा से कांग्रेस के डॉ. मदन मोहन झा, सारण से निर्दलीय अफाक अहमद और तिरहुत से सीपीआई के संजय कुमार सिंह प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.
वहीं चार स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में पटना से जेडीयू के नीरज कुमार, दरभंगा से निर्दलीय सर्वेश कुमार, कोसी से बीजेपी के एनके यादव और तिरहुत से निर्दलीय बंशीधर ब्रजवासी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. इन सीटों के चुनाव में राजनीतिक दलों के साथ-साथ स्थानीय संगठन और जमीनी कैडर की भूमिका भी महत्वपूर्ण रहने वाली है.
लालू की विरासत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या?
लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत सिर्फ एक परिवार की विरासत नहीं है. इसके साथ एक लंबा सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन, पार्टी संगठन और वर्षों से जुड़े कार्यकर्ताओं का आधार भी जुड़ा है. ऐसे में असली चुनौती यह है कि अगली पीढ़ी इस विरासत को किस तरह आगे बढ़ाती है. यदि परिवार के भीतर मतभेद लगातार सार्वजनिक होते रहे और संगठन के पुराने नेताओं व कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ता गया, तो इसका असर पार्टी की चुनावी क्षमता पर पड़ सकता है.
दूसरी ओर, यदि तेजस्वी यादव पार्टी संगठन को एकजुट करने और परिवार के भीतर मतभेदों को नियंत्रित करने में सफल रहते हैं, तो आरजेडी अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर सकती है.
क्या आरजेडी ढलान पर है या यह सिर्फ राजनीतिक संक्रमण?
फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि आरजेडी की राजनीतिक विरासत खत्म होने की ओर है. बिहार की राजनीति में पार्टी का एक मजबूत सामाजिक आधार अब भी मौजूद है. लेकिन यह भी सच है कि लगातार सामने आने वाले पारिवारिक और संगठनात्मक विवाद पार्टी की छवि पर असर डाल सकते हैं.
तेज प्रताप यादव की बगावत से लेकर रोहिणी आचार्य के ताजा बयान तक एक बात साफ है - लालू परिवार की अगली पीढ़ी के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि परिवार, संगठन और राजनीतिक विरासत को एक साथ संभालने की भी है. अब सवाल यही है कि लालू की बनाई राजनीतिक विरासत को अगली पीढ़ी नई ऊंचाई देगी या परिवार के भीतर की खींचतान आरजेडी के लिए सबसे बड़ी कमजोरी साबित होगी?









