छात्र राजनीति से निकले गजेंद्र सिंह शेखावत ने कैसे दी जादूगर को शिकस्त

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अशोक गहलोत. राजस्थान की राजनीति का वो चेहरा, जिसके आगे कोई नहीं टिका. उन्होंने राजस्थान में सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बाद कई नेताओं को ठिकाने लगाया. लेकिन राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत को इस बार लोकसभा चुनाव में एक ऐसे प्रत्याशी ने मात दी जो पांच साल पहले ही सक्रिय राजनीति में आया है. वो नाम है गजेंद्र सिंह शेखावत. हम यहां अशोक गहलोत की हार इसलिए बता रहे हैं क्योंकि जोधपुर संसदीय सीट पर उनके पुत्र वैभव गहलोत सिर्फ शारीरिक रुप से चुनाव लड़ रहे थे. यहां साख पूरी तरह से अशोक गहलोत की दांव पर थी.

अशोक गहलोत पांच बार जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं. वहां उनका जनाधार काफी मजबूत माना जाता है. यही वजह है कि अशोक गहलोत ने अपने वैभव के राजनीतिक पर्दापण के लिए जोधपुर को चुना. हालांकि पहले ये चर्चा थी कि वैभव गहलोत टोंक-सवाई माधोपुर से चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने पिछले काफी समय से यहां तैयारी भी की लेकिन अंत में अशोक गहलोत की तरफ से वैभव को जोधपुर से ही चुनाव लड़ाने का फैसला हुआ. लेकिन जिसने गहलोत के चूलें हिलाई, वैभव को उनके गढ़ में मात दी, वो गजेंद्र शेखावत कौन है. हम उनके जीवन परिचय के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं…

साल था 1967. जैसलमेर के शंकर सिंह शेखावत और मोहन कंवर के घर पुत्र का जन्म हुआ. नाम रखा गया गजेंद्र सिंह. गजेंद्र सिंह की शुरुआती शिक्षा जैसलमेर में हुई. स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद गजेंद्र सिंह कॉलेज शिक्षा के लिए जोधपुर आए. जोधपुर आना उनके जीवन का टर्निंग पांइट साबित हुआ. यहां आने के बाद वो बीजेपी के छात्र संघटन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े. छात्रों की समस्याओं को लेकर वो लगातार जोधपुर में संघर्षरत रहे.

1992 के जोधपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में गजेंद्र की लोकप्रियता को देखते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उन्हें अध्यक्ष पद का उम्मीदवार घोषित किया. नतीजे सामने आए तो गजेंद्र सिंह शेखावत ने इतिहास रच दिया था. वो सबसे ज्यादा मतों से जीतने का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके थे. उनकी जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि जब वे छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए, जोधपुर संसदीय सीट पर कांग्रेस का कब्जा था. अशोक गहलोत खुद सांसद थे. वो खुद छात्र राजनीति के दम पर मुख्य सियासत में आए थे. लेकिन तब किसी को यह इल्हाम नहीं था कि आने वाले समय में यह छात्र नेता जोधपुर की सियासत में एक नई इबारत लिखेगा.

गजेंद्र सिंह की जीत बड़ी थी तो जश्न भी बड़ा होने वाला था. उनके शपथ ग्रहण में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत पहुंचे थे. उस दौर में छात्रसंघ के कार्यालय उद्घाटन में मुख्यमंत्री का पहुंचना बहुत बड़ी बात थी. गजेंद्र ने अपने छात्रसंघ कार्यकाल में छात्रों के कल्याण के अनेक कार्य किए जिनमें अखिल भारतीय छात्र नेता सम्‍मेलन आयोजित किया जाना, विभिन्‍न सांस्‍कृतिक और खेलकूद के कार्यक्रम आयोजन किया जाना शामिल रहा.

इसके बाद वो 2001 में चोपासनी शिक्षा समिति की शिक्षा परिषद के सदस्‍य के रुप में सर्वाधिक मतों से निर्वाचित हुए. स्‍वदेशी जागरण मंच के तत्‍वाधान में 2000 से 2006 तक जोधपुर में स्‍वदेशी मेले का आयोजन किया गया. इन कार्यक्रमों की जिम्मेदारी गजेंद्र सिंह ने भी संभाली. इन कार्यक्रमों में लगभग 10 लाख लोग आए जिसके परिणामस्‍वरूप स्‍वदेशी उद्योग की चीजों की भारी बिक्री हुई. स्‍वदेशी मेले को काफी पसंद किया गया. इन कार्यक्रमों में गजेंद्र सिंह की पहचान जोधपुर के बाहर भी बनाई.

2012 में उन्हें बीजेपी प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया. 2014 में बीजेपी जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से मजबूत उम्मीदवार की तलाश में थी जो चंद्रेश कुमारी को मात दे सके. बीजेपी की खोज गजेंद्र सिंह पर आकर रुकी. गजेंद्र मोदी लहर पर सवार होकर संसद पहुंचे. उन्होंने कांग्रेस की चंद्रेश कुमारी कटोच को भारी अन्तर से हराया.

उन्हें शुरुआत में लोकसभा की प्रमुख कमेटियों का सदस्य बनाया गया. लेकिन 2017 का साल उनके लिए बड़ी खुशी लेकर आया. उन्हें नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में जगह मिली. गजेंद्र सिंह को कृषि और किसान कल्याण विभाग का राज्य मंत्री बनाया गया. इसके बाद वो अपने काम के दम पर पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के चहेते हो गए.

2018 में राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष अशोक परनामी के इस्तीफा देने के बाद अमित शाह ने गजेंद्र सिंह शेखावत को पार्टी का अध्यक्ष पद बनाने का मन बनाया. लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनके नाम का विरोध किया. अमित शाह जानते थे कि वो वसुंधरा राजे के खिलाफ जाकर गजेंद्र को अध्यक्ष तो बना देंगे लेकिन इससे पार्टी के बीच आंतरिक कलह हो सकती है. इसलिए फिर बाद में राज्यसभा सांसद मदनलाल सैनी को प्रदेश अध्यक्ष के लिए चुना गया.

2019 के चुनाव में गजेंद्र सिंह शेखावत ‘ज्वॉइंट किलर’ बनकर उभरे. उन्होंने अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत को भारी अंतर से हराया. यह हार वैभव गहलोत की नहीं अपितु अशोक गहलोत की है क्योंकि गहलोत इस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं. इसके बावजूद उनके पुत्र को करारी हार का सामना करना पड़ा. गजेंद्र सिंह शेखावत की इस बार की जीत उनका कद पार्टी के बीच बढ़ाएगी, इसमें कोई दोराय नहीं है. इस बार के मोदी मंत्रिमंडल में या तो गजेंद्र कैबिनेट मंत्री बनेंगे या फिर राजस्थान बीजेपी की कमान उनके हाथ में होगी, यह निश्चित है.

राजस्थानः कांग्रेस को अब भी है सात से आठ सीटों पर जीत की उम्मीद

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तमाम एग्ज़िट पोल भले ही राजस्थान में कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा छह सीटें मिलने का दावा कर रहे हों लेकिन कांग्रेस के टॉप नेताओं को अभी भी सात से आठ सीटें जीतने का भरोसा है. कांग्रेस करौली, टोंक, दौसा, नागौर, बाड़मेर, जोधपुर, अलवर और सीकर सीट पर जीत मानकर चल रही है.

खास बात यह भी है कि बाड़मेर, सीकर, टोंक और अलवर सीट पर कांग्रेस सिर्फ 25 हजार से लेकर 35 हजार के करीबी अंतर से ही जीत का दावा कर रही है. वहीं जोधपुर, करौली और दौसा में अच्छी जीत का भरोसा है. हालांकि 23 मई को साफ हो जाएगा कि एग्ज़िट पोल के दावे सही साबित होते हैं या कांग्रेस के खुद के दावे.
इन सीटों पर जीत तय मानकर चल रही है कांग्रेस
सीकर
कांग्रेस यहां से अपनी जीत को लेकर पूरी आश्वस्त नजर आ रही है. हालांकि मतदान से पहले कांग्रेस यहां से भारी जीत का दावा कर रही थी लेकिन अब कांग्रेस प्रत्याशी सुभाष महरिया खुद 25 हजार से 35 हजार के अंतर से जीत का दावा कर रहे हैं. कांग्रेस शुरुआत में यहां से एक लाख के अंतर से जीत का सपना देख रही थी. लेकिन संघ ने बीजेपी प्रत्याशी सुमेधानंद सरस्वती के लिए जमकर मेहनत की.
उसके बाद नरेंद्र मोदी की सभा ने सुमेधानंद को टक्कर में ला दिया. महरिया के लिए यह चुनाव ‘करो या मरो’ जैसा हो गया है. इस हार के बाद महरिया के सियासी करियर पर ब्रेक भी लग सकता है इसलिए महरिया ने सारी ताकत जीतने में लगा दी. सीकर में एक भी विधायक बीजेपी का नहीं होने से कांग्रेस को खूब फायदा मिला है. हालांकि जानकार और सट्टा मार्केेट इसे बीजेपी की सीट मानकर चल रहे हैं.

नागौर
बीजेपी ने गठबंधन करते हुए आरएलपी के हनुमान बेनीवाल को इस सीट पर टिकट थमाया. इस गठबंधन के चलते कांग्रेस मुकाबले में आ गई. कांग्रेस के पक्ष में बताया जा रहा है कि मुस्लिम और दलित समाज के अच्छे वोट आए हैं. वहीं राजपूत समाज ने भी ज्योति मिर्धा का साथ दिया. हनुमान का माइनस पॉइंट बताया जा रहा है कि बीजेपी का परम्परागत वोट उन्हें नहीं मिला.

वहीं खींवसर से बेनीवाल की लीड भी ज्यादा मिलती नहीं दिख रही. युनूस खान और सीआर चौधरी भी बेनीवाल के साथ मन से नहीं लगे. हालांकि सट्टा मार्केट और एग्ज़िट पोल इस सीट पर बेनीवाल की जीत का दावा कर रहे हैं.

टोंक
चुनाव से पहले कांग्रेस इस सीट पर बेहद मजबूत स्थिति में थी. खुद बीजेपी भी टोंक को कांग्रेस के खाते में मानकर चल रही थी लेकिन मतदान के बाद नमोनारायण मीणा के मुश्किल से सीट निकालने के समीकरण सामने आ रहे है. गुर्जर समाज की एकतरफा वोटिंग के बाद सामान्य वर्ग के मतदाताओं ने बीजेपी के पक्ष में जमकर मतदान किया है. इसके बावजूद मीणा करीब 25 हजार से अधिक वोटों से जीत मानकर चल रहे हैं. जानकार और एग्जिट पोल भी इस सीट पर कांग्रेस की जीत का दावा कर रहे हैं.
बाड़मेर
इस सीट पर कांग्रेस चुनाव प्रचार के दौरान बेहद मजबूत नजर आ रही थी. लेकिन मोदी की सभा और सनी देओल के रोड शो के बाद मानवेंद्र मुकाबले में फंस गए. हालांकि राजपूत, दलित और मुस्लिम वोटों की बदौलत मानवेंद्र मुकाबले मेें बढ़त बनाते दिखाई दिए. यहां कांग्रेस 25 हजार के करीब से जीत मानकर चल रही है. एग्ज़िट पोल में भी बाड़मेर में कांग्रेस की जीत बताई गई है.

जोधपुर
सीएम अशोक गहलोत के बेटे वैभव के कांग्रेस से चुनाव लड़ने पर यहां मुुकाबला बेहद रोचक हो गया. हालांकि केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह ने मजबूती से उनके सामने अंत तक चुनाव लड़ा. अशोक गहलोत और कांग्रेस इस सीट पर जीत मानकर चल रहे हैं. यहां एग्ज़िट पोल किसी की हार-जीत का दावा नहीं कर रहे बल्कि कड़ी टक्कर बता रहे हैं. हालांंकि सट्टा मार्केट गजेंद्र सिंह की जीत का दावा ठोक चुका है.

करौली-धौलपुर
कांग्रेस इस सीट पर सबसे बड़ी जीत दर्ज मानकर चल रही है. बीजेपी नेता भी दबी जुबान में यहां हार स्वीकार कर रहे हैं. एग्ज़िट पोल में भी करौली सीट कांग्रेस के पाले में गिरती दिख रही है.

दौसा
दौसा सीट भी कांग्रेस अपने खाते में मानकर चल रही है. यहां मुकाबला दो महिलाओं के बीच में था. निर्णायक मीणा वोटर्स ने कांग्रेस की सविता मीणा के पक्ष में ज्यादा वोट डाले हैं. वहीं बीजेपी प्रत्याशी जसकौर मीणा को कद्दावर नेता किरोड़ी मीणा का भरपूर समर्थन नहीं मिला. कांग्रेस एससी और गुर्जर वोटर्स मिलने के चलते अभी भी अपनी जीत सुनिश्चित मानकर चल रही है.

अलवर
इस सीट पर अब भी कांग्रेस को जीत की आस है. कांग्रेस अलवर शहर के वोटर्स अपने पाले में मानते हुए जीत का दावा कर रही है. हालांकि सच यह है कि यहां टक्कर कड़ी है लेकिन बीजेपी का पलड़ा भारी दिख रहा है.

इस तरह से एग्ज़िट पोल के बाद भी कांग्रेस को प्रदेश में सात से आठ सीटें मिलने की पूरी उम्मीद है. हालांकि पहले कांग्रेस के नेता यहां से करीबन 12 सीटों पर जीत मानकर चल रहे थे लेकिन एग्ज़िट पोल के बाद उनका यह दावा अधिकतम आठ सीटों तक सिमट गया.

वैसे राजनीति के जानकार अभी भी कांग्रेस की केवल पांच से छह सीटें आने का दावा कर रहे हैं. इसके पीछे दलील केवल इतनी सी है कि लोकसभा चुनाव में महज़ 25 हजार की जीत का दावा कैसे टिक पाएगा.

एग्ज़िट पोल: वीआईपी सीटों पर किसके सिर बंधेगा जीत का सेहरा

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देश में 7वें चरण के मतदान के तुरंत बाद तमाम न्यूज़ चैनल्स ने अपने-अपने एग्ज़िट पोल पेश कर दिए हैं. इन चैनल्स में जो तथ्य सभी एग्ज़िट पोल में एक जैसे निकलकर सामने आए हैं, वो यह है कि देश में एक बार फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार बनने जा रही है. एग्ज़िट पोल में यह तो बता दिया कि किस राज्य में किसकी कितनी सीटें आ रही हैं, लेकिन देश की बड़ी सीटों के परिणाम के बारे में पूरी तरह चुप रहे. हमारे इस खास आर्टिकल में हम आपको देश की बड़ी सीटों के बारे में बताएंगे कि कौन कहां से जीत रहा है…

वाराणसी
देश की सबसे चर्चित सीट वाराणसी, जहां से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद चुनाव लड़ रहे है. यहां विपक्षी दल मोदी के खिलाफ कहीं मुकाबले में नजर नहीं आए. आकलन यह है कि मोदी यहां 2014 से भी ज्यादा मतों से चुनाव जीतेंगे. कांग्रेस और सपा के बीच दूसरे नंबर की लड़ाई दिख रही है.

रायबरेली
यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी इस बार भी रायबरेली से आसानी से चुनाव जीतती हुई दिखाई दे रही है. बीजेपी के दिनेश प्रताप सिंह यहां सोनिया गांधी के खिलाफ कहीं मुकाबले में नहीं दिखे.

अमेठी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस बार अमेठी के साथ-साथ वायनाड से भी चुनावी मैदान में है लेकिन परम्परागत सीट अमेठी में ही उनकी प्रतिष्ठा दांव पर है. हमारे अनुमान के अनुसार, यहां राहुल और स्मृति के बीच मुकाबला बहुत करीबी रहने वाला है. हालांकि यहां थोड़ा सा पलड़ा राहुल गांधी का भारी दिखाई दे रहा है.

कन्नौज
यहां से सपा की तरफ से अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव चुनाव लड़ रही है. उनका मुकाबला बीजेपी के सुब्रत पाठक से है. 2014 में डिंपल ने पाठक को करीबी अंतर से हराया था. लेकिन हमारे आकलन में इस बार सुब्रत उलटफेर करते हुए दिखाई दे रहे है. उन्हें यहां करीबी मुकाबले में जीत हासिल हो सकती है. डिंपल इससे पूर्व फिरोजाबाद से राजबब्बर के खिलाफ चुनाव हार चुकी है.

गोरखपुर
गोरखपुर में इस बार यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा दांव पर है. हमारा अनुमान यह है कि वो अपनी प्रतिष्ठा बचाने में कामयाब हुए है. यह सीट बीजेपी के खाते में जाती दिखाई दे रही है.

बेगूसराय
देश की चर्चित सीटों में से एक बेगूसराय में मुकाबला काफी दिलचस्प रहा. कन्हैया कुमार ने यहां अपने पक्ष में माहौल बनाने की काफी कोशिशे की. लेकिन उनका यह अथा प्रयास गिरिराज सिंह को कमजोर नहीं कर पाया. यहां से बीजेपी के गिरिराज सिंह आसानी से चुनाव जीतते दिखाई दे रहे है.

पाटलिपुत्र
पाटलिपुत्र में मुकाबला इस बार भी 2014 के उम्मीदवारों के बीच देखने को मिल रहा है. यहां चुनावी टक्कर बीजेपी से केन्द्रीय मंत्री रामकृपाल यादव और राजद से मीसा भारती के बीच है. मीसा भारती बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालु यादव की बेटी है. 2014 में मीसा भारती को रामकृपाल यादव से हार का सामना करना पड़ा था. हमारे अनुमान के अनुसार, इस बार भी नतीजे 2014 की तरह ही रहने वाले है. यहां बीजेपी के रामकृपाल यादव जीतते हुए दिखाई दे रहे है.

भोपाल
भोपाल के चुनावी नतीजों पर पूरे देश की निगाहें हैं. यहां कांग्रेस और बीजेपी के प्रत्याशियों ने चुनाव को हिंदुत्व को मुद्दे के आस-पास लड़ा. लेकिन हमारे अनुमान में बीजेपी की साध्वी प्रज्ञा ठाकुर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह पर भारी पड़ती नजर आ रही हैं. यह सीट आसानी से बीजेपी के खाते में जाते हुए दिख रही है.

रोहतक
यहां मुकाबला कांग्रेस के वर्तमान सांसद दीपेन्द्र हुड्डा और बीजेपी के अरविंद शर्मा के मध्य है. यह सीट बीजेपी 2014 की मोदी लहर में भी नहीं जीत पाई थी. लेकिन इस बार यह सीट बीजेपी के खाते में जाती दिखाई दे रही है. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के पुत्र को इस बार हार का सामना करना पड़ रहा है. यह उनके लिए बड़ा झटका होगा.

सोनीपत
सोनीपत में मुकाबला इस बार त्रिकोणीय दिखाई दिया. यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस के भूपेंद्र हुड़डा, बीजेपी से रमेश कौशिक और जजपा के दिग्विजय चौटाला के बीच है. हमारे अनुमान के अनुसार सोनीपत भी 2019 में मोदी लहर पर सवार है. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड़डा को यहां हार का सामना करना पड़ सकता है.

फिरोजाबाद
यहां मुकाबला चाचा-भतीजे के बीच रहा. यहां से सपा के टिकट पर अक्षय यादव मैदान में है. सामने उनके चाचा शिवपाल यादव प्रसपा से ताल ठोक रहे है. बीजेपी ने यहां से चंद्रसेन जादौन को उम्मीदवार बनाया है. हमारे अनुमान के अनुसार, यह सीट सपा की तरफ जाती हुई नजर आ रही है. यहां भतीजा यानि अक्षय यादव अपने चाचा के उपर भारी पड़ रहे हैं.

गुरदासपुर
पंजाब की गुरदासपुर लोकसभा सीट पर पहले दावा कांग्रेस का मजबूत था. लेकिन सनी देओल की बीजेपी से उम्मीदवारी घोषित होने के बाद यहां के चुनावी समीकरण पुरी तरह से बदल गए हैं. पॉलिटॉक्स के अनुसार, यहां सनी देओल और सुनील जाखड के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिलेगी.

राजस्थान: आलाकमान ने मांगे भितरघात करने वालों के नाम, होगी कार्रवाई

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राजस्थान मेंं तमाम लोकसभा सीटों पर मतदान होने के बाद कांग्रेस आलाकमान ने भितरघात करने वालों के साथ मंत्रियों-विधायकों की परफॉर्मेंस रिपोर्ट तलब की है. प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडेय से राहुल गांधी ने फीडबैक रिपोर्ट मांगी है. आलाकमान के निर्देशों पर पांडेय ने तमाम उम्मीदवारों से जल्द रिपोर्ट देने को कहा है. रिपोर्ट में खास बात यह है कि हाईकमान ने चुनाव में पार्टी के खिलाफ काम करने वाले नेताओं की लिस्ट भी मांगी है. पहले चरण की 13 सीटों केे उम्मीदवारों ने तो भितरघात करने वाले नाम भी पांडेय को बता दिए हैं.

इन प्रत्याशियों ने सौंपे नाम
सूत्रों के मुताबिक, जालौर-सिरोही से रतन देवासी नेे निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा की खुलकर खिलाफत करने की शिकायत आलाकमान से की है. बाड़मेर से उम्मीदवार मानवेंद्र सिंह ने मंत्री हरीश चौधरी पर गड़बड़ी करने का आरोप लगाया है. पाली से बद्री जाखड़ ने विधायक दिव्या मदेरणा पर मदद नहीं करनेे के आरोप जड़े हैं. वहीं, उदयपुर लोकसभा प्रत्याशी रघुवीर मीणा ने गिरिजा व्यास और स्पीकर सीपी जोशी की निष्क्रियता की शिकायत की है.

इसी प्रकार, चितौड़गढ़ उम्मीदवार गोपाल ईडवा ने विधायक आरएस विधुड़ी पर मदद नहीं करने की शिकायत की है. बांसवाड़ा से प्रत्याशी ताराचंद भगौरा ने विधायक महेंद्रजीत सिंह मालवीय पर पार्टी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप लगाए है. बताया जा रहा है कि भीलवाड़ा प्रत्याशी रामपाल शर्मा ने विधायक रामलाल जाट और धीरज गुर्जर पर सहयोग नहीं करने की शिकायत की है. इसी तरह की शिकायतें अजमेर और झालावाड़ के प्रत्याशियों ने भी की हैं.

दूसरे चरण में ये करेंगे शिकायत
पहले चरण की तरह दूसरे चरण की स्थिति भी कुछ ज्यादा अलग नहीं है. कई कांग्रेस उम्मीदवारों को पार्टी नेताओं ने सहयोग प्रदान नहीं किया. जल्द ही ये प्रत्याशी भी हाईकमान को अहयोग करने वाले नेताओं की रिपोर्ट सौंपेंगे. बीकानेर प्रत्याशी मदन मेघवाल अपनी लिस्ट में विधायक गोविंद चौहान, वीरेंद्र बेनीवाल और मंंगालाराम गोदारा का नाम शामिल कर सकते हैं. उम्मीदवार भरत मेघवाल श्रीगंगानगर में शंकर पन्नू और विनोद गोठवाल को लेकर आपत्ति दर्ज करा सकते है. झुंझुनूं से श्रवण कुमार विधायक बृजेन्द्र ओला और हाकिम खान, वहीं जयपुर शहर से उम्मीदवार ज्योति खंडेलवाल पार्टी विधायक अमीन कागजी, महेश जोशी और अर्चना शर्मा की शिकायत कर सकती हैं.

तीन स्तर पर मांगी रिपोर्ट
कांग्रेस हाईकमान ने तीन स्तर पर पार्टी नेताओं पर सीसीटीवी की तरह निगरानी बनाए रखी. इसके लिए दूसरे राज्य के नेताओं को विधानसभा क्षेत्रों में पर्यवेक्षक नियुक्त किया था. प्रदेश प्रभारी पांडेय को भी निगरानी रखने के निर्देश दिए गए थे. प्रत्याशियों से भी फीडबैक देने के लिए कहा था. तीनों की रिपोर्ट के मिलान के बाद हर लोकसभा सीट की एक विस्तृत रिपोर्ट तैयारी की जाएगी जिसे बाद में पांडेय कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को सौंपेंगे.

मंत्रियों-विधायकों के खिलाफ कार्रवाई के थे निर्देश
लोकसभा चुनाव से पहले हाईकमान ने तमाम प्रभारियों को निर्देश दिए थे कि जिस भी विधायक और मंत्री की विधानसभा में परफॉर्मेंस खराब होगी, उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी. कार्यवाही से मतलब मंत्री पद से छुट्टी और भविष्य में टिकट नहीं देने के सख्त निर्देश दिए गए थे. कड़े निर्देश के पीछे हाईकमान की मंंशा पार्टी के खिलाफ जाकर काम नहीं करने देने का संदेश था. अब देखना है कि विपरित परिणाम आने पर हाईकमान कड़ी कार्यवाही करते है या नहीं.

40 साल के सियासी सफर में पहली बार दोहरे दवाब में ‘जादूगर’

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अपने 40 साल से ज्यादा के सार्वजनिक जीवन में राजस्थान ही नहीं, केंद्र की राजनीति में भी कई बार ‘जादूगरी’ दिखा चुके अशोक गहलोत की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा 2019 के लोकसभा चुनाव को कहा जाए तो गलत नहीं होगा. तीन बार राजस्थान में सत्ता के शिखर तक पहुंच चुके गहलोत ने राजनीति के कई उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन जीत आखिरकार उनकी ही हुई है. वे कभी पार्टी के भीतर चुनौतियों से निपटे हैं तो कभी विपक्ष पर बीस साबित हुए हैं.

चार महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव के समय राजनीति के जानकारों का एक तबका यह मानकर चल रहा था कि इस बार कांग्रेस के बहुमत हासिल करने की स्थिति में आलाकमान उनकी बजाय युवा सचिन पायलट को गद्दीनशीं करेगा, लेकिन कई दिन तक चली खींचतान के बाद अंतत: सेहरा उनके सिर ही सजा और पायलट को राहुल गांधी का वरदहस्त होने के बावजूद उप मुख्यमंत्री की कुर्सी से ही संतोष करना पड़ा.

जिस समय आलाकमान राजस्थान में मुख्यमंत्री के चयन को लेकर पसोपेश में था उस समय अशोक गहलोत के पक्ष में इस तर्क ने सबसे ज्यादा काम किया कि चार महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी को अच्छा प्रदर्शन करना है तो सू​बे की कमान अनुभवी हाथों में सौंपना जरूरी है. अब जब राजस्थान की कमान गहलोत के हाथों में है तो आलकमान उनसे कम से कम विधानसभा चुनाव में मिली सीटों के अनुपात में लोकसभा की सीटों की जिताने की अपेक्षा कर रहा है.

वैसे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के सामने 20 सीटों का लक्ष्य रखा है. जिस तरह से देश में मोदी का प्रभाव देखने को मिल रहा है और विपक्ष मोदी को हराने के नाम पर एक हो रहा है। उस घड़ी में खुद की पार्टी के शासन वाले राज्य राजस्थान से राहुल की अपेक्षा कुछ ज्यादा होना गलत नहीं है. इसके पीछे एक कारण यह भी है कि राजस्थान में पिछले कई चुनाव में यह ट्रेंड रहा है कि जिसकी सरकार होती है, उसकी लोकसभा में ज्यादा सीटें आती हैं. निश्चित रूप से आलाकमान की इस अपेक्षा का भार गहलोत के कंधों पर है.

‘मिशन-25’ के लक्ष्य के साथ चुनावी रण में उतरे अशोक गहलोत पर लोकसभा की ज्यादा से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज करने का दवाब तो है ही, जोधपुर सीट पर बेटे वैभव का चुनाव लड़ना उनके लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है. पहली बार गहलोत के परिवार का कोई व्यक्ति चुनाव लड़ रहा है. वह भी तब जब वे मुख्यमंत्री हैं. गहलोत चाहते तो पिछले कार्यकाल के दौरान भी वैभव को चुनावी रण में उतार सकते थे, लेकिन तब उन्होंने ऐसा नहीं किया.

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इस बार जब वैभव गहलोत को जोधपुर से उम्मीदवार बनाया गया तो सीएम गहलोत ने कई बार यह बात दोहराई कि यह टिकट उनके कहने से नहीं दिया गया है. उन्होंने कहा कि वैभव इतने साल से राजनीति में ​सक्रिय है, पार्टी ने उनके कामकाज को देखते हुए उम्मीदवार बनाया है. गहलोत के इस बयान और सच्चाई के बीच कितना फासला है, इसे राजनीति की सामान्य समझ रखने वाला व्यक्ति भी जान सकता है. इस तथ्य को कोई नकार नहीं सकता कि गहलोत की रजामंदी से वैभव को टिकट मिला है.

जोधपुर से वैभव का टिकट तय होने के बाद उनकी जीत की जिम्मेदारी अशोक गहलोत के कंधों पर आनी ही थी. पहले तो यह चुनाव आसान माना जा रहा था, लेकिन बीजेपी ने यहां जोरदार चक्रव्यूह रचा. बीजेपी उम्मीदवार गजेंद्र सिंह शेखावत मोदी-शाह के चहेते हैं. वे उनमें राजस्थान की राजनीति का भविष्य तलाश रहे हैं. ऐसे में उनकी ​जीत बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई. उनके समर्थन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ी सभा की और पार्टी अध्यक्ष अ​मित शाह ने रोड-शो किया.

इस चुनाव में गजेंद्र सिंह शेखावत बीजेपी के उन गिने-चुने उम्मीदवारों में शामिल हैं, जिनका प्रचार करने मोदी-शाह, दोनों आए. बीजेपी की इस रणनीति ने वैभव गहलोत की राह कठिन कर दी. इसे आसान बनाने के लिए अशोक गहलोत को जमकर पसीना बहाना पड़ा. उन्हें गली-गली में प्रचार के लिए उतरना पड़ा. बावजूद इसके जोधपुर में कांटे की टक्कर बताई जा रही है. वोटिंग ट्रेंड के आधार पर राजनीति के जानकार जीत-हार का अंतर 40 हजार के अंदर बता रहे हैं.

हालांकि अशोक गहलोत जीत के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हैं. उनकी नजदीकी नेता चार विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक बढ़त को जीत का आधार बता रहे हैं. वहीं, बीजेपी के नेता मोदी लहर के सामने अशोक गहलोत की रणनीति को बेअसर बताकर जीत का दावा कर रहे हैं. हालांकि गजेंद्र सिंह शेखावत के करीबी लोग यह मान रहे हैं कि मुकाबला कड़ा है और कुछ भी नतीजा आ सकता है.

जोधपुर में मतदान होने के बाद अशोक गहलोत दूसरे चरण की 12 सीटों पर धुंआधार प्रचार कर रहे हैं, लेकिन उनके चेहरे पर जोधपुर के परिणाम का दवाब देखा जा सकता है. उन्हें पता है कि कुल सीटें भले ही 7 से 8 रह जाएं, लेकिन जोधपुर में वैभव चुनाव हार गए तो यह उनकी सियासत के लिए कितनी हानिकारक होगी. विरोधी खेमा यह कहने में जरा भी देर नहीं लगाएगा कि जो अपने गृह क्षेत्र में बेटे को चुनाव नहीं जिता सके उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर रहने का क्या अधिकार है.

कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि राजस्थान में लोकसभा चुनाव का रण मुख्यमंत्री के साथ साथ पिता अशोक गहलोत की भी अग्निपरीक्षा ले रहा है. अब यह तो भविष्य के गर्त में है कि हर बार की तरह अशोक गहलोत की सियासी जादूगरी चलती है या इसकी धार कुंद होती है.

 

जोधपुर में मोदी लहर पर भारी पड़ सकता है अशोक गहलोत का सियासी जादू!

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लोकसभा चुनाव के रण में राजस्थान की सबसे ‘हॉट सीट’ जोधपुर में मतदान की प्रक्रिया संपन्न हो चुकी है. मतदाताओं ने 48 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ते हुए 68% से अधिक मतदान कर नया इतिहास रचा है. पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी लहर होने के बावजूद 62.5% मतदान हुआ था. बढ़े हुए मतदान को कांग्रेस और बीजेपी अपने-अपने पक्ष में बता रहे हैं.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत और मोदी सरकार के मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के बीच मुकाबला होने की वजह से सबकी निगाह इस सीट पर थी. इस दिलचस्प सियासी भिडंत को रिकॉर्ड मतदान ने और रोचक बना दिया है. आमतौर पर बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत बीजेपी के पक्ष में माना जाता रहा है लेकिन कई बार परिणाम कांग्रेस के पक्ष में भी आए हैं.

जोधपुर सीट पर बंपर मतदान किसकी किस्मत चमकाएगा और किसकी लुटिया डुबोएगा, यह तो 23 मई को ही पता चलेगा, लेकिन इलाके की राजनीति के जानकार कांग्रेस को बढ़त मिलने का आकलन कर रहे हैं. कांग्रेस प्रत्याशी वैभव गहलोत के लिए जिस तरह से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मेहनत की है, उसी का परिणाम है कि मतदान के अंत तक यह मुकाबला काफी कड़ा नजर आया.

आपको बता दें कि 3 दिन तक अशोक गहलोत ने वार्ड वार जाकर कार्यकर्ताओं से सीधा संपर्क स्थापित किया और उनमें जोश भरने का काम किया. जोधपुर लोकसभा सीट में कुल 8 विधानसभा क्षेत्र हैं. पोलिंग प्रतिशत के ट्रेंड को देखा जाए तो सबसे अधिक मतदान पोकरण विधानसभा क्षेत्र में हुआ है. पोकरण में लगभग 75 फीसदी मतदान हुआ है. पोकरण का बढ़ा हुआ मतदान प्रतिशत कांग्रेस को के पक्ष में जाता दिख रहा है तो वहीं सरदारपुरा में भी कांग्रेस को अच्छी बढ़त मिलती नजर आ रही है.

इसके अलावा लोहावट और फलोदी में भी कांग्रेस को बढ़त मिलने की उम्मीद है. वहीं बीजेपी को शेरगढ़ से बड़ी बढ़त मिलने की उम्मीद है. जोधपुर शहर, सूरसागर और लूणी से भाजपा को बढ़त मिल सकती है. यानी दोनों उम्मीदवारों को चार-चार विधानसभा सीटों पर बढ़त मिल सकती है, लेकिन वैभव को सरदारपुरा और पोकरण से निर्णायक बढ़त मिलने की संभावना जताई जा रही है.

हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि हार और जीत का अंतर 50000 के भीतर ही रहेगा. मतदान के बाद दोनों ही प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम मशीन में बंद हो चुका है और 23 मई को जब चुनाव परिणाम आएंगे तो तस्वीर साफ हो पाएगी कि क्या अशोक गहलोत की जादूगरी एक बार फिर कामयाब रही या मोदी लहर में गहलोत का जादू फीका पड़ा.

राजस्थान में वसुंधरा ही बीजेपी है और बीजेपी ही वसुंधरा है

राजस्थान में लोकसभा चुनाव प्रचार में लगी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रदेश की दो सीटों पर न जाने की बात पॉलिटॉक्स के बहाने बाहर क्या आई, सियासी गलियारों से होती हुई बीजेपी नेतृत्व तक भी पहुंच गई. खबर का असर हुआ और बीजेपी आलाकमान के दखल के बाद राजे जोधपुर में गजेंद्र सिंह के चुनाव प्रचार में आ खड़ी हुई. हाल ही में राजे ने यहां एक रोड शो कर गजेंद्र सिंह शेखावत के लिए वोट अपील की. अब राजनीतिक गलियारों से यह खबर भी आ रही है कि जोधपुर के बाद वसुंधरा राजे बीकानेर में अर्जुन मेघवाल के लिए भी वोट अपील करते हुए नजर आने वाली हैं.

सूत्रों की माने तो राजे 4 मई को श्रीडूंगरगढ़ का दौरा कर सकती हैं. यहां उनका एक जनसभा को संबोधित करने का कार्यक्रम प्रस्तावित है. हालांकि उनके दौरे की तिथि अभी तय नहीं हुई है लेकिन 3 मई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीकानेर में सभा है. ऐसे में चुनाव प्रचार खत्म होने से एक दिन पहले यानि 4 मई को उनके बीकानेर आने की पूरी-पूरी संभावना है.

दरअसल, वसुंधरा राजे का जोधपुर और बीकानेर में चुनावी प्रचार न करना चर्चा में बना हुआ था. राजे के साथ गजेंद्र सिंह और अर्जुन मेघवाल की अदावत को भले ही पार्टी के नेता खुले तौर पर स्वीकार न करते हों लेकिन इस बात को गलत ठहराने के प्रयास भी कभी नहीं हुए. मतलब साफ है कि दिल्ली दरबार के इन दोनों खास मंत्रियों ने न केवल राजस्थान की राजनीति में राजे का विकल्प बनने की कोशिश की, बल्कि बीजेपी का एक गुट इनकी चर्चा भी करने लग गया था.

यही कारण है कि मौके की तलाश में चुप रही राजे ने विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के बाद लोकसभा चुनाव का इंतज़ार करना बेहतर समझा. राजे ने जिस तरह से दिल्ली दरबार को प्रदेश के चुनावी प्रचार में अपनी हैसियत और राजनीतिक कद का अहसास कराया है, उसके बाद कहीं ना कहीं यह साफ हो गया है कि राजस्थान में आज भी वसुंधरा ही बीजेपी है और बीजेपी ही वसुंधरा है.

राजस्थान: 13 सीटों पर कल शाम थम जाएगा चुनाव प्रचार, मतदान 29 को

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देश में लोकसभा चुनाव के तीन चरण का मतदान हो चुका है और चौथे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है. राजस्थान में लोकसभा चुनाव दो चरण में सम्पन्न होंगे. जिसमें 29 अप्रैल को 13 लोकसभा सीटों और 6 मई को 12 सीटों पर मतदान होने वाला है. चौथे चरण प्रदेश की 13 सीटों पर भी मतदान होगा. प्रदेश में 29 अप्रैल को जिन 13 सीटों पर मतदान होना है उनमें अजमेर, टोंक-सवाई माधोपुर, पाली, जोधपुर, बाड़मेर, जालोर, उदयपुर, बांसवाड़ा, चितौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा, कोटा और झालावाड़-बारां संसदीय सीटें शामिल है. एक नजर डालते हैं इन सीटों पर. जोधपुर संसदीय सीट इस बार प्रदेश के साथ-साथ देश की हॉट सीटों … Read more