BSP के साथ 2008 की रणनीति पर काम करने जा रही है कांग्रेस

राजस्थान में बसपा के विधायकों का 27 मई को राज्यपाल कल्याण सिंह से मुलाकात का कार्यक्रम तय था. लेकिन बाद में विधायकों ने इस मुलाकात को टाल दिया. कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है. लेकिन इस मुलाकात के पीछे के कारण सत्ता के गलियारों में तलाशें जा रहे हैं. सूत्रों के अनुसार, खबर आ रही है कि बसपा के सभी विधायकों को कांग्रेस अपने दल में शामिल कराने का प्रयास कर रही है.

वैसे बसपा विधायकों ने राजस्थान में कांग्रेस सरकार को समर्थन दे रखा है और सरकार की स्थिति मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार की तरह किनारे पर भी नहीं है. लेकिन प्रदेश संगठन लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद प्रदेश सरकार में अपने आंकड़े दुरस्त करना चाहती है ताकि भविष्य में किसी भी तरह के संकट का सामना नहीं करना पड़े.

2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बहुमत से कुछ फासले पर रह गई थी. उसे 96 सीटों पर ही जीत मिली थी. बहुमत के लिए उसे पांच विधायकों की दरकार थी. शुरुआत में निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार चलाई गई लेकिन निर्दलीय विधायकों के सरगना बीजेपी के बागी नेता किरोड़ी लाल मीणा सरकार के कामकाज में ज्यादा हस्तक्षेप करने लगे थे.

ऐसे में अशोक गहलोत ने सरकार की स्थिति मजबूत करने के लिए बड़ा दांव चला. उन्होंने बसपा के टिकट पर जीते 6 विधायकों को पार्टी में लाने के प्रयास शुरु किए. गहलोत के इस मिशन में उनका साथ दिया तत्कालीन टोंक-सवाईमाधोपुर सांसद नमोनारायण मीणा ने.

अशोक गहलोत और नमोनारायण मीणा की मुहिम रंग लाई और बसपा के सभी 6 विधायकों ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली. अशोक गहलोत ने सभी विधायकों को प्रदेश सरकार में अहम पद दिए. 2008 में जिन विधायकों ने बसपा से कांग्रेस की सदस्यता ली थी, उनमें नवलगढ़ विधायक राजकुमार शर्मा, दौसा विधायक मुरारीलाल मीणा, बाड़ी विधायक गिर्राज सिंह मलिंगा, सपोटरा विधायक रमेश मीणा, उदयपुरवाटी विधायक राजेन्द्र सिंह गुढा और गंगापुर विधायक रामकेश मीणा शामिल थे. बसपा विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने के बाद सरकार में कांग्रेस विधायकों का आंकड़ा 96 से बढ़कर 102 हो गया. इसका नतीजा यह रहा कि सरकार पूरे पांच साल बिना किसी दबाव के चली.

अब कांग्रेस एक बार फिर 2008 की मुहिम को दोहराने के प्रयास कर रही है. देखा जाए तो कांग्रेस को कामयाबी मिलने की संभावना भी दिख रही है. क्योंकि इस बार जीते कई बसपा विधायक चुनाव में कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे. टिकट न मिलने की स्थिति में वो बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े.

बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव में 6 विधायकों को जीत हासिल हुई थी जिनमें उदयपुरवाटी से राजेंद्र सिंह गुढ़ा, नगर से वाजिब अली, तिजारा से संदीप यादव, नदबई से जोगिंदर सिंह अवाना, करौली-धोलपुर से लाखन सिंह गुर्जर और किशनगढ़ बास से दीपचंद खैरिया शामिल हैं.

राजेंद्र गुढ़ा 2008 की गहलोत सरकार में मंत्री रह चुके हैं. वहीं किशनगढ़ विधायक दीपचंद खैरिया 2008 और 2013 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं. इस बार उनका टिकट काट पार्टी ने कर्ण सिंह यादव पर दांव खेला था.

इन सभी विधायकों में से सिर्फ तिजारा विधायक संदीप यादव ही बीजेपी की पृष्ठभूमि से जुड़े हैं. वो वसुंधरा सरकार में युवा बोर्ड के उपाध्यक्ष रह चुके हैं. इस बार के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी से तिजारा विधानसभा से प्रत्याशी बनाने की मांग की थी लेकिन पार्टी ने यहां से संदीप दायमा को प्रत्याशी बनाया. इसके बाद संदीप यादव ने बागी होकर बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते.

बसपा विधायकों के कांग्रेस के संपर्क में होने की सूचना के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी के सभी 6 विधायकों को दिल्ली तलब किया है. मायावती 2008 में कांग्रेस से धोखा खा चुकी है इसलिए वो इस बार कोई चूक नहीं करना चाहती है. बसपा के विधायकों को कांग्रेस में शामिल कराना कांग्रेस के लिए इसलिए भी जरुरी है क्योंकि अगर बसपा राजस्थान में ज्यादा पांव पसारेगी, तो इसका सीधा-सीधा नुकसान कांग्रेस को ही होगा. इसकी सीधी सी वजह है कि प्रदेश में बसपा और कांग्रेस का कोर वोटर एक ही है.

कांग्रेस के सूपड़ा साफ से पायलट और गहलोत के नाम दर्ज हुआ अनचाहा रिकॉर्ड

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इस बार के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिली प्रचंड ​जीत ने कई मिथक तोड़े हैं और कई नए रिकॉर्ड बनाए हैं. इस फेहरिस्त में राजस्थान में कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट के खाते में भी एक अनचाहा रिकॉर्ड दर्ज हो गया है. पायलट के नेतृत्व में राजस्थान में कांग्रेस ने दो लोकसभा चुनाव लड़े और दोनों में ही कांग्रेस का खाता नहीं खुला. आपको बता दें कि दिसंबर, 2013 में राजस्थान में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद आलाकमान ने जनवरी, 2014 में प्रदेश में पार्टी की कमान सचिन पायलट को सौंपी थी. अध्यक्ष बनने के चार महीने बाद हुए लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस … Read more

राजस्थानः कांग्रेस को अब भी है सात से आठ सीटों पर जीत की उम्मीद

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तमाम एग्ज़िट पोल भले ही राजस्थान में कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा छह सीटें मिलने का दावा कर रहे हों लेकिन कांग्रेस के टॉप नेताओं को अभी भी सात से आठ सीटें जीतने का भरोसा है. कांग्रेस करौली, टोंक, दौसा, नागौर, बाड़मेर, जोधपुर, अलवर और सीकर सीट पर जीत मानकर चल रही है.

खास बात यह भी है कि बाड़मेर, सीकर, टोंक और अलवर सीट पर कांग्रेस सिर्फ 25 हजार से लेकर 35 हजार के करीबी अंतर से ही जीत का दावा कर रही है. वहीं जोधपुर, करौली और दौसा में अच्छी जीत का भरोसा है. हालांकि 23 मई को साफ हो जाएगा कि एग्ज़िट पोल के दावे सही साबित होते हैं या कांग्रेस के खुद के दावे.
इन सीटों पर जीत तय मानकर चल रही है कांग्रेस
सीकर
कांग्रेस यहां से अपनी जीत को लेकर पूरी आश्वस्त नजर आ रही है. हालांकि मतदान से पहले कांग्रेस यहां से भारी जीत का दावा कर रही थी लेकिन अब कांग्रेस प्रत्याशी सुभाष महरिया खुद 25 हजार से 35 हजार के अंतर से जीत का दावा कर रहे हैं. कांग्रेस शुरुआत में यहां से एक लाख के अंतर से जीत का सपना देख रही थी. लेकिन संघ ने बीजेपी प्रत्याशी सुमेधानंद सरस्वती के लिए जमकर मेहनत की.
उसके बाद नरेंद्र मोदी की सभा ने सुमेधानंद को टक्कर में ला दिया. महरिया के लिए यह चुनाव ‘करो या मरो’ जैसा हो गया है. इस हार के बाद महरिया के सियासी करियर पर ब्रेक भी लग सकता है इसलिए महरिया ने सारी ताकत जीतने में लगा दी. सीकर में एक भी विधायक बीजेपी का नहीं होने से कांग्रेस को खूब फायदा मिला है. हालांकि जानकार और सट्टा मार्केेट इसे बीजेपी की सीट मानकर चल रहे हैं.

नागौर
बीजेपी ने गठबंधन करते हुए आरएलपी के हनुमान बेनीवाल को इस सीट पर टिकट थमाया. इस गठबंधन के चलते कांग्रेस मुकाबले में आ गई. कांग्रेस के पक्ष में बताया जा रहा है कि मुस्लिम और दलित समाज के अच्छे वोट आए हैं. वहीं राजपूत समाज ने भी ज्योति मिर्धा का साथ दिया. हनुमान का माइनस पॉइंट बताया जा रहा है कि बीजेपी का परम्परागत वोट उन्हें नहीं मिला.

वहीं खींवसर से बेनीवाल की लीड भी ज्यादा मिलती नहीं दिख रही. युनूस खान और सीआर चौधरी भी बेनीवाल के साथ मन से नहीं लगे. हालांकि सट्टा मार्केट और एग्ज़िट पोल इस सीट पर बेनीवाल की जीत का दावा कर रहे हैं.

टोंक
चुनाव से पहले कांग्रेस इस सीट पर बेहद मजबूत स्थिति में थी. खुद बीजेपी भी टोंक को कांग्रेस के खाते में मानकर चल रही थी लेकिन मतदान के बाद नमोनारायण मीणा के मुश्किल से सीट निकालने के समीकरण सामने आ रहे है. गुर्जर समाज की एकतरफा वोटिंग के बाद सामान्य वर्ग के मतदाताओं ने बीजेपी के पक्ष में जमकर मतदान किया है. इसके बावजूद मीणा करीब 25 हजार से अधिक वोटों से जीत मानकर चल रहे हैं. जानकार और एग्जिट पोल भी इस सीट पर कांग्रेस की जीत का दावा कर रहे हैं.
बाड़मेर
इस सीट पर कांग्रेस चुनाव प्रचार के दौरान बेहद मजबूत नजर आ रही थी. लेकिन मोदी की सभा और सनी देओल के रोड शो के बाद मानवेंद्र मुकाबले में फंस गए. हालांकि राजपूत, दलित और मुस्लिम वोटों की बदौलत मानवेंद्र मुकाबले मेें बढ़त बनाते दिखाई दिए. यहां कांग्रेस 25 हजार के करीब से जीत मानकर चल रही है. एग्ज़िट पोल में भी बाड़मेर में कांग्रेस की जीत बताई गई है.

जोधपुर
सीएम अशोक गहलोत के बेटे वैभव के कांग्रेस से चुनाव लड़ने पर यहां मुुकाबला बेहद रोचक हो गया. हालांकि केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह ने मजबूती से उनके सामने अंत तक चुनाव लड़ा. अशोक गहलोत और कांग्रेस इस सीट पर जीत मानकर चल रहे हैं. यहां एग्ज़िट पोल किसी की हार-जीत का दावा नहीं कर रहे बल्कि कड़ी टक्कर बता रहे हैं. हालांंकि सट्टा मार्केट गजेंद्र सिंह की जीत का दावा ठोक चुका है.

करौली-धौलपुर
कांग्रेस इस सीट पर सबसे बड़ी जीत दर्ज मानकर चल रही है. बीजेपी नेता भी दबी जुबान में यहां हार स्वीकार कर रहे हैं. एग्ज़िट पोल में भी करौली सीट कांग्रेस के पाले में गिरती दिख रही है.

दौसा
दौसा सीट भी कांग्रेस अपने खाते में मानकर चल रही है. यहां मुकाबला दो महिलाओं के बीच में था. निर्णायक मीणा वोटर्स ने कांग्रेस की सविता मीणा के पक्ष में ज्यादा वोट डाले हैं. वहीं बीजेपी प्रत्याशी जसकौर मीणा को कद्दावर नेता किरोड़ी मीणा का भरपूर समर्थन नहीं मिला. कांग्रेस एससी और गुर्जर वोटर्स मिलने के चलते अभी भी अपनी जीत सुनिश्चित मानकर चल रही है.

अलवर
इस सीट पर अब भी कांग्रेस को जीत की आस है. कांग्रेस अलवर शहर के वोटर्स अपने पाले में मानते हुए जीत का दावा कर रही है. हालांकि सच यह है कि यहां टक्कर कड़ी है लेकिन बीजेपी का पलड़ा भारी दिख रहा है.

इस तरह से एग्ज़िट पोल के बाद भी कांग्रेस को प्रदेश में सात से आठ सीटें मिलने की पूरी उम्मीद है. हालांकि पहले कांग्रेस के नेता यहां से करीबन 12 सीटों पर जीत मानकर चल रहे थे लेकिन एग्ज़िट पोल के बाद उनका यह दावा अधिकतम आठ सीटों तक सिमट गया.

वैसे राजनीति के जानकार अभी भी कांग्रेस की केवल पांच से छह सीटें आने का दावा कर रहे हैं. इसके पीछे दलील केवल इतनी सी है कि लोकसभा चुनाव में महज़ 25 हजार की जीत का दावा कैसे टिक पाएगा.

राजस्थान: इन 6 नेताओं और संघ की मेहनत से प्रदेश में खिलेगा कमल

तमाम एग्ज़िट पोल राजस्थान में बीजेपी को 25 में से 19 या उससे भी ज्यादा सीटें दे रहे हैं. हालांकि इस बात में कोई शक नहीं है कि बीजेपी प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन करने जा रही है. इसका क्रेडिट जाता है बीजेपी के छह प्रमुख नेताओं को. पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह, प्रकाश जावड़ेकर, वसुंधरा राजे, सुंधाशु त्रिवेदी और चंद्रशेखर ने विधानसभा चुनाव में हार होने के बावजूद राज्य में बीजेपी के पक्ष में माहौल बनाया.

मोदी ने जहां ताबड़तोड़ सभाएं करते हुए अपने भाषणों से कार्यकर्ताओं को जोश दिलाया. शाह के नेतृत्व में मजबूत रणनीति को इन नेताओं ने अंजाम दिया. वसुंधरा राजे ने टिकट वितरण से लेकर प्रचार तक कमान संभाले रखी. वहीं संघ ने कमजोर सीटों पर विशेष फोकस रखते हुए प्रत्याशियों को जीत की दहलीज पर ला खड़ा किया. अगर एग्ज़िट पोल के दावे नतीजों में तब्दील होते हैं तो बीजेपी का कम से कम 20 सीटों पर जीत तय है. पांच महीने पहले ही विधानसभा चुनाव में हारने वाली बीजेपी का कांग्रेस पर यह करारा पलटवार होगा.

आइए जानते हैं प्रदेश में कमल खिलाने में बीजेपी के किन छह नेताओं का अहम योगदान रहा …

पीएम नरेंद्र मोदी
बीजेपी की अगर एग्ज़िट पोल के तहत 20 सीटें आ रही हैं तो इसके रियल हीरो होंगे पीएम मोदी. मोदी का चेहरा और राष्ट्रवाद बीजेपी के लिए राजस्थान में संजीवनी बूंटी बन गया. हर प्रत्याशी बस ‘मोदी को ही वोट’ देने की रट लगा रहा था. जहां बीजेपी कमजोर थी, वहां मोदी ने ताबड़तोड सभाएं करते हुए अपने प्रत्याशियों को टक्कर में ला दिया. मोदी ने अपने ओजस्वी भाषण से कार्यकर्ताओं में जोश फूंक दिया. यह मोदी का ही करिश्मा था कि राजस्थान में फर्स्ट टाइमर्स वोटर्स थोक के भाव बीजेपी के पाले में गए.

अमित शाह
प्रदेश में कमल खिलाने में नरेंद्र मोदी के बाद बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का अहम रोल रहा. शाह ने विधानसभा चुनाव में हार की भनक लगते ही राजस्थान पर ध्यान देना शुरु कर दिया था. इसके लिए शाह लगातार राजस्थान में दौरे करते रहे. इस दौरान शाह ने मौजूदा सांसदों की परफॉर्मेंस जानी. शाह ने ही रणनीति के तहत प्रकाश जावड़ेकर को राजस्थान चुनाव का प्रभारी बनाने का फैसला लिया. शाह की राय से ही टिकट वितरण से लेकर प्रचार प्रसार की रणनीति को अंजाम दिया गया था.

प्रकाश जावड़ेकर
केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर आलाकमान के चयन पर एकदम खरे साबित होते दिख रहे हैं. हर टास्क को जावड़ेकर ने बखूबी अंजाम दिया. जावड़ेकर ने कमान तब संभाली जब विधानसभा चुनाव में बीजेपी हार चुकी थी. जावड़ेकर ने हर सियासी और जातिगत समीकरण पर फोकस रखा. जातिगत समीकरण साधने के लिए नागौर की सीट हनुमान बेनीवाल को देने की चाल जावड़ेकर की ही थी. इसका फायदा बीजेपी को कईं सीटों पर मिलता दिख रहा है.

सुधांशु त्रिवेदी
सुधांशु त्रिवेदी को सहप्रभारी बनाकर चुनाव से पहले राजस्थान में भेजा गया था. त्रिवेदी ने हर जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए लगातार गहलोत सरकार पर आक्रामक हमले किए. कर्ज माफी और युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने जैसे वादों की जमकर पोल खोली. साथ ही जमकर केंद्रीय योजनाओं के फायदे गिनाएं. त्रिवेदी ने प्रदेश सरकार पर जमकर आरोप लगाते हुए कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाए रखा.

वसुंधरा राजेे
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का प्रदेश की हर रणनीति में अहम रोल रहा. राजे ने टिकटों के बंटवारों से लेकर जातिगत समीकरण साधने और तूफानी चुनाव प्रचार तक पूरी कमान संभाले रखी. प्रदेश के तमाम नेताओं को राजे ने एकजुट बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यहां तक की राजे नाराजगी के बावजूद राज्यवर्धन सिंह और गजेंद्र सिंह का प्रचार करने गई थी.

चंद्रशेखर
बीजेपी प्रदेश संगठन मंत्री चंद्रशेखर के प्रयास भी पार्टी के लिए काम आए. चंद्रशेखर के प्रयासों के चलते ही संघ का बीजेपी को पूरा साथ मिला. शाह के निर्देशन में चंद्रशेखर पर्दे के पीछे हर रणनीति को अंजाम देते बखूबी नजर आए. चंद्रशेखर संघ के साथ मिलकर प्रत्याशियों को जिताने में जुटे रहे. यही वजह रही कि इस बार राजस्थान में संघ ने बीजेपी के लिए जमकर पसीना बहाया.

आरएसएस का रोल
जानकारों की माने तो संघ ने पहली बार राजस्थान में सक्रिय होकर अपना रोल निभाया. इस बार वसुंधरा राजे के बजाय चुनाव की कमान केंद्रीय नेताओं के हाथ में थी इसलिए संघ ने मोदी को दोबारा पीएम बनाने के लिए जी-जान से मेहनत की. बीजेपी का जीत के लिए अन्य राज्यों के स्वयंसेवक भी राजस्थान में आए. संघ ने सबसे ज्यादा ध्यान कमजोर सीटों पर दिया. यह संघ की मेहनत का ही कमाल था कि जहां कांग्रेस लाखों से जीत का दावा कर रही थी, वहां अब जीत का टोटा पड़ रहा है. यही वजह रही कि सीएम अशोक गहलोत ने संघ को राजनीतिक पार्टी बनाने की नसीहत दे दी.

अगर एग्ज़िट पोल के दावे सही साबित होते हैं तो इन छह धुंरधंर बीजेपी नेताओं का कद बढ़ना तय है. क्योंकि भीषण गर्मी में भी इन नेताओं ने दिन-रात एक कर दिया और सत्ता में रहने के बावजूद कांग्रेस के ‘मिशन 25’ को फेल करने की दिशा में जुट गए.

राजस्थान: मंत्रियों-दिग्गजों को चुनाव नहीं लड़ाना कांग्रेस के लिए हो रहा है भारी साबित

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लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण के मतदान के बाद तमाम एग्ज़िट पोल प्रदेश में कांग्रेस को महज तीन से पांच सीटें दे रहे हैं. इसके बाद कांग्रेस में अभी से हार के कारणों को लेकर चर्चा शुरु हो गई है. कांग्रेस नेता अब मंत्रियों और वरिष्ठ नेताओं को चुनाव नहीं लड़ाने की रणनीति को कम सीटें आने के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं.

अगर कांग्रेस अजमेर से सचिन पायलट या रघु शर्मा, भीलवाड़ा से सीपी जोशी, झालावाड़ से प्रमोद जैन भाया, बाड़मेर से हरीश चौधरी, जयपुर शहर से महेश जोशी और जयपुर ग्रामीण से लालचंद कटारिया को मैदान में उतारती तो शायद कांग्रेस की अच्छी सीटें आ सकती थी. अब कांग्रेस के पास सिवाय मंथन और अफसोस के अलावा कुछ नहीं बचा है.

अजमेर
अगर खुद डिप्टी सीएम सचिन पायलट या मंत्री रघु शर्मा यहां से चुनाव लड़ते तो कांग्रेस शानदार मुकाबला कर सकती थी. दोनों नेता पहले यहां से सांसद रह चुके हैं. दोनों के मुकाबले रिजु झुंनझुनवाला बेहद कमजोर प्रत्याशी साबित हुए. बाहरी होने के चलते अजमेर के मतदाताओं की बात छोड़िए, खुद कांग्रेस के कईं नेताओं ने रिजु का साथ नहीं दिया. पायलट या रघु शर्मा लड़ते तो अजमेर सीट कांग्रेस आराम से निकाल सकती थी. वहीं रिजु को टिकट देकर कांग्रेस ने जीत सीधे थाली में परोसकर बीजेपी को दे दी.

भीलवाड़ा
मिनी नागपुर के नाम से पहचान बनाते भीलवाड़ा में कांग्रेस ने कमजोर मोहरे पर दांव खेला. विधानसभा चुनाव में करारी हार मिलने के बाद भी कांग्रेस ने कमजोर प्रत्याशी रामपाल शर्मा पर दांव खेला. यहां कांग्रेस अगर सीपी जोशी को मैदान में उतारती तो बाजी पलट सकती थी. लेकिन स्पीकर बनने के बाद सीपी को कांग्रेस ने चुनावी मैदान में उतारने पर विचार तक नहीं किया. जोशी पहले यहां से सांसद रह चुके हैं.

बारां-झालवाड़
यहां से मंत्री प्रमोद जैन भाया मैदान में उतरते तो मुकाबले में कांग्रेस नजर आ सकती थी. लेकिन भाया ने खुद चुनाव लड़ने में रुचि नहीं दिखाई जिसके चलते बीजेपी से आए प्रमोद शर्मा को टिकट दिया गया. पू्र्व सीएम वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह के सामने शर्मा कहीं टिकते नजर नहीं आए. खुद कांग्रेस यहां से बड़े अंतर से हार मानकर चल रही है.

जयपुर शहर
तमाम विरोध के बावजूद कांग्रेस ने जयपुर शहर से ज्योति खंडेलवाल पर दांव खेला. ज्योति की जगह अगर महेश जोशी को चुनाव लड़ाया जाता तो कांग्रेस की बात बन सकती थी. यहां भी कांग्रेस ने बीजेपी को एक तरह से वॉकओवर दे दिया.

जयपुर ग्रामीण
हालांकि कृष्णा पूनिया ने अच्छी तरह से चुनाव लड़ा लेकिन बाहरी होने का कहीं ना कहीं नुकसान उन्हें उठाना पड़ा. अगर यहां से पहले सांसद रहे लालचंद कटारिया को चुनाव में उतारते तो बात बन सकती थी. लेकिन कांग्रेस ने जाट और सेलिब्रिटी की रणनीति के तहत कृष्णा पूनिया को यहां से उतारा. इससे अच्छा यह होता कि कृष्णा को अगर चूरु से टिकट देते तो सीट निकल सकती थी.

बाड़मेर
बाड़मेर में कांग्रेस ने मानवेंद्र सिंह को टिकट दिया. मंत्री हरीश चौधरी ने टिकट के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला. वहीं बीजेपी ने जाट कार्ड खेलते हुए कैलाश चौधरी मैदान में उतारा. जानकारों का कहना है कि कैलाश चौधरी के सामने हरीश चौधरी भारी साबित होते.

तो यह वो छह सीटें हैं जिन पर कांग्रेस अगर मंत्रियों और दिग्गजों पर दांव खेलती तो विजयश्री हासिल कर सकती थी. अब इनको चुनाव नहीं लड़ाने की रणनीति कांग्रेस के लिए भारी साबित होती दिख रही है. लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद कांग्रेस नेता खुलकर कमजोर रणनीति अपनाने की गलती स्वीकार कर सकते हैं.

सचिन पायलट बने रहेंगे पीसीसी चीफ, खुद दिए संकेत

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कांग्रेस गलियारों में आजकल यह चर्चा तेज है कि क्या लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद सचिन पायलट को पीसीसी चीफ पद पर बरकरार रखा जाएगा या हटाया जाएगा. इन कयासों पर खुद सचिन पायलट ने एक बयान के जरिए ब्रेक लगाने की कोशिश की है. पायलट ने कहा कि बदलाव हर जगह होते रहते हैं.चुनाव में हार-जीत चलती रहती है लेकिन उनका लक्ष्य अगले पंचायत चुनाव की तैयारी में जुट जाना है.

साफ है कि उनके इस बयान से संकेत गया है कि पंचायती चुनाव तक वें ही पीसीसी चीफ की कमान संभालते रहेंगेे. सचिन पायलट करीब साढ़े पांच साल से इस पद पर विराजमान हैं. लंबे समय तक प्रदेशाध्यक्ष रहने वालों की सूची में पायलट तीसरे नंबर पर हैं. इस लिस्ट में पहले नंबर पर परसराम मदेरणा हैं जिन्होंने करीब छह साल तक पीसीसी चीफ का पदभार संभाला है.

खुद ने दिए पद पर बने रहने के संकेत
जानकारों का कहना है कि लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद ही यह तस्वीर साफ होगी कि पायलट प्रदेशाध्यक्ष पद पर बने रहेंगे या दूसरे नेता को मौका दिया जाएगा. कुछ का कहना है कि सीएम और डिप्टी सीएम बनाने के फॉर्मूले के दौरान आलाकमान के साथ बंद कमरे में क्या बातें हुई, उन पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा. इन तमाम कयासों के बीच सचिन पायलट ने शुक्रवार को पीसीसी में एक प्रेस कॉन्फ्रेस में एक बयान से सबको चौंका दिया. पायलट ने कहा, ‘परिवर्तन होते रहते हैं हर जगह. मेरा ध्यान पंचायत चुनाव की तैयारी में जुट जाना है.’ बता दें, राजस्थान में अगले साल यानि 2020 में पंचायत के चुनाव होंगे.

विधानसभा चुनाव में किया था खुद को साबित
पीसीसी चीफ बनने के बाद सचिन पायलट ने पांच साल काम करते हुए कांग्रेस को सत्ता में लाने की पहली अग्निपरीक्षा तो पास कर ली. अब उनकी असली परीक्षा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा सीटें दिलाने की होगी. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल सका था. ऐसे में कांग्रेस के पक्ष में परिणाम लाना पायलट के लिए बड़ा टास्क था. हालांकि राज्य में सरकार कांंग्रेस की है. ऐसे में संगठन के साथ सरकार का भी रिपोर्ट कार्ड मायने रखेगा.

खैर…पायलट प्रदेशाध्यक्ष पद पर रहेंगे या नहीं रहेंगे, यह चर्चा तो लोकसभा चुनाव के परिणाम और उसके कईं दिनों बाद भी जारी रहेगी. हालांकि तमाम बातें सीटों के आंकड़ों पर निर्भर रहेगी. सीटे कम या ज्यादा आने पर बहुत कुछ निर्भर करेगा.

चुनाव परिणाम बाद कांग्रेस में बदले जाएंगे करीब 13 जिलाध्यक्ष

लोकसभा चुुनाव के परिणाम के बाद प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी से लेकर जिला संगठन में बदलाव होने तय हैं, फिर चाहे परिणाम कुछ भी रहे. वजह है कईं पीसीसी पदाधिकारी और जिलाध्यक्ष मंत्री-विधायक बन गए. ऐसे में निकाय चुनाव से पहले संगठन को चुस्त और दुरुस्त बनाने के लिए यह बदलाव किया जाएगा. विधानसभा और लोकसभा चुनाव में मेहनत करने वाले नेताओं को कार्यकारिणी में मौका दिया जा सकता है. बदलाव के मद्देनज़र सियासी और जातिगत समीकरण तो साधे ही जाएंगे, मंत्रियों, विधायकों और लोकसभा चुनाव में जीतने वाले प्रत्याशियों की राय को भी तवज्जो दी जाएगी.

करीब एक दर्जन जिलों में नए जिलाध्यक्ष बनाए जा सकते हैं. वहीं मंत्री और विधायक बनने वाले पीसीसी पदाधिकारियों को एक व्यक्ति-एक पद के फॉर्मूले के आधार पर हटाया जाएगा. बदलाव की आहट के साथ ही नेताओं ने लॉबिंग भी शुरु कर दी है. इसके लिए कार्यकर्ता और नेता बड़े नेताओं के धोक लगा रहे हैं.

इन जिलों में बनेंगे नए जिलाध्यक्ष

अलवर
अलवर कांग्रेस के मौजूदा जिलाध्यक्ष टीकाराम जूली राज्य सरकार में मंत्री बन चुके हैं. हालांकि विधानसभा चुुनाव के दौरान ही यहां दो कार्यकारी जिलाध्यक्ष बना दिए गए थे. ऐसे में यहां नया जिलाध्यक्ष बनना तय है. डॉ. करण सिंह यादव को नया जिलाध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा है. भंवर जितेंद्र सिंह की नए जिलाध्यक्ष बनाने में एक बार फिर बड़ी भूमिका हो सकती है.

भीलवाड़ा
भीलवाड़ा जिलाध्यक्ष रामपाल शर्मा का हटना तय है क्योंकि उन्हें लोकसभा का टिकट दे दिया गया था. हारे या जीते, दोनों ही स्थितियों में शर्मा की विदाई तय है. शर्मा के लोकसभा चुनाव हारने के आसार पूरे-पूरे हैं. इसके चलते हारे हुए नेता को जिलाध्यक्ष पद पर रखने से अच्छा संदेश नहीं जाने की सोच के चलते उन्हें पद पर नहीं रखा जाएगा.

बूंदी
बूंदी में अभी कांग्रेस में जिलाध्यक्ष का पद खाली पड़ा है क्योंकि सीएल प्रेमी ने बगावत करके विधानसभा चुनाव लड़ लिया था. इसके चलते पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था. पिछले छह माह से जिलाध्यक्ष का पद खाली चल रहा है. नए जिलाध्यक्ष की नियुक्ति में मंत्री अशोक चांदना का अहम रोल रहेगा.

बीकानेर और देहात
बीकानेर शहर और देहात के दोनों जिलाध्यक्ष बदले जाने की पूरी संभावना है. शहर जिलाध्यक्ष यशपाल गहलोत को दो बार विधानसभा टिकट देने के बावजूद आखिर में बेटिकट कर दिया गया था. उसके बाद मंत्री बीडी कल्ला से गहलोत के मतभेद गहरे हो गए. लिहाजा कल्ला अब अपने खास नेता को नया अध्यक्ष बनाने में जुट गए हैं. देहात में महेंद्र गहलोत को हटाए जाने की पूरी संभावना है क्योंकि नोखा से रामेश्वर डूडी की हार में गहलोत को जिलाध्यक्ष बनाने का समीकरण हावी रहा था. लिहाजा किसी जाट को यहां जिलाध्यक्ष बनाया जा सकता है.

चूरु
चूरु जिलाध्यक्ष भंवरलाल पुजारी की रतनगढ़ से विधानसभा चुनाव में करारी हार हो गई थी. हार के बाद से ही पुजारी यहां सक्रिय नहीं हैं. ऐसे में नए जिलाध्यक्ष बनाने की कवायद यहां जारी है.

धौलपुर
धौलपुर जिलाध्यक्ष अशोक शर्मा ने पाला बदलकर बीजेपी का दामन थाम लिया है. ऐसे में कांग्रेस ने साकेत शर्मा को कार्यकारी जिलाध्यक्ष बनाया. अब कांग्रेस किसी ब्राह्मण को ही नया जिलाध्यक्ष बनाने पर विचार कर रही है.

जयपुर देहात
जयपुर देहात के जिलाध्यक्ष राजेंद्र यादव मंत्री बन चुके हैं. हालांकि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने संदीप चौधरी और अशोक तंवर को कार्यकारी जिलाध्यक्ष बनाया था लेकिन अब स्थायी जिलाध्यक्ष बनाया जा सकता है. किसी जाट या यादव समाज के नेता को यहां जिलाध्यक्ष बनाया जा सकता है.

जयपुर शहर
जयपुर शहर जिलाध्यक्ष प्रताप सिंह भी मंत्री बन चुके है. लिहाजा उनकी जगह अब किसी मुस्लिम या ब्राह्मण को जिलाध्यक्ष बनाने पर मंथन चल रहा है.

जालौर
जालौर जिलाध्यक्ष डॉ.समरजीत सिंह विधानसभा चुनाव में हार गए थे. ऐसे में पारसराम मेघवाल को कार्यकारी जिलाध्यक्ष बनाया गया था. बताया जा रहा है कि यहां भी पार्टी नए जिलाध्यक्ष बनाने पर मंथन कर रही है.

राजसमंद
जिलाध्यक्ष देेवकीनंदन काका को लोकसभा का टिकट दे दिया गया था. यहां भी काका की हार हो या जीत, अध्यक्ष पद से विदाई लगभग तय हैै. सीपी जोशी की पसंद पर नए जिलाध्यक्ष की ताजपोशी होना यहां तय है.

सिरोही
सिरोही जिलाध्यक्ष जीवाराम आर्य भी विधानसभा चुनाव हार गए थे. लिहाजा सिरोही भी कार्यकारी जिलाध्यक्ष के भरोसे है. यहां नए जिलाध्यक्ष बनाने जाने की तैयारी शुरु हो गई है.

झुंझुनूं
झुंझुनूं जिलाध्यक्ष जितेंद्र गुर्जर विधायक बन चुके हैं. ऐसे में उनको भी इस पद से हटाए जानेे की पूरी संभावना है. नए जिलाध्यक्ष बनाने में अब विधायक बृजेन्द्र ओला की राय को तवज्जो दी जा सकती है.

पीसीसी कार्यकारिणी में भी होगा फेरबदल
जिलाध्यक्षों की तरह पीसीसी कार्यकारिणी में भी बदलाव तय है. करीब 40 पदाधिकारी मंत्री या फिर विधायक बन गए जबकि कुछ हार गए. ऐसे में इनको पीसीसी से रवाना किया जा सकता है. लिहाजा उनकी जगह दूसरे नेताओें और कार्यकर्ताओं को पीसीसी में शामिल किया जाएगा. पीसीसी में बदलाव अगस्त में होने की संभावना जताई जा रही है.

राहुल गांधी ने अलवर में गैंगरेप पीड़िता से मुलाकात की, न्याय का भरोसा दिलाया

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आज अलवर के थानागाजी में गैंगरेप पीड़िता और उसके परिवार से मुलाकात की. राहुल गांधी करीब आधा घंटे पीड़ित परिवार के साथ रहे. इस दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, डिप्टी सीएम सचिन पायलट और प्रभारी अविनाश पांडे्य भी साथ थे. मुलाकात के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि यह मेरे लिए कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं है. यह एक भावनात्मक मामला है.

उन्होंने आगे कहा कि जैसे ही मुझे इस घटना के बारे में पता चला, मैंने तुरंत प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से फोन पर बात की. मैं पहले यहां आना चाहता था लेकिन किन्हीं कारणों के कारण ऐसा हो न सका. राहुल ने कहा कि मैं सुनिश्चित करना चाहता हूं कि पीड़ित परिवार को जल्द से जल्द न्याय मिलेगा. परिवार की मांगों को भी जल्दी पूरा किया जाएगा. जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

इस मौके पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में सीएम गहलोत ने भी मीडियाकर्मियों से पीड़ित परिवार को जल्दी से जल्दी न्याय मिलने की बात कही. उन्होंने अलवर जिले को प्रशासनिक तौर पर अलवर शहर और अलवर ग्रामीण में बांटने की बात कही. दोनों जगह दो एसपी को लगाया जाएगा. जिले में बढ़ती अनैतिक गतिविधियों को देखते हुए यह बात कही गई है.

उन्होंने यह भी कहा कि थानागाजी मामले में सात दिन में चालान पेश कर देंगे. पीड़ित को नौकरी दी जाएगी. सीएम गहलोत ने कहा कि बीजेपी इस मामले पर राजनीति कर रही है और पूरी पार्टी राजनीति पर उतर आई है.

बता दें, राहुल गांधी बुधवार को अलवर आने वाले थे लेकिन खराब मौसम के चलते उनके हेलिकॉप्टर को दिल्ली में उड़ान भरने की अनुमति नहीं मिल पायी थी. इसके बाद कांग्रेसी प्रवक्ता जयवीर शेरविल ने उनके दौरा रद्द होने की सूचना दी थी.

राहुल गांधी का संवेदनशील मामलों में प्रदेश में यह तीसरा दौरा है. इससे पहले राहुल गांधी 2011 में गहलोत सरकार के दौरान गोपालगढ़ में हुए साम्प्रदायिक हिंसा के बाद राहुल यहां आए थे. उसके बाद वसुंधरा सरकार में बीकानेर की डेल्टा मेघवाल की दुष्कर्म और हत्या के बाद राहुल गांधी ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की थी.

लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद राजस्थान में बदलेगा सत्ता-संगठन का चेहरा

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कांग्रेस के गलियारों में इन दिनों बस दो ही चर्चाएं जोरों पर है. एक तो ये कि लोकसभा में कांग्रेस की कितने सीटें आएंगी. दूसरी- परिणाम के आधार पर क्या मंंत्रीमंडल और पार्टी संगठन में बदलाव होगा? सूत्रों की मानें तो लोकसभा परिणाम के बाद राजस्थान सरकार और कांग्रेस संगठन में फेरबदल देखने को मिल सकता है. यह हम नहीं कह रहे हैं बल्कि इस बदलाव के संकेत खुद राजस्थान प्रभारी महासचिव अविनाश पांडेय ने दिए हैं.

पांडेय ने आलाकमान के निर्देशों के तहत राजस्थान में लोकसभा चुनाव के दौरान एक-एक गतिविधियों की खुफिया रिपोर्ट तैयार की है जिसे वे राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी को सौपेंगे. रिपोर्ट में राहुल गांधी को वॉर रूम से लेकर चुनाव प्रचार, मंत्रियों और विधायकों का रोल जैसे फीडबैक दिए जाएंगे. यह रिपोर्ट पर्यवेक्षकों और प्रत्याशियों से मिले फीडबैक के आधार पर तैैयार की गई है. देश में अंतिम चरण का मतदान खत्म होने के बाद पांडे्य यह रिपोर्ट राहुल को हैंडओवर कर देंगे.

आलाकमान से होगी चर्चा
रिपोर्ट आने के बाद राहुल गांधी अपने लेवल पर इसका मंथन करेंगे. उसके बाद प्रभारी अविनाश पांडेय, सीएम अशोक गहलोत और पीसीसी चीफ सचिन पायलट के साथ सरकार और संगठन के बीच बेहतर तालमेेल को लेकर चर्चा होगी. रिपोर्ट के तहत जिन विधायकों और मंंत्रियों की परफॉर्मेंस अच्छी होगी, उन्हें पदोन्नत किया जाएगा.

वहीं जिन्होंने भितरघात किया, उनके खिलाफ कड़ा एक्शन लेते हुए अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने के पूरे आसार हैं. यानी भितरघात करने वाले विधायकों के मंत्री बननेे के चांस बेहद कम हो जाएंगे. मंत्रियों पर मंत्रिमंडल से बाहर होने की तलवार भी लटक सकती है.

परफोर्मेंस बनेगा पैमाना
अगर प्रभारी के संकेतों को समझा जाए तो यही निकलकर सामने आ रहा है कि गहलोत मंत्रिमंडल में फेरबदल या विस्तार तय है. परफॉर्मेंस देने वाले विधायकों को मंत्री बनाया जाएगा और नहीं देने वालों को हटाया जाएगा. हालांकि मंत्रिमंडल में फेरदबल और विस्तार में इतनी जल्दबाजी नहीं होने की बातेें भी सामने आ रही है. ऐसे में अंदेशा यही है कि यह फेरबदल दिवाली तक हो सकता है. यह भी माना जा रहा है कि मंत्रियों की फेहरिस्त में कई नए चेहरों को भी शामिल किया जा सकता है. वहीं कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जाने के आसार हैं.

मिलेगा नया पीसीसी चीफ
चुनावी परिणाम से पहले यह चर्चा भी कांग्रेस में गर्म हैं कि क्या अब पीसीसी को नया मुखिया मिलेगा, क्योंकि सचिन पायलट को इस पद पर रहते हुए पांच साल से ज्यादा का वक्त हो चुका है. जानकारों का यह भी कहना है कि सचिन पायलट खुद इस पद पर रहने को लेकर ज्यादा इच्छुक नहीं हैं. इसकी वजह है- पायलट के पास डिप्टी सीएम होने के साथ अन्य विभाग भी हैं.

हालांकि इन बातों की पुष्टि अभी कोई नहीं कर रहा है. कईं नेताओं का ऑफ द रिकॉर्ड कहना है कि जुलाई बाद नया पीसीसी चीफ जरुर बनेगा.