उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट आज अपने विधानसभा क्षेत्र टोंक के दौरे पर रहे जहां बम्बोर गांव में आयोजित टाटा ट्रस्ट की ओर से राष्ट्रीय पोषण मिशन के तहत कार्यक्रम में शिरकत की कार्यक्रम में उपमुख्यमंत्री पायलट ने ट्रस्ट की ओर लगाई गई प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया. साथ ही राजस्थान के पांच जिलों में उत्कर्ष कार्य करने वाल सरपंच और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सम्मानित भी किया इसके साथ ही पायलट ने सम्बोधित करते हुए कहा कि कुपोषण ना तो किसी राजनैतिक दल का अब तक मुद्दा रहा है, ना ही किसी सरकार का कुपोषण पर दल और सत्ता से दूर हटकर मंथन और बहस की जरूरत है. आखिर क्यों देश में कुपोषण बढ़ता जा रहा है. आखिर क्यों देश में कुपोषण बढ़ रहा है. आखिर गरीबी में जीने वाले परिवार ही क्यों कुपोषण का शिकार हो रहे है. ऐसे कई सवाल है जिन पर बहस होना चाहिए. इन सवालों के जवाब मिलना चाहिए टाटा ट्रस्ट की ओर से कार्यक्रम चलाया जा रहा है, वो वाकई सराहनीय है. इस दौरान पायलट ने बिजली कनेक्शनों के अभाव में सुविधाओं के लिए जूझ रही आंगनबाड़ी केंद्रों पर बिजली कनेक्शन लगवाने का वादा भी किया और सबसे पहले शुरूआत टोंक जिले से करने की बात कही.
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संस्कृत दिवस पर ये बोले अशोक गहलोत
संस्कृत दिवस पर जयपुर के रविंद्र मंच पर आयोजित एक कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने शिरकत की. मंच को संबोधित करते हुए सीएम गहलोत ने कहा कि संस्कृति भाषा कई भाषाओं की जननी है. हमें गर्व होना चाहिए कि कई भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा का उद्गम हमारे देश में हुआ है. संस्कृत एक ऐसी भाषा है जो न केवल समृद्ध है बल्कि इसका डिजिटलाइलेशन भी हो रहा है. संस्कृत भाषा कभी खत्म न होने वाला ज्ञान का एक अथाह भंडार है.
जयपुर में दंगा भड़काने की साजिश नाकाम
राजस्थान की राजधानी जयपुर में पिछले तीन दिनों से सांप्रदायिक दंगा भड़काने के प्रयास चल रहे हैं. सोमवार 12 अगस्त को रामगंज इलाके में कुछ कांवड़ियों के माध्यम से उपद्रव शुरू हुआ. कांवड़ियों के जयकारों से भड़ककर कुछ शरारती तत्वों ने पत्थर फेंके. झड़प हुई. मामला शांत हो गया. रात साढ़े दस बजे के बाद ईदगाह के पास सड़क पर कुछ उपद्रवी प्रकट हुए और उन्होंने दिल्ली जाने वाली बसों और अन्य वाहनों पर पथराव शुरू कर दिया. वे राहगीरों को रोककर नाम पूछकर मारपीट करने लगे. इसके बाद मंगलवार रात गंगापोल इलाके में सोमवार रात की तरह साढ़े दस बजे रावलजी चौराहे पर दंगा फैलाने का प्रयास शुरू हो गया. दो पक्ष आमने-सामने हुए. झगड़ा हुआ, पथराव हुआ, वाहनों में तोड़फोड़, दुकानों में लूटपाट शुरू हो गई.
सोमवार रात और दूसरे दिन मंगलवार को उसी तय समय पर गंगापोल में यह अचानक हुआ घटनाक्रम था. जबकि कहीं से कोई उकसावा नहीं था. सोमवार को ईद का त्योहार था. दिन भर सांप्रदायिक सद्भाव के साथ परंपरागत तरीके मनाया गया. राजस्थान में धारा 370 जैसा कोई लफड़ा भी नहीं है. तनाव जैसी कोई बात ही नहीं थी. सुबह कांवड़ियों पर पथराव के घटना के बाद पुलिस को सतर्क रहना चाहिए था, वह नहीं रही और दोनों रात अपनी आदत के मुताबिक घटनाक्रम प्रारंभ होने के एक घंटे बाद मौके पर पहुंची. इस दौरान शहर के ज्यादातर जन प्रतिनिधियों का रवैया हास्यास्पद और शर्मनाक रहा. चुनाव के समय जनता के सामने गिड़गिड़ाने वाले ये नेता सूचना मिलते ही मौके पर पहुंच सकते थे, लेकिन आदर्श नगर विधायक रफीक खान के अलावा और कोई नहीं पहुंचा.
सोमवार रात एक ही जगह उपद्रव हुआ था. मंगलवार रात दो अलग-अलग गुटों ने दो जगह उपद्रव शुरू किया. 10.30 बजे रावलजी के चौराहे पर और 11.20 बजे बदनपुरा में. दोनों जगह दंगे भड़काने का एक ही तरीका था. पांच उपद्रवी दस-पंद्रह स्थानी उपद्रवियों को साथ में लेकर हंगामा शुरू करते हैं. भीड़ जुट जाती है और वह भीड़ उकसावे के बाद बर्बर हो जाती है. सोमवार रात ईदगाह रोड पर दंगाइयों के निशाने पर राहगीर थे. दिल्ली बाईपास से गुजरने वाले वाहनों को उन्होंने निशाना बनाया. मंगलवार रात गंगापोल में उन्होंने उपद्रव को विस्तार देते हुए वाहनों में तोड़फोड़ के साथ ही दुकानों को निशाना बनाया. दंगाइयों की भीड़ रावजी चौराहे पर अनियंत्रित हुई और देखते ही देखते गंगापोल, सुभाष चौक की तरफ फैल गई. पुलिस ने पहुंचकर आधा घंटे में भीड़ को तितड़ बितर कर दिया. इसके लिए लाठीचार्ज करना पड़ा और आंसू गैस के गोले भी छोड़ने पड़े.
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जब दंगाई गंगापोल में दंगा भड़काने में सफल नहीं रहे तो नजदीकी इलाके बदनपुरा के शांति कालोनी, जयंती कालोनी आदि मोहल्लों में उपद्रव शुरू हो गया. अब तक दंगाई पथराव और तोड़फोड़ ही कर रहे थे. जयंती कालोनी में दंगाइयों ने धारदार हथियार भी निकाल लिए. शांति कालोनी में एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हुआ. कई लोग मामूली रूप से घायल हुए. यह दिल्ली बायपास से सटा इलाका है और नजदीक ही खोले के हनुमानजी का मंदिर है. हालांकि पुलिस ने दंगाइयों पर काबू करने में काफी मशक्कत की और देर रात पूरा इलाका छावनी में तब्दील हो चुका था, लेकिन आम लोगों में दहशत का आलम पसर चुका था. बहरहाल शहर के 15 थाना क्षेत्रों में धारा 144 लागू कर दी गई है. अतिरिक्त पुलिस बल तैनात है. गश्त जारी है. इस तरह जयपुर में लगातार दूसरे दिन दंगा भड़काने का प्रयास विफल रहा.
सोमवार रात के बाद मंगलवार रात को भी दंगा भड़कने से साफ था कि कुछ लोग शहर का माहौल खराब करने में जुटे हैं, फिर भी यहां के तमाम जनप्रतिनिधि लापरवाह और उदासीन दिखे, जैसे कि उनका इस घटनाक्रम से कोई लेना देना ही न हो. एक अखबार के संवाददाता ने छह लोगों को फोन किया था. हवामहल विधायक महेश जोशी को रात 12.28 बजे फोन किया, तो उन्होंने नहीं उठाया. दूसरी बार फोन करने पर कहा कि तबीयत ठीक नहीं थी, सो गया था. बताओ क्या हुआ? दंगा भड़कने की सूचना दी तो उन्होंने कहा कि पुलिस फोर्स लगा तो रखी है. चिंता न करें. इसके बाद शायद वह सो गए होंगे.
किशनपोल के विधायक अमीन कागजी को फोन किया तो बोले, खास मीटिंग में हैं. फिर फोन किया तो बताया कि सुभाष चौक थाने पर हैं. इसके बाद 15 बार फोन नहीं उठाया. 16वीं बार उन्होंने कहा कि इस बारे में कोई बात नहीं करनी. वहीं पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी को रात 11.21 बजे फोन किया और हालात बताए तो उन्होंने कहा, हां, सूचना मिली है. जैसी सरकार वैसा माहौल है. मैं कमिश्नर से बात करता हूं. 11.46 बजे फोन कर बताया कि पुलिस अब तक नहीं पहुंची, तो चतुर्वेदी ने कहा, एसपी जल्दी ही पहुंचेंगे.
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रात 11.27 बजे सिविल लाइंस क्षेत्र के विधायक प्रताप सिंह खाचरियावास को फोन किया तो उन्होने कहा कि चिंता मत करो, सब्र करो. मेरी पुलिस कमिश्नर से बात हो गई है. कुछ ही देर में पुलिस पहुंच रही है. तो वहीं विधायक अशोक लाहोटी तो दो कदम आगे निकले, अशोक लाहोटी को 11.23 बजे फोन किया, तो उन्होंने पहले घटनाक्रम की जानकारी प्राप्त की, फिर कहा, चिंता मत करो, मैं अभी पुलिस से बात करता हूं. फोर्स भेजने को कहता हूं. इसके बाद उनसे फोन पर बात नहीं हो पाई. शायद मोबाइल ऐरोप्लेन मोड ओर चला गया होगा.
इन सबसे अलग आदर्श नगर विधायक रफीक खान को जब 11 बजे उपद्रव की सूचना मिली तो वह तत्काल दिल्ली बाईपास पहुंच गए थे. उन्होंने पुलिस और दोनों समुदायों के लोगों से बातचीत की. लोगों को घर लौट जाने के लिए समझाते रहे. रात दो बडे शांति व्यवस्था बहाल होने के बाद वह घर लौटे. रफीक खान के अलावा शहर के पांच नेता, जिनमें एक भाजपा के और चार कांग्रेस के हैं, टालमटोल करते ही दिखे. क्या इन जन प्रतिनिधियों के मन में नहीं आया कि दंगा भड़क रहा है तो उन्हें तुरंत मौके पर पहुंचना चाहिए? क्या आजकल के जन प्रतिनिधि सिर्फ बयानबाजी और विरोधी पार्टी की आलोचना के दम पर ही राजनीति करेंगे? इन्हें जनता के सुख-दुख से कोई लेना-देना है या नहीं?
कांग्रेस के पोस्टर्स में नेहरू-इंदिरा की जगह अब प्रियंका-रॉबर्ट वाड्रा
सोनिया गांधी के कांग्रेस के अंतरिम अध्यक्ष बनने पर पार्टी मुख्यालय के बाहर बधाई वाले पोस्टर लगाये गए हैं. सामान्य दिखने वाले इन पोस्टर्स में गौर करने वाली दो प्रमुख बातें है. पहली बात ये कि इन पोस्टर्स में पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी के साथ-साथ उनके पति रॉबर्ट वाड्रा की फोटो भी लगी हुई है और दूसरी बात ये कि आमतौर पर इससे पहले तक कांग्रेस के पोस्टरों पर जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी की तस्वीरें छपी रहती थीं. इन पोस्टर्स पर श्रीमती सोनिया गांधी जी को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की अंतरिम अध्यक्ष बनाए जाने पर हार्दिक बधाई लिखा हुआ है. प्रमुख समाचार एजेंसी ANI ने यह पोस्टर्स दिखाए हैं.


गौरतलब है कि, लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. करीब दो महीने तक कांग्रेस अध्यक्षविहीन रही और पार्टी के कार्यकर्ता से लेकर विपक्षी दल भी आरोप लगाते थे कि जिस पार्टी का अध्यक्ष न हो वो लोगों की बातों को कैसे रखेगा. करीब ढाई महीने की कशमकश के बाद कांग्रेस को अध्यक्ष मिला लेकिन अंतरिम अध्यक्ष. सीडब्ल्यूसी की बैठक में कई नेताओं के नामों पर चर्चा हुई, लेकिन किसी भी नाम पर सब एक राय नहीं हो सके और कांग्रेस की सत्ता एक बार फिर गांधी परिवार के हाथों में आ गई. सीडब्लूसी में सर्वसम्मति से सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष चुना गया.
बात करें कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा की तो इससे पहले हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद शहर में उन्हें चुनाव लड़ने का आग्रह करते हुए पोस्टर लगे थे. इसके अलावा राजस्थान में प्रवर्तन निदेशालय(ED) के कार्यालय के बाहर भी पोस्टर लगे थे, जिसमें प्रियंका और राहुल के साथ-साथ वाड्रा की फोटो थी. ईडी उनसे बीकानेर जमीन घोटाले में पूछताछ कर रही थी, तभी ये पोस्टर लगे थे. ठीक इसी तरह के पोस्टर दिल्ली-एनसीआर में लगे थे. इसमें लिखा था कट्टर सोच नहीं, युवा सोच. इस पोस्टर में भी प्रियंका और राहुल के साथ वाड्रा की फोटो थी.

राजस्थान से राज्यसभा में कांग्रेस का खुलेगा खाता, मनमोहन सिंह होंगे सांसद
राजस्थान में मदनलाल सैनी के निधन के बाद खाली हुई राज्यसभा की सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस की तरफ से पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने आज नामांकन दाखिल किया. राजस्थान से डॉ मनमोहन सिंह का राज्यसभा जाना तय हो गया है, क्योंकि भाजपा ने अपना उम्मीदवार उपचुनाव में उतारने से मना कर दिया है. ऐसे में मनमोहन सिंह का निर्विरोध चुना जाना तय है. देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह ने मंगलवार को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया. इसके लिए वे मंगलवार सुबह जयपुर पहुंचे. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उनका स्वागत करने एयरपोर्ट पहुंचे. डॉ सिंह ने राजस्थान विधानसभा पहुंच कर अपना नामांकन दाखिल किया. इस अवसर … Read more
राज्यसभा उपचुनाव पर बोले सचिन पायलट
राजस्थान के उपमुख़्यमंत्री सचिन पायलट ने राज्यसभा उपचुनाव के लिए पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नामांकन भरे जाने पर खुशी जताई. राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष मदनलाल सैनी के निधन के चलते राजस्थान राज्यसभा की एक सीट खाली हुई है. बुधवार नामांकन की अंतिम तिथि है. बीजेपी ने अपना प्रत्याशी उतरने से इनकार कर दिया है. वैसे कांग्रेस के पास विधानसभा में 100 विधायक हैं. इसके साथ निर्दलीय, बसपा सहित अन्य 22 विधायकों का समर्थन भी मिला हुआ है. ऐसे में डॉ.मनमोहन सिंह का राज्यसभा में बिना विरोध के पहुंचना पहले से ही पक्का है. पॉलिटॉक्स ने अपनी पिछली खबरों में पहले ही यह कन्फर्म कर दिया था कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह का राज्यसभा में पहुंचना निश्चित है.
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आज भरेंगे नामांकन, बसपा ने दिया समर्थन
देश के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह मंगलवार को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करेंगे. इसके लिए वे जयपुर पहुंच चुके हैं. राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उनका स्वागत करने पहुंचे. राजस्थान में मदनलाल सैनी के निधन के बाद खाली हुई सीट से कांग्रेस मनमोहन सिंह को राज्यसभा भेजेगी. डॉ.सिंह फिलहाल किसी सदन के सदस्य नहीं हैं. कांग्रेस के पास अपने 100 विधायकों के अलावा निर्दलीय, बसपा और बीटीपी सहित 122 विधायकों का समर्थन हासिल है. बसपा सुप्रीमो मायावती राजस्थान विधानसभा में अपने विधायकों के जरिए डॉ.मनमोहन सिंह का समर्थन पहले ही कर चुकी है. माना जा रहा है कि मनमोहन सिंह के सामने बीजेपी अपना प्रत्याशी नहीं उतरेगी. ऐसे में … Read more
‘गांधी ने गांधी को दिया इस्तीफा, फिर से गांधी बना अध्यक्ष’
एक कहावत बड़ी मशहूर है ‘तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, बोलो कितने तीतर’. ऐसा ही कुछ कांग्रेस पार्टी में हो रहा है. सोनिया गांधी ने 16 दिसम्बर, 2017 को जब गांधी परिवार के युवराज राहुल गांधी की ताजपोशी की थी यानि उनको पार्टी की कमान संभलायी थी तब ये निश्चित था कि कांग्रेस केवल वंशवाद आगे बढ़ा रही है. ऐसे में तय था कि कांग्रेस की सियासत की बागड़ौर केवल गांधी परिवार के हाथों में रहेगी. लोकसभा चुनाव-2019 में मिली करारी हार के बाद नैतिकता के आधार पर जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.
राहुल गांधी ने ये इस्तीफा यूपीए चैयरपर्सन सोनिया गांधी को सौंपा. यानि एक गांधी को. उसके बाद शुरू हुई नए अध्यक्ष की तलाश. राहुल गांधी ने साफ तौर पर कहा कि अब पार्टी की बागड़ौर किसी गैर गांधी को सौंपी जाए लेकिन अब हुआ पहले से भी बड़ा झोल और एक बार फिर अध्यक्ष बन गयी सोनिया गांधी. यानि गांधी के बाद फिर गांधी. ऐसे में सीधे तौर पर कहा जाए तो इस्तीफा लेने वाला भी गांधी, देने वाला भी गांधी और नया अध्यक्ष भी गांधी.
इससे पहले जिस व्यक्ति का नाम अध्यक्ष पद पर सबकी पसंद था और उसे सभी का समर्थन भी मिल रहा था, वो भी था एक गांधी यानि प्रियंका गांधी. वहीं जिस नाम का सबसे ज्यादा समर्थन किया जा रहा है, वो भी गांधी. सीधे तौर पर कहा जाए तो कांग्रेस में फिर से गांधियों का वंशवाद शुरू हो गया जो बड़ी मुश्किल से लाइन पर आने वाला था. राहुल गांधी के इस्तीफे और पार्टी कमान संभालने को प्रियंका के इनकार के बाद लगने लगा था कि अब कांग्रेस को जो नया अध्यक्ष मिलेगा, निश्चित तौर पर कोई गैर गांधी ही होगा. इस लिस्ट में अशोक गहलोत सबसे आगे रहे लेकिन उन्होंने साफ तौर पर मना कर दिया.
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वजह रही कि राजनीति के जादूगर गहलोत को साफ तौर पर पता था कि वे कांग्रेस अध्यक्ष भले ही बन जाएं लेकिन पर्दे के पीछे और महत्वपूर्ण फैसलों में कलम केवल राहुल-सोनिया-प्रियंका यानि गांधी परिवार की ही चलेगी. ऐसे में उन्होंने बड़ा पद लेने की जगह राजस्थान की राजनीति में ही ध्यान देना उचित समझा. पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह का भी यही सोचना है. अपनी बेबाकी के लिए जाने जाने वाले अमरिन्दर के हितों का टकराव सीधे गांधी परिवार से होगा, इसलिए उन्होंने अपना नाम कभी आगे ही नहीं आने दिया. इसके दूसरी ओर, उन्होंने प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाने का विकल्प भी सुझा दिया.
कांग्रेस अध्यक्ष के नए नाम की इस लिस्ट में मुकुल वासनिक, सुशील शिंदे और मलिकार्जुन खडगे का नाम भी शामिल था लेकिन 5 ग्रुप की बैठक के बावजूद इनमें से किसी का नाम तय न हो सका. वहीं इस लिस्ट में युवाओं के तौर पर राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट और पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम भी था लेकिन सीनियर्स के अनुभव के सामने न तो युवाओं की रणनीति काम आयी और न ही उनकी युवा सोच.
अगर सीड्ब्ल्यूसी की एक ही दिन में दो बैठकों के बाद भी अगर कोई निष्कर्ष न निकलता तो पार्टी फिर से विपक्ष के निशाने पर आ जाती. शायद इसी डर से सोनिया गांधी को नए अध्यक्ष के चुनाव होने तक अंतरिम अध्यक्ष का दायित्व सौंप दिया. अब गौर करने वाली बात ये है कि चाहे कांग्रेस के नेता ये सोचकर खुश हो रहे हो कि चलो अब कुछ समय के लिए पार्टी के नए कप्तान की चिंता खत्म हुई लेकिन यह समस्या केवल टली है और वो भी कुछ समय के लिए. ज्यादा से ज्यादा चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने तक सोनिया अंतरिम अध्यक्ष का पद संभाल सकती हैं. उसके बाद से कांग्रेस की ये नोटंकी फिर से शुरू होगी और फिर से शुरू होगा गांधी बनाम गांधी का खेल.
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अब ये खेल कितना लंबा चलेगा, ये तो समय भी बताएगा लेकिन जो भी हुआ या जो होने वाला है, उससे एक बात तो एकदम साफ है कि गांधी परिवार के लोगों से पार्टी की बागड़ौर इतनी आसानी से नहीं फिसलने वाली. अगर जरा सी फिसल भी गयी जैसे कि राहुल गांधी के साथ हुआ है तो कांग्रेस के सिपेसालार फिर से इसे किसी न किसी गांधी के हाथों में थमा देंगे, फिर चाहें वो प्रियंका गांधी हो या सोनिया गांधी या फिर से राहुल गांधी.