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राजस्थान में BJP-RLP का गठबंधन, नागौर से चुनाव लड़ेंगे हनुमान बेनीवाल
आगामी लोकसभा चुनाव से पहले राजस्थान में कांग्रेस के एक बड़ा झटका लगा है. राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल के अध्यक्ष हनुमान बेनीवाल ने प्रदेश में बीजेपी से गठबंधन कर लिया है. बेनीवाल की पार्टी रालोपा अब एनडीए का घटक दल होगी. दोनों पार्टियां मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ेंगी. इसके तहत हनुमान बेनीवाल नागौर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे. शेष 24 सीटों पर बीेजेपी अपने उम्मीदवार उतरेगी. राज्य की सभी सीटों पर बेनीवाल और उनके समर्थक बीजेपी के पक्ष में चुनाव प्रचार करेंगे. नागौर सीट से बेनीवाल के सामने कांग्रेस की ज्योति मिर्धा चुनावी मैदान में हैं.
गठबंधन को लेकर आज राजधानी जयपुर स्थित बीजेपी मुख्यालय पर बीजेपी और आरएलपी की संयुक्त प्रेसवार्ता हुई. पीसी को केन्द्रीय मंत्री एवं बीजेपी के लोकसभा चुनाव प्रभारी प्रकाश जावड़ेकर और आरएलपी के संयोजक हनुमान बेनीवाल ने संबोधित किया. बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदनलाल सैनी गठबंधन की घोषणा की. इससे पहले बेनीवाल के कांग्रेस के साथ गठबंधन की खबरें सामने आई थीं लेकिन सीटों को लेकर बात नहीं बनी.
प्रेसवार्ता को संबोधित करते हुए हनुमान बेनीवाल ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि राजस्थान में कांग्रेस का सूपड़ा साफ होगा. उन्होंने यह भी कहा कि वह प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने का प्रयास करेंगे. बता दें, आरएलपी को राजस्थान विधानसभा चुनाव में 3 सीटों पर जीत मिली थी.
राजस्थान की इस सीट पर कोई जीते-हारे, सांसद तो ‘भाई’ ही बनेगा
लोकसभा चुनावों को लेकर देशभर में इन दिनों सियासी कवायदों एवं दांवपैचों का दौर पूरे शबाब पर है. हर कोई शह और मात के इस खेल में येन-केन-प्रकारेण अपने प्रतिद्वंदी को पटखनी देने के लगा है. बात जब राजनीति की हो तो यहां न कोई रिश्ता हावी होता है और न कोई दोस्ती. इससे इतर भाई-भतीजावाद भी राजनीति में नया नहीं है. रिश्तों के साथ साथ राजनीतिक रोटियां सेकने में भी हर कोई आगे रहता आया है.
काफी हद तक ऐसा होना लाजमी भी है, क्योंकि जब दो रिश्तेदार एक दूसरे के खिलाफ या फिर अप्रत्यक्ष रूप से साथ मिलकर चुनाव लड़े तो निश्चित रूप से जीत तो तय ही है, भले ही दोनों में से किसी की भी हो. ऐसा ही नजारा आजकल राजस्थान के बीकानेर लोकसभा क्षेत्र में इन दिनों एक ही नारा चल रहा है ‘हारे-जीते कोई, सांसद बनेगा भाई.’ ऐसा इसलिए क्योंकि बीकानेर सीट से कांग्रेस और भाजपा दोनों से ही टिकट पाने वाले प्रत्याशी रिश्ते में मौसेरे भाई लगते हैं. हालांकि यह बात अलग है कि दोनों भाईयों को अपनी ही पार्टी के खेवनहारों से डर लग रहा है.
क्षेत्र में जहां जीत की हैट्रिक बनाने की तैयारी में जुटे बीजेपी उम्मीदवार और केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को पार्टी छोड़ चुके कद्दावर नेता देवी सिंह भाटी के आक्रामक विरोध का सामना करना पड़ रहा है, वहीं कांग्रेस उम्मीदवार मदन मेघवाल के लिए भी मुश्किलें कम नहीं हैं. बीजेपी सरकार में मंत्री रहे देवीसिंह भाटी ने विधानसभा चुनाव में पुत्रवधु की हार का हिसाब चुकता करने के लिए खुलेआम अर्जुनराम का विरोध शुरू कर दिया है. देवी सिंह भाटी ने अपनी चार दशक की राजनीति में कई पार्टियां बदलीं, लेकिन हर हाल में कांग्रेस का विरोध किया. इस बार अर्जुनराम को हराने के लिए वह कोई भी हथकंडा अपनाने को तैयार हैं.
देवी सिंह भाटी ने मेघवाल को हराने के लिए यहां तक कह दिया कि चाहे कांग्रेस को वोट दे दो, लेकिन अर्जुनराम को हराओ. यह कड़वाहट इसलिए भी है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में मेघवाल ने श्रीकोलायत में दलित मतों का ध्रुवीकरण कर उन्हें देवी सिंह भाटी के खिलाफ कर दिया था. अब इन आरोप में कितनी सच्चाई है, यह तो नहीं पता लेकिन भाटी उन्हीं बूथ पर पीछे रहे, जहां दलित मतों का बोलबाला है. यही वजह रही कि दोनों के बीच कड़वाहट ने जन्म ले लिया. पिछले दिनों अर्जुनराम को टिकट मिलने का संकेत मिलते ही भाटी ने बीजेपी से त्यागपत्र दे दिया था. अब भाटी समर्थक सड़कों पर उतर चुके हैं और हर हाल में अर्जुनराम को हराने की रणनीति बना रहे हैं.

बीकानेर में आजकल जगह-जगह अर्जुनराम मेघवाल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. हाल ही में शहर के हृदयस्थल कोटगेट पर अर्जुनराम का पुतला जलाया गया. गौरतलब है कि विरोध करने वालों के हाथ में भाजपा का झंडा और पैरों में अर्जुनराम का पुतला था. यानी स्थिति ‘मोदी से बैर नहीं, अर्जुनराम की खैर नहीं’ जैसी हो चली है. हालांकि अर्जुनराम का मानना है कि इस विरोध का चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.
अब बात करें मदन मेघवाल की जो सेवानिवृति के बाद कांग्रेस टिकट पर अर्जुनराम के सामने ताल ठोकने के लिए तैयार हैं. उनका भी कई जगह विरोध हो रहा है. इस मामले में कांग्रेसी विधायक गोविंद मेघवाल के समर्थक सबसे आगे हैं. उनके अनुसार, कांग्रेस प्रत्याशी जीत की स्थिति में नहीं है. वहीं जिला परिषद की उप जिला प्रमुख इंदू देवी तर्ड का पत्र भी चर्चा में है, जिसमें रायसिंहनगर में हुए किसान आंदोलन के दौरान तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मदन मेघवाल पर लगे आरोपों का जिक्र है.
राजस्थान में हो रहे इस राजनीतिक तमाशे को राजनीति के जानकार कौतुहल से देख रहे हैं. गौर करने वाली बात यह भी है कि एक तरफ जहां अर्जुनराम का विरोध नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ मोदी के प्रति भक्ति में कोई खास कमी नहीं आई है. यही कारण है कि अब अर्जुनराम मोदी के नाम पर जीत की उम्मीद लगाकर बैठे हैं. वे दस साल से बीकानेर से सांसद हैं. पांच साल विपक्ष और पांच साल सरकार में मंत्री रह चुके मेघवाल बीकानेर में अपनी ओर से करवाए गए कार्यों को लंबी सूची बताते हैं.
अर्जुनराम बीकानेर को हवाई सेवा देने के साथ ही राजमार्गों के विस्तार का जिक्र चुनाव प्रचार के दौरान कर रहे हैं. इसके बावजूद ठीक एक साल पहले दो अप्रैल को दलितों के समर्थन में भारत बंद के दौरान हुई उत्पात का खामियाजा अर्जुनराम को भुगतना पड़ सकता है. सवर्ण जाति के झंडाबरदार यह आरोप लगाते हैं कि दो अप्रैल को बीकानेर में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना के सूत्रधार अर्जुनराम ही थे.
मदन मेघवाल के पास गिनाने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वे स्थानीय कांग्रेस नेताओं के हाथों की सिर्फ कठपुतली बने नजर आ रहे हैं. कांग्रेस के पास जीत का एकमात्र आधार ‘अर्जुनराम का विरोध है.’ मदन मेघवाल अपने भाषणों में इंदिरा गांधी नहर पानी में एक इंच की बढ़ोतरी नहीं होने का जिक्र जरूर कर रहे हैं. बहरहाल, ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प हो चला है कि चुनावी रण में कौनसा ‘भाई’ बाजी मारता है और कौनसा जनता के हाथों हार का सामना करता है.
अखिलेश यादव के खिलाफ चुनाव लड़ेंगे भोजपुरी स्टार निरहुआ, बीजेपी ने जारी की लिस्ट
बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के लिए अपनी 16वीं लिस्ट जारी कर दी है. इस सूची में एक महाराष्ट्र और 5 उत्तर प्रदेश के उम्मीदवारों के नाम शामिल हैं. यूपी के पूर्व सीएम और सपा चीफ अखिलेश यादव के सामने भोजपुरी स्टार निरहुआ मैदान में उतरेंगे. दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ को आजमगढ़ से टिकट मिला है. निरहुआ हाल ही में बीजेपी में शामिल हुए हैं. इस बार अखिलेश यादव अपने पिता मुलायम सिंह यादव की सीट आजमगढ़ से चुनाव लड़ रहे हैं. मुलायम सिंह मैनपुरी से चुनावी मैदान में हैं. बीजेपी ने महाराष्ट्र की मुंबई उत्तर पूर्व सीट से मनोज कोटक को लोकसभा चुनाव में उतारा है. वहीं यूपी की … Read more
RSS ऑफिस की सुरक्षा पर क्यों भिड़े कमलनाथ और दिग्गी?
मध्य प्रदेश में संघ कार्यालय (RSS) भोपाल में अरेरा कॉलोनी में ‘समीधा’ के नाम से स्थित है. यहां सुरक्षा के लिए पिछले 10 सालों से सुरक्षाकर्मी तैनात रहते थे लेकिन सोमवार को सरकार ने अचानक से फैसला किया कि अब से संघ कार्यालय को सुरक्षा नहीं दी जाएगी. ऐसे में एसएएफ के 4 तैनात जवान वहां से हटा लिए गए. खबर के वायरल होने के बाद तेज होते हंगामे को देखते हुए कांग्रेस सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा. इस मामले के बाद प्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान और बीजेपी नेता गोपाल भार्गव ने इसे सरकार की साजिश करार दिया. वहीं आरएसएस की तरफ से अधिकारिक तौर पर … Read more
राजस्थान: गजेंद्र को ‘मोदी’ तो वैभव को पिता ‘गहलोत’ की जादूगरी का सहारा
राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटों में इस बार जोधपुर लोकसभा सीट सबसे हॉट सीट मानी जा रही है. इस सीट से भाजपा ने एक बार फिर केंद्रीय मंत्री और वर्तमान सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत पर दांव खेला है. वहीं, कांग्रेस ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत को चुनावी मैदान में उतारा है. दोनों ने चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है. वैभव गहलोत ने फिलहाल अपना पूरा जोर जोधपुर शहर में लगा रखा है तो गजेंद्र सिंह शेखावत ग्रामीण इलाकों में पसीना बहा रहे हैं.
मजेदार बात यह है कि दोनों उम्मीदवार अपने नाम से वोट नहीं मांग रहे. केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह को पीएम नरेंद्र मोदी के नाम का सहारा है तो वैभव गहलोत अपने पिता अशोक गहलोत के आसरे हैं. आपको बता दें कि राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत ने अपनी सियासत जोधपुर से ही शुरू की थी. वे जोधपुर लोकसभा सीट से पांच बार सांसद और जिले की सरदारपुरा विधानसभा सीट से पांच बार विधायक का चुनाव जीत चुके हैं. यही वजह है कि उन्होंने बेटे वैभव के चुनावी राजनीति में पर्दापण के लिए जोधपुर सीट को चुना.
टिकट मिलने के बाद वैभव गहलोत जब पहली बार जोधपुर पहुंचे तो उनके स्वागत में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की अच्छी-खासी भीड़ उमड़ी, लेकिन इस हुजूम ने जो नारे लगाए उनमें वैभव के कम और सीएम गहलोत के ज्यादा थे. इक्का-दुक्का नारों को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने राहुल गांधी का नाम तक नहीं लिया. स्वागत के बाद प्रचार पर निकले वैभव अपने नाम पर वोट मांगने की बजाय अशोक गहलोत की ओर से जोधपुर को दी गई सौगातों को गिना रहे हैं.
बात यदि गजेंद्र सिंह शेखावत की करें तो वे अपने भाषणों में सांसद और केंद्रीय मंत्री रहते हुए जोधपुर में किए विकास कार्यों का जिक्र करने की बजाय नरेंद्र मोदी का गुणगान कर रहे हैं. शेखावत अपने हर भाषण में इस बात को दोहराना नहीं भूलते कि देश की सभी 543 लोकसभा सीटों पर केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही उम्मीदवार हैं. शेखावत के साथ समस्या यह है भी है कि उनके पास जोधपुर में करवाए विकास कार्यों की लंबी फेहरिस्त नहीं है.
ऐसे में वैभव गहलोत का शुरूआती राजनीतिक करियर और गजेंद्र सिंह का अनुभवी राजनीतिक अनुभव बराबरी पर आ खड़े हुए हैं. कहने को तो जोधपुर से वैभव गहलोत चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम है कि यह चुनाव वैभव के नाम पर स्वयं अशोक गहलोत चुनाव लड़ रहे हैं. यिद वैभव गहलोत चुनाव जीतते हैं तो यह सीएम गहलोत की जीत होगी और उन्हें शिकस्त मिलती है तो ये भी उनके ही हिस्से आएगी.
जहां तक गजेंद्र सिंह का सवाल है, यदि वे वैभव गहलोत को हराने में कामयाब होते हैं तो प्रदेश की राजनीति में उनका कद निश्चित रूप से बढ़ जाएगा. यदि वे चुनाव हार जाते हैं तो उन्हें देश और प्रदेश की रजनीति में खुद को खड़ा करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ेगी. जोधपुर का परिणाम चाहे जो कुछ भी हो, लेकिन अब तक के सियासी माहौल से यह साफ नजर आ रहा है कि मुकाबला कड़ा है. दोनों ओर से जीत के लिए दमखम लगाया जा रहा है.