प्रियंका गांधी ने CWC की बैठक में किसे कहा कांग्रेस का हत्यारा?

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लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस के भीतर मंथन का दौर जारी है. कभी खबर आती है कि राहुल गांधी इस्तीफा देने के अड़े है. उसके पलभर बाद फिर खबर आ जाती है कि राहुल गांधी इस्तीफा न देने के लिए मान गए हैं. कांग्रेस के भीतर क्या चल रहा है, किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा. इसी बीच यह खबर आयी कि प्रियंका गांधी CWC की बैठक में पार्टी की हार के लिए जिम्मेदार नेताओं पर जमकर बरसी. उन्होंने तल्ख लहजे में चुनिंदा नेताओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि ‘पार्टी के हत्यारे’ आज हमारे बीच इसी बैठक में मौजूद हैं. उन्होंने अपने स्वार्थ … Read more

गुटों में विभाजित कांग्रेस कहां कर पाती मोदी लहर का मुकाबला

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देश में लोकसभा चुनाव के नतीजों में नरेंद्र मोदी की सुनामी देखने को मिली जिसमें कांग्रेस पूरी तरह धाराशायी हो गई. कई राज्यों में तो उसके हालात 2014 से भी बुरे थे. कांग्रेस का 18 राज्यों में खाता तक नहीं खुला. हार के इन नतीजों की समीक्षा की जाए तो कांग्रेस को मिली करारी हार का सबसे बड़ा कारण राज्यों की कांग्रेस लीडरशिप में चल रही जबरदस्त गुटबाजी है. हमारे इस खास आर्टिकल में विभिन्न राज्यों की गुटबाजी के बारे में विस्तृत रुप से बता रहे हैं…

हरियाणाः कांग्रेस गुटबाजी का सबसे बड़ा नमुना देखना है तो हरियाणा होकर आइए. यहां कांग्रेस के भीतर कई धड़े सक्रिय मिलेंगे जो परोक्ष रुप से बीजेपी के पक्ष में कार्य करते हुए नजर आए. इस राज्य में कांग्रेस के भीतर खींचतान काफी लंबे समय से है लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कभी इस अस्थिरता को थामने की कोशिश नहीं की. प्रदेश कांग्रेस के भीतर 2 धड़े पूर्ण रुप से सक्रिय हैं जिन्होंने चुनाव में कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया है.

तंवर गुटः इस गुट की कमान हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अशोक तंवर के हाथ में है. हालांकि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि उनके अध्यक्ष बनने के बाद से ही हरियाणा में कांग्रेस गर्त की ओर है. राहुल गांधी की तरफ से अशोक तंवर को अध्यक्ष बनाने के तुरंत बाद ही विधायकों ने उनका विरोध शुरु कर दिया था. कई बार राहुल गांधी को विधायकों ने तंवर को हटाने की गुहार की लेकिन राहुल ने उनकी मांग को हर बार अनसुना किया. तंवर के साथ उनके कार्यकाल के दौरान एक भी विधायक उनके साथ खड़ा नजर नहीं आया. यही हरियाणा में कांग्रेस को मिली करारी हार का कारण रहा.

हुड्डा गुटः हरियाणा कांग्रेस के चेहरों में आज भी अगर कोई बीजेपी से चुनौती दे सकता है तो वो है भूपेन्द्र सिंह हुड्डा. उनकी संगठन पर पकड़ आज भी पहले की तरह ही मजबूत है. पार्टी के 90 फीसदी से भी ज्यादा विधायक भूपेन्द्र हुड्डा के एक इशारे पर लाइन में कदमताल करते नजर आते हैं. लेकिन संगठन पर उनकी इस जबरदस्त पकड़ को राहुल गांधी पिछले पांच साल में भांप ही नहीं पाए.

विधायकों और पार्टी पदाधिकारियों की तरफ से कई बार भूपेन्द्र हुड्डा को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की मांग की गई लेकिन उनकी मांग को हर बार दरकिनार किया गया. लोकसभा चुनाव में मिली हार का एक बड़ा कारण भूपेन्द्र हुड्डा को नजरअंदाज कराना भी रहा. तंवर और हुड्डा के अलावा हरियाणा कांग्रेस में किरण चौधरी, कुलदीप विश्नोई, रणदीप सुरजेवाला जैसे नेताओं के भी धड़े सक्रिय हैं जो बीजेपी से मुकाबला कम और कांग्रेस का नुकसान करने के ज्यादा प्रयास करते हैं.

राजस्थानः राजस्थान में कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीत मिलने की आशंका थी. लेकिन कांग्रेस को जीत मिली सिर्फ 100 सीटों पर यानि बहुमत से भी एक सीट कम. कांग्रेस के पक्ष में जबरदस्त माहौल होने के बावजूद कांग्रेस का 100 सीटों पर सिमटना आलाकमान के लिए चिंताजनक था. कारण तलाशे गए तो सामने निकलकर आया कि गुटबाजी के कारण टिकट वितरण में काफी गलतियां हुई जिससे कई स्थानों पर पार्टी प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा.

विधानसभा चुनाव के बाद सरकार के गठन में राहुल गांधी ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों को साधते हुए गहलोत को मुख्यमंत्री और पायलट को उप-मुख्यमंत्री बनाया. लेकिन लोकसभा चुनाव में भी विधानसभा चुनाव की तरह ही गुटबाजी के कारण टिकट वितरण में भारी गलतियां की गई. जिससे अनेक लोकसभा क्षेत्रों में तो कांग्रेस चुनाव लड़ने से पहले ही हार गई. ये टिकट इसलिए गलत बांटे गए ताकि अपने चहेते व्यक्ति को टिकट मिल सके. इन नेताओं को टिकट वितरण के दौरान जिताऊ चेहरों से कोई सरोकार नहीं रहा.

उत्तराखंड़ः इस पहाड़ी क्षेत्र में 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद प्रदेश संगठन के अंदर गुटबाजी अपने चरम पर है. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष प्रीतम सिंह के बीच कोई सामंजस्य नहीं है. दोनों अधिकतम समय एक-दूसरे को कमजोर करने के प्रयास में दिखाई देते हैं. लोकसभा चुनाव में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला. पार्टी को राज्य की पांचों सीटों पर बड़ी पराजय नसीब हुई.

उधमपुर लोकसभा क्षेत्र से हरीश रावत चुनाव लड़े. उनका सामना बीजेपी के अजय भट्ट से था. पार्टी की आंतरिक गुटबाजी का नुकसान हरीश रावत को चुनाव में हुआ और वो भारी अंतर से अजय भट्ट के सामने चुनाव हारे. टिहरी गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र से प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने चुनाव लड़ा. यह इलाका हरीश रावत के प्रभाव क्षेत्र वाला माना जाता है. हरीश रावत यह कभी नहीं चाहते थे कि प्रीतम सिंह चुनाव जीते. उन्होंने और उनके कार्यकर्ताओं ने प्रीतम सिंह की जमकर कारसेवा की. नतीजा रहा कि प्रीतम सिंह भारी मतों से चुनाव हारे.

हिमाचलः हिमाचल कांग्रेस के भीतर गुटबाजी की खबर अकसर अखबारों में देखने को मिलती है. चाहे अदावत सुखविंद्र सिंह और वीरभद्र सिंह के मध्य हो या पूर्व मंत्री जीएस बाली और वीरभद्र के बीच. नुकसान संगठन का ही हुआ है. इस गुटबाजी ने कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भी नुकसान पहुंचाया था. लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस पूरी तरह गुटों में बंटी हुई नजर आई. नेता कांग्रेस प्रत्याशियों को जिताने के लिए नहीं बल्कि हराने के लिए मेहनत करते दिखे. परिणाम यह रहा कि कांग्रेस का प्रदेश से सूपड़ा साफ हो गया. हिमाचल में पार्टी के हालात इतने बुरे रहे कि सभी प्रत्याशी 3.50 लाख से अधिक मतों से चुनाव हारे.

मध्यप्रदेशः मध्यप्रदेश में कांग्रेस की लुटिया कांग्रेस संगठन में फैली भयंकर गुटबाजी ने डुबोई. यहां कांग्रेस मुख्यतः तीन गुट में विभाजित है. पहला मुख्यमंत्री कमलनाथ धड़ा, दूसरा गुट राहुल गांधी के करीबी और पश्चिमी यूपी के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया. तीसरे धड़े के मुखिया का हाथ तो कांग्रेस की लुटिया डुबोने में अहम है. उन महाशय का नाम है दिग्विजय सिंह. गुटबाजी के कारण कांग्रेस के प्रदर्शन में सुधार होना तो दूर, 2014 की तुलना से भी खराब हो गया.

दिग्विजय सिंह भोपाल संसदीय क्षेत्र से साध्वी प्रज्ञा के सामने बुरी तरह चुनाव हारे. हालात कुछ ऐसे रहे कि जो सीट पार्टी पिछली बार में जीतने में कामयाब रही थी, इस बार हाथ से फिसल गई. गुना लोकसभा क्षेत्र से पार्टी के दिग्गज़ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को हार का सामना करना पड़ा.

लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस में शुरू हुआ इस्तीफों का दौर

लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस संगठन के भीतर इस्तीफों का दौर शुरु हो गया है. राहुल गांधी खुद अपने इस्तीफे को लेकर अड़े हुए हैं. हालांकि आज इस मामले को लेकर उनसे पार्टी के दो बड़े नेताओं ने बात की है. इसके बाद भी राहुल गांधी मानने को तैयार नहीं है. अब इस्तीफे देने की पार्टी में लहर सी चल पड़ी है. महाराष्ट्र में पार्टी अध्यक्ष अशोक चव्हाण ने लोकसभा चुनाव नतीजों के अगले ही दिन अपने इस्तीफे की पेशकश की थी. पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़, झारखंड कांग्रेस चीफ अजय कुमार और असम कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा ने भी आज अपने इस्तीफे कांग्रेस अध्यक्ष को भेजे … Read more

स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी को कैसे किया चारों खाने चित?

लोकसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोर रही है. पार्टी ने 2014 से भी ज्यादा सीटें जीतकर इतिहास रचा है. बीजेपी के 303 उम्मीदवार चुनाव जीते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत की. उन्होंने गांधी परिवार का गढ़ मानी जाने वाली उत्तर प्रदेश की अमेठी सीट से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पटकनी देकर सबको चौंका दिया है. स्मृति ने राहुल गांधी को 55,122 वोटों के अंतर से शिकस्त दी.

यह दूसरा मौका है जब अमेठी से गांधी परिवार के किसी सदस्य को हार झेलनी पड़ी है. इससे पहले 1977 के लोकसभा चुनाव में संजय गांधी को हार का सामना करना पड़ा था. तब जनता पार्टी के रविंद्र प्रताप सिंह ने संजय गांधी को पटकनी दी थी. हालांकि राजनीतिक विश्लेषक 1977 के चुनाव में संजय गांधी की हार को राहुल गांधी के मुकाबले अप्रत्याशित नहीं मानते, क्योंकि उस समय आपातकाल लागू करने की वजह से पूरे देश में कांग्रेस के खिलाफ गुस्सा था. तब लोग संजय गांधी को ही आपातकाल का सूत्रधार मानते थे.

कई लोग अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत की तुलना 1977 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली से इंदिरा गांधी के खिलाफ राजनारायण की जीत से कर रहे हैं. अलबत्ता राजनारायण की जीत में उनकी मेहनत से ज्यादा इंदिरा गांधी के खिलाफ आपातकाल लगाने का गुस्सा था. इस लिहाज से देखें तो स्मृति ईरानी की जीत राजनारायण और रविंद्र प्रताप सिंह से बड़ी है. इस बार के चुनाव में मोदी की आंधी तो थी, लेकिन राहुल गांधी या कांग्रेस के खिलाफ गुस्से जैसी कोई बात नहीं थी.

अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत विशुद्ध रूप से पांच साल तक सक्रियता, कड़ी मेहनत और रणनीति का नतीजा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में हारने के बावजूद स्मृति ईरानी अमेठी से ठीक वैसे ही जुड़ी रहीं, जैसे वे ही वहां की सांसद हों. 2014 से 2019 के बीच उन्होंने करीब 60 बार अमेठी का दौरा किया जब​कि अमेठी से सांसद चुने गए राहुल गांधी इस दौरान 20 बार भी वहां नहीं गए.

केंद्र में मंत्री होने बावजूद स्मृति ईरानी ने अमेठी को पूरा समय दिया. इस दौरान उन्होंने बीजेपी के स्थानीय नेताओं और संघ के स्वयंसेवकों को साथ लेकर संगठन को मजबूत किया. खासकर कांग्रेस के दलित और पिछड़ी जातियों के वोट बैंक में सेंध लगाई. साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने जोर—शोर से प्रचार किया. उनकी मेहनत नतीजों में साफतौर पर दिखाई दी. अमेठी की पांच में चार सीटों पर बीजेपी ने फतह हासिल की.

विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद स्मृति ईरानी ने अमेठी में राहुल गांधी के खिलाफ ‘गुमशुदा सांसद’ का नारा दिया. वे जब भी अमेठी गईं, उन्होंने लोगों को यह समझाया कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के यहां से जीतने के बावजूद क्षेत्र विकास की दौड़ में पिछड़ा हुआ है. स्मृति की अगुवाई में बीजेपी अमेठी में इतना सब करती रही और इस दौरान कांग्रेस हाथ पर हाथ रखकर बैठी रही. दरअसल, कांग्रेस को यह भरोसा था कि अमेठी गांधी परिवार का गढ़ है और स्मृति ईरानी यहां कितने भी हाथ-पैर मार लें, चुनाव में जीत राहुल गांधी की ही होगी.

अमेठी से स्मृति ईरानी की जीत में उनके चुनाव प्रबंधन का बड़ा योगदान है. एक ओर कांग्रेस ने यह सोचकर चुनाव लड़ा कि यह सीट तो पार्टी का गढ़ है तो दूसरी ओर स्मृति ईरानी ने एक-एक बूथ के हिसाब से रणनीति तैयार की. सूत्रों के अनुसार उन्होंने कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए कई डमी प्रत्याशी भी खड़े किए. आपको बता दें कि अमेठी में स्मृति ईरानी और राहुल गांधी के अलावा 25 दूसरे उम्मीदवार भी मैदान में थे. इन्हें मिले वोटों का जोड़ स्मृति की जीत के अंतर के आसपास ही है.

स्मृति ईरानी की मेहनत और रणनीति के अलावा राहुल गांधी की हार में उन नेताओं की भी कम भूमिका नहीं है, जिनके भरोसे कांग्रेस आलाकमान ने अमेठी को छोड़ रखा था. इनमें सबसे बड़ा नाम चंद्रकांत दुबे का है, जो अमेठी में राहुल गांधी के अघोषित नुमाइंदे थे. कांग्रेस के स्थानीय कार्यकर्ताओं का आरोप है कि दुबे ने उनकी बात राहुल गांधी तक नहीं पहुंचाई. अपनी उपेक्षा से आहत इन कार्यकर्ताओं ने चुनाव में अनमने ढंग से काम किया. नतीजतन राहुल गांधी न सिर्फ चुनाव हारे, बल्कि उन्हें किसी भी विधानसभा सीट पर बढ़त नहीं मिली. वे वोटों की गिनती में एक बार भी स्मृति ईरानी से आगे नहीं निकले.

कारण चाहे जो भी रहे हों, फिलहाल हकीकत यह है कि गांधी परिवार का गढ़ कही जाने वाली अमेठी सीट कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी है. गौरतलब है कि अमेठी के साथ कांग्रेस का सुनहरा अतीत जुड़ा रहा है. यह सिलसिला 1967 से शुरू हुआ था जब कांग्रेस के विद्याधर वाजपेयी ने अमेठी में पार्टी की जीत की नींव रखी थी. 1967 और 1971 के लोकसभा चुनाव में भी वाजपेयी यहां से चुनाव जीते. 1977 के चुनाव में जनता पार्टी के रविंद्र प्रताप सिंह ने संजय गांधी को हराकर इस सीट पर फ​तह हासिल की.

अमेठी की बागडोर असली रूप से गांधी परिवार के हाथ में 1980 के लोकसभा चुनाव में आई. संजय गांधी ने यहां से जीत दर्ज की, लेकिन उनकी विमान हादसे में मौत हो गई. 1981 में राजीव गांधी ने यहां से चुनाव लड़ा और 1991 तक यहां से सांसद रहे. बम धमाके में राजीव गांधी के निधन के बाद कांग्रेस ने यहां से सतीश शर्मा को मैदान में उतारा. वे 1991 से लेकर 1998 तक यहां से सांसद रहे. 1998 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के संजय सिन्हा ने सतीश शर्मा को शिकस्त दी.

1999 के लोकसभा चुनाव में सोनिया गांधी अमेठी से मैदान में उतरीं. उन्होंने बीजेपी के संजय सिन्हा को चुनाव में हराया और 2004 तक अमेठी की सांसद रहीं. 2004 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी यहां से मैदान में उतरे और लगातार तीन बार चुनाव जीते. 2019 के लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी हो हराकर अमेठी में गांधी परिवार के किले को ढहा दिया है.

इस बड़ी जीत के बाद स्मृति ईरानी का केंद्र की मोदी सरकार में कद बढ़ना तय माना जा रहा है. यह देखना रोचक होगा कि कद बढ़ने के बाद वे अमेठी पर कितना ध्यान देती हैं. यदि वे पिछले पांच साल की तरह ही यहां सक्रिय रहीं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भी इस सीट पर कांग्रेस के लिए वापसी करना मुश्किल हो जाएगा. वहीं अमेठी के एक बीजेपी कार्यकर्ता की हत्या के बाद जिस तरह से स्मृति वहां पहुंची और उनकी अर्थी को कंधा दिया, उसे देखकर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि गांधी परिवार की तरह वे भी इस सीट को अपना स्थायी ठिकाना बनाना चाहती हैं.

छात्र राजनीति से निकले गजेंद्र सिंह शेखावत ने कैसे दी जादूगर को शिकस्त

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अशोक गहलोत. राजस्थान की राजनीति का वो चेहरा, जिसके आगे कोई नहीं टिका. उन्होंने राजस्थान में सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बाद कई नेताओं को ठिकाने लगाया. लेकिन राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत को इस बार लोकसभा चुनाव में एक ऐसे प्रत्याशी ने मात दी जो पांच साल पहले ही सक्रिय राजनीति में आया है. वो नाम है गजेंद्र सिंह शेखावत. हम यहां अशोक गहलोत की हार इसलिए बता रहे हैं क्योंकि जोधपुर संसदीय सीट पर उनके पुत्र वैभव गहलोत सिर्फ शारीरिक रुप से चुनाव लड़ रहे थे. यहां साख पूरी तरह से अशोक गहलोत की दांव पर थी.

अशोक गहलोत पांच बार जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं. वहां उनका जनाधार काफी मजबूत माना जाता है. यही वजह है कि अशोक गहलोत ने अपने वैभव के राजनीतिक पर्दापण के लिए जोधपुर को चुना. हालांकि पहले ये चर्चा थी कि वैभव गहलोत टोंक-सवाई माधोपुर से चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने पिछले काफी समय से यहां तैयारी भी की लेकिन अंत में अशोक गहलोत की तरफ से वैभव को जोधपुर से ही चुनाव लड़ाने का फैसला हुआ. लेकिन जिसने गहलोत के चूलें हिलाई, वैभव को उनके गढ़ में मात दी, वो गजेंद्र शेखावत कौन है. हम उनके जीवन परिचय के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं…

साल था 1967. जैसलमेर के शंकर सिंह शेखावत और मोहन कंवर के घर पुत्र का जन्म हुआ. नाम रखा गया गजेंद्र सिंह. गजेंद्र सिंह की शुरुआती शिक्षा जैसलमेर में हुई. स्कूली शिक्षा पूर्ण करने के बाद गजेंद्र सिंह कॉलेज शिक्षा के लिए जोधपुर आए. जोधपुर आना उनके जीवन का टर्निंग पांइट साबित हुआ. यहां आने के बाद वो बीजेपी के छात्र संघटन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े. छात्रों की समस्याओं को लेकर वो लगातार जोधपुर में संघर्षरत रहे.

1992 के जोधपुर विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में गजेंद्र की लोकप्रियता को देखते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने उन्हें अध्यक्ष पद का उम्मीदवार घोषित किया. नतीजे सामने आए तो गजेंद्र सिंह शेखावत ने इतिहास रच दिया था. वो सबसे ज्यादा मतों से जीतने का रिकॉर्ड अपने नाम कर चुके थे. उनकी जीत इसलिए भी खास थी क्योंकि जब वे छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए, जोधपुर संसदीय सीट पर कांग्रेस का कब्जा था. अशोक गहलोत खुद सांसद थे. वो खुद छात्र राजनीति के दम पर मुख्य सियासत में आए थे. लेकिन तब किसी को यह इल्हाम नहीं था कि आने वाले समय में यह छात्र नेता जोधपुर की सियासत में एक नई इबारत लिखेगा.

गजेंद्र सिंह की जीत बड़ी थी तो जश्न भी बड़ा होने वाला था. उनके शपथ ग्रहण में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत पहुंचे थे. उस दौर में छात्रसंघ के कार्यालय उद्घाटन में मुख्यमंत्री का पहुंचना बहुत बड़ी बात थी. गजेंद्र ने अपने छात्रसंघ कार्यकाल में छात्रों के कल्याण के अनेक कार्य किए जिनमें अखिल भारतीय छात्र नेता सम्‍मेलन आयोजित किया जाना, विभिन्‍न सांस्‍कृतिक और खेलकूद के कार्यक्रम आयोजन किया जाना शामिल रहा.

इसके बाद वो 2001 में चोपासनी शिक्षा समिति की शिक्षा परिषद के सदस्‍य के रुप में सर्वाधिक मतों से निर्वाचित हुए. स्‍वदेशी जागरण मंच के तत्‍वाधान में 2000 से 2006 तक जोधपुर में स्‍वदेशी मेले का आयोजन किया गया. इन कार्यक्रमों की जिम्मेदारी गजेंद्र सिंह ने भी संभाली. इन कार्यक्रमों में लगभग 10 लाख लोग आए जिसके परिणामस्‍वरूप स्‍वदेशी उद्योग की चीजों की भारी बिक्री हुई. स्‍वदेशी मेले को काफी पसंद किया गया. इन कार्यक्रमों में गजेंद्र सिंह की पहचान जोधपुर के बाहर भी बनाई.

2012 में उन्हें बीजेपी प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बनाया गया. 2014 में बीजेपी जोधपुर लोकसभा क्षेत्र से मजबूत उम्मीदवार की तलाश में थी जो चंद्रेश कुमारी को मात दे सके. बीजेपी की खोज गजेंद्र सिंह पर आकर रुकी. गजेंद्र मोदी लहर पर सवार होकर संसद पहुंचे. उन्होंने कांग्रेस की चंद्रेश कुमारी कटोच को भारी अन्तर से हराया.

उन्हें शुरुआत में लोकसभा की प्रमुख कमेटियों का सदस्य बनाया गया. लेकिन 2017 का साल उनके लिए बड़ी खुशी लेकर आया. उन्हें नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में जगह मिली. गजेंद्र सिंह को कृषि और किसान कल्याण विभाग का राज्य मंत्री बनाया गया. इसके बाद वो अपने काम के दम पर पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के चहेते हो गए.

2018 में राजस्थान बीजेपी के अध्यक्ष अशोक परनामी के इस्तीफा देने के बाद अमित शाह ने गजेंद्र सिंह शेखावत को पार्टी का अध्यक्ष पद बनाने का मन बनाया. लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने उनके नाम का विरोध किया. अमित शाह जानते थे कि वो वसुंधरा राजे के खिलाफ जाकर गजेंद्र को अध्यक्ष तो बना देंगे लेकिन इससे पार्टी के बीच आंतरिक कलह हो सकती है. इसलिए फिर बाद में राज्यसभा सांसद मदनलाल सैनी को प्रदेश अध्यक्ष के लिए चुना गया.

2019 के चुनाव में गजेंद्र सिंह शेखावत ‘ज्वॉइंट किलर’ बनकर उभरे. उन्होंने अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत को भारी अंतर से हराया. यह हार वैभव गहलोत की नहीं अपितु अशोक गहलोत की है क्योंकि गहलोत इस समय प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हैं. इसके बावजूद उनके पुत्र को करारी हार का सामना करना पड़ा. गजेंद्र सिंह शेखावत की इस बार की जीत उनका कद पार्टी के बीच बढ़ाएगी, इसमें कोई दोराय नहीं है. इस बार के मोदी मंत्रिमंडल में या तो गजेंद्र कैबिनेट मंत्री बनेंगे या फिर राजस्थान बीजेपी की कमान उनके हाथ में होगी, यह निश्चित है.