राहुल कल से लेंगे तीन राज्यों की बैठक, इस्तीफे पर संशय बरकरार

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लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद राहुल गांधी CWC बैठक में अपने इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं. उसके बाद राहुल ने संसद के बाहर मीडिया से बातचीत करते हुए अध्यक्ष नहीं बनने की बात दोहराई. राहुल ने पार्टी को एक माह में नया अध्यक्ष चुनने के निर्देश दिए थे. इस्तीफे की पेशकश के बाद राहुल गांधी कल से फिर सक्रिय हो रहे हैं. राहुल अगले तीन दिन लगातार महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली के कांग्रेस नेताओं की बैठक लेंगे. इस सक्रियता के मायने तो यही निकल रहे हैं कि कहीं राहुल गांधी अपना मूड फिर तो नहीं बदल रहे. हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगा. लेकिन एक बार … Read more

राजनीतिक नियुक्तियों की आलाकमान तक पहुंची शिकायत, प्रियंका करेंगी निपटारा

राजस्थान में राजनीतिक नियुक्तियों और सरकार में संगठन के लोगों को तवज्जों नहीं देने का मसला कांग्रेस आलाकमान तक पहुंच गया है. बताया जा रहा है कि विदेश से लौटते ही पीसीसी चीफ और डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने आलाकमान से इसकी शिकायत की है. पायलट ने राहुल गांधी से कहा कि संगठन के लोगों को सरकार में दरकिनार किया जा रहा है.

पायलट ने यह पीड़ा भी जाहिर की है कि बिना संगठन की सलाह से नियुक्तियां की जा रही है. ऐसे में अब राजनीतिक नियुक्तियों का काम पूरी तरह से बताया जा रहा है कि प्रियंका गांधी ने अपने हाथ में ले लिया है. इससे पहले कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मंत्रीमंडल फेरबदल और नियुक्तियों के लिए फ्री हैंड देने की अटकलों की खबरें चली थी. इससे साफ है कि राजस्थान में आला नेताओं में अब भी विवाद बरकरार है.

विधानसभा सत्र के बाद होनी है राजनीतिक नियुक्तियां
सूत्रों के मुताबिक सीएम अशोक गहलोत ने राजनीतिक नियुक्तियां का काम लगभग निपटा लिया था. जिन नेताओं को नियुक्तियां देनी थी उनके नामों की लिस्ट भी वो दिल्ली में आलाकमान को दे आए हैं. लेकिन राहुल गांधी के इस्तीफा प्रकरण और विधानसभा सत्र के चलते नियुक्तियों का काम अगस्त तक अटक गया. बताया जा रहा है कि नियुक्तियों में सिफारिश अपने ही लोगों की गई है.

पीसीसी चीफ सचिन पायलट को जैसे ही इसकी भनक लगी, उन्होंने आलाकमान से अपनी आपत्ति दर्ज कराई. सामने आ रहा है कि पायलट संगठन के लोगों को मौका नहीं देने और सलाह नहीं लेने तक की शिकायत की है. अगर इस खबर में दम है तो फिर नियुक्तियों में अब और ज्यादा देरी हो सकती है.

प्रियंका गांधी ने लिया नियुक्तियों का काम अपने हाथ में
बताया जा रहा है कि नियुक्तियों को लेकर आ रही विवाद की खबरों के बीच प्रियंका गांधी ने कमान संभाल ली है. क्योंकि राहुल गांधी पार्टी की किसी गतिविधियों के काम को अपने हाथ में लेने से साफ मना कर चुके हैं. ऐसे में अब राजस्थान में तमाम राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर प्रियंका गांधी ही अंतिम फैसला लेगी.

इसकी भनक लगते ही राजस्थान के कांग्रेस नेताओं ने अब प्रियंका गांधी के यहां सिफारिश भी कराना शुरु कर दिया है. पायलट की आपत्ति में दम इसलिए भी लग रहा है क्योंकि हाल ही में कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को नियुक्तियों के लिए आलाकमान का फ्री हैंड मिलने की खबरें सामने आई थी.

जल्द मिल जाएगा कांग्रेस को नया अध्यक्ष, कभी भी हो सकती है CWC बैठक

कांग्रेस को जल्द ही अब नया अध्यक्ष मिल जाएगा. इसके लिए बहुत जल्द कांग्रेस की सबसे ताकतवर बॉडी CWC की बैठक होगी. सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में एक बार फिर राहुल गांधी को मनाने की कोशिशें होगी. अगर राहुल नहीं माने तो फिर नए अध्यक्ष के नाम पर बैठक में मुहर लग सकती है. अध्यक्ष की दौड़ में अशोक गहलोत और वेणुगोपाल के नाम सबसे आगे है. सुशील कुमार शिंदे के नाम पर भी विचार चल रहा है.

दरअसल राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव के परिणाम बाद 25 मई को हुई CWC बैठक में एक माह के भीतर गैर गांधी को अध्यक्ष चुनने का वक्त दिया था. यह मियाद 25 जून को खत्म होगी. लिहाजा 25 जून के बाद अब कभी भी यह अहम बैठक बुलाई जा सकती है. इस असमजंस के चलते पार्टी की काफी फजीहत हो रही है. क्योंकि नेता और कार्यकर्ता हताश हो गए हैं. विपक्ष के रुप में सड़क से लेकर सदन तक कांग्रेस की सक्रियता नहीं दिखने से भी गलत संदेश जा रहा है.

राहुल गांधी को मनाने की एक और कोशिश होगी
राहुल गांधी साफ कह चुके हैं कि वो अब अध्यक्ष पद पर नहीं रहेंगे. 25 मई को CWC बैठक में दिग्गज नेताओं के सामने राहुल ने अपने इस्तीफे की पेशकश की लेकिन उनका इस्तीफा खारिज कर दिया. उसके बाद कईं नेताओं ने राहुल गांधी को इस्तीफा वापस लेने की मनुहार की. हालांकि राहुल ने साफ कह दिया कि वो साधारण कार्यकर्ता की तरह अब पार्टी की मजबूती के लिए काम करेंगे. उसके बाद सोनिया और प्रियंका गांधी के निर्देश पर नए अध्यक्ष की तलाश का काम जारी है.

हालांकि अभी भी यह तस्वीर नहीं साफ हो रही है कि कोई एक नेता फुल टाइम अध्यक्ष बनेगा या फिर कार्यकारी या अंतरिम अध्यक्ष बनाए जाएंगे. लेकिन यह तय है कि राहुल अपना इस्तीफा वापस किसी भी सूरत में वापिस नहीं लेंगे. ऐसे में हार के बाद होने वाली दूसरी CWC बैठक बेहद अहम होगी. सभी को यह भी इंतजार रहेगा कि बैठक में नए अध्यक्ष नाम पर मुहर लग जाएगी या फिर नए अध्यक्ष चुनने का प्रस्ताव पारित होगा.

असमजंस के चलते पटरी से उतरी पार्टी
राहुल गांधी के इस्तीफे और अब तक नया अध्यक्ष नहीं चुनने से पार्टी की तमाम गतिविधियां पटरी से उतर गई है. नेता, पदाधिकारी और कार्यकर्ता सब हताश हो गए हैं. पार्टी में किसी तरह की हलचल नहीं दिख रही है. सब या तो छुट्टियों में घूमने चले गए हैं या फिर घर बैठे ‘देखो और इंतजार करो’ की स्थिति में है.

पार्टी के नेता एक दूसरे से फोन करके ‘कुछ हुआ क्या या कब होगा’ इस उत्सुकता को शांत करने में जुटे हुए हैं. करारी हार के बाद विपक्ष के रोल में भी पार्टी में धार नहीं दिख रही है जिससे आमजन में कांग्रेस को लेकर बेहद गलत मैसेज जा रहा है.

गहलोत, शिंदे, एंटनी, खड़गे और वेणुगोपाल रेस में आगे
नया अध्यक्ष चुनने में कांग्रेस के सामने क्या समस्या है, इस सवाल का किसी के पास जवाब नहीं है. जानकारों का कहना है कि कोई भी नेता सीताराम केसरी नहीं बनना चाहता. सबको पता है कि गैर गांधी परिवार का नेता महज नाम का अध्यक्ष होगा. इसलिए कोई भी दिग्गज़ नेता ‘यस मैम’ के रुप में भूमिका निभाने से बच रहा है.

एंटनी ने खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया. वेणुपोपाल संगठन महासचिव के तौर पर ही काम करने के इच्छुक दिख रहे हैं. अशोक गहलोत भी अध्यक्ष बनने को लेकर बिल्कुल भी रुचि नहीं दिखा रहे. अब किसी एक को तो अध्यक्ष बनाना बेहद जरुरी हो गया है. नहीं तो जितनी देरी करेंगे, हालात और विकट हो जाएंगे.

आखिर अशोक गहलोत के खिलाफ कौन करा रहा है मीडिया में खबरें प्लांट

पार्टी से ज्यादा गहलोत ने पुत्र मोह को तवज्जो दी. कांग्रेस पार्टी के हत्यारे तो इस बैठक में बैठे है और वैभव गहलोत की हार की जिम्मेदारी तो पायलट लें. ये वो मीडिया की पिछले दिनों सुर्खियां थी जिससे लोग गहलोत के सीएम पद से रवानगी के कयास लगाने लग गए थे. परिणाम के बाद लगातार गहलोत के खिलाफ ये खबरें मीडिया में आ रही है. ऐसे में गहलोत समर्थकों का दावा है कि उनके खिलाफ खबरें प्लांट करने की सुनियोजित साजिश को अंजाम दिया जा रहा है .

ताजा विवाद गहलोत को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने के रुप में सामने आया है. खबर आई कि अशोक गहलोत को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा रहा है और प्रदेश की कमान उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को सौंपी जाएगी. लेकिन जानकारों की माने तो इस खबर में जरा भी दम नहीं है. क्योंकि गहलोत और उनके समर्थकों को पूर्ण भरोसा है कि वो पांच साल सीएम रहेंगे और कहीं नहीं जाने वाले.

गहलोत ने हाल ही में बीकानेर हाऊस का दौरा करके औऱ सीएम हाऊस में शिफ्ट होकर साफ इसके संकेत भी दे चुके हैं. हालांकि यह जरुर है कि प्लांटेड न्यूज से गहलोत परेशान जरुर है. उन्हें यह भी पता है कि ये खबरे कौन प्लांट करा रहा है.

इससे पहले  गहलोत का एक निजी चैनल को दिए गए इंटरव्यू से भी जमकर बवाल मच गया था. गहलोत के चैनल पर बोले गए कुछ शब्दों को लेकर हैडलाइंस बना दी थी. वैभव गहलोत की हार की जिम्मेदारी वाले बयान के एक अंश को तवज्जो देते हुए खबरें प्लांट हो गई. जबकी इंटरव्यू में गहलोत हार की सामूहिक जिम्मेदारी होने का दावा साफ कर रहे थे.

ताज्जुब की बात है कि गहलोत के खिलाफ सूत्रो के हवाले से पहले एक मीडिया संस्थान खबर चलाता है. बाद में मीडिया संस्थान लपकते हुए उसमें तड़का लगाते हुए जान डालने की कोशिशें करते है. नाराज राहुल गांधी की अशोक गहलोत से नहीं मिलने की खबरें लगातार 20 दिन सुर्खियों में रही. परेशान गहलोत को जन्मदिन के दिन राहुल गांधी से मिलकर न चाहते हुए भी खबरों का खंडन करवाना पड़ा.

अशोक गहलोत संदेश और मैसेज की सियासत करते है. जैसी खबरें चल रही है, उनसे बेखबर गहलोत फिलहाल बजट तैयार करने और विधानसभा सत्र की तैयारी में जुटे हुए हैं. गहलोत को पता है कि खबरें पूरे पांच साल शायद ऐसी ही चलती रहेगी लेकिन उनकी सेहत औऱ सियासत पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला. लिहाजा गहलोत चिर-परिचित अपने अंदाज में मंद्ध मंंद्ध मुस्कराते हुए ऐसी खबरों को पढ रहे है.

 

राहुल गांधी जुटे इस जांच में कि राजस्थान में क्यों नहीं खुला कांग्रेस का खाता

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राहुल गांधी लगातार दूसरी दफा राजस्थान में कांग्रेस की एक भी सीट नहीं आने पर बेहद दुखी हैं. लिहाजा राहुल गांधी गहराई में जाकर राजस्थान में हुई करारी हार के असली कारण तलाशने में जुटे है. इसके तहत राहुल गांधी तीन तरीके से हार की पड़ताल कर रहे है. एक तो उन्होंने बूथवाइज मतदान प्रतिशत की आंकड़े मंगाए है. दूसरे प्रभारी पांडे के जरिए उम्मीदवारों से हार के कारण पूछ रहे है. तीसरा राहुल अपने स्तर पर गुपचुप फीडबैक जुटा रहे है. अब तक प्रभारी 20 सांसदों से लिखित में हार के कारण ले चुके है. 25 जून की राहुल गांधी के पास तीनों तरीके से रिपोर्ट मिल जाएगी. सीएम और … Read more

क्यों हरियाणा में BJP का ‘मिशन-75+’ हकीकत के करीब है?

लोकसभा चुनाव में बंपर जीत के बाद बीजेपी के हौंसले सातवें आसमान पर है. बीजेपी ने विधानसभा चुनाव को लेकर मिशन 75 प्लस का नारा दिया है. हरियाणा में विधानसभा की 90 सीटें हैं और बीजेपी ने 75 प्लस सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है. अब सवाल यह है कि बीजेपी का मिशन 75 प्लस सफल हो सकता है या नहीं.

ऐसा ही कुछ सवाल पत्रकारों ने मनोहरलाल खट्टर से भी पुछा था. सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था कि कहा हमने लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 10 सीटों पर जीत दर्ज की है. अगर आप लोकसभा चुनाव के नतीजों को विधानसभा-वार देखें तो हमने विधानसभा की 89 सीटों पर जीत दर्ज की है. लोकसभा चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि यह लक्ष्य हमारे लिए आसान है. हम इसे आसानी से प्राप्त कर लेंगे.

हरियाणा में यह लक्ष्य जनता पार्टी ने 1977 में हासिल किया था. जनता पार्टी ने आपातकाल के बाद हुए विधानसभा चुनाव में प्रदेश की 75 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. बीजेपी विधानसभा चुनाव को लेकर उत्साहित नजर आ रही है. इस आत्मविशावस की कई वजह हैं.

मोदी लहर का भरोसाः
बीजेपी को लोकसभा चुनाव की तरह विधानसभा चुनाव में भी मोदी का जादू मतदाताओं पर चलने का भरोसा है. बीजेपी को भरोसा है कि जिस तरह लोकसभा चुनाव में मोदी के नाम पर जातिगत मुद्दे गौण हुए थे, ठीक उसी प्रकार विधानसभा चुनाव में भी विपक्षी पार्टियों का जाति कार्ड नहीं चलेगा.

जाट-नॉन जाटः
जाट आंदोलन के बाद प्रदेश का माहौल बिल्कुल अलग हो चुका है. जहां जाट मतदाता बीजेपी से पुरी तरह नाराज नजर आ रहे है. वहीं नॉन जाट मतदाता बीजेपी के पक्ष में मजबूती से खड़े दिखाई दे रहे है. लोकसभा चुनाव में मिली बंपर जीत में इसका सबसे बड़ा योगदान रहा है.

बिखरी कांग्रेसः
प्रदेश कांग्रेस वर्तमान में गहरी गुटबाजी में उलझी हुई है. लोकसभा चुनाव में पार्टी के नेता पार्टी को जिताने के लिए नहीं, दूसरे धड़े के नेताओं को हराने में मेहनत करते दिख रहे हैं. हरियाणा कांग्रेस के नेताओं का समय केवल एक-दूसरे को कमजोर करने में ही गुजरता है न कि पार्टी को मजबूत करने में. हरियाणा में कांग्रेस की कमान अशोक तंवर के हाथ में है जो खुद सिरसा से बुरी तरह से चुनाव हार बैठे हैं. पार्टी के विधायक लंबे समय से तंवर को हटाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन अभी तक विधायकों की मांग को पार्टी आलाकमान अनसुना कर रहा है.

इनेलो की टूटः
प्रदेश की सियासत में अहम हिस्सेदारी रखने वाली ओमप्रकाश चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) वर्तमान में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. टूट के बाद पार्टी के हालात बहुत बुरे हैं. हाल में हुए लोकसभा चुनाव में उसके सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई है.

बगैर अध्यक्ष बीजेपी का मुकाबला कैसी करेगी कांग्रेस

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लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद राहुल गांधी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा कांग्रेस कार्य समिति को सौंप दिया है. हालांकि समिति ने उनका इस्तीफा मजूंर नहीं किया और उनसे अध्यक्ष पद पर बने रहने का आग्रह किया था. लेकिन राहुल ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का मन बना लिया है और वो इसपर कतई पुनर्विचार करने के मूड में नहीं हैं.

संसद सत्र में पत्रकारों से बातचीत के दौरान भी राहुल यह साफ कर चुके हैं कि वो अब अध्यक्ष पद पर नहीं रहेंगे और न ही अध्यक्ष चुनने की प्रकिया में शामिल होंगे. वो पार्टी के लिए एक साधारण कार्यकर्ता की तरह कार्य करते रहेंगे. अब कांग्रेस के लिए कितनी बड़ी विडंबना यह है कि राहुल को इस्तीफा दिए हुए करीब एक महीना होने जा रहा है. लेकिन पार्टी एक महीने में भी नए अध्यक्ष की तलाश नहीं कर पायी है.

हालांकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी और केसी वेणुगोपाल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव दिया गया था जिसको दोनों नेताओं ने निजी कारण बताते हुए ठुकरा दिया. अब सवाल यह है कि जब राहुल ने इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया है तो पार्टी अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद के लिए नेता के चुनाव में देरी क्यों कर रही है. जबकि बीजेपी ने अमित शाह के गृहमंत्री बनने के बाद बिना देरी किए जगत प्रकाश नड्डा को पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष की बागड़ौर संभाला दी.

वहीं कांग्रेस लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद भी संगठन में बदलाव के लिए अभी इंतजार ही कर रही है. वरिष्ठ नेता तो अब भी राहुल को अध्यक्ष पद पर रहने के लिए मना रहे हैं. बता दें कि हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं और कांग्रेस इन सभी राज्यों में सत्ता से बाहर है.

हरियाणा में पार्टी के विधायक लगातार प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को हटाने की मांग कर रहे हैं. वहीं झारखंड और महाराष्ट्र के कांग्रेस अध्यक्ष लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद अपना इस्तीफा आलाकमान को भेज चुके है. इसके बाद भी कांग्रेसी नेतृत्व बिल्कुल सजग नजर नहीं आ रहा है.

अब पार्टी इन राज्यों को लेकर कुछ फैसला तो तब ले जब कांग्रेस राष्ट्रीय अध्यक्ष पद की ऊहापोह से बाहर निकले. हाल में राष्ट्रीय अध्यक्ष को लेकर खबर आई कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जा सकता है लेकिन बाद में यह खबर भी केवल कयास ही साबित हुई.

एक ओर बीजेपी के पास मोर्चा संभालने के लिए दो अध्यक्ष हो गए हैं, वहीं कांग्रेस के पास एक भी नहीं है. ऐसे में सवाल ये हैं कि इतनी लचर तैयारी के साथ कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव में बीजेपी का मुकाबला कैसे करेगी?

राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान फिर मोबाइल चलाते दिखे राहुल गांधी

संसद में आज राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अभिभाषण के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार के अगले पांच साल का विज़न रखा. लेकिन राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान राहुल गांधी मोबाइल में उलझे हुए दिखाई दिए. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के एक घंटे के अभिभाषण में राहुल करीब 40 मिनट मोबाइल चलाते रहे. वहीं 20 मिनट सोनिया गांधी के साथ गुफ्तगु करते नजर आए.

राष्ट्रपति कोविंद के पूरे अभिभाषण के दौरान राहुल गांधी ने एक बार भी मेज नहीं थपथपाई. सिर्फ आखिर में एक सेकेंड के लिए मेज को छुआ. वहीं उनके बगल में बैठी उनकी मां सोनिया गांधी ने 6 बार मेज थपथपाई. सोनिया ने 17वीं लोकसभा में पहले से अधिक महिला सांसदों के चुने जाने और मसूद अजहर के अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित होने पर मेज थपथपाई. लेकिन इस दौरान भी राहुल गांधी मोबाइल में ही उंगली करते रहे.

सदन में सबसे ज्यादा मेज तब थपथपाई गई जब राष्ट्रपति रामानाथ कोविंद ने उरी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक का जिक्र किया. इस दौरान सोनिया ने भी काफी देर तक मेज थपथपाई पर राहुल गांधी नीचे देखते हुए शांत बैठे रहे. कई बार सोनिया ने उनकी तरफ देखकर उनका ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की लेकिन राहुल जस के तस बैठे रहे.

हालांकि इस पर कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने राहुल गांधी का बचाव करते हुए इन सभी बातों और आरोपों को गलत बेबुनियाद बताया है. उन्होंने कहा कि ये सभी गलत आरोप हैं और उन्होंने पूरा भाषण बड़े ही ध्यान से सुना है. उन्होंने कहा कि अभिभाषण में कुछ हिंदी के शब्द ऐसे थे, जिन्हें राहुल गांधी समझ नहीं पा रहे थे. इसलिए वह लगातार उन शब्दों के बारे में पूछ रहे थे.

इससे पूर्व राहुल गांधी पुलवामा हमले में शहीद हुए जवानों के श्रद्धांजलि देने के दौरान भी मोबाइल का इस्तेमाल करते दिखाई दिए थे. इसपर विपक्ष ने राहुल गांधी की आलोचना की थी. इस मौके पर तत्कालीन बीजेपी सांसद परेश रावल ने कहा था कि राहुल शहीदों को सही से श्रद्धांजलि नहीं दे सकते है. वो ऐसे गमनीन माहौल में भी मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं.