राजस्थान में कानून-व्यवस्था की हालत, गहलोत सरकार फेल

राजस्थान (Rajasthan) में क्या हो रहा है? पुलिस निकम्मी बन गई है या अपराधियों को वारदात करने की छूट दे दी गई है. जयपुर में एक अखबार वितरक की हत्या के मामले में पुलिस को जो सांप्रदायिक पक्ष दिखा, वह चौंकाने वाला रहा. पुलिस ने हत्यारे के खिलाफ सख्ती करने की बजाय उससे सहानुभूति दिखाई, जिससे लोग भड़क गए. पुलिस ने उलटे प्रदर्शऩ करने वालों पर लाठियां भांजी. रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों को खदेड़ा. फोटो खींच रहे फोटोग्राफर को पीट दिया. पुलिस की ज्यादती सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. यह विवाद थमा भी नहीं था कि शुक्रवार सुबह अलवर जिले के बहरोड़ पुलिस थाने (Behror Police Station) से कुछ लोग अंधाधुंध गोलियां चलाकर, पुलिस को धमकाकर एक दुर्दांत अपराधी को छुड़ा ले गए.

जयपुर पुलिस (Jaipur Police) का रवैया अजीबो गरीब रहा. एक व्यक्ति ने अखबार वितरक को कुल्हाड़ी से काट दिया और पुलिस ने उसे अस्पताल में भर्ती करवा कर रहा कि वह मानसिक रूप से विक्षिप्त है. क्या मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति को हत्या करने का हक मिला हुआ है? मुख्यमंत्री गहलोत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक करते हैं, जिसकी खबरें अखबारों में छपती रहती हैं. इससे यह लगता है कि मुख्यमंत्री को प्रदेश की कानून-व्यवस्था को लेकर बड़ी फिक्र है. गहलोत पुलिस अफसरों को सीख भी देते होंगे कि पुलिस को क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए? क्या उनकी सीख यह है कि दुर्दांत अपराधी को थाने से भागने देना चाहिए, या अखबार वितरक को कुल्हाड़ी से काट देने वाले के खिलाफ तत्काल प्रभाव से हत्या का मामला दर्ज नहीं करना चाहिए?

यह भी पढ़ें: RCA तो सिर्फ बहाना, कहीं ओर ही है निशाना

राजस्थान में कानून-व्यवस्था की स्थिति विकट है. मुख्यमंत्री गहलोत राज्य के गृहमंत्री भी हैं और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर बुरी तरह फेल साबित हो रहे हैं. जयपुर की घटना पुलिस की आम आदमी के खिलाफ बर्बरता का उदाहरण पेश करती है, जबकि बहरोड़ की घटना पुलिस के नाकारापन की मिसाल है. किसी की हत्या होने पर उसके परिजन जब न्याय की मांग करते हैं तो पुलिस लाठी चलाती है, उनके साथ अमानवीय व्यवहार करती है और जब एक थाने से कुछ लोग अपराधी को छुड़ाने पहुंचते हैं तो उसके सामने समर्पण की मुद्रा में आ जाती है. क्या लोग पुलिस पर भरोसा कर सकते हैं?

बहरोड़ (Behror) का घटनाक्रम इस प्रकार है. शुक्रवार तड़के करीब 3.20 बजे पुलिस ने एक गाड़ी की तलाशी ली तो उसमें सवार तीन लोग भागने लगे. एक पुलिस की पकड़ में आ गया. वह हरियाणा का कुख्यात अपराधी विक्रम गुर्जर उर्फ पपला था. उसने पुलिस को अपना गलत नाम बताया. खुद को प्रॉपर्टी कारोबारी साहिल के रूप में पेश किया. पुलिस ने सुबह पांच बजे बाद उसे थाने लाकर हवालात में बंद कर दिया. शुक्रवार सुबह करीब 8.20 बजे थाने के सामने तीन गाड़ियां रुकी उनमें करीब 15 लोग सवार थे. सात-आठ थाने में घुसे और गोलियां चलानी शुरू कर दी.

अचानक हुए इस हमले से थाने में मौजूद तमाम पुलिस कर्मी बचने की कोशिश करते दिखे. कुछ यहां-वहां छिपे, कुछ दीवार लांघकर भागे. थाना अधिकारी सुगन सिंह अपने कक्ष में बैठे थे. हमला होने पर वह पिछले दरवाजे से निकल गए. कक्ष के दरवाजे पर काली फिल्म लगी होने से वह हमलावरों को नहीं दिखे. हमलावर चिल्ला रहे थे, जो भी दिखे, गोली से उड़ा दो. कुछ ही देर में वे पपला को हवालात से छुड़ा ले गए. पपला को छुड़ा कर ले जाने में उन्हें सात मिनट से ज्यादा समय नहीं लगा. एके-47 से फायरिंग करते हुए अपराधी को थाने से छुड़ा ले जाने का यह राजस्थान में पहला मामला है.

पपलू हरियाणा के महेन्द्रगढ़ जिले के खेतली गांव का रहने वाला है. महेन्द्रगढ़ पुलिस उसे 8 सितंबर, 2017 को अदालत में पेशी के लिए ले जा रही थी, तब उसके साथी उसे छुड़ा ले गए थे. तब भी पपला के साथियों ने पुलिस पर फायरिंग की थी और चार पुलिस कर्मियों को गोली लगी थी. उसके बाद से वह फरार थी. हरियाणा के मोस्ट वांटेड अपराधियों की सूची में उसका नाम शामिल है. उस पर पांच लाख रुपए का इनाम है. वह अनायास ही राजस्थान पुलिस की पकड़ में आ गया था, लेकिन गलत नाम बताने से पुलिस गफलत में रही. पुलिस ने उसके पास से 31.90 लाख रुपए नकद बरामद किए थे.

क्या पुलिस अधिकारी लालच में आ गए थे? खबर है कि पुलिस अधिकारी ज्यादा रकम ऐंठने के लिए सौदेबाजी में लगे रहे. पपला ने छोड़ने के बदले 35 लाख रुपए देने की बात कही थी. इस पर पुलिस अधिकारियों ने पपला को साथियों से संपर्क करने के लिए अपना मोबाइल फोन दे दिया. पपला को अपने साथियों से संपर्क करने का मौका मिल गया. उसके बाद जो हुआ, वह सबके सामने है. पुलिस ने रोजनामचे में साहिल उस्मान के नाम से रिपोर्ट लिखी थी.

यह भी पढ़ें: क्या राजस्थान में गहलोत दिखाएंगे पान मसाला बैन करने का पराक्रम?

पपला को छुड़ाकर भागे लोगों ने अपनी कार रास्ते में छोड़कर एक पिकअप गाड़ी लूटी. उसके बाद उसे भी छोड़कर एक और अन्य गाड़ी पर कब्जा किया, फिर हरियाणा सीमा पर उस गाड़ी को भी वहीं छेड़कर खेतों से पैदल भाग निकले. हमले के बाद हतप्रभ पुलिस ने पीछा किया, लेकिन कोई भी पकड़ में नहीं आया. पुलिस को दोष नहीं दिया जा सकता. पुलिस भले ही अपराधियों को पकड़ न सके, लेकिन पीछा तो करती ही है. बच्चों में चोर-पुलिस का खेल ऐसे ही लोकप्रिय नहीं हुआ है.

बहरहाल डीजीपी भूपेन्द्र सिंह (DGP Bhupendra Singh) बहरोड पहुंचे हुए हैं. भारी पुलिस बल भेजा गया है. घटना की एसआईटी से जांच की घोषणा हो चुकी है. सांप निकल गया, लकीर पीटने का काम हो रहा है. मुख्यमंत्री गहलोत की तरफ से इस घटना पर प्रतिक्रिया नहीं आई है. यह राजस्थान में कानून-व्यवस्था की तस्वीर है. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) ने बहरोड़ की घटना पर गहलोत सरकार को कठघरे में खड़ा किया है. उन्होंने ट्वीट किया है कि इस घटना से प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लग गया है. विधानसभा में भाजपा विधायक दल के उपनेता राजेन्द्र राठौड़ (Rajendra Rathore) ने कहा कि प्रदेश में अराजकता की स्थिति है. राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीणा (Kirodi Lal Meena) और विधायक कालीचरण सराफ (Kalicharan Saraf) ने मुख्यमंत्री गहलोत से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की मांग की है.

बेरी सीट पर रघुवीर कादयान की सल्तनत को चुनौती दे पाएंगे मनोहर लाल खट्टर?

हरियाणा (Haryana) में विधानसभा चुनाव (Assembly Election-2019) की घोषणा चुनाव आयोग की तरफ से जल्द की जा सकती है. संभावना जताई जा रही है कि चुनाव आयोग अक्टूबर और नवंबर के महीने में हरियाणा में विधानसभा चुनाव करवा सकता है. पॉलिटॉक्स न्यूज ने हरियाणा विधानसभा चुनाव को लेकर एक विशेष कार्यक्रम शुरु किया है. जिसमें हम आपको रोज एक नए विधानसभा क्षेत्र की ग्राउंड रिर्पोट (Ground Report) से अवगत करवाते है. आज हम आपको हरियाणा की बेरी विधानसभा सीट (Beri Assembly Constituency) के जमीनी हालात से रुबरु करवाएंगे.

बेरी विधानसभा क्षेत्र झज्जर जिले के अन्तर्गत आता है, लेकिन बेरी विधानसभा क्षेत्र में लोकसभा क्षेत्र रोहतक लगता है. विधानसभा क्षेत्र पर पिछले काफी समय से कांग्रेस का एक-क्षत्र राज है. कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेता और भूपेन्द्र हुड्डा के खास सिपहसालार चौधरी रघुवीर सिंह कादयान (Choudhary Raghuveer Singh Kadayan) पिछले चार चुनाव से यहां लगातार अपनी जीत का सिलसिला बरकरार रखने में कामयाब रहे हैं.

राजनीतिक इतिहासः
हरियाणा गठन के साथ ही बेरी विधानसभा भी अस्तित्व में आई. बेरी विधानसभा सीट से सर्वप्रथम 1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के प्रताप सिंह दौलुता विधायक चुने गए थे. 1968 के चुनाव में पार्टी ने प्रताप सिंह की जगह रण सिंह को प्रत्याशी बनाया और रण सिंह ने प्रताप सिंह को मात दी. साल 1972 में प्रताप सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में जीत हासिल की. 1977, 80 के विधानसभा चुनाव में यहां से जनता पार्टी के उम्मीदवार ने जीत हासिल की.

साल 1987 में लोकदल उम्मीदवार के रुप में रघुवीर सिंह कादयान ने जीत हासिल की, लेकिन कादयान जीत के इस सिलसिले को बरकरार नहीं रख पाये और 1991 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी ओमप्रकाश से हार बैठे. 1996 के चुनाव में बाजी वीरेन्द्र ने मारी. साल 2000 को विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने रघुवीर कादयान को उम्मीदवार बनाया. बेरी की जनता ने इस बार रघुवीर को निराश नहीं किया और रघुवीर बड़े अंतर से चुनाव जीतने में कामयाब हुए.

साल 2000 में शुरु हुआ रघुवीर कादयान की जीत का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. साल 2014 के चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस विरोधी लहर होने के बावजूद भी रघुवीर कादयान चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे. उन्होंने इंडियन नेशलन लोकदल के चतर सिंह को लगभग 4500 मतों से मात दी थी.

सामाजिक समीकरणः
बेरी विधानसभा सीट रोहतक लोकसभा क्षेत्र के अन्तर्गत आता है. बेरी विधानसभा सीट में जाट समाज बहुतायात में है. जाट वोटर्स के कारण ही रघुवीर लगातार चुनाव जीतने में कामयाब हो रहे हैं. 2019 के विधानसभा चुनाव में कादयान को इनेलो के कमजोर होने का भी फायदा मिलेगा. इस चुनाव में रघुवीर कादयान को जाट वोट एकमुश्त मिलने का अनुमान है, जैसा लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र से जाट समाज का समर्थन दीपेन्द्र हुड्डा को एकतरफा मिला था.

2019 विधानसभा चुनावः
विधानसभा चुनाव को लेकर तमाम पार्टियों ने प्रत्याशी चयन की प्रकिया शुरु कर दी है. पार्टियों के वरिष्ठ नेता इलाकों में अपने मजबूत उम्मीदवारों की तलाश में लग गए है. कांग्रेस के सामने प्रत्याशी चयन में कोई समस्या नहीं है. तंवर के हटने के बाद पार्टी पर पुरा नियंत्रण भूपेन्द्र हुड्डा का होगा इसलिए टिकट एक बार फिर रघुवीर कादयान को मिलना तय है. रघुवीर कादयान, हुड्डा के करीबी है, तो इसलिए भी उनके टिकट पर कोई संशय नहीं है.

बीजेपी की तरफ से बेरी विधानसभा सीट को लेकर दावेदारों की सूची काफी लंबी है. इन दावेदारों में विक्रम सिंह कादयान, प्रदीप अहलावत, शिव कुमार रंगीला प्रमुख दावेदार है. जजपा की तरफ से उपेन्द्र कादयान का टिकट लगभग पक्का है. इनेलो इस बार प्रमोद राठी पर दांव लगाने का मन बना चुकी हैं.

जीत की संभावनाः
रघुवीर कादयान के लिए इस बार का चुनाव पिछले चुनावों की तरह आसान नहीं होने वाला है. हमारे इस तर्क के पीछे सबसे बड़ा कारण प्रदेश कांग्रेस के अंदर मची भारी गुटबाजी है. कादयान हुड्डा गुट के नेता हैं तो दुसरे गुट के नेता उन्हें चुनाव में कमजोर करने के पुरे प्रयास करेगें. जिसका नुकसान सीधा-सीधा रघुवीर सिंह कादयान को चुनाव में होगा. 2019 में बीजेपी और कांग्रेस के मध्य रोचक मुकाबला देखने को मिलेगा यह तय है.

मैं मध्य प्रदेश का सुपर सीएम नहीं हूं: दिग्विजय सिंह

Digvijay Singh on Mohan bhagwat

वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) ने इन आरोपों का जोरदार शब्दों में खंडन किया है कि वह मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh ) में सुपर सीएम के रूप में काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि कमलनाथ (Kamalnath) अपने आप में मजबूत नेता हैं और उन्हें किसी सुपर सीएम की जरूरत नहीं है. दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh) दो बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उन पर आरोप कि वह गैर जरूरी तरीके से सरकार के काम में रुकावटें पैदा करते रहते हैं. दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh)  ने कहा कि मध्य प्रदेश में कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत से कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका मिला है. वे सरकार … Read more

तीन राज्यों में चुनाव जीतने के लिए भाजपा की मजबूत तैयारी

देश में तीन राज्यों हरियाणा (Haryana), झारखंड (Jharkhand) और महाराष्ट्र (Maharastra) में विधानसभा चुनाव (Assembly Election 2019) होने वाले हैं. भाजपा की तैयारियां जोरों पर है जबकि विपक्ष लड़ाई से पहले ही हारने की स्थिति में दिख रहा है. चुनाव आयोग ने इन राज्यों में चुनाव का कार्यक्रम अभी घोषित नहीं किया है. लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा ने अपने चुनाव अभियान का पहला चरण करीब-करीब पूरा कर लिया है. विपक्षी पार्टियां अभी सीटों के तालमेल में ही उलझी हुई हैं और किस नेता के नाम पर चुनाव लड़ा जाएगा, यह तय नहीं है.

हरियाणा में भाजपा के चुनाव अभियान के तहत बड़े नेताओं के दौरे शुरू हो चुके हैं. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दो रैलियां कर चुके हैं. शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रोहतक में विजय संकल्प रैली कर रहे हैं. इस तरह भाजपा का चुनाव अभियान पूरी गति से आगे बढ़ रहा है, वहीं प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस स्थानीय नेताओं के आपसी मतभेदों को दूर करने में जुटी हुई है. हाल की कांग्रेस ने नेताओं के आपसी विवाद थामने के लिए कुमारी शैलजा को हरियाणा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और भूपेन्द्र सिंह हुड्डा (Bhupendra Singh Hooda) को विधायक दल नेता बना दिया है. चुनाव अभियान समिति के प्रमुख भी हुड्डा ही रहेंगे.

इसके बावजूद यह पूरी तरह तय नहीं है कि कांग्रेस के भीतरी मतभेद, विवाद आसानी से हल हो पाएंगे. हरियाणा में सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस कभी भी किसी भी मुद्दे पर भाजपा सरकार को न तो घेर पाई है और न ही चुनौती दे पाई है. एक स्थानीय कांग्रेस नेता का कहना है कि इतने सालों से चल रहे झगड़े एकदम से खत्म होना मुश्किल है.

हरियाणा में राजनीतिक रूप से मजबूत चौटाला परिवार (Chautala Family) में भी फूट पड़ी हुई है. इसको देखते हुए विधानसभा चुनाव में इनेलो अपनी मौजूदगी दिखा पाएगी, इसमें संदेह है. अजय चौटाला (Ajay Chautala) ने अपनी अलग जननायक जनता पार्टी (JJP) बना ली है. उनकी पार्टी का बसपा से तालमेल हो चुका है. उनका दावा है कि इस बार हरियाणा में चारकोणी मुकाबला होगा. भाजपा, कांग्रेस, इनेलो और जेपीपी के बीच टक्कर होगी.

महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस अपनी महाजनादेश यात्रा पूरी कर चुके हैं. इस दौरान उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ राज्य के हर क्षेत्र के लोगों से संपर्क स्थापित करने की कोशिश की. दूसरी तरफ महाराष्ट्र का मुख्य विपक्षी गठबंधन कांग्रेस और राकांपा आपसी झगड़ों में उलझा हुआ है. दोनों ही पार्टियों के प्रमुख नेताओं में पार्टी छोड़ने का रुझान बढ़ता जा रहा है. पिछले लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद दोनों ही पार्टियों में उत्साह की कमी नजर आ रही है.

लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बदल दिया है, लेकिन पार्टी नेताओं के अंदरूनी मतभेद खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं. दोनों ही पार्टियां प्रकाश अंबेडकर की पार्टी वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीएस) से तालमेल करना चाहती हैं. लोकसभा चुनाव में वीबीएस के कारण दोनों पार्टियां कम से कम आठ सीटों पर नुकसान उठा चुकी हैं. कांग्रेस के सामने वीबीएस ने शर्त रखी है कि वह राकांपा को गठबंधन से अलग करे. यह शर्त मानना कांग्रेस के लिए मुश्किल है.

महाराष्ट्र में एक हद तक राज ठाकरे (Raj Thackeray) की पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MANS) का भी असर है. लोकसभा चुनाव में राज ठाकरे ने मोदी सरकार के खिलाफ प्रचार किया था. विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर मनसे के उम्मीदवार भी चुनाव लड़ेंगे. कांग्रेस और राकांपा, दोनों पार्टियां अभी राज ठाकरे से गठबंधन के बारे में कोई फैसला नहीं ले पाई है.

झारखंड की राजधानी रांची में 12 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी की रैली का कार्यक्रम तय हो चुका है. विपक्षी खेमे को अब तक कांग्रेस के साथ बैठक का इंतजार है. झारखंड मुक्ति मोर्चा (Jharkhand Mukti Morcha) के नेता हेमंत सोरेन अपने स्तर पर 26 अगस्त को साहेबगंज से राज्य में बदलाव यात्रा शुरू कर चुके हैं. वह पूरे राज्य का दौरा करने के बाद 19 सितंबर को रांची में बड़ी रैली को संबोधित करेंगे. कांग्रेस अभी तक अपने अंदरूनी झगड़ों में उलझी हुई है. पार्टी को एकजुट करने के लिए कांग्रेस ने झारखंड प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार को हटाकर उनकी जगह रामेश्वर उरांव (Rameshwar Oraon) को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है. लेकिन इसका उलटा असर हो रहा है. कांग्रेस के कई विधायक भाजपा में जाने की योजना बना रहे हैं.

इस तरह तीनों राज्यों में साल के अंत तक होने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी अभी से काफी मजबूत स्थिति में नजर आ रही है. एक तरफ तीनों राज्यों में जहां कांग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टियों के नेता बीजेपी में शामिल हो रहे हैं और जो बचे हुए हैं वो आपसी खींचतान के चलते एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी लोकसभा में मिले भारी बहुमत और उसके बाद के ताबड़तोड़ लिए गए जम्मू कश्मीर पुनर्गठन (Jammu Kashmir Reorganization) जैसे कई बिलों को लागू करवाने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज है.

राहुल गांधी अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य कैसे बने हुए हैं?

Poli Talks News

राहुल गांधी (Rahul Gandhi) कांग्रेस अध्यक्ष (Congress President) पद से इस्तीफा देने के बाद अपने आप कांग्रेस कार्यसमिति सदस्य कैसे बन गए, इसको लेकर सवाल उठने लगे हैं. राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष बनी थीं. सोनिया की अध्यक्षता वाली कांग्रेस कार्यसमिति ने राहुल गांधी को सदस्य नियुक्त करने की औपचारिक घोषणा नहीं की है, फिर भी पार्टी की वेबसाइट पर कार्यकारिणी के 24 सदस्यों की सूची अपडेट करते हुए मनमोहन सिंह (Manmohan Singh) के बाद दूसरे नंबर पर राहुल गांधी (Rahul Gandhi) का नाम दर्ज कर दिया गया है. कांग्रेस के … Read more

अशोक तंवर ने कहा था हुड्डा नहीं बन पाएंगे अध्यक्ष, कोई ओर ही बनेगा

कुमारी शैलजा की नियुक्ति के बाद, साल 2017 में अशोक तंवर की तरफ से कही वो बात याद आती है जिसमें तंवर ने कहा था कि मेरे हटने के बाद हुड्डा नहीं ओर कोई पार्टी की कमान संभालेगा. आज शैलजा की नियुक्ति के बाद तंवर को वो बयान बिल्कुल सही साबित हुआ हैं.

प्रदेश में अपराध का बोलबाला, अपराधियों के हौसले हैं बुलन्द

गहलोत सरकार में अपराध का बोलबाला बढ़ता जा रहा है. वहीं अपराधियों के हौसले बुलन्द हैं. जयपुर के खो-नागोरियन में न्यूजपेपर हॉकर की हत्या और अलवर में बढ़ता अपराध का ग्राफ इस बात को साबित करते हैं.

किरोड़ी मीणा ने नैतिकता के आधार पर मांगा गहलोत से इस्तीफा

BJP के राज्यसभा सांसद किरोड़ीलाल मीणा (Kirodi Lal Meena) ने प्रदेश में बढ़ती अपराधिक घटनाओं पर राजस्थान (Rajasthan) के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (CM Ashok Gehlot) से नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने की मांग की है.

आखिर पूर्व सीएम भूपेन्द्र सिंह हुड्डा क्यों नहीं बन पाये प्रदेश अध्यक्ष?

हरियाणा कांग्रेस (Haryana Congress) में आलाकमान ने बड़ा बदलाव करते हुए अशोक तंवर (Ashok Tanwar) की जगह कुमारी शैलजा (Kumari Shailja) को प्रदेश अध्यक्ष (State President) बनाया है. शैलजा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद अब यह सवाल हर किसी के मन में हैं कि 13 वर्तमान विधायक और लगभग 70 के करीब पूर्व विधायक पूर्व मुख्यमंत्री (Ex-Chief Minister) भूपेंद्र सिंह हुड्डा (Bhupendra Singh Hudda) के पक्ष में होने के बावजूद सोनिया गांधी ने हुड्डा को प्रदेश कांग्रेस की कमान क्यों नहीं सौंपी?

हुड्डा की जगह शैलजा को कमान सौंपने के पीछे कांग्रेस आलाकमान का मत यह रहा कि हुड्डा के प्रदेश अध्यक्ष बनने से हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी कम होने के बजाय ज्यादा बढ़ती. अशोक तंवर के साथ-साथ, कैथल विधायक रणदीप सूरजेवाला, किरण चौधरी, पार्टी के दिग्गज नेता कैप्टन अजय यादव सभी खुलेआम भूपेन्द्र हुड्डा की मुखालफत करते नजर आते. इन सब के खुले विरोध से बचने के लिए कांग्रेस आलाकमान ने बीच का रास्ता चुना.

पूर्व सीएम हुड्डा के प्रदेश अध्यक्ष बनने में सबसे बड़ा रोड़ा हाल में हरियाणा विधानसभा चुनाव को लेकर हुआ जननायक जनता पार्टी (जजपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का गठबंधन रहा. अशोक तंवर दलित समाज से आते हैं. तंवर प्रदेश के साथ-साथ देश की राजनीति में भी कांग्रेस के बड़े दलित चेहरे के तौर पर देखे जाते हैं. अगर कांग्रेस उनके स्थान पर भूपेन्द्र हुड्डा को अध्यक्ष बनाती तो प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी इसे दलित समाज के अपमान के रुप में चुनावी प्रचार में पेश करती. जिसका नुकसान कांग्रेस को आगामी विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता था.

जजपा-बसपा के गठबंधन ने पहले ही कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा रखी हैं. प्रदेश प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने परिवर्तन रैली के बाद सोनिया गांधी से हुई मुलाकात में यह बात साफ कही थी कि तंवर को हटाने के बाद अगर हुड्डा को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी जाती हैं तो आने वाले विधानसभा चुनाव में अपना मूल वोटबैंक (दलित समाज) हमारे से दूर जा सकता है. गुलाम नबी आजाद की दलित वोट छिटकने की संभावना के बाद सोनिया गांधी ने शैलजा कुमारी को अध्यक्ष बनाने का फैसला किया. शैलजा को अध्यक्ष बनाकर पार्टी आलाकमान ने एक-तीर से दो निशाने साधे. पहला तो अशोक तंवर के नाम से उठ रहे विद्रोह को शांत करते हुए तंवर को अध्यक्ष पद से हटा दिया.

दूसरा, हरियाणा कांग्रेस के दिग्गज नेता भूपेन्द्र हुड्डा को विधायक दल का नेता बनाकर उनके बगावती तेवर को कुछ ही समय के लिए ही सही लेकिन शांत कर दिया गया. हुड्डा गुट पिछले दो साल से अशोक तंवर को प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाने की मांग कर रहा था, लेकिन 90 प्रतिशत बड़े नेता अपना पाले में होने के बावजूद भी हुड्डा तंवर को हटवा नहीं पा रहे थे. हुड्डा को तंवर को हटवाने के लिए आखिरकार अपने बगावती तेवर दिखाने ही पड़े. रोहतक में पार्टी से इत्तर अलग रैली करनी पड़ी. पार्टी आलाकमान को तंवर को नहीं हटाने पर नई पार्टी बनाने की धमकी दी, जिसके बाद आखिरकार हुड्डा लंबे संघर्ष के बाद तंवर की अध्यक्ष पद से छुट्टी कराने में कामयाब हुए.

भूपेन्द्र हुड्डा और उनके समर्थित (13) विधायकों ने पिछले काफी समय से अशोक तंवर के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था. भूपेन्द्र हुड्डा ने हरियाणा की राजनीतिक राजधानी रोहतक में परिवर्तन रैली कर कांग्रेस आलाकमान को तंवर को हटाने का आखिरी अल्टीमेटम दिया था, जिसके बाद कांग्रेस आलाकमान ने पार्टी में होने वाली किसी प्रकार की टूट से बचने के लिए अशोक तंवर को हटाकर उनके स्थान पर कुमारी शैलजा को अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी हैं.

गौरतलब है कि बुधवार को कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हरियाणा में अशोक तंवर की पार्टी अध्यक्ष पद से छुट्टी करते हुए पूर्व केन्द्रीय मंत्री शैलजा कुमारी को पार्टी का अध्यक्ष बनाया जिसकी घोषणा हरियाणा प्रभारी गुलाम नबी आजाद ने की. वहीं कांग्रेस पार्टी से बगावत का झंडा बुलंद कर रहे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा चुनाव कमेटी के प्रधान के साथ-साथ किरण चौधरी की जगह कांग्रेस विधायक दल के नेता की जिम्मेदारी दी गई है.

कुमारी शैलजा की नियुक्ति के बाद, साल 2017 में अशोक तंवर की तरफ से कही वो बात याद आती है जिसमें तंवर ने कहा था कि मेरे हटने के बाद हुड्डा नहीं ओर कोई पार्टी की कमान संभालेगा. आज शैलजा की नियुक्ति के बाद तंवर को वो बयान बिल्कुल सही साबित हुआ हैं.

असम के बाद अन्य राज्यों में भी उठ रही NRC की मांग, बन सकता है बड़ा चुनावी मुद्दा

असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (NRC) की फाइनल लिस्ट जारी होने के बाद कई अन्य राज्यों में भी NRC की मांग तेज आवाज में उठने लगी हैं. अधिकांश लोगों का यही कहना है कि अन्य राज्यों में भी बड़ी संख्या में बांग्लादेशी सहित अन्य देशों के घुसपैठिए रहते हैं जिनकी पहचान नहीं हो पा रही है. इससे देश में आतंकवाद को बल मिल रहा है. ऐसे में इन राज्यों में भी NRC लागू करने की मांग हो रही है. इन राज्यों में राजधानी दिल्ली, पंजाब, बिहार, पं.बंगाल और अरूणाचल प्रदेश जैसे राज्य शामिल हैं. अब इस मुद्दे को राजनीति का रंग देने की कोशिश की जा रही है. इस … Read more