वित्त मंत्री अरूण जेटली की PC, राहुल गांधी रहे निशाना

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लोकसभा चुनाव के समर में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है. इस बयानबाजी के दंगल में दोनों राजनीतिक दलों के अलावा अन्य पार्टियों के शीर्ष नेता भी कूद पड़े हैं. इसी क्रम में बीजेपी के वरिष्ठ नेता व वित्त मंत्री अरूण जेटली ने पार्टी कार्यालय में प्रेसवार्ता कर राहुल गांधी पर बड़ा हमला बोला है. नागरिकता मामले के बाद अब बीजेपी ने राहुल को बैकॉप्स कंपनी में उनकी हिस्सेदारी और मालिकाना हक को लेकर घेरने की कोशिश की है. बीजेपी मुख्यालय दिल्ली में प्रेसवार्ता के दौरान वित्त मंत्री अरूण जेटली ने राहुल गांधी पर जमकर वार किए. इस दौरान जेटली ने राहुल को सही मुद्दे पर चुप रहने वाला बताया और … Read more

क्या नागौर में जाट-राजपूत एकता की नई मिसाल देखने को मिल सकती है?

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देशभर में हो रहे लोकसभा चुनाव का पांचवा चरण 6 मई को संपन्न होगा. राजस्थान में भी इस बार 2 चरणों में चुनाव प्रक्रिया संपन्न हो रही है. पहले चरण के चुनाव 29 अप्रैल हो चुके हैं, जिसमें प्रदेश की 13 लोकसभा सीटों पर वोटिंग हुई. बाकी बची 12 सीटों पर 6 मई को वोट डाले जाएंगे. इन 12 सीटों में नागौर सीट पर सबसे दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है.

नागौर में जहां एक और मिर्धा परिवार की राजनीतिक दांव पर है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश की राजनीति में अपने बूते अलग तरह की धाक रखने वाले हनुमान बेनीवाल के राजनीतिक कौशल की भी परीक्षा है. आपको बता दें कि कांग्रेस ने नाथूराम मिर्धा की पोती ज्योति मिर्धा को नागौर के चुनावी रण में उतारा है जबकि बीजेपी ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी यानी आरएलपी के साथ गठबंधन करते हुए हनुमान बेनीवाल को मौका दिया है.

दोनों उम्मीदवार धुंआधार प्रचार में लगे हुए हैं. हनुमान बेनीवाल खुद की छवि और नरेंद्र मोदी का नाम लेकर वोट मांग रहे हैं तो ज्योति मिर्धा सांसद रहते हुए करवाए विकास कार्यों को गिनाकर वोट मांग रही हैं. प्रचार के इस प्रपंच के बावजूद चुनाव जाति की जाजम पर पसरता हुआ दिखाई दे रहा है. सबकी निगाह जाट और राजपूत समाज पर टिकी हुई हैं. राजनीति के जानकार यह मानकर चल रहे हैं कि इन दोनों जातियों का रुख ही इस चुनाव में हार-जीत तय करेगा.

दोनों उम्मीदवार जाट और राजपूतों को अपने-अपने पाले में लाने की मशक्कत कर रहे हैं. इस बीच यह सवाल भी नागौर की जनता के मन में उठ रहा है कि क्या एक बार फिर जाट और राजपूत एक मंच पर आकर राजनीति का नया अध्याय लिखेंगे. आपको बता दें कि प्रदेश की राजनीति में दिग्गज नेता रहे नाथूराम मिर्धा और कल्याण सिंह कालवी पहले भी दोनों जातियों को एक पाले में ला चुके हैं.

आमतौर पर जाट और राजपूत जातियों के बीच हमेशा तनाव की स्थिति रहती है, लेकिन राजनीति में कभी कोई स्थाई शत्रु और मित्र नहीं होता. क्या इस चुनाव में भी जाट और राजपूत एक जाजम पर बैठने वाले हैं? बता दें कि नागौर सीट पर लगभग 2 लाख राजपूत मतदाता हैं. वैसे तो राजपूतों को बीजेपी का वोट बैंक माना जाता है, लेकिन इस बार बीजेपी ने आरएलपी से गठबंधन कर हनुमान बेनीवाल को मैदान में उतारा है, जिनकी छवि कट्टर जाट नेता की रही है.

बेनीवाल के मैदान में आने के बाद से नागौर के राजपूत बीजेपी से छिटकते हुए दिखाई दे रहे हैं. कई राजपूत संगठन हनुमान बेनीवाल का विरोध करने के लिए मैदान में उतर चुके हैं. करणी सेना के लोकेंद्र सिंह कालवी भी बेनीवाल के खिलाफ वोट देने की अपील कर चुके हैं. दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत राजपूत समाज को बेनीवाल के पक्ष में करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं.

गौरतलब है कि गजेंद्र सिंह शेखावत जोधपुर से बीजेपी के उम्मीदवार हैं. उनकी सीट पर पहले चरण में मतदान हो चुका है. हनुमान बेनीवाल ने उनके समर्थन में दो सभाओं को संबोधित करते हुए जाट समाज से गजेंद्र सिंह शेखावत के पक्ष में मतदान करने की अपील की थी. अब गजेंद्र सिंह शेखावत ने बेनीवाल का सियासी कर्ज उतारने के लिए नागौर में डेरा डाल रखा है.

गजेंद्र सिंह शेखावत हर भाषण में यह संदेश दे रहे हैं कि नागौर लोकसभा सीट से हनुमान बेनीवाल नहीं गजेंद्र सिंह शेखावत चुनाव लड़ रहा है. शेखावत भावुक अपील के जरिए एक बार फिर राजपूत समाज को भाजपा के पक्ष में खड़ा करने का प्रयास कर रहे हैं. यदि उनकी अपील ने असर किया तो नागौर में जाट-राजपूत एकता की नई मिसाल देखने को मिल सकती है. बहरहाल, सबको 6 मई को वोटिंग और 23 मई को काउटिंग का इंतजार है.

राहुल का मोदी पर हमला, कहा- पीएम सेना को निजी संपति समझते हैं

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेसवार्ता में कहा कि आधे चुनाव खत्म हो चुके हैं, जिसमें बीजेपी की छुट्टी हो गई है. मोदी सरकार के सारी बातों को नकारते हुए देश की जनता किसानों की समस्याओं, बेरोजगारी व बढ़े भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस के समर्थन में मतदान कर रही है. राहुल गांधी ने बेरोजगारी के मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए कहा कि इस समय देश के सामने सबसे बड़ी समस्या कोई है तो वो बेरोजगारी है. उन्होंने कहा कि पीएम मोदी की नीतियों ने देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर दिया है. देश मोदीजी से 2014 में उनके द्वारा किए गए दो … Read more

आज पूरे दिन राहुल-प्रियंका रहेंगे अमेठी में, रोड़ शो के साथ कई कार्यक्रम

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लोकसभा चुनाव का रथ धीरे-धीरे सातवें व अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है. 6 मई को होने वाले पांचवें चरण के मतदान का चुनाव प्रचार आज शाम 5 बजे बंद हो जाएगा. इसके चलते कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी आज पूरे दिन अमेठी में चुनाव प्रचार करेंगे. इस दौरान पार्टी महासचिव व उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा भी उनके साथ रहेंगी. प्रियंका गांधी को पार्टी द्वारा पूर्वी यूपी का प्रभारी भी नियुक्त किया गया है. जिसके बाद से वे यहां काफी सक्रिय नजर आ रही हैं. अपने पूरे दिन के कार्यक्रम के अनुसार राहुल गांधी रोड़ शो के अलावा जनसंपर्क व चुनावी सभाओं को संबोधित भी करेंगे. राहुल … Read more

क्या यूपी में बीजेपी के वोट काटने के लिए चुनाव लड़ रही है कांग्रेस?

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पिछले दिनों कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के बयान पर बड़ा बवाल हुआ. बयान ये था कि हमने यूपी में जो उम्मीदवार खड़े किए हैं, वो इस रणनीति पर किए है – या तो वे जीतने में सक्षम होंगे या बीजेपी का नुकसान करेंगे. प्रियंका ने यह भी कहा कि सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के उम्मीदवारों को कांग्रेस से नुकसान नहीं होगा. प्रियंका के इस बयान के बाद बवाल तो मचना ही था. आनन-फानन में बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने इस मामले में प्रेस कांफ्रेस करते हुए कांग्रेस को वोट-कटवा पार्टी करार दे दिया. उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस पार्टी यूपी में जीतने के लिए नहीं बल्कि बीजेपी के वोट काटने के … Read more

पीएम मोदी ने झूठे वादे कर दिया धोखा, नहीं दी दो करोड़ नौकरी: राहुल गांधी

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प्रदेश में 6 मई को होने जा रहे दूसरे चरण के मतदान के लिए प्रचार-प्रसार जोरों पर है. पार्टी के शीर्ष नेता हर हाल में अपने उम्मीदवारों को जिताने की जद्दोजहद में लगे हैं. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी भरतपुर संसदीय सीट से पार्टी प्रत्याशी अभिजीत जाटव के समर्धन में चुनावी सभा को संबोधित करने पहुंचे. राहुल की रैली का उत्साह सभा स्थल पर उपस्थित लोगों में साफ देखा जा सकता था. इस अवसर पर उनके साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी उपस्थित रहे. चुनावी सभा में पीएम मोदी और बीजेपी उनके निशाने पर रही. राहुल गांधी ने चुनावी सभा को संबोधित करते हुए पीएम मोदी पर … Read more

राजस्थान में गरजे पीएम मोदी, सर्जिकल स्ट्राइक पर कांग्रेस को घेरा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को प्रदेश में तीन चुनावी सभाओं को संबोधित करने पहुंचे. पीएम मोदी ने करौली-धौलपुर संसदीय सीट से मनोज राजौरिया, सीकर से स्वामी सुमेधानंद सरस्वती व बीकानेर से अर्जुन राम मेघवाल के समर्थन में चुनावी सभाओं को संबोधित किया. इस दौरान पीएम ने विपक्ष को आड़े हाथों लिया. साथ ही कांग्रेस सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दे पर उनके निशाने पर रही. अपने संबोधन में कटाक्ष करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि कभी सर्जिकल स्ट्राइक का मजाक बनाने वाले अब कहते हैं ‘मी टू, मी टू’. पीएम मोदी ने चुनावी रैली में संबोधन के दौरान केंद्र सरकार के काम और उपलब्धियां गिनाईं. साथ ही कहा कि देश को … Read more

संजय गांधी के ‘गिल्ली बिल्ली’ कैसे बने राजनीति के जादूगर?

बात 70 के दशक के शुरूआत की है. यह वह दौर था जब कांग्रेस में संजय गांधी की तूती बोला करती थी. हर राज्य में उनके चहेते नेता थे. इनमें से कोई सत्ता के शिखर पर था कोई संगठन का सूत्रधार. राजस्थान में जिन गिने-चुने नेताओं पर संजय गांधी का वरदहस्त था उनमें जर्नादन सिंह गहलोत का नाम सबसे ऊपर था. साल 1972 में विधानसभा चुनाव के बाद जर्नादन सिंह उनकी आंखों का तारा बने, जिसमें उन्होंने जयपुर के भैरों सिंह शेखावत सरीखे दिग्गज नेता को पटकनी दी.

उस दौरान कांग्रेस के भीतर यह चर्चा जोर-शोर से होती थी कि देर-सवेर राजस्थान में सत्ता की कमान जर्नादन सिंह गहलोत के हाथों में होगी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. कुछ ही महीनों में जर्नादन सिंह गहलोत संजय गांधी की नजरों से उतर गए और उनकी जगह दूसरे गहलोत ने ले ली. ये दूसरे गहलोत और कोई नहीं बल्कि अशोक गहलोत थे.

हालांकि संजय गांधी और अशोक गहलोत का परिचय पुराना था. इसका जरिया बने उनके पिता लक्ष्मण सिंह, जो जाने-माने जादूगर थे. ऐसा कहा जाता है कि लक्ष्मण सिंह गांधी परिवार के करीबी थे. वे जब भी दिल्ली जाते गांधी परिवार से जरूर मिलकर आते थे. इस दौरान कई बार अशोक गहलोत भी उनके साथ गए. परिचय हुआ और मेलजोल बढ़ा. कांग्रेस के कई पुराने नेता बताते हैं कि उस समय संजय गांधी और उनकी पूरी मंडली अशोक गहलोत को ‘गिल्ली बिल्ली’ नाम से पुकारती थी.

बताया जाता है कि लक्ष्मण सिंह जब भी गांधी परिवार से मिलने जाते थे, राजीव गांधी और संजय गांधी उनसे जादू दिखाने का आग्रह करते थे. यह भी कहा जाता है बाद में अशोक गहलोत भी गांधी परिवार को जादू के करतब दिखाने लगे. जादू देखने-दिखाने के इस सिलसिले के इतर संजय गांधी ने अशोक गहलोत में छिपे नेता को उस समय पहचाना जब इंदिरा गांधी ने उनके बारे में जिक्र किया.

दरअसल, पढ़ाई के दौरान अशोक गहलोत अक्सर पूर्वी बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में लोगों की मदद करने के लिए जाते थे. संयोग से जिस दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इन शिविरों का जायजा लेने पहुंचीं, उस दिन गहलोत वहीं थे. इस दौरान इंदिरा को गहलोत के कामकाज की जानकारी मिली, जिसे देखकर बहुत प्रभावित हुईं. उस समय गहलोत की उम्र महज 20 साल थी.

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बताया जाता है कि गहलोत में राजनीति की संभावनाओं को देखते हुए इंदिरा गांधी ने उन्हें इंदौर में होने वाले अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन में बुलाया. यहां संजय गांधी से उनकी लंबी चर्चा हुई. संजय ने ही उन्हें राजनीति में आने का न्यौता दिया. गहलोत के हामी भरने पर उन्हें नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन यानी एनएसयूआई की राजस्थान इकाई का पहला अध्यक्ष बनाया गया.

उनकी इस नियुक्ति से एक दिलचस्प किस्सा जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि आलाकमान में गहलोत को पद देने की इतनी जल्दी थी कि उनका नियुक्ति पत्र लेकर एक शख्स मोटरसाइकिल से दिल्ली से जयपुर आया. इस नियुक्ति के बाद अशोक गहलोत ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. पहले संजय गांधी और बाद में इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद यह कयास लगाए जाने लगे कि ‘गॉडफादर’ खोने के बाद गहलोत कुछ नहीं कर पाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

साल 1977 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अशोक गहलोत को मैदान में उतारा, लेकिन वे जीत नहीं पाए. इसके बाद साल 1980 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें जोधपुर सीट से मौका दिया, जिसमें उनकी जीत हुई. केंद्र में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी, जिसमें गहलोत को राज्यमंत्री बनाया गया. साल 1984 में हुए चुनाव में भी गहलोत जोधपुर से सांसद बने और केंद्र सरकार में राज्य मंत्री के रूप में भूमिका निभाई.

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साल 1984 में इंदिरा गांधी के मृत्यु और राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कांग्रेस के भीतर अशोक गहलोत की पकड़ और मजबूत हुई. एक समय ऐसा आया जब गहलोत राजीव गांधी के ‘आंख-कान’ बन गए. बड़े ही नहीं, सामान्य राजनीतिक निर्णय लेने से पहले भी राजीव गांधी का गहलोत से मशविरा करना आम बात थी. इसी दौरान राजीव गांधी ने तमाम दिग्गज नेताओं को दरकिनार कर साल 1985 में अशोक गहलोत को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया.

1991 में राजीव गांधी की मृत्यु के बाद इन अटकलों ने फिर से जोर पकड़ा कि अब अशोक गहलोत राजनीति में आगे नहीं बढ़ पाएंगे, लेकिन पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनकी धाक बरकरार रही. राव सरकार में गहलोत मंत्री रहे. साल 1995 में गहलोत को फिर से प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपी गई. इस दौरान संगठन के मुखिया के तौर पर गहलोत का नया रूप देखने को मिला.

1998 का विधानसभा चुनाव गहलोत के नेतृत्व में ही हुआ, लेकिन यह तय माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री परसराम मदेरणा ही बनेंगे. इस चुनाव में कांग्रेस को बंपर बहुमत मिला. विधायक दल की बैठक हुई, जिसमें कांग्रेस की परंपरा के मुताबिक मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार आलाकमान को सौंपा गया. सबके मन में यह सवाल था कि कांग्रेस नेतृत्व मदेरणा को दरकिनार कर गहलोत के नाम पर कैसे मुहर लगाएगा, लेकिन आखिर में उनके नाम की घोषणा हुई. कहा जाता है कि सोनिया गांधी के दखल से अशोक गहलोत मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे.

Ashok Gehlot CM

1999 में सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद गहलोत और मजबूत हो गए. हालांकि साल 2003 में हुए विधानसभा चुनाव में गहलोत के मुख्यमंत्री रहते हुए कांग्रेस की करारी हार हुई. इसके बाद गहलोत को एआईसीसी का महासचिव बनाया गया. साल 2008 में विधानसभा चुनाव हुए तो डॉ. सीपी जोशी प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे. उस समय सियासी गलियारों में यह चर्चा थी कि यदि कांग्रेस सत्ता में आई तो मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए उनके और गहलोत के बीच कड़ा संघर्ष होगा.

इस चुनाव के नतीजों में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत तो नहीं मिला, लेकिन सरकार बनाने लायक सीटें मिल गई. कमाल की बात यह रही कि मुख्यमंत्री पद के लिए उनके प्रतिद्वंद्वी रहे डॉ. सीपी जोशी महज एक वोट से चुनाव हार गए और गहलोत फिर से मुख्यमंत्री बने. साल 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में गहलोत के कंधों पर पार्टी को फिर से सत्ता में लाने की जिम्मेदारी थी, लेकिन कांग्रेस सबसे बुरा प्रदर्शन करते हुए महज 21 सीटों पर सिमट गई.

चुनाव के कुछ समय बाद ही जब प्रदेश कांग्रेस की कमान सचिन पायलट को सौंपी गई तो यह कयास लगाए जाने लगे कि अब अशोक गहलोत के दिन लद चुके हैं, युवा और राहुल गांधी के करीबी पायलट ही अब राजस्थान में कांग्रेस का भविष्य है. यह वह दौर था जब राहुल गांधी ने पार्टी का कामकाज संभालना शुरू कर दिया था. कांग्रेस नेताओं के बीच यह सर्वसम्मत राय थी कि गहलोत की राहुल से उतनी अच्छी केमिस्ट्री नहीं थी, जिनती सोनिया गांधी के साथ थी.

विधानसभा चुनाव में हार के बाद अशोक गहलोत फिर से एआईसीसी महासचिव के ओहदे के साथ राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हो गए. साल 2017 में जब उन्हें गुजरात का प्रभारी बनाया गया तो सबको यह लगा कि गहलोत को बर्फ में लगा दिया गया है, लेकिन उन्होंने प्रदेश कांग्रेस की कील-कांटों को दुरूस्त कर पार्टी को बीजेपी के मुकाबले खड़ा कर दिया. आखिर में अपना गढ़ बचाने के लिए मोदी-शाह को चुनावी रण में जमकर पसीना बहाना पड़ा.

गुजरात में कांग्रेस की सरकार तो नहीं बनी, लेकिन अशोक गहलोत की रणनीति की चर्चा पूरे देश में हुई. चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने गहलोत के कामकाज को नजदीक से देखा और वे उनके इतने मुरीद हुए कि उन्हें संगठन महासचिव के अहम ओहदा सौंप दिया. यह जिम्मेदारी मिलते ही गहलोत साये की तरह राहुल गांधी के साथ नजर आने लगे.

बावजूद इसके राजस्थान में यह संशय बरकरार रहा कि साल 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुमत मिलेगा तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बनेंगे या सचिन पायलट. कांग्रेस के पक्ष में चुनाव के नतीजे आने के बाद इस पर जमकर खींचतान हुई. कई दिन तक चले संस्पेंस के बाद आखिकार अशोक गहलोत के सिर पर सहरा सजा. गहलोत तीसरी बार राजस्थान के मुख्यमंत्री बने और सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा.

चर्चाओं के मुताबिक सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी के दखल के बाद अशोक गहलोत की ताजपोशी हुई. यानी गहलोत अपने 40 साल के राजनीतिक जीवन में समय के साथ-साथ आगे बढ़ते गए और सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए. इस सफर के दौरान जिनके हाथ में भी कांग्रेस की कमान रही, वे उनके करीबी बन गए.

सियासत में इतनी जादूगरी के बावजूद अशोक गहलोत को यह मलाल है कि वे राजस्थान में पांच साल बाद सत्ता की अदला-बदली के सिलसिले को नहीं तोड़ पाए. आपको बता दें कि गहलोत तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे हैं. उनके मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा के दो चुनाव हुए हैं, दोनों में कांग्रेस को पराजय का सामना करना पड़ा.

अशोक गहलोत साल 1998 में जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो कांग्रेस 153 सीटें जीतकर सत्ता में आई थी, लेकिन पांच साल बाद हुए चुनाव में पार्टी महज 56 सीटों पर ही सिमट गई. गहलोत साल 2008 में जब दूसरी बार सूबे के सीएम बने तब कांग्रेस को 96 सीटें मिलीं, लेकिन पांच साल बाद हुए चुनाव में पार्टी महज 21 सीटों पर ही रह गई.

अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री रहते हुए विधानसभा के दो चुनावों में कांग्रेस को मिली करारी हार को विरोधी खूब हवा देते हैं. वे यह कहते हैं कि गहलोत को संगठन का काम करने में तो महारत हासिल है, लेकिन सरकार चलाते समय वे अफसरशाही के शिकंजे में फंस जाते हैं. इस तोहमत से बचने का अशोक गहलोत को एक मौका अब साल 2023 में मिलेगा. यह देखना रोचक होगा कि गहलोत पुराने ट्रेंड को तोड़ पाते हैं या नहीं.

राजस्थान: जयपुर में कलह में डूबी ज्योति तो मोदी लहर पर सवार बोहरा

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जयपुर शहर लोकसभा सीट पर जीत का सूखा समाप्त करने के लिए कांग्रेस ने 48 साल बाद महिला उम्मीदवार को उतारने का मास्टर स्ट्रोक खेला है. कांग्रेस ने जयपुर की पूर्व महापौर ज्योति खंडेलवाल को तमाम अटकलों पर विराम लगाते हुए चौंकाने वाला टिकट थमा दिया लेकिन ज्योति का विवादों से हमेशा से गहरा नाता रहा है. लिहाजा कांग्रेस का कोई भी नेता ज्योति के टिकट मिलने से दिल से खुश नहीं है. ज्योति ने अपने तेवरों से कांग्रेस में दुश्मनों की लंबी फौज खड़ी रखी है जो दिखावे के लिए तो ज्योति के साथ मंच पर खड़े नजर आते हैं लेकिन बंद कमरों में अपनी पुरानी अदावत का हिसाब निपटाने में जुटे हुए हैं. उधर बीजेपी ने पिछले चुनाव में रिकॉर्ड तोड़ जीत दर्ज करने वाले रामचरण बोहरा पर फिर दांव खेला है. बोहरा अपने चेहरे को पीछे रखकर नरेंद्र मोदी को आगे करते हुए वोट मांग रहे हैं. कांग्रेस अभी भी गुटबाजी में उलझी हुई है जबकि बीजेपी मोदी लहर पर सवार होकर मुकाबले में बहुत आगे चल रही है.

जयपुर शहर सीट पर बीजेपी-कांग्रेस में सीधा मुकाबला है. चुनाव के पहले दिन से ही यहां एयर स्ट्राइक और माेदी फैक्टर हावी है. कांग्रेस के पास इससे निपटने के लिए कोई हथियार नहीं है. यहां तक की माहाैल बनाने के लिए न ताे कोई बड़ी रैली की गई और न ही प्रचार तेज हुआ. हालांकि प्रदेश सीएम अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम सचिन पायलट सभाएं जरुर कर रहे हैं. माैजूदा विधायकाें का भी ज्योति को पूरा सहयाेग नहीं मिल पा रहा जिसका पूरा फायदा बीजेपी और रामचरण बोहरा काे हाे रहा है. विधायक अमीन कागजी और महेश जोशी की ज्योति से जंग जगजाहिर है लेकिन पार्टी के आदेश पर दोनों ज्योति के साथ खड़े हैं. हालांकि कागजी पर ज्योति को अब भी भरोसा है लेकिन अर्चना शर्मा के साथ ज्योति के रिश्ते अच्छे नहीं हैं. इन तीनों नेताओं की मेहनत के बिना ज्योति की नैंया पार लगना कतई संभव नहीं होगा.

पांच विधानसभा में बीजेपी भारी, तीन में कांग्रेस
वैसे जयपुर शहर हमेशा से बीजेपी का मजबूत गढ़ रहा है लेकिन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस इस गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब हो गई. कांग्रेस बगरु, आदर्शनगर, हवामहल, सिविल लाइंस और किशनपोल विधानसभा सीटें जीतने में कामयाब रही. वहीं बीजेपी के खाते में सांगानेर, विद्याधर नगर और मालवीय नगर सीटें आई. इसके बावजूद बगरु और सिविल लाइंस में शहरी वोटर्स होने से बीजेपी मजबूत दिखाई दे रही है. इनके अलावा, सांगानेर, मालवीय नगर और विद्याधर नगर में बढ़त मिलते दिख रही है. वहीं कांग्रेस किशनपोल और हवामहल में मजबूत दिखाई दे रही है. आदर्शनगर से भी बढ़त मिलने के आसार हैं. विधानसभा चुनाव में कम सीटें आने के बावजूद बीजेपी मोदी लहर, राष्ट्रवाद और शहरी वोटर्स के फैक्टर के चलते कांग्रेस से आगे दिख रही है.

जीत का क्या रह सकता है फार्मूला
रामचरण बोहरा के ब्राह्मण होने के चलते बीजेपी के पास ब्राह्मण सबसे बड़ा वाेट बैंक है. दूसरी जातियाें का वाेट भी माेदी के नाम पर बीजेपी के खाते में जाएगा. कांग्रेस वैश्य-मुस्लिम समाज के सहारे मैदान में है. मुस्लिम समाज का कांग्रेस के पक्ष में जाते ही ध्रुवीकरण हाे सकता है. धरातल पर चौंकाने वाली बात यह भी आ रही है कि मोदी लहर के चलते वैश्य समाज का वाेट भी बीजेपी की ओर जा सकता है. ऐसे में कांग्रेस को इससे सीधा नुकसान हाेगा वहीं कुछ वोटर्स खंडेलवाल के महापौर रहने के दौरान उनकी कार्यशैली से खफा भी नजर आ रहे है.

पिछले दो चुनाव के नतीजे
पिछला चुनाव बीजेपी ने मोदी लहर में पांच लाख 39 हजार वोटों से जीता था. पूरे देश में बोहरा की यह टॉप 5 में पांचवीं बड़ी जीत थी. बोहरा ने मौजूदा सांसद कांग्रेस के महेश जोशी को पटकनी दी थी. 2009 में महेश जोशी ने बीजेपी के घनश्याम तिवाड़ी को करीबी मुकाबले में करीब 16 हजार वोटों से शिकस्त दी थी. विधानसभा चुनाव में भले ही कांग्रेस आठ में से पांच सीटें जीतने में कामयाब रही हो लेकिन उसे बीजेपी से आठ हजार वोट कम मिले थे. कांग्रेस को कुल 6 लाख 34 हजार 24 वोट मिले जबकि बीजेपी को 6 लाख 42 हजार 486 वोट हासिल हुए थे. ऐसे में बीजेपी की यह बढ़त यकीनन मोदी लहर में बरकरार रहेगी.

भितरघात का खतरा
बीजेपी प्रत्याशी रामचरण बोहरा और कांग्रेस की ज्योति खंडेलवाल के लिए सबसे अधिक चुनौती भितरघात से निपटने की है. दोनों ही पार्टियों के मौजूदा विधायकों और हारे हुए प्रत्याशियों के बीच अच्छा तालमेल नहीं है. ऐसे में प्रत्याशियों की व्यक्तिगत छवि का सबसे अधिक असर पड़ सकता है.

कांग्रेस जयपुर में जीती है सिर्फ तीन चुनाव
जयपुर शहर लोकसभा सीट कांग्रेस की जीत के लिए बेहद चुनौतीभरी है. अब तक हुए चुनावों में कांग्रेस ने केवल तीन बार यहां से जीत का स्वाद चखा है. 1952 में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस के दौलतराम जीते थे. राजीव गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर के चलते पंडित नवलकिशोर शर्मा ने यह सीट कांग्रेस को दिला दी. तीसरी और अंतिम बार महेश जोशी यहां से जीतकर दिल्ली पहुंचे थे. यह आंकड़ा साफ बयां करता है कि यह सीट शुद्ध रुप से बीजेपी की परम्परागत सीट है. बीजेपी के गिरधारीलाल भार्गव लगातार छह बार इस सीट से चुनाव जीत चुके हैं. ऐसे में ज्योति के लिए जीत की ज्वाला जलाना बेहद टफ है.

कांग्रेस के लिए गुटबाजी सबसे बड़ी सिरदर्दी
राजस्थान में कांग्रेस के लिए अगर सबसे ज्यादा गुटबाजी है, तो वह गुलाबी नगरी में मानी जाती है. यहां छोटा सा पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी राजधानी होने के चलते खुद को बड़ा मानकर चलता है. ऐसे में किसी एक नेता के निर्देशों को मानना वह अपनी शान के खिलाफ मानता है. ज्योति ने अपनी बेबाकी और कार्यशैली से इतने विरोधी बना लिए थे कि उब उन्हें गर्ज के चलते मनाना पड़ा. दिखावे के लिए तो यह सभी साथ हैं लेकिन वोट दिलवाने में उनका क्या रोल रहेगा, यह देखना दिलचस्प रहेगा.

राहुल गांधी का अमेठी के नाम पत्र, फिर से मजबूत बनाने की अपील

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लोकसभा चुनाव के लिए देशभर में प्रचार में लगे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी से उम्मीदवार हैं. इसके अलावा उन्होंने अबकी बार केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ा है. प्रचार की व्यस्तता को देखते हुए राहुल गांधी अमेठी में कम ही समय दे पाए हैं. यहां पार्टी महा सचिव व पूर्वी यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी उनके लिए प्रचार कर रहीं है. राहुल गांधी ने अमेठी के मतदाताओं के लिए एक पत्र लिखा है. जिसमें उन्होंने अमेठी को अपना परिवार बताते हुए फिर से मजबूत करने की अपील की है. बता दें कि बीजेपी ने यहां केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को फिर से चुनाव मैदान में उतारा है. साल … Read more