ममता बनर्जी की फोटो से छेड़छाड़ करने वाली BJP नेता को कोर्ट से जमानत

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पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की फोटो से छेड़छाड़ (मॉर्फ) से तैयार फोटो को सोशल मीडिया पर शेयर करने के मामले में गिरफ्तार बीजेपी नेता प्रियंका शर्मा की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर कर ली है. ममता बनर्जी की फोटो के साथ छेड़छाड़ कर उसे सोशल मिडिया पर शेयर करने के आरोप में प्रियंका को जेल में बंद कर दिया गया था. अब उन्हें सशर्त बैल मिल गई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर प्रियंका शर्मा फेसबुक पोस्ट पर माफी मांगती हैं तो ही उन्हें जमानत दी जाएगी. उन्हें तुरंत जमानत पर रिहा किया जाए. बाहर आते ही उन्हें मांफी मांगनी होगी. कोर्ट के इस फैसले को … Read more

जेडीएस-कांग्रेस में फिर ‘तू तू मैं मैं’ कांग्रेस नेता ने जेडीएस अध्यक्ष को कहा ‘कुत्ता’

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कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस की सरकार बनने के बाद भी दोनों पार्टियों के नेताओं में जुबानी जंग कम नहीं हुई है. बीच-बीच में दोनों पार्टियों में शब्दों की जंग जारी रहती है जबकि जेडीएस नेता और मुख्यमंत्री कुमारस्वामी पार्टी में कुछ भी गलत न होने का बार-बार दम भरते हैं. आज जो बयानबाजी हुई, उसके बाद फिर से लगने लगा है कि दोनों दलों के गठबंधन के हालात सामान्य नहीं हैं. आज कर्नाटक जेडीएस के अध्यक्ष विश्वनाथ ने प्रदेश के पूर्व सीएम और कांग्रेस नेता सिद्धारमैया पर जमकर प्रहार किए. विश्वनाथ ने कहा, ‘सिद्धारमैया पांच साल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. वो इसी की शेखी बघारते फिरते है. अगर उनका कार्यकाल इतना … Read more

पंजाब: बदले सियासी माहौल के बाद दिलचस्प होंगे चुनावी नतीजे

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देश में लोकसभा चुनाव अपने अंतिम पड़ाव पर है. 19 मई को आखिरी दौर की 59 सीटों पर वोट डाले जाएंगे. इसी चरण में पंजाब की सभी 13 सीटों पर एक चरण में मतदान होंगे. पंजाब में सत्ता परिवर्तन के बाद अकाली-बीजेपी गठबंधन के लिए यह चुनाव बहुत मुश्किल दिख रहा है. विधानसभा चुनावों के बाद राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल गए हैं. 2014 लोकसभा चुनाव के समय प्रदेश की कमान अकाली-बीजेपी गठबंधन के पास थी. तो चुनावी नतीजे भी गठबंधन के पक्ष में रहे थे. उस समय अकाली-बीजेपी गठबंधन ने 13 में से 6 सीटों पर जीत हासिल की थी. कांग्रेस के हाथ तीन सीट लगीं जबकि चार … Read more

लोकसभा चुनाव: सहयोगी दल हांकेंगे बीजेपी का रथ लेकिन उनकी भी हालत खराब

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लोकसभा चुनाव अपने अंतिम दौर में आ पहुंचा है और विश्लेषकों ने चुनावी परिणाम का आकलन लगाना शुरु कर दिया है. अगर किसी तथ्य पर सभी चुनावी विश्लेषक एकमत हैं तो वह है ‘इस बार बीजेपी को चुनाव में पूर्ण बहुमत नहीं मिलेगा’. अभी तक चुनावी रुझान भी इसी ओर इशारा करते हैं. इस तथ्य को बीजेपी नेता राम माधव और सुब्रमण्यम स्वामी भी स्वीकार कर चुके हैं. स्वामी ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि इस बार बीजेपी को केवल 220 सीटों पर ही कामयाबी मिलेगी. वहीं बीजेपी महासचिव राम माधव ने कहा था कि अगर इस बार पार्टी 271 सीटें जीत पाती तो बहुत अच्छा … Read more

राजनीति के ‘मौसम विज्ञानी’ इस बार दो मोर्चों पर गच्चा खाते हुए क्यों दिख रहे हैं?

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भारत की राजनीति में रामविलास पासवान ऐसे नेता हैं, जो हमेशा सत्ता के साथ रहते हैं. सरकार चाहे किसी की भी आए, पासवान कभी चुनाव से पहले तो कभी चुनाव के बाद सत्ता के सिरमौर बनने वाले दल के साथ हो लेते हैं. इसी वजह से कई नेता उन्हें राजनीति का ‘मौसम विज्ञानी’ कहते हैं. पासवान फिलहाल एनडीए का हिस्सा हैं और दावा कर रहे हैं कि नरेंद्र मोदी फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे.

रामविलास पासवान का यह दावा कितना सही होगा यह तो यह चुनाव परिणाम आने के बाद पता चलेगा, लेकिन उनकी सियासत पर सबकी नजर है. आपको बता दें कि रामविलास पासवान बिहार की हाजीपुर लोकसभा क्षेत्र से आठ बार सांसद चुने गए. जीत का यह आंकड़ा इस बात की तस्दीक करता है कि राजनीति में उनका कद कितना बड़ा है.

पासवान पहली बार भारतीय लोकदल के टिकट पर साल 1977 में चुनाव जीतकर संसद पहुंचे. साल 1980 में वे जनता पार्टी के टिकट पर सांसद बने, लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी के निधन के बाद हुए चुनाव में उन्हें कांग्रेस के रामरात्न राम के सामने हार का सामना करना पड़ा. हालांकि 1989 के चुनाव में उन्होंने फिर से जीत हासिल की. इस चुनाव के साथ जीत का जो सिलसिला शुरू हुआ वो 2004 तक जारी रहा.

इस दौरान रामविलास पासवान की दलीय निष्ठा बार—बार बदलती रही. वे एनडीए और यूपीए, दोनों सरकारों में रहे. पासवान अकेले तो बिहार में इतने ताकतवर नहीं हैं कि वे कुछ बड़ा कर सकें, लेकिन प्रदेश के दलित वर्ग पर उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है. पहले यूपीए और बाद में एनडीए में उनकी एंट्री की वजह भी यही थी.

2014 के चुनाव में पासवान की पार्टी लोजपा ने बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. पार्टी ने सात सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे, जिनमें से छह ने फतह हासिल की. इनमें हाजीपुर से रामविलास पासवान खुद और जमुई से उनके पुत्र चिराग पासवान सांसद चुने गए. पासवान इस बार के चुनाव में एनडीए में शामिल हैं. इस बार उनकी पार्टी को छह सीटें मिली हैं.

इस बार रामविलास पासवान चुनावी मैदान में नहीं हैं. 1977 के बाद यह पहला मौका है जब वे लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. उनकी परंपरागत हाजीपुर सीट से इस बार रामविलास पासवान के भाई और बिहार सरकार के मंत्री पशुपति कुमार पारस चुनाव लड़ रहे हैं. वहीं, जमुई से रामविलास के पुत्र चिराग एक बार फिर चुनावी मैदान में हैं.

राजनीति के जानकारों की मानें तो इस चुनाव में रामविलास पासवान की प्रतिष्ठा दांव पर है. बताया जा रहा है कि दलितों के बीच अब उनकी पहले जैसी पकड़ नहीं बची है. उनकी पार्टी के उम्मीदवार अपनी सीटों पर तो दलित वोट हासिल कर रहे हैं, लेकिन बीजेपी और जेडीयू के उम्मीदवारों के खाते में इसे ट्रांसफर नहीं करवा पा रहे. जानकारों की मुताबिक प्रदेश की कुछ सीटों को छोड़कर ज्यादातर पर दलित समाज पूरी तरह से महागठबंधन के पक्ष में लामबंद दिखाई दे रहा है.

यदि ऐसा होता है तो यह रामविलास पासवान के लिए किसी झटके से कम नहीं होगा, क्योंकि जिस दलित वोट बैंक की वजह से वे राष्ट्रीय दलों से गठबंधन और सरकार में मोलभाव कर पाते हैं यदि वो ही उनसे छिटक गया तो उनका राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव कम होना तय मानकर चलिए. लोजपा के कई नेता भी यह स्वीकार करते हैं कि मोदी सरकार के दौरान हुई दलित विरोधी घटनाओं का नुकसान उनकी पार्टी को भी हुआ है.

आपको बता दें कि बीते पांच साल में देश में दलित उत्पीड़न की कई घटनाएं हुईं. वह चाहे गुजरात के ऊना में दलित की पिटाई का मामला हो या रोहित वेमुला की आत्महत्या का मुद्दा. एससी-एसटी एक्ट में संशोधन का मामला भी खूब उछला. ये सभी मामले मोदी सरकार के साथ—साथ रामविलास पासवान के लिए भी मुसीबत का सबब बने. कहा गया कि पासवान सरकार में शामिल थे, लेकिन उन्होंने बड़े मामलों पर चुप्पी साधे रखी.

आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव इन्हीं मुद्दों पर रामविलास पासवान को घेर रहे हैं. तेजस्वी हर जनसभा में कह रहे हैं कि बीजेपी के साथ रहकर रामविलास की सोच भी आरएसएस जैसी हो गई है. वे आरएसएस की तरह दलितों की बजाय सवर्णों के लिए काम करते है. आपको बता दें कि रामविलास पासवान ने सवर्ण वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़ों को आरक्षण देने की मांग की थी. इस पर तेजस्वी ने उन्हें सवर्ण समाज का नेता कहा था.

दरअसल, तेजस्वी ये भली-भांति जानते हैं कि अगर दलित वोट उनके पक्ष में एकमुश्त लामबंद होते हैं तो महागठबंधन के लिए बिहार में संभावना बढ़ेगी. तेजस्वी लोकसभा चुनाव को महागठबंधन की एक प्रयोगशाला के रूप में देख रहे हैं. वे इस चुनाव में सभी प्रकार के विकल्पों को अपनाकर देख रहे हैं. चाहे मुकेश साहनी की नई-नवेली विकासशील इंसान पार्टी को तीन लोकसभा की सीट गठबंधन में देने की बात हो या उपेंद्र कुशवाह की रालोसपा को गठबंधन में लेने की.

कांग्रेस को सिर्फ नौ लोकसभा सीटों पर ही लड़ने पर सहमत करना भी तेजस्वी की रणनीति का ही हिस्सा है. वहीं, रामविलास पासवान पर वंशवाद के भी जमकर आरोप लग रहे हैं. विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रदेश में उनके परिवार के अलावा उन्हें कोई दलित नेता नहीं मिलता, जो चुनाव लड़ सके. गौरतलब है कि लोजपा के हिस्से में आई छह में से तीन सीटों पर तो उनके परिवार के सदस्य ही चुनाव लड़ रहे हैं.

जमुई से रामविलास के पुत्र चिराग पासवान, हाजीपुर से उनके भाई पशुपति कुमार पारस और समस्तीपुर से उनके दूसरे भाई रामचंद्र पासवान चुनाव लड़ रहे हैं. विपक्ष आरोप लगा रहा है कि पशुपति कुमार पारस तो वैसे ही बिहार सरकार में मंत्री हैं, तो उनके स्थान पर किसी दलित कार्यकर्ता को क्यों नहीं चुनाव लड़ाया गया. इन तीन सीटों के अलावा लोजपा ने नवादा से चंदन कुमार, खगड़िया से महमूद अली कैसर, वैशाली से मुगेंर की वर्तमान सांसद वीना देवी को प्रत्याशी बनाया है.

बताया जा रहा है कि इन वजहों से रामविलास पासवान के उपर से दलितों का भरोसा उठ रहा है और लोग खुद को ठगा हुआ महसूस करके अपना रुख महागठबंधन की ओर कर रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि खुद उनके समाज के (पासवान) लोगों को भी यह लगने लगा है कि दलितों और पासवानों के नाम पर राजनीति करके रामविलास सिर्फ अपने परिवार के लोगों और कुछ अमीर लोगों को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं. इनका दलित समाज से कोई सरोकार नहीं है. हालांकि रामविलास पासवान का जनाधार उनसे कितना खिसका है, इसका पता तो 23 मई को ही चल पाएगा.

फिर एक बड़ी भूमिका में नजर आएंगेे गहलोत, आलाकमान ने सौंपी बड़ी जिम्मेदारी

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इस बार का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के लिए करो या मरो जैसा है. इसी के चलते सियासत के जादूगर और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को चुनावी परिणाम आने से पहले कांग्रेस आलाकमान ने एक और अहम जिम्मेदारी दी है. राहुल गांधी ने खास टास्क देते हुए गहलोत को यूपीए के दलों और अन्य विपक्षी दलों से बातचीत करते हुए उन्हें साधने की जुगत में लगा दिया है. गहलोत के साथ कोषाध्यक्ष अहमद पटेल को भी इस काम में शामिल किया है. लिहाजा गहलोत ने दिल्ली में दो दिन डेरा डालते हुए इस रणनीति पर काम शुरु कर दिया है. हालांकि गहलोत अब जयपुर लौट आए हैं लेकिन फोन के जरिए लगातार अन्य दलों के प्रमुख नेताओं से संपर्क में बने हुए हैं.

दिल्ली में गहलोत ने अहमद पटेल से पहले हर राज्य के संभावित परिणाम पर मंत्रणा की. उसके बाद जोधपुर हाउस में कईं अन्य दलों के नेताओं से गुप्त मुलाकात भी की. बता दे कि कर्नाटक और गुजरात सहित कई राज्यों में गहलोत संकटमोचक की भूमिका में पार्टी के लिए उभरकर सामने आए थे, जिनकी बदौलत उन्हें फिर से राजस्थान का मुख्यमंत्री का दायित्व ​सौंपा गया.

केंद्र में कांग्रेस की संभावित सरकार बनाने के आधार में जुटे गहलोत
दिल्ली में अहमद पटेल से चर्चा करने के बाद चाणक्य गहलोत यूपीए सरकार बनाने के आंंकड़े पर काम में जुट गए हैं. गहलोत सहित कांग्रेस के कद्दावर नेताओं का मानना है कि बीजेपी इस बार केवल 200 सीटें ही जीत पाएगी. ऐसे में यूपीए के अन्य सहयोगी दलों के साथ मिलकर सरकार बनाई जा सकती है. सहयोगी दलों की सीटें कम पड़ने पर गैर यूपीए-एनडीए दल या फिर एनडीए के साथ वाली पार्टियों को कैसे तोड़ा जाए, इस कार्य में सियासी जादूगर का अनुभव और सहयोग लिया जाए. अगर कांग्रेस की उम्मीदों के तहत बीजेपी की गाड़ी 200 सीटों पर अटक जाती है तो फिर गहलोत जैसे वरिष्ठ नेताओं का लंबा सियासी तजुर्बा और उनकी अन्य दलों से ट्यूनिंग यूपीए की सरकार बनानेे में मददगार साबित होगी.

अगर बीजेपी 225 सीटों का आंकड़ा पार करती है तो नरेंद्र मोदी को पीएम बनने से कैसा रोका जाए, इसमें जादूगर के दांवपेंच बेहद काम आ सकते हैं. गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता ही अन्य दलों को बीजेपी के किसी अन्य नेता को पीएम प्रोजेक्ट के लिए आगे करने की शर्त के लिए तैयार करा सकते हैं.

गहलोत के साथ अन्य वरिष्ठ नेता भी देखेंगे काम
अशोक गहलोत के साथ कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को भी ऐसी जिम्मेदारियां दी गई हैं. गहलोत के साथ अहमद पटेल, एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल, पी.चिदंबरम, मुकुल वासनिक और गुलाम नबी आजाद आदि उन प्रमुख नेताओं की लिस्ट में शामिल हैं जो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के निर्देश पर चुनावी गणित के आंकड़ों को देख रहे हैं. गहलोत ने दो दिन दिल्ली में नेताओं के साथ बंद कमरे में बैठक करते हुए गहनता से हर राज्य की लोकसभा सीटों के संभावित परिणाम को लेकर फीडबैक जुटाया है. वैसे भी गहलोत के राजनीतिक दलों के प्रमुख नेताओं से अच्छे रिश्ते जगजाहिर हैं.

कर्नाटक-गुजरात में गहलोत ने दिखाया था जलवा
बताया जा रहा है कि कर्नाटक में मुख्यमंत्री पद जेडीएस को देने का आईडिया अशोक गहलोत ने ही दिया था. इस पर आलाकमान ने उन्हें फ्री हैंड दे दिया. उसके बाद गहलोत ने कर्नाटक में कई दिनों तक डेरा डालते हुए कांग्रेस के समर्थन से जेडीएस की सरकार बना डाली. उससे पहले गुजरात के प्रभारी रहते हुए उन्होंने पीएम मोदी के गृहराज्य में मजबूती से विधानसभा चुनाव लड़ते हुए एक बार तो बीजेपी के छक्के छुड़ा दिए थे. यह गहलोत की रणनीति का ही कमाल था कि कांग्रेस 80 सीटों तक पहुंच गई. उसके बाद से गहलोत आलाकमान के लिए एक बार फिर आंखों का तारा बन गए.

छठे चरण में 63 फीसदी मतदान, पश्चिम बंगाल ने फिर मारी बाजी

लोकसभा चुनाव के छठे चरण में सात राज्यों की 59 सीटों पर 63.43 फीसदी मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया. पश्चिम बंगाल में 80.35 प्रतिशत वोटिंग हुई जबकि उत्तर प्रदेश में मात्र 54.72 फीसदी वोट पड़े. छठा चरण पूरा होने के साथ ही देश की 484 सीटों पर चुनाव पूरा हो गया है. छठे चरण के दौरान पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में कुछ जगहों पर हिंसा भी हुई. पश्चिम बंगाल में बीजेपी प्रत्याशी भारती घोष पर हमला हुआ, वहीं उत्तर प्रदेश में बीजेपी विधायक के साथ झड़प हुई. कई जगह पर ईवीएम में खराबी और फर्जी मतदान की शिकायत भी मिली. छठे चरण में दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, … Read more