कर्नाटक संकट से हमारा कोई लेना-देना नहीं: राजनाथ सिंह

कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन सरकार पर मंडराते संकट के बादल के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा में अपनी सफाई में कहा कि कर्नाटक सरकार के गिरने में उनकी पार्टी की कोई भूमिका नहीं है. लोकसभा में उन्होंने कहा, ‘कर्नाटक की सरकार गिराने में हम कोई कोशिश नहीं कर रहे हैं. त्याग पत्र देने का सिलसिला तो राहुल गांधी ने शुरू किया है, हमारा क्या लेना देना? हर दिन कांग्रेस के बड़े बड़े नेता इस्तीफ़ा दे रहे हैं. हमारी पार्टी कभी भी खरीद फरोख्त में शामिल नहीं होती. हम संसदीय लोकतंत्र की गरिमा को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं.’ बता दें, कर्नाटक सरकार के 13 विधायकों ने एक … Read more

कर्नाटक: JDS-कांग्रेस गठबंधन और बीजेपी के बीच खड़े हैं विधायक एच. नागेश, जिसकी तरफ गए सरकार उसकी

कर्नाटक में सियासी ड्रामा खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. धीरे-धीरे जेडीएस-कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार के सभी सैनिक रण छोड़ भाग खड़े हुए हैं या फिर सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे हैं. मई, 2018 में सत्ता की कमान मिलने से अब तक इस मिलीजुली सरकार की राह कभी भी आसान नहीं रही. एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तो चलते ही रहे लेकिन अब हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि एक झटका और सरकार ढेर. अब सभी की नजरें मंगलवार पर टिकी हुई हैं. कल जैसे ही विधानसभा सदन खुलेगा, सरकार के भविष्य का फैसला हो जाएगा.

दरअसल शनिवार को सरकार के 13 विधायकों ने एक साथ विधानसभा सचिव को अपना त्यागपत्र सौंप दिया. इनमें 10 विधायक कांग्रेस और 3 जेडीएस के हैं. विधानसभा स्पीकर के.आर. रमेश कुमार की अनुपस्थिति में अभी तक ये त्यागपत्र स्वीकार नहीं हुए हैं. आज स्पीकर कार्यालय बंद होने से मंगलवार तक परिणाम नहीं आएंगे लेकिन जब आएंगे, सारी स्थिति पल भर में साफ हो जाएगी.

अगर ये सभी इस्तीफे स्वीकार होते हैं जिसकी संभावना काफी ज्यादा है तो ऐसे में निर्दलीय विधायक नागेश जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन और बीजेपी के बीच की मुकाबले की अहम कड़ी साबित होंगे. 9 जुलाई को कर्नाटक की सियासी गणित कुछ इस प्रकार बैठेगी कि कर्नाटक विधानसभा में कुल 225 सदस्य होते हैं, इनमें एक सदस्य मनोनीत होता है. मई, 2018 में कुल 224 सीटों पर विधानसभा चुनाव हुए थे. बीजेपी को 105, कांग्रेस को 79, जेडीएस को 37 सीटें मिली थी. 2 निर्दलीय और एक सीट बसपा के खाते में गई थी. बाद में एक निर्दलीय विधायक ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. बाकी एक निर्दलीय विधायक और बसपा विधायक ने गठबंधन को समर्थन दिया जिससे गठबंधन सरकार के विधायकों की संख्या 119 हो गई. इसमें एक विधायक विधानसभा अध्यक्ष पद पर नियुक्त है. इस तरह कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार 118 विधायकों (कांग्रेस-79, जेडीएस-37, निर्दलीय-1, बीएसपी-1) के समर्थन से चल रही थी.

इन 13 विधायकों के इस्तीफों के बाद विधानसभा सदस्यों की संख्या 224 से घटकर 211 रह जाएगी. इनमें एक सीट स्पीकर की है. यानी अगर इन सभी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार होते हैं तो बहुमत का हिसाब 210 सीटों पर लगाया जाएगा और किसी भी पार्टी को सरकार में रहने के लिए 106 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी.

अब 13 विधायकों के इस्तीफे देने के बाद अब जेडीएस और कांग्रेस दोनों पार्टियों के पास कुल 104 विधायक शेष हैं. बसपा का समर्थन अभी भी पार्टी को प्राप्त है. ऐसे में गठबंधन विधायकों की संख्या 105 हो जाती है जो समर्थन से एक विधायक दूर है. बीजेपी के पास भी इतने ही विधायक हैं. ऐसे में जब कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष के.आर. रमेश कुमार दोनों पार्टियों को बहुमत पेश करने को कहेंगे तो उस समय निर्दलीय विधायक नागेश की भूमिका अहम हो जाएगी.

बीजेपी और गठबंधन दोनों को ही बहुमत के लिए केवल एक विधायक की जरूरत होगी. ऐसे में नागेश जिस भी पार्टी को समर्थन देंगे, सरकार उसी की बनना निश्चित है. मौजूदा हालातों को देखते हुए तो कहा जा सकता है कि प्रदेश में सरकार बीजेपी की बनती ​दिख रही है क्योंकि नागेश ने राज्यपाल को एक ​खत लिखकर कांग्रेस समर्थन को वापिस लेने की बात कही है. अगर ऐसा होता है तो गठबंधन सरकार का गिरना तय है.

हालांकि यह तो निश्चित है कि नागेश जिस भी तरफ जाएंगे, उनका मंत्री बनना पक्का है. अब सबसे पहले देखना तो यह होगा कि विधानसभा अध्यक्ष इन सभी विधायकों के इस्तीफे मंजूर करेंगे या नहीं. उसके बाद अगर बहुमत साबित करने की नौबत आती है तो यह दिलचस्प होगा विधायक नागेश ‘हाथ’ पकड़ते हैं या फिर ‘कमल’ की ओट में जाते हैं.

कर्नाटक में सरकार जाने का खतरा बढ़ा, मंत्रिमंडल के सभी 32 मंत्रियों ने ​दिया इस्तीफा

कर्नाटक में सियासी उथल-पुथल अब अपने चरम पर आ पहुंची है. शनिवार को जेडीएस-कांग्रेस के 13 विधायकों के इस्तीफे के बाद अब कांग्रेस कोटे के मंत्रिमंडल में शामिल सभी 22 मंत्रियों ने अपने इस्तीफे प्रदेश अध्यक्ष दिनेश गुंडू राव को सौंप दिए हैं. अन्य 10 मंत्रियों के भी अपने इस्तीफे दिए जाने की खबर है. कर्नाटक के डिप्टी सीएम जी. परमेश्वर ने भी अपना इस्तीफा सौंप दिया है. ऐसे में मंत्रिमंडल के भंग होने की समस्या आन खड़ी हुई है. मंगलवार को कर्नाटक सीएम एचडी कुमार स्वामी के भी इस्तीफा देने के कयास लगाए जा रहे हैं. वहीं विधायक पदों से भी इस्तीफा देने का सिलसिला रूकने का नाम नहीं … Read more

कर्नाटक की राजनीति में बीजेपी का शिवसेना से ‘सामना’

कर्नाटक की राजनीति में हो रही उथल-पुथल में अब शिवसेना भी आ खड़ी हुई है. शिवसेना ने केंद्र और राज्य में अपनी सहयोगी पार्टी बीजेपी पर सवाल उठाते हुए तोड़फोड़ की राजनीति पर राष्ट्रीय नीति होने की बात कही है. यह बात शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के माध्यम से कही है. शिवसेना ने ‘सामना’ में लिखा है, ‘मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान ने शनिवार को ही ये बात कही है कि कांग्रेस के कुछ विधायक हमारे संपर्क में हैं लेकिन तोड़फोड़ करके सरकार नहीं बनाएंगे. शिवराज सिंह की भूमिका अवसरवाद की है पर कर्नाटक में अलग भूमिका व मध्य प्रदेश में दूसरी ये ऐसा क्यों? तोड़फोड़ … Read more

‘कर्नाटक सीएम को आराम से छुट्ट‍ियां भी मनाने नहीं दे रहे मोदी और शाह’

कर्नाटक में इन दिनों जो राजनीतिक ड्रामा चल रहा है, अब वह सियासी गलियारों से निकल सोशल मीडिया तक जा पहुंचा है. शनिवार को कर्नाटक की सत्तासीन सरकार के 13 व‍िधायकों के इस्तीफा देते ही राजनीत‍ि में जो भूचाल आया है, उसकी संभावना तो पहले ही लोकसभा चुनाव-2019 में झलक आई थी. खैर जो भी हो, सोशल मीडिया पर इस घटना पर जमकर मीम्स बन रहे हैं. एक यूजर ने तो यहां तक कहा है कि पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कर्नाटक सीएम कुमार स्वामी को अमेरिका में छुट्टी भी मनाने नहीं दे रहे हैं. दरअसल, कुमार स्वामी अपने परिवार संघ छुट्टियां मनाने अमेरिका गए थे. वह … Read more

कर्नाटक में सरकार पर आए संकट के पीछे ऑपरेशन लोटस है या खुद सिद्धारमैया

कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस की गठबंधन सरकार बिखरती नजर आ रही है. कर्नाटक में सियासी रंग जिस तरह से बदल रहा है, उससे लगता तो यही है कि संकट के बादल कभी भी सरकार को घेर सकते हैं. यहां गठबंधन सरकार को एक साल भी पूरा नहीं हुआ है और इसके गिरने की नौबत आ खड़ी हुई है. हालांकि 2018 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद से ही यहां सियासी ड्रामा शुरू हो गया था.

कर्नाटक में कुल 224 विधानसभा सीटें हैं. बहुमत के लिए चाहिए 113 विधायक. विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 104 सीटों पर जीत मिली थी और समर्थन के लिए केवल 9 विधायकों की दरकार थी. वहीं कांग्रेस के पास 80 और जेडीएस के पास 38 विधायक थे, 2 सीटें अन्य पार्टियों के हिस्से आई थी. कर्नाटक के राज्यपाल ने विरोध के बावजूद बीजेपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था. विरोध और बढ़ते हाई प्रेशर सियासी ड्रामे के बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद कांग्रेसी नेताओं के साथ धरने पर बैठ गए थे. हालांकि बीजेपी समर्थन के अभाव में सरकार बनाने से चूक गई और कुमार स्वामी के नेतृत्व में जेडीएस-कांग्रेस की मिली जुली सरकार बनी.

इस गठबंधन सरकार के पिछले एक साल में जेडीएस के नेताओं और पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बीच सियासी ड्रामा चलता रहा है. महीना खत्म न होता और कुछ न कुछ ऐसा हो जाता कि जेडीएस और कांग्रेसी नेताओं में रार पड़ जाती. इस पर न तो कुमार स्वामी कुछ बोल पाये न ही सिद्धारमैया और न ही कांग्रेस आलाकमान ने इसको गम्भीरता से लिया, ऐसा चलता रहा रार बढ़ती गई और अब आने वाला परिणाम सबके सामने है.

वर्तमान में जेडीएस और कांग्रेस के सामने वही स्थिति आ खड़ी हुई है जैसी दोनों पार्टियों ने मिलकर बीजेपी के सामने खड़ी की थी. विधानसभा चुनावों के परिणाम के बाद बीजेपी ने 9 विधायकों को अपनी ओर मिलाने की अथाह कोशिश की लेकिन दोनों पार्टियों ने अपने विधायकों की ऐसी घेराबंदी की कि बीजेपी लाख हाथ-पैर मारने के बाद भी इस गठबंधन के 9 विधायक नहीं निकाल पाई. तब बीजेपी ने यह मान लिया कि अभी समय उपयुक्त नहीं है.

समय बीतता गया और जेडीएस-कांग्रेस के बीच रार बढ़ती गई. कांग्रेस नेता सिद्धारमैया खुद इस तपती आग में घी डालने का काम कर रहे थे. अंदरूनी सूत्रों से खबर लगातार जोर पकड़ी रही कि सिद्धारमैया कई कांग्रेसी नेताओं को पद का लालच देकर इस बात के लिए उकसा रहे हैं कि वह आलाकमान से उन्हें सीएम पद नियुक्त कराने पर जोर डालें. हाल ही में इस्तीफा दिए कुछ विधायकों के फिर यही मांग करने पर यह बात पूरी तरह से साबित भी हो जाती है लेकिन आलाकमान के दखल न देने से यह बात बिगड़ती गई और विचारों के बीच खाई और गहरी होती गई. ताज्जुब की बात तो यह रही कि गठबंधन सरकार में पड़ रही इस गहरी खाई को पाटने की कोशिश न तो सीएम और जेडीएस प्रमुख कुमार स्वामी ने की और न ही कांग्रेस आलाकमान ने.

गठबंधन सरकार में बढ़ती इस रार का भरपूर फायदा बीजेपी के चाणक्य अमित शाह के शातिर दिमाग ने उठाया. उन्होंने कांग्रेसी विधायकों को यह भरोसा दिला ही दिया कि इस गठबंधन सरकार में उनका कोई भला नहीं हो सकता. यही वजह रही कि पहले दो और बाद में 14 विधायकों ने एक साथ इस्तीफा देकर सरकार का साथ छोड़ दिया. इनमें 13 विधायक कांग्रेस और 3 जेडीएस के हैं. एक विधायक को पार्टी ने निष्कासित कर दिया था.

अब यह गठबंधन सरकार पूरी तरह डूबती हुई नजर आ रही है. अगर मौजूदा इस्तीफाधारक विधायकों ने अपना त्यागपत्र वापिस नहीं लिया तो सरकार गिरेगी, यह पक्का है. उसके बाद शुरू होगा बीजेपी का ऑपरेशन लोटस जो प्रदेश में पहले भी एक बार चल चुका है.

ऑपरेशन लोटस के जरिए बीजेपी 2008 में भी कर्नाटक में सरकार बनाने में सफल रही थी. उस समय बीजेपी 224 में से 110 सीटें जीतकर आई थी. बहुमत के आंकड़े को छूने के लिए बीजेपी ने ऑपरेशन लोटस का इस्तेमाल किया था. इसके तहत कांग्रेस और जेडीएस के 8 विधायकों ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. इन सभी नेताओं को बीजेपी ने अपने चुनाव चिन्ह पर विधानसभा उपचुनाव लड़ाया, जिसमें से 5 बीजेपी से जीतकर आए. बीजेपी का बहुमत साबित हो गया था और राज्य में बीजेपी की 5 साल की सरकार आसानी से बन गई. वैसा ही कुछ होता हुआ इस बार भी नजर आ रहा है.

बहुमत के लिए बीजेपी को केवल 9 विधायकों की दरकार है. उनके पास 16 ऐसे विधायक हैं जो जेडीएस या कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके हैं. बीजेपी इन सभी पर दांव खेलेगी और इनमें से आधे भी जीतकर आते हैं तो बीजेपी सरकार बनाने के साथ ही सदन की मुख्य पार्टी बनकर बैठेगी.

अलगाववादी कश्मीरियों के बच्चों को पढ़ने नहीं देते, विदेशों में पढ़ते हैं इनके बच्चे

बार-बार कश्मीर घाटी में स्कूलों और कालेजों को बंद करने का आह्वान करने और युवाओं को पत्थरबाजी व आतंकवाद के लिए उकसाने वाले अलगाववादी नेताओं के बच्चे न सिर्फ विदेश में पढ़ रहे है, बल्कि वहीं नौकरी भी कर रहे हैं. जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी नेता लगातार युवाओं को भटकाते रहते हैं. अलगाववादी नेता ही सबसे बड़े कारण हैं जिनकी वजह से स्थानीय युवा विरोध करने के लिए सड़कों पर दिखते हैं और देशविरोधी नारेबाजी करते हैं. गृह मंत्रालय ने आज उन अलगाववादी नेताओं की लिस्ट जारी की है, जिनके बच्चे विदेश में पढ़ते हैं और वहीं नौकरी करते हैं. 1.असरफ सेहराईः (चेयरमैन, तहरीक-ए-हुर्रियत)- 2 पुत्र खालिद और आबिद साउदी अरब … Read more

क्या 2024 में प्रधानमंत्री बनने की तैयारी कर रहे हैं अमित शाह?

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देश के केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बीजेपी के दिग्गज़ नेता और मार्गदर्शक लाल कृष्ण आडवाणी की परम्परागत सीट गांधीनगर से लोकसभा चुनाव लड़ा था. यहां उन्होंने कांग्रेस के सी.जे. चावड़ा को बड़े अंतर से मात देकर न केवल अपना राजनीतिक कद दिखाया. बल्कि पिछली सरकार में गृहमंत्री रहे राजनाथ सिंह से उनकी गद्दी ​छीन अपने आपको पार्टी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद नंबर दो पर लाकर खड़ा कर दिया.

पिछली सरकार में यह स्थान राजनाथ सिंह के पास था. इस बार जिस तरह राजनाथ सिंह को 8 कैबिनेट समितियों में से केवल दो में शामिल किया गया, उससे साफ है कि अब पार्टी राजनाथ सिंह को नंबर दो पर रखने के ​बिलकुल मूड में नहीं है. हालांकि बाद में संघ के दखल के बाद उन्हें 6 कमेटियों में जगह मिल गई थी.

इससे पहले चुनाव प्रचार के दौरान जब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने अपने संसदीय क्षेत्र गांधीनगर में अपनी ताकत का शक्ति प्रदर्शन किया था, तभी पार्टी से जुड़े सभी नेताओं को उनके नंबर दो होने का अहसास हो गया था. यहां तक की उनके नामांकन में तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, रामविलास पासवान, अरुण जेटली और महाराष्ट्र में अपना चुनाव प्रचार छोड़कर नितिन गडकरी भी वहां पहुंचे थे. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी उनकी तारीफ करते देखे गए.

गृहमंत्री बनने के बाद कार्यभार को देखते हुए अमित शाह पार्टी अध्यक्ष पद से छुटकारा पाना चाह रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी इस बात में मौन स्वीकृति है. तय माना जा रहा है कि जनवरी में नए पार्टी चीफ का चयन किया जाएगा. जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बना इसकी शुरूआत भी हो चुकी है. जैसी की उम्मीद है, नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री के तौर पर यह अंतिम कार्यकाल होगा. ऐसे में माना यही जा रहा है कि बीजेपी लोकसभा चुनाव-2024 में अमित शाह को प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने की रणनीति पर अभी से काम कर रही है.

वैसे भी देखा जाए तो नरेंद्र मोदी के बाद बीजेपी में अमित शाह दूसरे सबसे लोकप्रिय नेता हैं. 2024 में मोदी की आयु 75 साल के करीब हो जाएगी और मोदी-शाह फॉर्मूले के हिसाब से यह उनके संन्यास का वक्त होगा. ऐसे में बीजेपी नए नेतृत्व का निर्माण करेगी जिसके लिए मौजूदा समय में शाह पहली पसंद हैं. यह वजह है कि उन्हें अभी से तैयार किया जा रहा है.

हालांकि इस रणनीति में संघ की स्वीकृति अभी शेष है. सूत्रों की माने तो संघ की चाहत है कि अगला बीजेपी नेतृत्वकर्ता या तो उत्तरप्रदेश से हो या फिर मध्यप्रदेश से. इसके लिए विकल्प के तौर पर दो नेताओं को ढूंढ भी लिया है. पहला नाम है मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जिन्हें संघ की तरफ से भोपाल प्रेम त्यागने के लिए कहा जा चुका है. उसके बाद से शिवराज सिंह ने दिल्ली में अपनी सक्रियता बढ़ाई भी है. शिवराज सिंह बीजेपी के सर्वशक्तिशाली संसदीय बोर्ड के सदस्य भी हैं. ऐसे में उनकी पीएम पद के लिए उम्मीदवारी कमतर नहीं मानी जा सकती.

दूसरे नंबर पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम आता है जिन्हें कट्टर हिंदू समर्थक नेता माना जाता है. हिंदी भाषी राज्यों में उनकी लोकप्रियता मोदी और शाह से कमतर नहीं है. लेकिन योगी मोदी-शाह के पक्के भक्त हैं और किसी भी सूरत में अमित शाह के नेतृत्व को नकार नहीं पाएंगे. वहीं शिवराज सिंह का ओहदा अभी पार्टी में उतना ऊंचा नहीं हुआ है जो अमित शाह को टक्कर दे सकें. ऐसे में माना यही जा रहा है कि 2024 का लोकसभा चुनाव अमित शाह के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा और उनके कद के आगे राजनाथ सिंह भी अपनी आवाज तेज नहीं कर पाएंगे.