कौन जीतेगा-कौन हारेगा अब होगा विधानसभा में ही तय, फ्लोर टेस्ट नहीं बल्कि सामान्य बिल होगा पेश

सोमवार से संभावित संक्षिप्त विधानसभा सत्र के दौरान फ्लोर टेस्ट के बजाए जनता की भलाई से जुड़ा कोई बिल पेश मुख्यमंत्री गहलोत सदन में पेश करेंगे, ऐसे में कांग्रेस की ओर से अपने सभी विधायकों के लिए व्हिप जारी किया जाएगा, उसके बाद नहीं आने वाले या बिल के समर्थन में वोटिंग नहीं करने वाले विधायकों की जाएगी विधायकी

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गहलोत Vs पायलट विधानसभा में होगा तय
गहलोत Vs पायलट विधानसभा में होगा तय
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Politalks.News/Rajasthan. जिन पलों का सबको इंतजार है, वो समय नजदीक आता जा रहा है. राजस्थान की सियासत के नंबर गेम के असली खुलासे की तैयारी हो रही है. यानि अब लुका छुपी, कोर्ट कचहरी नहीं बल्कि सीधे-सीधे विधानसभा में सारा सियासी घमासान तय होगा. किसका खेल कितना बड़ा, किसके पास कितने विधायक. सरकार रहेगी या जाएगी, अब सब कुछ विधानसभा में तय होगा. पिछले एक महीने से कांग्रेस में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व पीसीसी चीफ सचिन पायलट के बीच चल रहा वर्चस्व का संघर्ष कांग्रेस की बैठकों से बाहर निकल कर पहले हाईकोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. हाईकोर्ट को कल फैसला सुनाना है, जबकि सुप्रीम कोर्ट सुनवाई ने प्राथमिक सुनवाई के बाद निर्णय दिया कि इस मामले को लेकर सोमवार को सुनवाई होगी.

मामला बहुत रोचक होता जा रहा है. ऐसे में जानकारी आ रही है कि सीएम गहलोत सोमवार को विधानसभा का सत्र बुलाने की तैयारी कर रहे हैं. यहां सबसे ज्यादा कयास इस बात के लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी या फिर कोई और विपक्षी दल फलोर टेस्ट की मांग करें या नही सीएम अशोक गहलोत खुद ही फलोर टेस्ट कराने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं हैं, पॉलिटॉक्स का आंकलन है कि मुख्यमंत्री गहलोत फ्लोर टेस्ट की मांग नहीं करेंगे इसमें तो सरकार गिरने का खतरा बहुत ज्यादा है. अगर सभी बागी विधायक फ्लोर टेस्ट में पहुंचते हैं और सरकार के खिलाफ वोटिंग कर देते हैं, वहीं 4 से 5 गहलोत खेमे के मौजूदा विधायक भी बागी विधायकों का साथ दे देते हैं तो फिर सीएम गहलोत के पास सरकार बचाने का कोई विकल्प नहीं बचेगा, क्योंकि फ्लोर टेस्ट का अंतिम ब्रह्मास्त्र वो चल चुके होंगे. बाद में आप बागी विधायकों के खिलाफ चाहे जो एक्शन लेते रहो, लेकिन सरकार तो गिर ही जाएगी.

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क्या हो सकता है अब आगे
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निवेदन के बाद अगर राज्यपाल कलराज मिश्र सोमवार को विधानसभा सत्र बुलाते हैं, तो सीएम गहलोत इस संक्षिप्त विधानसभा सत्र के दौरान जनता की भलाई से जुड़ा कोई बिल पेश सदन में पेश करेंगे. ऐसे में कांग्रेस की ओर से अपने सभी विधायकों के लिए व्हिप जारी किया जाएगा. जिसके तहत कांग्रेस पार्टी सचिन पायलट सहित सभी 19 बागी विधायकों पर भी तमाम कानूनी पेचीदगियों के बावजूद व्हिप लागू होगा. इसके साथ ही विधानसभा सत्र से पहले कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई जाएगी, उसमें भी सभी बागी विधायकों को आना होगा अनिवार्य. ऐसे में व्हिप की पालना में जो विधायक उपस्थित रहेंगे वो कांग्रेस में बने रहेंगे और जो सदन में नहीं आएंगे या आने के बाद सरकार का साथ न देते हुए पस्तुत बिल के अगेंस्ट वोटिंग करते हैं या वोटिंग नहीं भी करते हैं तो उन सभी विधायकों की सदस्यता समाप्त करने से कोई भी हाइकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट विधायिका को नहीं रोक पाएगा.

विधानसभा स्पीकर व्हिप के अनुपालना में उपस्थित नहीं होने वाले, उपस्थित होने बाद भी सरकार के बिल के पक्ष में वोटिंग नहीं करने वाले या अगेंस्ट वोटिंग करने वाले कांग्रेस विधायकों को नोटिस जारी करेंगे. विवेक के आधार पर उनको विधानसभा सदस्यता से बर्खास्तगी करेंगे. जानकारों के अनुसार व्हिप जारी होने के बाद कांग्रेस के सभी विधायकों को सदन में सरकार की ओर से प्रस्तुत बिल के पक्ष में होने वाली वोटिंग में ना सिर्फ भाग लेना होगा, बल्कि सरकार के पक्ष में मतदान भी करना पड़ेगा. ऐसा नहीं करने वाले विधायकों की विधायकी समाप्त हो जाएगी. अगर गहलोत सरकार यह प्रोसेस पूरा कर लेती है तो फिर कानूनी पहलुओं में वो पूरी तरह मजबूत हो जाएगी.

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मतलब साफ है कि गहलोत सरकार के पास जब फ्लोर टेस्ट करवाए बिना जंग जितने का हथियार है तो क्यों फ्लोर टेस्ट के ब्रह्मास्त्र को अभी चलाया जाएगा. हां अगर बीजेपी या अन्य कोई विपक्षी दल फ्लोर टेस्ट की मांग करता है और मुख्यमंत्री गहलोत को अपना बहुमत साबित करने के लिए परिक्षण देना भी पड़ा तो गहलोत खेमा इसके लिए भी तैयार है. ऐसे में अब सारा खेल संख्या बल पर निर्भर हो जाता है. किसके पास कितनी संख्या यह विधानसभा में ही साफ होगा.

माना जा रहा है कि यदि कल हाईकोर्ट से पायलट खेमे को राहत मिल जाती है तो वो कांग्रेस में बने रहेंगे. लेकिन कांग्रेस से जारी होने वाले व्हिप के अनुसार ही उन्हें चलना होगा. यानि सीएम अशोक गहलोत का यह दांव सबसे भारी दांव के तौर पर देखा जा सकता है. वहीं सचिन पायलट खेमे का दावा है कि उनके पास 30 विधायकों का समर्थन प्राप्त है. जबकि मुख्यमंत्री गहलोत का दावा है कि सरकार को चलाने के लिए जितने वोट होने चाहिए उससे ज्यादा ही विधायक मेरे पास हैं, यानी बहुमत मेरे पास है.

आपको बताते हैं सत्ता का गणित
पायलट खेमा – 19 + 3 निर्दलीय यानि 21
बीजेपी खेमा – 72 + 3 आरएलपी यानि 75

गहलोत खेमा – पायलट के 19 कांग्रेस विधायक हटा दिए जाएं तो गहलोत खेमे में कांग्रेस के कुल 107 में से 88 विधायक हैं. इसके साथ ही 10 निर्दलीय, 2 बीटीपी, सीपीएम के 2, लोकदल से 1 विधायक. यानि सबको मिला दिया जाएग तो गहलोत खेमे में इस समय कुल 103 विधायक हैं. इसमें सीपीएम के एक विधायक ने अभी पूरी तरह सरकार को समर्थन देना स्वीकार नहीं किया है लेकिन सम्भावना जताई जा रही है कि उनका समर्थन मुख्यमंत्री गहलोत को ही मिलेगा. वहीं मास्टर भंवर लाल शर्मा मेदांता अस्पताल में गम्भीर बीमारियों से जूझ रहे हैं ऐसे में उनका समर्थन किसके साथ होगा यह स्पष्ट अभी नहीं है, वैसे मास्टर को पायलट खेमे के माना जाता है.

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किसी भी स्थिति में विधानसभा में यदि 200 विधायक मतदान करते हैं तो मुख्यमंत्री गहलोत को बहुमत के लिए 101 विधायक चाहिए. जो किसी भी हाल में उनके पास मौजूद है. यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कांग्रेस के एक विधायक विधानसभा के स्पीकर बन चुके हैं. ऐसे में विधानसभा का संख्या बल 199 होता है. लेकिन विशेष परिस्थितियों में स्पीकर का वोट भी गिना जा सकता है.

वहीं अगर दूसरी स्थिति बनती है यानी अगर ऐसा हो जाता कि पायलट खेमे के विधायकों की बर्खास्तगी हो जाए तब दूसरी स्थिति में मतदान होगा. विधानसभा का 200 का संख्या बल 19 विधायक हटाने के बाद 181 पर आ जाएगा. ऐसे में गहलोत कोे बहुमत साबित करने के लिए 91 विधायकों की जरूरत होगी.

अब फिर से समझिए आखिरी स्थिति
बीजेपी खेमा – 75 विधायक और पायलट खेमे के तीन निर्दलीय विधायक भी अगर भाजपा के समर्थन में आते हैं तो भाजपा खेमे का संख्या बल 75 से 78 पर पहुंच जाएगा. यानि यदि बीजेपी सरकार बनाने की कोशिश करती है तो उसे 13 विधायकों की जरूरत होगी.

वहीं बागी बने पायलट सहित 18 कांग्रेस विधायक और उनके साथ 3 निर्दलीय विधायक को हटा दिया जाए तो भी गहलोत खेमे में 103 नहीं तो 101 विधायक बने हुए हैं. ऐसे में यह कहना बिलकुल गलत नहीं होगा कि अब जो भी होगा विधानसभा में ही होगा.

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खड़ी हो चुकी है कानूनी पेचीदगी

एक ही तरह का मामला हाईकोर्ट और सुुप्रीम कोर्ट में लंबित हो गया है. चूंकि मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है, इसलिए हाईकोर्ट अपने फैसले को रोक सकता है. यदि सुप्रीम कोर्ट विधानसभा स्पीकर की याचिका के पक्ष में निर्णय दे देता है, तो हाईकोर्ट द्वारा स्पीकर की ओर से की जाने वाली कार्रवाई पर रोक का आदेश स्वत ही समाप्त हो जाएगा.

अब सब कुछ सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बैंच के निर्णय पर निर्भर हो गया है. लेकिन इन सबसे हटकर गहलोत सरकार विधानसभा का सत्र बुला सकती है. उससे पहले विधायक दल की बैठक भी होगी और दोनों में बागी विधायकों को उपस्थित होना ही होगा.

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