कर्नाटक: विधानसभा में इस तरह रहेगा सत्ता का सियासी गणित

कर्नाटक में सियासी संकट टल तो नहीं रहा है लेकिन अब आखिरी पड़ाव नजर आने लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने इस्तीफों पर आए बवंडर को साफ करते हुए विधायकों पर सत्र में आने या नहीं आने का निर्णय छोड़ दिया. कल विधानसभा सत्र के दौरान गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी विश्वासमत प्रस्ताव पेश करेंगे. इस दौरान सत्ता की सियासी गणित क्या कहती है, यह तो सभी जानते हैं लेकिन कैसी रहती है, इसे जानना भी जरूरी है. आइए जानते हैं कि सदन में सत्ता की पहेली किस तरह से काम करेगी. दरअसल, कर्नाटक विधानसभा में निर्वाचित विधायकों की संख्या 224 है. अगर विश्वासमत के दौरान कांग्रेस के 16 बागी … Read more

अगले 6 महीनों तक कांग्रेस रहेगी नेतृत्वविहीन, अगले साल मिलेगा नया कप्तान!

इस बात में कोई शक नहीं है कि कांग्रेस पार्टी अपने कप्तान के बिना नेतृत्वविहीन होकर बिखरने लगी है. कर्नाटक और गोवा में जो होगा, इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं. राहुल गांधी के अपने इस्तीफे को सार्वजनिक करने के बाद उनकी फिर से पार्टी की कमान संभालने की संभावनाएं एकदम क्षीण हो चुकी हैं.

कांग्रेस आलाकमान लाख कोशिशों के बाद भी संगठन को नया अध्यक्ष नहीं दिला पाया. अब कांग्रेस के सियासी गलियारों से यह खबर आ रही है कि अगले 6 माह तक कांग्रेस को नया अध्यक्ष नहीं मिलेगा. अगले साल ही इस बारे में कोई फैसला लिया जाएगा. सीड्ब्ल्यूसी की बैठक का आहूत न होना इस बात का साफ संकेत देता है.

सभी की उम्मीदों और सभी तरह की संभावनों को पीछे छोड़ अब कांग्रेस को टीम का नया कप्तान दिल्ली विधानसभा चुनाव या फिर अगले साल के केंद्रीय बजट के बाद ही मिलेगा, यह पक्का है. पता चला है की मौजूदा समय में कांग्रेस आलाकमान अध्यक्ष पद पर नहीं बल्कि कांग्रेस शासित प्रदेशों में अपनी सरकारें बचाने में लगा है. आगामी 6 महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं. इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर लोकसभा हार को भुलाने की रणनीति पर भी काम हो रहा है.

सियासी झरोखों से खबर तो यह भी आ रही है कि एकदम से कर्नाटक और गोवा में दल बदल के बाद कांग्रेस को राजस्थान और मध्यप्रदेश में गठबंधन के पायों पर टिकी सत्ता की कुर्सी खिसकने का भय लग रहा है. ऐसे में दोनों राज्यों में चल रही गुटबाजी को समाप्त करने के प्रयासों में पार्टी जुटी हुई है. यही वजह है कि 51 दिन बाद भी पार्टी नेतृत्वविहीन है फिर भी आलाकमान चुप्पी साधे बैठा है.

दरअसल हुआ कुछ यूं कि सभी पार्टी नेताओं ने सबसे पहले राहुल गांधी को ही मनाने की जिद पकड़ी थी लेकिन इस बाद राहुल गांधी अपना फैसला नहीं बदला. इसके बाद वरिष्ठ नेताओं ने एक अन्य विकल्प सुझाया है. इसके अनुसार, संगठन के महासचिवों को विशेष अधिकार दे दिए जाएं ताकि जिन राज्यों में चुनाव हैं, वहां के फैसले वे आसानी से ले सकें. इसी बीच पार्टी के चुनाव की प्रक्रिया को भी शुरू कर दिया जाए. 4 राज्यों में जब चुनाव समाप्त हो जाएंगे, तब तक महासचिव अपने-अपने राज्यों का कार्यभार संभालते रहेंगे. उसके बाद पार्टी के नए अध्यक्ष का चुनाव भी कर लिया जाएगा.

हालांकि यह तीसरा रास्ता यूं ही नहीं निकाला गया है. इससे पहले ऐके एंटनी, सुशील कुमार शिंदे, अशोक गहलोत सहित कई नाम अध्यक्ष के तौर पर सामने आए थे लेकिन सभी ने इस जिम्मेदारी को लेने से साफ तौर पर इनकार कर दिया. इसकी वजह शायद यह रही कि सभी नेताओं को यही लगा कि पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद भी असली कंट्रोल तो सोनिया-राहुल-प्रियंका की तिगड़ी के हाथ में ही रहेगी और शायद यह सच भी है.

हालांकि यह तो तय है कि 21 साल बाद कांग्रेस की कमान फिर से एक बार नेहरू-गांधी परिवार से बाहर किसी और नेता के हाथ में होगी. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बाद ‘गांधी परिवार’ से सोनिया गांधी 1998 में पार्टी अध्यक्ष बनीं और 2017 तक इस पद पर रहीं.

इस दौरान कांग्रेस 10 साल तक केंद्र की सत्ता पर काबिज रही और डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने. इसके बाद राहुल गांधी की ताजपोशी हुई. अब इस पार्टी की लगाम किसी गैर गांधी नेता के हाथों में संभलाई जाएगी. इन सभी बातों पर गौर करते हुए माना यही जा रहा है कि कांग्रेस को नेतृत्वकर्ता के लिए कुछ महीने और इंतजार करना पड़ेगा.

क्या ‘ममता दीदी’ की राह पर चल पड़ी हैं मायावती?

क्या सच में बसपा सुप्रीमो मायावती बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नक्शे कदम पर चलने की दिशा में कदम बढ़ा रही है या उन जैसी बनने की कोशिश कर रही है? इस बात पर हर कोई कहेगा कि बिलकुल नहीं. इसकी वजह है कि ममता बनर्जी और मायावती की छवि बिलकुल अलग है.

एक ओर ममता दीदी बिलकुल बेबाक और दबंग छवि वाली महिला है. वहीं मायावती एक राजनीतिज्ञ की तरह सोचती हैं. उस दौरान अगर थोड़ा झुकना भी पड़े तो उन्हें बिलकुल नहीं अखरता. लोकसभा में समाजवादी पार्टी के साथ बरसों पुराने क्लेश भुलाकर अखिलेश यादव से गठबंधन करना इसका परिचय देता है. वहीं ममता बनर्जी बीजेपी सरकार से चुनावों से पहले और बाद में भी अकेली लोहा ले रही हैं. इतनी दबंगई तो कांग्रेस तक नहीं दिखा पा रही है.

देखा जाए तो काफी हद तक ये सभी बातें बिलकुल सही हैं लेकिन मौजूदा हालातों में जो मायावती कर रही हैं, उनकी छवि ममता बनर्जी से कमतर आंकना भी ठीक नहीं है. सोशल मीडिया पर हाल के दिनों में बीजेपी पर किए जा रहे प्रहार और बेबाक ट्वीट इस बात को साबित करते हैं. लोकसभा चुनावों में प्रचार के दौरान मायावती की यही छवि देखने को मिली. उन्होंने सपा हो या बसपा, दोनों पार्टियों की चुनावी सभाओं में गजब का समां बांधा. अब सोशल मीडिया पर उनकी इसी बेबाक छवि की झलक फिर से देखी जा सकती है.

माया और ममता दोनों में इन दिनों एक खास समानता और देखने को मिल रही है और वो है ‘जय श्री राम’ के नारे से चिढ़ जिसकी खीज़ बीजेपी पर निकल रही है. पं.बंगाल में लोकसभा चुनाव प्रचार और उसके बाद भी ममता बनर्जी को ‘जय श्री राम’ के नारों से जमकर परेशान किया गया. इस मामले में बीजेपी कार्यकर्ताओं सहित कई अन्य लोगों की गिरफ्तारी भी हुई. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह तक ने कहा कि पता नहीं ममता दीदी को जय श्री राम से चिढ़ क्यों है. अब बसपा सुप्रीमो मायावती को भी कुछ इसी तरह की दिक्कत होने लगी है.

हाल में मायावती ने अपने ट्वीटर हैंडल से इस संबंध में ट्वीट किया है. उन्होंने ट्वीटर पर पोस्ट किया, ‘यूपी सहित कुछ राज्यों में जबरन अपने धार्मिक नारे लगवाने व उस आधार पर जुल्म-ज्यादती की जो नयी गलत प्रथा चल पड़ी है, वह अति-निन्दनीय है. केन्द्र व राज्य सरकारों को इस हिंसक प्रवृति के विरूद्ध सख्त रवैया अपनाने की जरूरत है ताकि भाईचारा व सद्भावना हर जगह बनी रहे व विकास प्रभावित न हो.’

इससे पहले मायावती ने नरेंद्र मोदी सरकार पर बजट 2019 और ईवीएम को लेकर भी निशाना साधा था. यहां तक कि बीजेपी सरकार की तुलना फ्रांसीसी क्रांति से कर दी. मायावती ने कहा था, ‘आज बीजेपी सरकार में देश क्या उसी रास्ते पर चल रहा है जिस प्रकार फ्रांसीसी क्रान्ति के समय कहा गया कि अगर लोगों के पास खाने को रोटी नहीं है तो वे केक क्यों नहीं खाते? वास्तव में जुमलेबाजी त्याग कर सरकार को देश की 130 करोड़ जनता की मूलभूत समस्याओं के प्रति गंभीर होना होगा.’

लोकसभा चुनाव के बाद इस तरह का बेबाकपन तो ममता बनर्जी के श्रीमुख पर ही देखा गया. देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस और उसके दिग्गज़ नेता जिस बीजेपी की आंधी का सामना नहीं कर पाए, उनके सामने ममता बनर्जी बिना किसी सहारे के दबंगई के साथ टिकी रहीं. चुनावों के समय अमित शाह और यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ के चौपर को उन्होंने बंगाल की जमीं पर उतरने तक नहीं दिया. उनके करारे प्रहारों और जुबानी जंग का जवाब नरेंद्र मोदी तक के पास नहीं है. पीएम मोदी ने खुद कहा था कि अगर ‘दीदी’ थप्पड़ भी मार दें तो वो सहन कर लेंगे. यह उनकी बेबाकी का ही नतीजा है.

हाल में बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने भी ममता बनर्जी के बढ़ते सियासी कद को आंकते हुए कहा कि बीजेपी के बाहुबल के सामने कांग्रेस, टीएमसी और एनसीपी को एकजुट होना चाहिए और इस एकजुट कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी को बनना चाहिए.

फिलहाल मायावती उस लेवल तक तो नहीं आ पायी है लेकिन अपनी बेबाकी से उस दिशा में कदम जरूर बढ़ा रही है. लोकसभा में यूपी महागठबंधन को मिली करारी शिख्स्त के बाद सपा का साथ छोड़ अकेले उपचुनाव लड़ना और अब लगातार बीजेपी पर करारे प्रहार उन्हें ममता दीदी के नक्शे कदम पर ले जा रहे हैं. ‘जय श्री राम’ मुद्दे पर उनकी यह ठसक भी दोनों में समानता जाहिर कर रही है. अब तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि मायावती सियासी होड़ में ‘ममता दीदी’ के कितना समकक्ष आ पाती हैं.

कर्नाटक के सियासी घमासान के शोर के बीच गोवा में हुआ बीजेपी का ‘साइलेंट ऑपरेशन लोटस’

लगता है लोकसभा चुनाव में करारी हार का काला साया कांग्रेस का जल्द पीछा नहीं छोड़ेगा. कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार पर सत्ता जाने का खतरा थमा भी नहीं था कि गोवा में पता नहीं कहां से ‘साइलेंट ऑपरेशन लोटस’ की आंधी आई और कांग्रेस के विधायकों को बहा ले गयी. यह इतना जल्दी और गुपचुप में हुआ कि किसी को कानोकान खबर तक नहीं हुई. दरअसल गोवा में कांग्रेस के 10 विधायक बीजेपी में शामिल हो गए हैं. चौकाने वाली बात यह है बीजेपी में शामिल होने वाले विधायकों की लिस्ट में गोवा कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष चंद्रकांत कावलेकर का नाम भी शामिल हैं.

‘हाथ’ का साथ छोड़ ‘कमल’ की शरण में जाने वाले सभी बागी विधायकों ने आज सीएम प्रमोद सावंत के साथ दिल्ली में बीजेपी के चाणक्य अमित शाह और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा से मुलाकात की. हालांकि इस बारे में किसी ने भी अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है. गोवा सीएम ने इतनाभर जरूर कहा है कि बीजेपी ने किसी कांग्रेस MLA को तोड़ने की कोशिश नहीं की और वे खुद आकर पार्टी में शामिल हुए हैं.

इससे पहले बीजेपी में शामिल होने से पहले कांग्रेस के उक्त सभी 10 विधायकों ने विधानसभा स्पीकर को अलग ग्रुप बनाने की चिट्ठी दी थी. इसके बाद सभी विधायक बीजेपी में शामिल हो गए. चूंकि पार्टी छोड़ने वाले विधायकों की संख्या 2 तिहाई से ज्यादा है. इस वजह से इन विधायकों पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा.

गोवा में आए ‘साइलेंट ऑपरेशन लोटस’ की सफलता के पीछे सीएम प्रमोद सावंत की अहम भूमिका रही है जिन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद मार्च, 2019 में प्रदेश की सत्ता का भार सौंपा गया है. उनके सारथी का किरदार निभाया अतानासियो मोनसेराते ने, जो कांग्रेस के टिकट पर हाल ही में पणजी सीट से उपचुनाव जीत विधानसभा में पहुंचे हैं. मोनसेराते ने चंद्रकांत कावलेकर के साथ मिलकर बीजेपी के लिए ‘साइलेंट ऑपरेशन लोटस’ को अमली जामा पहना दिया. इसके बाद सत्ताधारी पार्टी ने बहुमत से कहीं ज्यादा विधायकों की संख्या जुटा ली. हालांकि सभी बागी विधायकों का नेतृत्व करते हुए कावलेकर ने सीएम प्रमोद सावंत और गोवा सरकार के अच्छे कार्यों का हवाला देते हुए बीजेपी में शामिल होने की बात कही है.

10 विधायक जाने के बाद अब कांग्रेस के पास गोवा विधानसभा में केवल 5 विधायक बचे हैं. ताज्जुब की बात यह है कि 2017 में हुए गोवा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस 15 सीट जीत प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. कुल 40 सीटों में से 13 सीटों पर बीजेपी के विधायक जीतकर आए. कम सीटें होने के बाद भी बीजेपी ने अन्य विधायकों के साथ मिलकर गठबंधन में सरकार बनाई. बाद में 5 सीटों पर हुए उपचुनावों में से बीजेपी ने 4 सीटों पर कब्जा जमा लिया. अब 10 कांग्रेस बागियों के आने के बाद बीजेपी के पास 27 विधायक हो गए हैं. गोवा फॉरवर्ड पार्टी के तीन और 3 निर्दलीय विधायक पहले से ही बीजेपी को समर्थन दे रहे हैं.

खैर जो भी हो लेकिन बीजेपी ने गोवा में ‘साइलेंट ऑपरेशन लोटस’ चलाकर एक तीर से दो निशाने साधे हैं. पहला तो ये कि उन्होंने गठबंधन सरकार से आगे बढ़ते हुए जादूई बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया. यह संख्या बहुमत से कहीं ज्यादा है. दूसरा, विपक्ष में बैठी कांग्रेस को इतना कमजोर कर दिया है कि अब वह किसी भी मुद्दे पर आवाज तक नहीं उठा पाएगी.

ज्योतिरादित्य सिंधिया के हाथ आएगी कांग्रेस की कमान!

राहुल गांधी के इस्तीफे के सार्वजनिक होने के बाद कांग्रेस में इस्तीफों का दौर जारी है. कल मुम्बई कांग्रेसाध्यक्ष मिलिंद देवड़ा के अपने पद से इस्तीफा देने की कुछ समय बाद ही कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पश्चिमी उत्तरप्रदेश के प्रभारी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कल शाम अपने पद इस्तीफा दे दिया. दोनों ही कांग्रेस के युवा नेता हैं.

हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए बयान दिया कि ‘अब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में एक गतिशील युवा नेता की उम्मीद है. CWC से आग्रह है कि युवा भारत की युवा आबादी के लिए युवा नेता की जरूरत पर ध्यान दें.’ कैप्टन के इस ताजा बयान के बाद से कांग्रेस के नए अध्यक्ष के तौर पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम की अटकलें शुरू हो गई हैं. हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया को हाल में हुए लोकसभा चुनाव में गुना सीट से हार का सामना करना पड़ा है.

स्व. माधवराव सिंधिया के पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजनीति की सौगात विरासत में मिली है. उनके पिता 9 बार लगातार सांसद रहे और कभी चुनाव नहीं हारे. फिर चाहे उन्होंने चुनाव निर्दलीय लड़ा हो या फिर कांग्रेस के झंडे के नीचे. अपने पिता के निधन के बाद हावर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 2002 में पहली बार राजनीति में कदम रखा और मध्यप्रदेश की गुना लोकसभा सीट से जीत हासिल की. उन्होंने अपने प्रतिद्धंदी बीजेपी के देशराज सिंह यादव को करीब साढ़े 4 लाख वोटों से मात दी. 2014 में मोदी लहर के बावजूद उन्होंने गुना संसदीय सीट से एक लाख से अधिक वोटों से जीत दर्ज की थी.

उनके राजनीतिक सोच और रणनीति का ही नतीजा था कि 2018 के विधानसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में उनके नेतृत्व में बीजेपी के शिवराजसिंह चौहान की प्रभुता समाप्त हुई और सत्ता की बागड़ौर कांग्रेस के हाथ में आई. उस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी जताई थी. हालांकि गांधी परिवार का नजदीकी होने का फायदा उठा कमलनाथ सीएम की कुर्सी पर काबिज हो गए, लेकिन इस घटना से ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक कद का अहसास लोगों को भलीभांति हो गया.

राहुल गांधी के इस्तीफा देने के बाद सियासी गलियारों में उनका नाम कहीं शामिल नहीं था लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री कै. अमरिन्दर सिंह के किसी युवा हाथों में पार्टी की कमान सौंपने संबंधित हालिया बयान के बाद अचानक से कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ में ज्योतिरादित्य सिंधिया शामिल भी हुए और सबसे आगे वाले पायदान पर आकर खड़े हो गए. मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के दफ्तर के बाहर पोस्टर लगाकर राहुल गांधी से की जा रही अध्यक्ष बनाने की मांग ज्योतिरादित्य सिंधिया के बढ़ते राजनीतिक कद और लोकप्रियता को बयां करती है.

सिंधिया के समर्थन में जो पोस्टर लगा है, उस पर लिखा है, ‘आदरणीय राहुल गांधी जी से अपील, हमारे देश के गौरव एवं मध्य प्रदेश के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को उनकी कार्यशैली के अनुरूप राष्ट्रीय नेतृत्व देने की अपील.’ हालांकि इस पोस्टर पर किसी नेता का नाम नहीं है. पोस्टर पर समस्त कार्यकर्ता मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी लिखा है. ये काम किसी ने भी किया हो लेकिन केंद्रीय संगठन में चल रही उठापटक के बीच ज्योतिरादित्य सिंधिया का इस तरह लोकमत हासिल करना उन्हें मध्यप्रदेश के सीएम कमलनाथ के बराबर लाकर खड़ा कर रहा है.

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश विधानसभा से ही प्रदेश में सिंधिया और कमलनाथ के दो धड़े बन गए थे. चुनाव परिणाम के बाद दोनों धड़ों ने अपने-अपने नेता को सीएम कुर्सी संभलवाने की बात आलाकमान तक पहुंचाई थी. मामला उलझते देख राहुल गांधी ने ज्योतिरादित्य को बहला-फुसला कर बड़ी चालाकी से कमलनाथ को सत्ता की बागड़ौर संभला दी. लेकिन टकराव यहां खत्म नहीं हुआ और लोकसभा में फिर से ये धड़ा अलग-अलग राजनीति करते नजर आया.

हालांकि खामियाजा ज्योतिरादित्य सिंधिया को हुआ और गुना लोकसभा सीट से उन्हें अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा. दूसरी ओर, कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ को छिंदवाड़ा से एकमात्र जीत हासिल हुई. हालांकि इस जीत का नकुलनाथ और कमलनाथ को कितना फायदा हुआ, इसका तो पता नहीं लेकिन यह हार भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए फायदे का सौदा लेकर आती दिख रही है.

यह तो तय है कि राहुल गांधी अब अध्यक्ष पद से अपना इस्तीफा वापिस नहीं लेंगे. अब कै.अमरिन्दर सिंह के बयान और सीनियर नेताओं को खुद ही रास्ता साफ कर देने की नसीयत के बाद आलाकमान भी इस बारे में विचार कर रहा है. राहुल भी युवा चेहरे को बागड़ौर संभलाने में इच्छुक हैं. ऐसे में युवा चेहरे के तौर पर ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट का नाम सबसे पहले आता है. लेकिन इस रैस में सिंधिया आगे माने जा रहे हैं. अगर आलाकमान युवा चेहरे को मौका देता है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस का नया कप्तान बनना तय है. साथ ही मिलिंद देवड़ा को केंद्र में नई जिम्मेदारी मिल जाए तो इसमें ताज्जुब की कोई बात नहीं होगी.

कर्नाटक: JDS-कांग्रेस गठबंधन और बीजेपी के बीच खड़े हैं विधायक एच. नागेश, जिसकी तरफ गए सरकार उसकी

कर्नाटक में सियासी ड्रामा खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है. धीरे-धीरे जेडीएस-कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार के सभी सैनिक रण छोड़ भाग खड़े हुए हैं या फिर सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे हैं. मई, 2018 में सत्ता की कमान मिलने से अब तक इस मिलीजुली सरकार की राह कभी भी आसान नहीं रही. एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप तो चलते ही रहे लेकिन अब हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि एक झटका और सरकार ढेर. अब सभी की नजरें मंगलवार पर टिकी हुई हैं. कल जैसे ही विधानसभा सदन खुलेगा, सरकार के भविष्य का फैसला हो जाएगा.

दरअसल शनिवार को सरकार के 13 विधायकों ने एक साथ विधानसभा सचिव को अपना त्यागपत्र सौंप दिया. इनमें 10 विधायक कांग्रेस और 3 जेडीएस के हैं. विधानसभा स्पीकर के.आर. रमेश कुमार की अनुपस्थिति में अभी तक ये त्यागपत्र स्वीकार नहीं हुए हैं. आज स्पीकर कार्यालय बंद होने से मंगलवार तक परिणाम नहीं आएंगे लेकिन जब आएंगे, सारी स्थिति पल भर में साफ हो जाएगी.

अगर ये सभी इस्तीफे स्वीकार होते हैं जिसकी संभावना काफी ज्यादा है तो ऐसे में निर्दलीय विधायक नागेश जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन और बीजेपी के बीच की मुकाबले की अहम कड़ी साबित होंगे. 9 जुलाई को कर्नाटक की सियासी गणित कुछ इस प्रकार बैठेगी कि कर्नाटक विधानसभा में कुल 225 सदस्य होते हैं, इनमें एक सदस्य मनोनीत होता है. मई, 2018 में कुल 224 सीटों पर विधानसभा चुनाव हुए थे. बीजेपी को 105, कांग्रेस को 79, जेडीएस को 37 सीटें मिली थी. 2 निर्दलीय और एक सीट बसपा के खाते में गई थी. बाद में एक निर्दलीय विधायक ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. बाकी एक निर्दलीय विधायक और बसपा विधायक ने गठबंधन को समर्थन दिया जिससे गठबंधन सरकार के विधायकों की संख्या 119 हो गई. इसमें एक विधायक विधानसभा अध्यक्ष पद पर नियुक्त है. इस तरह कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार 118 विधायकों (कांग्रेस-79, जेडीएस-37, निर्दलीय-1, बीएसपी-1) के समर्थन से चल रही थी.

इन 13 विधायकों के इस्तीफों के बाद विधानसभा सदस्यों की संख्या 224 से घटकर 211 रह जाएगी. इनमें एक सीट स्पीकर की है. यानी अगर इन सभी विधायकों के इस्तीफे स्वीकार होते हैं तो बहुमत का हिसाब 210 सीटों पर लगाया जाएगा और किसी भी पार्टी को सरकार में रहने के लिए 106 विधायकों के समर्थन की जरूरत होगी.

अब 13 विधायकों के इस्तीफे देने के बाद अब जेडीएस और कांग्रेस दोनों पार्टियों के पास कुल 104 विधायक शेष हैं. बसपा का समर्थन अभी भी पार्टी को प्राप्त है. ऐसे में गठबंधन विधायकों की संख्या 105 हो जाती है जो समर्थन से एक विधायक दूर है. बीजेपी के पास भी इतने ही विधायक हैं. ऐसे में जब कर्नाटक विधानसभा अध्यक्ष के.आर. रमेश कुमार दोनों पार्टियों को बहुमत पेश करने को कहेंगे तो उस समय निर्दलीय विधायक नागेश की भूमिका अहम हो जाएगी.

बीजेपी और गठबंधन दोनों को ही बहुमत के लिए केवल एक विधायक की जरूरत होगी. ऐसे में नागेश जिस भी पार्टी को समर्थन देंगे, सरकार उसी की बनना निश्चित है. मौजूदा हालातों को देखते हुए तो कहा जा सकता है कि प्रदेश में सरकार बीजेपी की बनती ​दिख रही है क्योंकि नागेश ने राज्यपाल को एक ​खत लिखकर कांग्रेस समर्थन को वापिस लेने की बात कही है. अगर ऐसा होता है तो गठबंधन सरकार का गिरना तय है.

हालांकि यह तो निश्चित है कि नागेश जिस भी तरफ जाएंगे, उनका मंत्री बनना पक्का है. अब सबसे पहले देखना तो यह होगा कि विधानसभा अध्यक्ष इन सभी विधायकों के इस्तीफे मंजूर करेंगे या नहीं. उसके बाद अगर बहुमत साबित करने की नौबत आती है तो यह दिलचस्प होगा विधायक नागेश ‘हाथ’ पकड़ते हैं या फिर ‘कमल’ की ओट में जाते हैं.

कर्नाटक में सरकार पर आए संकट के पीछे ऑपरेशन लोटस है या खुद सिद्धारमैया

कर्नाटक में जेडीएस-कांग्रेस की गठबंधन सरकार बिखरती नजर आ रही है. कर्नाटक में सियासी रंग जिस तरह से बदल रहा है, उससे लगता तो यही है कि संकट के बादल कभी भी सरकार को घेर सकते हैं. यहां गठबंधन सरकार को एक साल भी पूरा नहीं हुआ है और इसके गिरने की नौबत आ खड़ी हुई है. हालांकि 2018 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद से ही यहां सियासी ड्रामा शुरू हो गया था.

कर्नाटक में कुल 224 विधानसभा सीटें हैं. बहुमत के लिए चाहिए 113 विधायक. विधानसभा चुनावों में बीजेपी को 104 सीटों पर जीत मिली थी और समर्थन के लिए केवल 9 विधायकों की दरकार थी. वहीं कांग्रेस के पास 80 और जेडीएस के पास 38 विधायक थे, 2 सीटें अन्य पार्टियों के हिस्से आई थी. कर्नाटक के राज्यपाल ने विरोध के बावजूद बीजेपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था. विरोध और बढ़ते हाई प्रेशर सियासी ड्रामे के बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद कांग्रेसी नेताओं के साथ धरने पर बैठ गए थे. हालांकि बीजेपी समर्थन के अभाव में सरकार बनाने से चूक गई और कुमार स्वामी के नेतृत्व में जेडीएस-कांग्रेस की मिली जुली सरकार बनी.

इस गठबंधन सरकार के पिछले एक साल में जेडीएस के नेताओं और पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बीच सियासी ड्रामा चलता रहा है. महीना खत्म न होता और कुछ न कुछ ऐसा हो जाता कि जेडीएस और कांग्रेसी नेताओं में रार पड़ जाती. इस पर न तो कुमार स्वामी कुछ बोल पाये न ही सिद्धारमैया और न ही कांग्रेस आलाकमान ने इसको गम्भीरता से लिया, ऐसा चलता रहा रार बढ़ती गई और अब आने वाला परिणाम सबके सामने है.

वर्तमान में जेडीएस और कांग्रेस के सामने वही स्थिति आ खड़ी हुई है जैसी दोनों पार्टियों ने मिलकर बीजेपी के सामने खड़ी की थी. विधानसभा चुनावों के परिणाम के बाद बीजेपी ने 9 विधायकों को अपनी ओर मिलाने की अथाह कोशिश की लेकिन दोनों पार्टियों ने अपने विधायकों की ऐसी घेराबंदी की कि बीजेपी लाख हाथ-पैर मारने के बाद भी इस गठबंधन के 9 विधायक नहीं निकाल पाई. तब बीजेपी ने यह मान लिया कि अभी समय उपयुक्त नहीं है.

समय बीतता गया और जेडीएस-कांग्रेस के बीच रार बढ़ती गई. कांग्रेस नेता सिद्धारमैया खुद इस तपती आग में घी डालने का काम कर रहे थे. अंदरूनी सूत्रों से खबर लगातार जोर पकड़ी रही कि सिद्धारमैया कई कांग्रेसी नेताओं को पद का लालच देकर इस बात के लिए उकसा रहे हैं कि वह आलाकमान से उन्हें सीएम पद नियुक्त कराने पर जोर डालें. हाल ही में इस्तीफा दिए कुछ विधायकों के फिर यही मांग करने पर यह बात पूरी तरह से साबित भी हो जाती है लेकिन आलाकमान के दखल न देने से यह बात बिगड़ती गई और विचारों के बीच खाई और गहरी होती गई. ताज्जुब की बात तो यह रही कि गठबंधन सरकार में पड़ रही इस गहरी खाई को पाटने की कोशिश न तो सीएम और जेडीएस प्रमुख कुमार स्वामी ने की और न ही कांग्रेस आलाकमान ने.

गठबंधन सरकार में बढ़ती इस रार का भरपूर फायदा बीजेपी के चाणक्य अमित शाह के शातिर दिमाग ने उठाया. उन्होंने कांग्रेसी विधायकों को यह भरोसा दिला ही दिया कि इस गठबंधन सरकार में उनका कोई भला नहीं हो सकता. यही वजह रही कि पहले दो और बाद में 14 विधायकों ने एक साथ इस्तीफा देकर सरकार का साथ छोड़ दिया. इनमें 13 विधायक कांग्रेस और 3 जेडीएस के हैं. एक विधायक को पार्टी ने निष्कासित कर दिया था.

अब यह गठबंधन सरकार पूरी तरह डूबती हुई नजर आ रही है. अगर मौजूदा इस्तीफाधारक विधायकों ने अपना त्यागपत्र वापिस नहीं लिया तो सरकार गिरेगी, यह पक्का है. उसके बाद शुरू होगा बीजेपी का ऑपरेशन लोटस जो प्रदेश में पहले भी एक बार चल चुका है.

ऑपरेशन लोटस के जरिए बीजेपी 2008 में भी कर्नाटक में सरकार बनाने में सफल रही थी. उस समय बीजेपी 224 में से 110 सीटें जीतकर आई थी. बहुमत के आंकड़े को छूने के लिए बीजेपी ने ऑपरेशन लोटस का इस्तेमाल किया था. इसके तहत कांग्रेस और जेडीएस के 8 विधायकों ने व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. इन सभी नेताओं को बीजेपी ने अपने चुनाव चिन्ह पर विधानसभा उपचुनाव लड़ाया, जिसमें से 5 बीजेपी से जीतकर आए. बीजेपी का बहुमत साबित हो गया था और राज्य में बीजेपी की 5 साल की सरकार आसानी से बन गई. वैसा ही कुछ होता हुआ इस बार भी नजर आ रहा है.

बहुमत के लिए बीजेपी को केवल 9 विधायकों की दरकार है. उनके पास 16 ऐसे विधायक हैं जो जेडीएस या कांग्रेस से इस्तीफा दे चुके हैं. बीजेपी इन सभी पर दांव खेलेगी और इनमें से आधे भी जीतकर आते हैं तो बीजेपी सरकार बनाने के साथ ही सदन की मुख्य पार्टी बनकर बैठेगी.

‘युवा कप्तान या ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ के फेर में फंसी कांग्रेस

राहुल गांधी के इस्तीफा सार्वजनिक करने के बाद भी लगता है जैसे कांग्रेस के कप्तान पर अभी तक सबकी एकमत राय नहीं बन पा रही है. राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद नए कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर अब तक अशोक गहलोत, मल्लिकार्जुन खड़गे, सुशील कुमार शिंदे, के.सी.वेणुगोपाल और मोतीलाल वोरा के नाम सामने आ चुके हैं.  लेकिन इनमे से किसी के भी नाम पर कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) ने मुहर नहीं लगाई है. कांग्रेस की नाव का नया खेवनहार कौन होगा, इसपर बहस चल ही रही थी कि एक नया बखेड़ा और खड़ा हो गया है.

पंजाब के मुख़्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एक बयान देकर सभी की नींदे उड़ा दी है. कैप्टन ने कहा है कि ‘राहुल गांधी का पद छोड़ने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण है. अब कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में एक गतिशील युवा नेता की उम्मीद है. CWC से आग्रह है कि युवा भारत की युवा आबादी के लिए युवा नेता की जरूरत पर ध्यान दें.’ कैप्टन ने यह बयान सोशल मीडिया पर शेयर किया है.

अमरिंदर सिंह ने यह भी कहा है कि देश की बहुसंख्यक युवा आबादी के मद्देनजर कांग्रेस वर्किंग कमिटी को राहुल गांधी के विकल्प के तौर पर नई पीढ़ी के ऐसे नेता को कमान सौंपनी चाहिए, जो अपनी देशव्यापी पहचान और जमीन से जुड़ाव के जरिए लोगों को उत्साहित कर सके. यही नहीं, अमरिंदर ने बुजुर्ग नेताओं को नसीहत देते हुए कहा कि समय आ गया है कि पुराने लोग नए लोगों को रास्ता दें. वरना कांग्रेस मौजूदा चुनौतियों का सामना नहीं कर पाएगी.

अब इस मामले पर फिर से एक बहस छिड़ गई है. कैप्टन अमरिंदर सिंह का बयान इसलिए भी अहम है, क्योंकि पहली बार पार्टी के किसी नेता ने अगले कांग्रेस अध्यक्ष को लेकर विचार रखा है. अब इस बात को गफलत में इसलिए भी नहीं रखा जा सकता क्योंकि सोशल मीडिया पर बयान आने के बाद उनके विचार सभी के पास पहुँच गए है. ऐसे में उनकी मांग को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता.

कैप्टन के ये विचार इसलिए भी अहम है क्योंकि अमरिंदर सिंह कांग्रेस सत्ताधारी राज्यों मे पहले ऐसे CM थे जिन्होंने न केवल खुद के दम पर विधानसभा चुनाव जीता बल्कि लोकसभा चुनाव में साफ तौर पर कहा था कि अगर पंजाब में उनका नेतृत्व फेल होता है तो वो पद से इस्तीफा दे देंगे. उनके इस बयान के बाद राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में हुई शर्मनाक हार के बाद यहां के मुख्यमंत्रियों को कमान सपने हाथों से जाती हुई दिख रही थी. हालांकि ऐसा कुछ हुआ नहीं.

अभी तक नए कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर जितने भी नाम सामने आये हैं, वे सभी नाम ‘ग्रैंड ओल्ड पार्टी’ कांग्रेस के नाम जैसे ही है. मोतीलाल वोरा (90) साल के है. अशोक गहलोत (68), मल्लिकार्जुन खड़गे (76) और सुशील कुमार शिंदे (77) कोई भी युवा नहीं है. अगला नाम है के.सी.वेणुगोपाल जो 56 साल के है और काफी हद तक इस जिम्मेदारी को वहन करने की काबिलियत भी रखते है लेकिन युवा तो ये भी नहीं है.

अब कैप्टन के इस बयान ने सवाल तो खड़ा कर ही दिया कि अगर उनकी बात पर गौर किया जाए तो आखिर कांग्रेस के पास युवा नेताओं के तौर पर कौन से चेहरे हैं? इनमें सबसे पहले राजस्थान के डिप्टी CM के साथ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट और पार्टी के महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम आता है. उनके पास पश्चिमी यूपी का प्रभार है. मुकुल वासनिक के रूप में कांग्रेस एक और महासचिव को इस सूची में शामिल किया जा सकता है.

जहां तक प्रियंका गांधी का सवाल है तो वो इस रेस में इसलिए नहीं हैं क्योंकि राहुल गांधी चाहते हैं कि उनके बाद पार्टी अध्यक्ष गांधी परिवार के बाहर का नेता बने. ऐसे में देश के राजनैतिक पटल पर 60 साल तक एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस की पतवार युवा कप्तान या ग्रैंड ओल्ड पार्टी के भंवर में एकबार फिर फंसते हुए नजर आ रही है.

क्या इस्तीफा देकर राहुल गांधी ने साधे हैं एक तीर से कई निशाने

PoliTalks news

राहुल गांधी ने हाल में सोशल मीडिया पर अपना इस्तीफा शेयर कर उन अटकलों को समाप्त कर दिया है जिसमें यह माना जा रहा था कि वे अपने फैसले पर फिर से विचार कर सकते हैं. हालांकि उनके इस्तीफा देने से पार्टी नेतृत्व विहिन हो गई है. राहुल के इस्तीफा देने के बाद विपक्ष उन्हें युद्ध में हथियार डालने वाला सिपाही बता रहा है.

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों ने राहुल गांधी के इस फैसले को सरासर गलत और जोखिम वाला बताया है. यह भी कहा जा रहा है कि ऐसा करके उन्होंने अपने राजनीतिक करियर के साथ एक बड़ा रिस्क लिया है. वहीं एक तबका वो भी है जिनका कहना है कि राहुल गांधी ने इस्तीफा देकर एक तीर से कई निशाने साध दिए हैं.

थोड़ा अटपटा जरूर है लेकिन एकदम सही है. हाल में हुए लोकसभा चुनावों में विपक्ष ने कांग्रेस पर सबसे बड़ा प्रहार वंशवाद को लेकर किया था. विपक्ष के इस हमले का तोड़ किसी भी कांग्रेसी नेता या यूं कहें कि खुद राहुल गांधी के पास भी नहीं था. चुनाव के नतीजों से यह साफ झलकता है. इस्तीफा देकर और साफ तौर पर किसी गैर गांधी सदस्य को अध्यक्ष पद सौंपकर राहुल गांधी ने विपक्ष पर एक जवाबी हमला कर दिया है.

यह बात सही है कि लंबे समय से पार्टी के शीर्ष पद पर गांधी परिवार का ही कोई सदस्य विराजमान है. लेकिन इसका गहरा असर अन्य नेताओं पर पड़ रहा है. ‘गांधी परिवार’ के सिवा पार्टी के बाकी नेता मेहनत नहीं करना चाहते जबकि दूसरी पार्टियों में नेता से लेकर कार्यकर्ता तक संघर्ष करते नजर आते हैं.

अब राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोड़ साफ संकेत दे दिए हैं कि अगर पार्टी को जीत दर्ज करनी है तो सबको मेहनत करनी होगी. जिस प्रकार 1989 के बाद गांधी परिवार का कोई भी सदस्य प्रधानमंत्री नहीं बना है, अब उसी तर्ज पर कांग्रेस संगठन को गांधी परिवार से मुक्त रखने का कदम उठाया जा रहा है ताकि सभी को बराबरी का मौका मिल सके.

देखा जाए तो यह बात भी काफी हद तक सही है की राहुल का डर भी कांग्रेस नेताओं के बीच उस तरह का नहीं है जिस तरह का भय केंद्रीय नेतृत्व का होना चाहिए. इसमें कोई संदेह नहीं कि राहुल गांधी बहुत ज्यादा लिबरल हैं. यही वजह है कि वह अपनी बातों को सख्ती से मनवा नहीं पाते. राजस्थान और मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री पद की लड़ाई इस बात को पुख्ता तौर पर बयां करती है.

अगर इतिहास पर गौर करें तो इंदिरा गांधी पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदल देती थी लेकिन सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने दिल्ली में शीला दीक्षित और असम में तरुण गोगई को 15 साल तक मुख्यमंत्री बने रहने दिया. इसका खामियाजा क्या हुआ, वह सामने है.

2014 के लोकसभा चुनाव में राज्यों की आंतरिक राजनीति कांग्रेस को ले डूबी. हालांकि उस समय सोनिया गांधी कांग्रेस की सर्वेसर्वा थी लेकिन चला राहुल गांधी ही रहे थे. 2017 में ताजपोशी के बाद यह उनका पहला लोकसभा नेतृत्व था लेकिन हाल पहले से भी बुरा रहा. लेकिन अब राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष नहीं रहने के बाद भी मास लीडर के तौर पर उनकी अहमियत रहेगी.

राहुल गांधी इस बात को भलीभांति समझ रहे हैं कि आज कांग्रेस जिस हालत में है, चेहरा बदले बगैर नरेंद्र मोदी और अमित शाह से मुकाबला नहीं किया जा सकता. वहीं कांग्रेस में कई ऐसे मठाधीश नेता भी हैं जिनके चलते राहुल गांधी अपने फैसलों को पार्टी में लागू नहीं कर पा रहे थे. अब राहुल गांधी परदे के पीछे रहकर कांग्रेस में बने अलग-अलग पावर सेंटर की बेड़ियों को तोड़ने के साथ ही बीजेपी के नैरेटिव को भी तोड़ने का काम करेंगे.

नए कांग्रेस अध्यक्ष के बाद भी उनकी भूमिका में कोई खास फर्क नहीं आएगा लेकिन दोहरा दवाब पॉलिसी के चलते राहुल गांधी न केवल स्टेट पॉलिटिक्स को नियंत्रित कर पाएंगे, साथ ही कांग्रेस की आगामी रणनीति पर भी फोकस कर पाएंगे.

कांग्रेस के साथ कुछ भी नहीं हो रहा है सही, अब गुजरात में विधायकों पर पड़ रहा ‘डाका’

जब से लोकसभा चुनाव के नतीजे आए हैं, लगता है कांग्रेस की किस्मत सो गई है. कुछ भी पार्टी के लिए सही नहीं हो रहा है. एक तो पहले से ही राहुल गांधी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर बैठे हैं, जिससे पार्टी की बागड़ौर कमजोर हो गई है. वहीं दूसरी ओर, लगातार कांग्रेस शासित प्रदेशों में विधायकों पर हो रही डकैती दिल्ली में बैठे नेताओं की नींदे हराम कर रही है. आए दिन कोई न कोई कांग्रेसी विधायक पार्टी से इस्तीफा दे रहा है या फिर गायब हो रहा है. ऐसे में कांग्रेस पर चुनिंदा राज्यों में सरकार खोने का खतरा भी मंडराने लगा है.

फिलहाल राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब और पांडिचेरी में कांग्रेस सरकार है जबकि कर्नाटक में जेडीएस के कुमार स्वामी के साथ साझा सरकार है. मध्यप्रदेश में भी पार्टी की सरकार बसपा विधायकों के सहारे टिकी हुई है. लोकसभा चुनाव में करारी शिख्स्त के बाद करीब-करीब सभी राज्यों में कांग्रेस के विधायकों के इस्तीफे और पार्टी छोड़ने का दौर लगातार जारी है. इनमें से अधिकतर विधायक बीजेपी की ओट में जाकर छिप रहे हैं.

यह घटनाक्रम गुजरात और कर्नाटक में ज्यादा देखा जा रहा है. हाल ही में कर्नाटक में तीन कांग्रेसी विधायकों पार्टी से इस्तीफा दे दिया. शेष बचे विधायकों को बचाने के लिए पूर्व सीएम सिद्धारमैया प्रयासों में लगे हैं. अब यह दिक्कत गुजरात में भी आ खड़ी हुई है. गुजरात विधानसभा से लेकर अब तक कांग्रेस के 7 विधायक पार्टी से इस्तीफा दे चुके हैं. अब खबर आ रही है कि 18 अन्य विधायक भी इसी लाइन में खड़े हैं.

हाल ही में कांग्रेस के पूर्व सदस्य अल्पेश ठाकोर ने एक नया बयान देकर कांग्रेस खेमे की मुश्किलों को और हवा दे दी है. दरअसल अल्पेश ने कहा है कि गुजरात में 18 कांग्रेसी विधायक पार्टी छोड़ने का मन बना रहे हैं. इससे कांग्रेसी खेमा एकदम से एक्टिव हो गया है और अपने शेष विधायकों को बचाने की कोशिशों में जुट गया है. इस बयान को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के गुजरात दौरा करने की खबर से और हवा मिल रही है.

बता दें, इसी महीने में गुजरात राज्यसभा की दो सीटों पर उपचुनाव होने हैं. अमित शाह और स्मृति ईरानी के लोकसभा पहुंचने से यह सीटें खाली हुई हैं. पहले भी इन दोनों सीटों पर एक साथ चुनाव कराने को लेकर कांग्रेस हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा चुकी है लेकिन उनकी याचिका खारिज कर दी गई. अब बीजेपी कांग्रेसी विधायकों को अपनी तरफ करने का प्रयास कर रही होगी, इस बात में कोई संदेह नहीं है.

राहुल गांधी के कांग्रेस पद से इस्तीफा देने के बाद से पार्टी एक तरह से नेतृत्व विहीन हो चुकी है. ऐसे में पार्टी के दिग्गज़ नेता अहमद पटेल ने कांग्रेस में आए इस प्रवाह को रोकने की जिम्मेदारी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सौंपी हैं. गहलोत को अनुभवी राजनीतिज्ञ और रणनीतिकार के तौर पर जाना जाता है जिनका कोई वार कभी खाली नहीं गया. गुजरात विधानसभा चुनावों में भी उन्होंने अपने अनुभव से बीजेपी को कड़ी टक्कर दी थी.

अब अशोक गहलोत ने गुजरात में कांग्रेसी विधायकों की बाड़बंदी गुजरात में नहीं बल्कि राजस्थान में करने की योजना बनाई है. उन्होंने गुजरात में उपस्थित सभी कांग्रेसी विधायकों को माउंट आबू पहुंचने का फरमान सुनाया है. यहां उन्हें सैर सपाटे के लिए बल्कि दो दिन की घेराबंदी के लिए बुलाया है. सभी विधायकों को अचलगढ़ की एक निजी होटल में रखा जाने की सूचना है.

अब गहलोत की यह रणनीति कितनी काम आएगी, इसका तो पता नहीं लेकिन यह पता जरूर चल गया है कि सच में कांग्रेस का अब कोई ठोर-ठिकाना नहीं बचा है. कांग्रेस अध्यक्ष का चयन भी खटाई में पड़ा हुआ है. आगामी कुछ महीनों में हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में विधानसभा चुनाव भी होने हैं. ऐसे में कांग्रेस का लोकसभा चुनाव की हार भूल फिर खड़े होकर बीजेपी की आंधी का सामना करना आसान काम नहीं लग रहा है.