अर्थव्यवस्था को लेकर कांग्रेस ने खोला मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा

भारतीय अर्थव्यवस्था की गिरती हालत पर अब बीजेपी-कांग्रेस आमने सामने हो गयी हैं. इंडियन इकॉनोमी के ताजा और सोचनीय हालातों पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. तीनों ने सोशल मीडिया पर अपने तीखे कमेंट से मोदी 2.0 सरकार पर तेज प्रहार किए. मोदी सरकार की इस भारी असफलता को पूर्व वित्तमंत्री और यूपीए सरकार में गृहमंत्री रहे पी.चिदंबरम से भी जोड़ा जा रहा है. कांग्रेस के आला नेताओं का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था की लगातार गिरती हालातों को छिपाने और जनता का ध्यान भटकाने के लिए ही चिदंबरम पर ये कार्यवाही हुई है.

हालांकि शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारण ने जनता को देश की अर्थव्यवस्था पर भरोसा दिलाने की कोशिश करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था के ताजा हालात पर सरकार के कदमों की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि दुनियाभर के देशों की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल बेहतर हालात में है. देश की आर्थिक वृद्धि दर भी कई देशों की तुलना में ऊंची है. लेकिन चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर की वजह से अर्थव्यवस्था पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है लेकिन सरकार इसे संभालने की दिशा में काम कर रही है. उन्होंने ये भी कहा कि जीएसटी रिफंड के सभी लम्बित पड़े मामलों को अगले एक महीने में निपटा दिया जाएगा. इसके बावजूद कांग्रेस नेताओं के बेतहाशा प्रहारों में कमी नहीं आ रही.

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कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने अपने ट्वीटर हैंडल पर कई प्रमुख मीडिया संस्थाओं की रिपोर्ट का हवाला देकर मोदी सरकार से दिए गए सभी सवालों का जवाब मांगा है. ट्वीट पर उन्होंने पोस्ट किया, ‘भाजपा सरकार को अब देश को साफ-साफ बताना चाहिए कि अर्थव्यवस्था की दुर्दशा ऐसी क्यों हो रही है? व्यापार टूट रहा है, उद्योग डगमगा रहे हैं, रुपया कमजोर होता जा रहा है, नौकरियां खत्म हो रही हैं. इससे हो रहे नुकसान की भरपाई कौन करेगा?’

इससे पहले भी प्रियंका ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा था. उन्होंने कहा, ‘अभी तक औद्योगिक संस्थाएं विज्ञापन देती थीं कि हम आगे बढ़ रहे हैं. लेकिन अब भाजपा सरकार के शासन में कईयों को विज्ञापन देकर कहना पड़ रहा है कि हम डूब रहे हैं, हमें बचाओ.’


इसके अलावा पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी को लेकर भी प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार को आड़े हाथ लिया है.


वहीं कांग्रेस नेता और पूर्व पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट करते हुए कहा, ‘सरकार के स्वयं के आर्थिक सलाहकारों ने आखिरकार स्वीकार किया कि हमने लंबे समय तक क्या सावधानी बरती है – भारत की अर्थव्यवस्था एक गहरी गड़बड़ी में है. अब, हमारे समाधान को स्वीकार करें और जरूरतमंदों के हाथों में पैसा वापस करके अर्थव्यवस्था को फिर से संगठित करें.’ दरअसल उन्होंने इशारों-इशारों में नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के उस बयान की ओर संकेत किया जिसमें राजीव कुमार ने कहा था, ‘देश की अर्थव्यवस्था 70 सालों में सबसे खराब दौर में है. इसके लिए नोटबंदी और जीएसटी जिम्मेदार है. गंभीर आर्थिक संकट को देखते हुए और कदम उठाने की जरूरत है.’


कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भी अपने ट्वीट के जरिए केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण पर सीधा निशाना साधा. उन्होंने अपना ट्वीट वित्तमंत्री को समर्पित करते हुए कहा, ‘वित्त मंत्री जी, अर्थव्यवस्था की जो भयानक दुर्दशा भाजपा ने की है, उस पर सरकारी पॉवर पाईंट की 32 स्लॉईडों से पर्दा नहीं डल सकता. देश मंदी से झूझ रहा है. मोदी सरकार पहले बजट में आधा अधूरा रोलबैक कर रही है. GDP औंधे मुंह लुढ़क रहा है और NPA दिन-रात ऊफान पर है पर पर ठोस हल कहां है?’


सुरजेवाला इससे पहले भी पीएम मोदी पर इंडियन इकॉनोमी को लेकर कटाक्ष कर चुके हैं. अपने ट्वीट में उन्होंने कहा, ‘अगर मोदीजी ने अर्थव्यवस्था को अपनी पसंद, विदेशी परेड और जंगल फोटो शूट पर प्राथमिकता दी होती तो यह दिन नहीं आता.’ दरअसल उन्होंने इस ट्वीट के जरिए प्रधानमंत्री के मेन इक वाइल्ड कार्यक्रम में भाग लेने को लेकर चुटकी ली.


एक अन्य ट्वीट में सुरजेवाला ने कहा कि चौपट अर्थव्यवस्था से एक दिन में निवेशकों के 2,00,000 करोड़ डूब जाते हैं. उद्यमी रोज आंसू बहाते हैं लेकिन बर्बादी के मंज़र पर भाजपाई चुप्पी साध जाते हैं. यही हैं अच्छे दिन पार्ट 2.0?’

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी अर्थव्यवस्था को लेकर मोदी सरकार पर तंज कसा. उन्होंने मीडिया को बताया, ‘एफएम द्वारा कल घोषित किए गए उपाय केवल एक चेहरा बचाने की कवायद है. ये कदम अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अपर्याप्त हैं. विभिन्न क्षेत्रों के सामने आने वाली समस्याओं पर गौर करने की जरूरत है. उन्हें मंदी, धीमी वृद्धि, कम बिक्री और इतने पर लाने के लिए अलग से उपायों की घोषणा करें.’

ये 370 के बाद का कश्मीर है…

शायद ही किसी ने सोचा होगा की 5 अगस्त, 2019 की तारीख जम्मू कश्मीर में एक नई सुबह लेकर आएगी. सावन के दूसरे सोमवार की भोर के साथ ही गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू कश्मीर को लेकर राज्यसभा में एक ऐसा एटॉम बम फोडा जिससे कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की पूरी राजनीति हिल गयी. अमित शाह ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 और धारा 35ए हटाने के साथ कश्मीर के पुनर्गठन का प्रस्ताव सदन में रख दिया. शोर शराबा हुआ, वाद विवाद हुए, नौकझोंक भी हुई लेकिन जो भी हुआ, जम्मू कश्मीर धारा 370 की काली छाया से बाहर आ गया. हालांकि भारत सरकार के इस फैसले से अवगाववाद … Read more

‘गांधी ने गांधी को दिया इस्तीफा, फिर से गांधी बना अध्यक्ष’

एक कहावत बड़ी मशहूर है ‘तीतर के दो आगे तीतर, तीतर के दो पीछे तीतर, बोलो कितने तीतर’. ऐसा ही कुछ कांग्रेस पार्टी में हो रहा है. सोनिया गांधी ने 16 दिसम्बर, 2017 को जब गांधी परिवार के युवराज राहुल गांधी की ताजपोशी की थी यानि उनको पार्टी की कमान संभलायी थी तब ये निश्चित था कि कांग्रेस केवल वंशवाद आगे बढ़ा रही है. ऐसे में तय था कि कांग्रेस की सियासत की बागड़ौर केवल गांधी परिवार के हाथों में रहेगी. लोकसभा चुनाव-2019 में मिली करारी हार के बाद नैतिकता के आधार पर जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया.

राहुल गांधी ने ये इस्तीफा यूपीए चैयरपर्सन सोनिया गांधी को सौंपा. यानि एक गांधी को. उसके बाद शुरू हुई नए अध्यक्ष की तलाश. राहुल गांधी ने साफ तौर पर कहा कि अब पार्टी की बागड़ौर किसी गैर गांधी को सौंपी जाए लेकिन अब हुआ पहले से भी बड़ा झोल और एक बार फिर अध्यक्ष बन गयी सोनिया गांधी. यानि गांधी के बाद फिर गांधी. ऐसे में सीधे तौर पर कहा जाए तो इस्तीफा लेने वाला भी गांधी, देने वाला भी गांधी और नया अध्यक्ष भी गांधी.

इससे पहले जिस व्यक्ति का नाम अध्यक्ष पद पर सबकी पसंद था और उसे सभी का समर्थन भी मिल रहा था, वो भी था एक गांधी यानि प्रियंका गांधी. वहीं जिस नाम का सबसे ज्यादा समर्थन किया जा रहा है, वो भी गांधी. सीधे तौर पर कहा जाए तो कांग्रेस में फिर से गांधियों का वंशवाद शुरू हो गया जो बड़ी मुश्किल से लाइन पर आने वाला था. राहुल गांधी के इस्तीफे और पार्टी कमान संभालने को प्रियंका के इनकार के बाद लगने लगा था कि अब कांग्रेस को जो नया अध्यक्ष मिलेगा, निश्चित तौर पर कोई गैर गांधी ही होगा. इस लिस्ट में अशोक गहलोत सबसे आगे रहे लेकिन उन्होंने साफ तौर पर मना कर दिया.

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वजह रही कि राजनीति के जादूगर गहलोत को साफ तौर पर पता था कि वे कांग्रेस अध्यक्ष भले ही बन जाएं लेकिन पर्दे के पीछे और महत्वपूर्ण फैसलों में कलम केवल राहुल-सोनिया-प्रियंका यानि गांधी परिवार की ही चलेगी. ऐसे में उन्होंने बड़ा पद लेने की जगह राजस्थान की राजनीति में ही ध्यान देना उचित समझा. पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिन्दर सिंह का भी यही सोचना है. अपनी बेबाकी के लिए जाने जाने वाले अमरिन्दर के हितों का टकराव सीधे गांधी परिवार से होगा, इसलिए उन्होंने अपना नाम कभी आगे ही नहीं आने दिया. इसके दूसरी ओर, उन्होंने प्रियंका गांधी को अध्यक्ष बनाने का विकल्प भी सुझा दिया.

कांग्रेस अध्यक्ष के नए नाम की इस लिस्ट में मुकुल वासनिक, सुशील शिंदे और मलिकार्जुन खडगे का नाम भी शामिल था लेकिन 5 ग्रुप की बैठक के बावजूद इनमें से किसी का नाम तय न हो सका. वहीं इस लिस्ट में युवाओं के तौर पर राजस्थान के डिप्टी सीएम सचिन पायलट और पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम भी था लेकिन सीनियर्स के अनुभव के सामने न तो युवाओं की रणनीति काम आयी और न ही उनकी युवा सोच.

अगर सीड्ब्ल्यूसी की एक ही दिन में दो बैठकों के बाद भी अगर कोई निष्कर्ष न निकलता तो पार्टी फिर से विपक्ष के निशाने पर आ जाती. शायद इसी डर से सोनिया गांधी को नए अध्यक्ष के चुनाव होने तक अंतरिम अध्यक्ष का दायित्व सौंप दिया. अब गौर करने वाली बात ये है कि चाहे कांग्रेस के नेता ये सोचकर खुश हो रहे हो कि चलो अब कुछ समय के लिए पार्टी के नए कप्तान की चिंता खत्म हुई लेकिन यह समस्या केवल टली है और वो भी कुछ समय के लिए. ज्यादा से ज्यादा चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने तक सोनिया अंतरिम अध्यक्ष का पद संभाल सकती हैं. उसके बाद से कांग्रेस की ये नोटंकी फिर से शुरू होगी और फिर से शुरू होगा गांधी बनाम गांधी का खेल.

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अब ये खेल कितना लंबा चलेगा, ये तो समय भी बताएगा लेकिन जो भी हुआ या जो होने वाला है, उससे एक बात तो एकदम साफ है कि गांधी परिवार के लोगों से पार्टी की बागड़ौर इतनी आसानी से नहीं फिसलने वाली. अगर जरा सी फिसल भी गयी जैसे कि राहुल गांधी के साथ हुआ है तो कांग्रेस के सिपेसालार फिर से इसे किसी न किसी गांधी के हाथों में थमा देंगे, फिर चाहें वो प्रियंका गांधी हो या सोनिया गांधी या फिर से राहुल गांधी.

कैसा होगा ‘नया कश्मीर’, युवाओं को मिलेंगे आगे बढ़ने के सुअवसर

सोमवार को नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा कश्मीर से धारा370 और 35A को समाप्त करके लिये गए ऐतिहासिक फैसले के बाद स्थानीय युवाओं को आगे बढ़ने के सुअवसर मिलेंगे, इसमें कोई संयश नहीं है. अभी तक धारा 370, दोहरी नागरिकता और अन्य प्रतिबंधों के चलते युवाओं को न तो यहां से बाहर निकलने का मौका मिलता था और न ही किसी और को यहां आने का. बेरोजगारी यहां की सबसे बड़ी समस्या है जिससे चलते युवा वर्ग बहकावे में आता है और पत्थरबाजों की शक्ल ले लेता है. लेकिन अब सभी तक के प्रतिबंध यहां से हट चुके हैं और एकल नागरिकता के साथ सुप्रीम कोर्ट के सभी कानून एवं नियम … Read more

पाक सितारों को लगी मिर्ची, सोशल मीडिया पर अलाप रहे ‘कश्मीर राग’

नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर पर ऐतिहासिक फैसला लेते हुए जम्मू-कश्मीर में धारा 370 और धारा 35ए को समाप्त कर दिया गया है. कमोबेश पूरा देश सरकार के इस फैसले का जश्न मना रहा है. तो वहीं दूसरी ओर, भारत सरकार के इस फैसले से पाकिस्तान के सितारों को मिर्ची लग रही है. वहां के सितारे मन ही मन जल-भुन रहे हैं और सोशल मीडिया पर अपनी भड़ास निकालते हुए दुनिया से इस मामले पर आवाज उठाने की गुहार लगा रहे हैं. पाकिस्तान में रहकर कश्मीर की चिंता करने वाले इन सितारों में बॉलीवुड में काम कर चुकी माहिरा खान और मारवा भी शामिल हैं. वहीं इंडियन यूजर्स की तरफ से इन सभी को करारा पलटवार भी मिल रहा है. एक यूजर ने तो ये तक कहा है कि आप भारत के मसले में परेशान न हों और अपने देश की फ़िक्र करें.

पाकिस्तानी एक्टर हमजा अली अब्बास ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर पोस्ट किया है, ‘मैं पाकिस्तान के सभी कलाकारों से गुजारिश करता हूं कि वो अपनी आवाज क्यों नहीं उठा रहे हैं. कश्मीर के लिए अपनी उठाएं.’

वहीं इसका उत्तर देते हुए सोशल मीडिया यूजर जनार्दन मिश्रा ने कहा, ‘जो हमारे कश्मीर की तरफ बुरी नज़र से देखेगा उसका हाल भी बुरा ही होगा क्योंकि इस बार देशभक्तो की सरकार है और देशभक्त जो चाहेगे वही होगा.’

एक्ट्रेस हरीम फारूक ने कश्मीर पर आए फैसले पर बेहद चिंता जताते हुए कहा, ‘दुनिया शांत क्यों है. कश्मीर में हो रही ये निर्ममता की क्यों अनदेखी हो रही है. ये अपनी आवाज को उठाने का वक्त है. ये वक्त कश्मीर के साथ खड़े होने का है. इस अन्याय को खत्म करने की जरूरत है.’

एक यूजर ने उन्हें रिट्वीट करते हुए कहा, ‘पहले अपना बलूचिस्तान संभाल वरना वो भी हाथ से निकल जाएगा.’

शाहरूख खान के साथ फिल्म रईस में काम कर चुकी माहिरा खान कहा कहना है, ‘जिस पर हम चर्चा नहीं करना चाहते हैं, उस पर हमें बहुत ही आसानी से खामोश कर दिया गया है. ये रेत पर लकीर खींचने की तरह है…जन्नत जल रहा है और हम खामोशी से आंसू बहा रहे हैं.’

एक यूजर ने उन्हें ट्रोल करते हुए रिट्वीट किया, ‘हां, हम समझ सकते हैं कि आप चुपचाप रो रहे हो क्योंकि न तो आपको भारतीय फिल्मों में अभिनय करने के लिए मिला और न ही आपको रणबीर. अपना ध्यान रखें और खुश रहें…लाइफ चलती रहती है.’

वहीं एक अन्य पाक अदाकारा मारवा ने ट्वीट किया, ‘क्या हम इस अंधेरे में जी रहे हैं. ह्यूमन राईट के लिए अनग‍िनत प्रोटेस्ट हुए उन सारे अधिकारों, नियमों का क्या हुआ. क्या उनके मायने हैं?’

इस पर रिट्वीट करते हुए एक इंडियन यूजर ने लिखा, ‘आपको क्या तकलीफ है मावरा? कश्मीर हिंदुस्तान का एक हिस्सा है और हम हमेशा कश्मीर के हित में सर्वश्रेष्ठ प्रयास करेंगे. अब आप पाकिस्तान की बेहतर देखभाल करें.’

लालू के लाल ‘तेजस्वी’ फिर से गायब, पटरी से उतरती राजद का कोई धणी नहीं

बिहार में 17वीं विधानसभा के चुनाव 2020 में होने हैं और घटते दिनों के साथ ही प्रदेश में चुनावी आहट शुरू हो गई है. सभी प्रमुख दल आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियों में जुट गए हैं. लेकिन आरजेडी अभी तक अपने तारणहारों का इंतजार ही कर रही है. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) नेता तेजस्वी यादव की असक्रियता अब अखरने लगी है. एक महीने के करीब होने को आया है लेकिन अभी तक तेजस्वी यादव का कहीं कोई अता पता नहीं है. यहां तक की आरजेडी के नेताओं को इस बात कि कोई जानकारी नहीं है की तेजस्वी आखिर कहां हैं. हालांकि तेजस्वी सोशल मीडिया पर … Read more

फिर फिसली मेनका गांधी की जुबान, एसडीओ को सुनाई खरी खोटी

लोकसभा चुनाव में अपने बिगड़े बोल से सुर्खियों में आयी बीजेपी की सुलतानपुर सांसद मेनका गांधी अपने गुस्सेल रवैये की वजह से फिर से चर्चा में है. इस बार उन्होंने अपना गुस्सा बिजली विभाग के एसडीओ पर निकाला. बीजेपी सांसद ने न केवल उन्हें डांट लगाई, बल्कि वहां मौजूद कई अधिकारियों के साथ जमकर खरी खोटी सुनाई.

दरअसल मेनका गांधी अपने संसदीय क्षेत्र के दो दिवसीय दौरे पर हैं. यहां बीजेपी सांसद एक गांव में विद्युत व्यवस्था को लेकर की गई शिकायत पर कलेक्ट्रेट में अधिकारियों से सवाल-जवाब कर ही रही थी कि अचानक से फूटे गुस्से के दौरान उनकी जुबान फिर से फिसल गयी. पहले तो उन्होंने इलाके में लचर बिजली व्‍यवस्‍था को लेकर अधिकारियों की जमकर क्‍लास ली. उसके बाद बिजली विभाग के एसडीओ से यहां तक कह दिया कि तुम कोई राजा हो…छोटे-मोटे कर्मचारी…तुम हमारी भीख पर टिके हो.

मेनका गांधी के ये कटु वचन सुनकर अधिकारी सहित अन्य अफसर भी बगले झांकने लगा लेकिन थोड़ी ही देर बार उनका अधिकारियों को डांट पिलाने का ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा. इसी के साथ चर्चाओं का दौर भी शुुरू हो गया. कई यूजर्स उनके अधिकारियों को इस तरह जलील करने की आलोचना कर रहे हैं तो कुछ जनता की समस्याओं पर ध्यान देने के लिए उनके इस एक्शन की सराहना कर रहे हैं.

इससे पहले रविवार को सांसद मेनका गांधी ने एक फायर स्टेशन के भूमि पूजन कार्यक्रम में अधिकारियों ने कहा कि फायर स्टेशन एक साल में चालू नहीं हुआ केंद्र तो किसी न किसी की नौकरी जानी पक्की है. सुल्‍तानपुर पहुंचने से पहले मेनका गांधी ने लखनऊ में सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात भी की. मेनका गांधी ने जिले के लिए विभिन्न विकास योजनाओं से लेकर बिजली, कानून व्यवस्था, अस्पताल की खराब स्थिति पर बातचीत कर उसे दूर कराने का आग्रह किया.

लोकसभा चुनाव के प्रचार कैंपेन में भी सुलतानपुर की जनता उनका ये गुस्सैल रवैया देख चुकी है. चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र के एक मुस्लिम इलाके अमहट के तुराबखानी में जाकर लोगों को संबोधित किया था, ‘अगर आप मुझे वोट नहीं देंगे तो भी मैं जीतूंगी लेकिन उसके बाद अगर कोई काम के लिए मेरे पास आता है तो उनके लिए भी उनके कार्य करना मुश्किल होगा. मेरा रुख भी वैसा ही रहेगा.’

मेनका के इस बयान से जमकर बवाल हुआ था. उसके ऐसे ही बिगड़े बोल के चलते बीते लोकसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने मेनका गांधी पर 48 घण्टे का बैन भी लगाया था. इसके बाद वे दो दिन तक किसी चुनाव प्रचार में भाग नहीं ले पायी थी.

महाराष्ट्र: पार्थ और रोहित में से कौन संभालेगा ‘NCP’ की विरासत?

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार ने इस बार लोकसभा चुनाव में न उतरकर एक तरह से राजनीति से संन्यास ले लिया है. कयास यही लगाए जा रहे हैं कि अक्टूबर में होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावों के बाद शरद पवार किसी न किसी को एनसीपी की विरासत सौंप पार्टी के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका का निर्वाह करेंगे. ठीक वैसे ही जैसा समाजवादी पार्टी के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव ने किया था. एनसीपी की विरासत किसी पवार सदस्य को ही मिलेगी, यह तो पक्का है लेकिन किसे, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है. वैसे इस विरासत को संभालने के लिए दो नाम सबसे आगे चल … Read more

बिहार में ये कैसी आहट, पर्दे के आगे मिठास तो पीछे कड़वाहट

बिहार में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं ऐसे में यहां की आबोहवा में अभी से अलग ही सियासी महक घुलने लगी है. वर्तमान में बीजेपी और जदयू की मिली जुली सरकार की बागड़ौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों में है लेकिन गठबंधन के इस घोड़े पर नीतीश कितने दिन सवारी कर पाएंगे और आने वाले विधानसभा चुनाव तक यह गठबंधन चलेगा भी या नहीं, इस पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं.

बीजेपी और जदयू नेताओं में तनातनी तो लंबे समय से चली ही आ रही है लेकिन ये सुर्खियों में तब आई जब केंद्रीय मंत्रीमंडल में एक भी केबिनेट मंत्री का पद जनता दल यूनाइटेड (जदयू) को नहीं मिला. इस पर जदयू चीफ नीतीश कुमार ने सीधे तौर पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की और सांकेतिक भागीदारी लेने से इनकार करते हुए राज्य मंत्री का पद ठुकरा दिया. इसके तुरंत बाद नीतीश कुमार ने प्रदेश मन्त्रिमण्डल का विस्तार करते हुए बीजेपी के किसी विधायक को उसमें शामिल नहीं करके हिसाब बराबर कर दिया. इसके बाद से दोनों पार्टियों के बीच रिश्तों में कड़वाहट की खाई और गहरी होती चली गई.

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू ने लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद के साथ मिलकर महागठबंधन के बैनर तले चुनाव लड़ा था. जदयू और राजद की यह जोड़ी बीजेपी और कांग्रेस दोनों पर ही भारी पड़ी और नीतीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बनीं. लेकिन इस दोस्ती की डोर में जल्द ही गांठ पड़ गई और नीतीश कुमार ने महागठबंधन से जदयू को अलग कर लिया. नीतीश ने सियासी हल्कों में हलचल बढ़ाते हुए केवल 12 घंटों के अंदर बीजेपी से हाथ मिला फिर से अपनी सरकार बना ली. बीजेपी के सुशील कुमार को डिप्टी सीएम का पद मिल गया.

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हालांकि इस गठबंधन को तीन साल से अधिक हो गए हैं लेकिन तकरार की खाई दिन-ब-दिन बढ़ती गयी. दोनों पार्टियों के नेताओं ने इस खाई को पाटने की बजाय और गहरा करने का काम किया है. जदयू के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा के पूर्व सदस्य पवन वर्मा के ताजा बयान से गठबंधन में रिश्तों की कड़वाहट का पता चलता है. उन्होंने साफ तौर पर कहा, ‘अगर बीजेपी को लगता है कि वे अकेले चुनाव लड़कर सफल हो जाएगी तो वह निर्णय ले सकती है. उसे निर्णय करना हो तो कर ले.’ दरअसल उन्होंने यह बयान एक बीजेपी नेता पर पलटवार करते हुए दिया था लेकिन वर्मा के इस बयान से बीजेपी के लिए जदयू की नाराजगी और कड़वाहट का सीधे-सीधे पता चलता है.

इससे पहले बिहार के बीजेपी एमएलसी सच्चिदानंद राय ने बयान देते हुए कहा कि पार्टी नेतृत्व नीतीश सरकार को दिए समर्थन पर विचार करे. उनके इस बयान ने प्रदेश की दोनों पार्टियों को हिलाकर रख दिया. उनके बयान से बीजेपी नेतृत्व भी चिंतित हुआ और राय को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया. इससे पहले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह भी रोज इफ्तार की एक दावत के मौके की तस्वीरों के जरिए नीतीश कुमार पर निशाना साध चुके हैं.

अब आने वाले विधानसभा चुनावों में बीजेपी और जदयू दोनों कंधे से कंधा मिलाकर चुनाव लड़ेंगे या फिर अलग-अलग, ये अभी तक भविष्य के गर्भ में छिपा है. लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पार्टियों के बीच कड़वाहट और ज्यादा बढ़ने लगी है. दोनों के बीच आई इस खटास का फायदा राजद पूरी तरह से उठाने के फिराक में है.

सूत्रों के मुताबिक राजद के कुछ नेताओं ने नीतीश कुमार से इस बारे में बात करना शुरू कर दिया है लेकिन नीतीश कुमार पिछले वाकिये को अब तक भूल नहीं पाए हैं. इसलिए हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं. हालांकि बीजेपी का साथ छोड़ना उन्हें भारी पड़ सकता है, इस बात को नीतीश कुमार भलीभांति जानते हैं. ऐसे में नीतीश फिलहाल अपने तरकश के सभी तीर संभालकर रखे हुए हैं ताकि सही समय पर एकदम सटीक निशाना लगा सकें. वह निशाना बीजेपी पर होगा या फिर राजद पर, इसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा.

कर्नाटक-गोवा के अनुभव से राज्यसभा साधने की कोशिशों में लगी बीजेपी!

कर्नाटक संकट देशभर की राजनीति के लिए एक बड़ा झटका है कि रातोरात सत्ताधारी सरकार हासिए पर कैसे आ गई. वजह साफ है- यह बीजेपी और पार्टी के चाणक्य अमित शाह की दूरगामी रणनीति और आक्रामक सोच का परिणाम है कि चुटकी बजाते ही सत्ताधारी को करीब-करीब विपक्ष में बैठाने की तैयारी हो चुकी है. कुछ ऐसा ही कारनामा शायद बीजेपी राज्यसभा में करने की तैयारी कर रही है. बस फर्क सिर्फ इतना है कि राज्यसभा में यह काम एनडीए के बैनर तले किया जा रहा है. समाजवादी पार्टी के नीरज शेखर का इस्तीफा इस दिशा में बढ़ाया गया पहला कदम हो सकता है.

बीजेपी का आक्रामक रवैया तो हालिया लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाहियों में देखा ही जा रहा है. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का असदुद्दीन ओवैसी को भरे सदन में चुप करना और रक्षा मंत्री राजनाथ के विपक्ष पर मारे गए तीखे प्रहार पार्टी का सत्ता में भारी मतों से वापसी का अतिआत्मविश्वास है. बीजेपी का यह चेहरा पिछली मोदी सरकार के वक्त इतना आक्रामक नहीं था जितना इस बार है.

बात करें नीरज शेखर की तो नीरज पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के छोटे पुत्र हैं और उत्तर प्रदेश में पिता की सीट बलिया से समाजवादी पार्टी के टिकट पर लोकसभा सांसद रह चुके हैं. 2014 की मोदी लहर में लोकसभा चुनाव हारने के बाद उन्हें समाजवादी पार्टी ने तत्काल राज्यसभा सदस्य बनाया. राज्यसभा में उनका कार्यकाल नवंबर 2020 तक का था. नीरज शेखर ने न सिर्फ राज्यसभा बल्कि समाजवादी पार्टी की सदस्यता से भी इस्तीफा दे दिया है. संकेत स्पष्ट हैं कि बीजेपी नीरज शेखर को इसी सीट से फिर राज्यसभा में भेज देगी.

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नीरज शेखर तो सिर्फ शुरुआत है. इसके पीछे का ऐजेंडा तो ये है कि नीरज राज्यसभा से जुड़े कई विपक्ष के नेताओं को कमल के झंडे के नीचे इक्ठ्ठा करने का काम करेंगे. सुनने में तो ये भी आ रहा है कि नीरज अपना पहला निशाना बसपा के सांसद राजा राम पर साध रहे हैं. एक समय मायावती के आंखों का तारा रहे राजा राम का पार्टी में पहले जैसा राजनीतिक कद नहीं रहा है.

एक दौर था जब रामाराम को मायावती का उत्तराधिकारी समझा जाता था लेकिन अब उन्हें एक किनारे कर दिया गया है. मायावती के भाई आनंद कुमार के पार्टी में हस्तक्षेप के बाद पार्टी के कुछ वरिष्ठ सांसद पहले से ही नाराज चल रहे हैं. ऐसे में बसपा के बचे चारों सांसद अगर बीजेपी से जुड़ जाएं तो कोई अचंभा नहीं होना चाहिए. वहीं समाजवादी पार्टी के दो सांसदों के भी पार्टी छोड़ने की खबरें सियासी गलियारों से आ रही हैं.

यहां ठीक उसी तरह की रणनीति अपनाई जा रही है जैसे कर्नाटक में अपनाई गई थी. कर्नाटक गठबंधन सरकार के 16 विधायकों ने एक साथ विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर मौजूदा सरकार को अल्पमत के द्वार पर लाकर खड़ा कर दिया है. हालांकि इस्तीफों पर फैसला आना बाकी है.

वैसे यह सवाल सभी के मन में होगा कि प्रदेश स्तर तक तो ठीक है लेकिन राज्यसभा सांसद तोड़कर बीजेपी को क्या मिलेगा. इसका सीधा सा जवाब है कि राज्यसभा में बहुमत न होने से मोदी सरकार के कई बिल पास नहीं हो पा रहे हैं. मौजूदा सरकार के पास लोकसभा में पर्याप्त बहुमत है. ऐसे में वहां कोई भी बिल पास कराना बड़ा काम नहीं है लेकिन वहां से निकल कर ये बिल राज्यसभा में अटक जाते हैं. तीन तलाक बिल का यही हाल है. इस बिल पर विपक्ष तो छोड़िए, बिहार में सहयोगी पार्टी जेडीयू तक विरोध कर रही है.

राज्यसभा में कुल 245 सांसद होते हैं जिसमें से पांच सीटें फिलहाल खाली हैं. इस हिसाब से बहुमत के लिए 121 सांसद चाहिए. बीजेपी और उनके सहयोगी घटक यानी एनडीए के पास 116 सांसद हैं यानी बहुमत से सिर्फ 5 कम. अब बीजेपी इसी कमी को दूर करने की कोशिशों में लगी है.

हालांकि पूर्ण बहुमत हासिल करने के लिए एनडीए को ज्यादा वक्त नहीं लगेगा. उत्तर प्रदेश में अगले साल यानि नवंबर, 2020 तक राज्यसभा की करीब 10 सीटें खाली होंगी. इनमें नीरज शेखर की सीट भी शामिल है. प्रदेश में संख्याबल के हिसाब से बीजेपी के खाते में कम से कम 9 सीटें आएंगी. इसका सीधा मतलब ये होगा कि नीरज शेखर की जो सीट सपा के पास थी, वो बीजेपी के खाते में आ जाएगी. ये सारी सीटें आने के बाद एनडीए के पास राज्यसभा में भी पूर्ण बहुमत होगा.

लेकिन शायद बीजेपी इससे कहीं ज्यादा सोच रही है. इसकी झलक गोवा में दिखी है. 40 सीटों वाली गोवा विधानसभा में बीजेपी के 17 विधायक हैं. यहां बीजेपी की गठबंधन सरकार है. हाल ही में कांग्रेस के 15 में से 10 विधायकों ने बीजेपी ज्वॉइन की है. ऐसे में बीजेपी के विधायकों की संख्या 27 जा पहुंची है जहां से कोई उन्हें हिला नहीं सकता. इसके बाद उन्होंने गठबंधन मंत्रियों को साइड लाइन कर नए विधायकों को मंत्री पदों पर बिठाया.

इसी तरह का कुछ करने की मंशा बीजेपी की राज्यसभा में भी है. एनडीए के बैनर के अलावा, बीजेपी के झंडे के नीचे जितने ज्यादा सांसद रहेंगे, पार्टी को उतना ही फायदा होगा. अगर बीजेपी सांसदों का संख्याबल अधिक होगा तो जेडीयू की तरह विरोध होने के बाद भी पार्टी को अपने बिल पास कराने में परेशानी नहीं होगी.

अब देखना ये होगा कि बीजेपी की नीरज शेखर के अलावा और कितने सांसदों को तोड़कर अपनी पार्टी में लाती है और नीरज शेखर कितने सांसदों को बीजेपी या फिर एनडीए के झंडे के नीचे लाने में सफल होते हैं.