दिल्ली में गौतम गम्भीर की लोकप्रियता और स्थानीय होने का मुद्दा भारी न पड़ जाए मनोज तिवारी पर

(Popularity of Gautam Gambhir)
13 Dec 2019
पॉलिटॉक्स ब्यूरो. दिल्ली में चुनावी दंगल शुरु होने में अभी कुछ समय बाकी है लेकिन राजधानी में घमासान का आगाज अभी से हो चुका है. लड़ाई है सपनों की, उम्मीदों की और सम्मान की. इसमें सबसे आगे हैं क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बने गौतम गंभीर जो पूर्वी दिल्ली से भाजपा सांसद हैं. गौतम की देश में एक बड़ी फैन फोलोइंग (Popularity of Gautam Gambhir) हैं और वे राजनीति में आते ही दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने का सपना आंखों में पाल बैठे हैं. हाल में एक मीडिया संस्थान ने जब गौतम से सवाल किया गया कि क्या वे उत्तर प्रदेश जैसी व्यवस्था पर सहमति जताएंगे जहां तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनने के लिए कहा गया था? इस पर गौतम ने गंभीर होते हुए कहा कि एक बड़ी जिम्मेदारी सम्मान की बात होगी और यह एक मुकम्मल सपना होगा. अब गौतम ने तो अपने मन की बात कह दी लेकिन इस बयान के बाद बीजेपी के दिल्ली प्रदेशाध्यक्ष मनोज तिवारी अति गंभीर हो गए हैं. इसकी वजह है, जो सपना राजनीति में कदम रखते ही गौतम गंभीर देख रहे हैं, वो ही सपना पिछले कई सालों से सांसद मनोज तिवारी भी देख रहे हैं और उसके लिए जी जान एक कर चुके हैं. एक समय वो भी था जब एक दिन ऐसा नहीं जाता था जब मनोज तिवारी दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और प्रदेश सरकार के अच्छे बुरे हर काम में नुक्स निकालने से नहीं चूकते थे, लेकिन पिछले कुछ महीनों से गौतम गंभीर ने ये काम बखूबी संभाला हुआ है. वे राजनीति में आने से पहले से ही आप सरकार पर भड़ास निकालकार अपने काम को बढ़िया अंजाम देते आए हैं. गौतम गंभीर दिल्ली के स्थानीय स्थानीय (Popularity of Gautam Gambhir) हैं और स्टार क्रिकेटर रहने की वजह से दिल्ली के युवा उनके स्टाइल और बेबाक छवि के फैन हैं हालांकि मनोज तिवारी के चाहने वालों की भी दिल्ली में कमी नहीं है और वे गायकी के नाते उनकी पॉपुलर्टी भी कम नहीं हैं. लेकिन मनोज तिवारी बिहारी मूल के एक्टर एवं सिंगर हैं. दिल्ली विधानसभा चुनावों को देखते हुए बीजेपी भी हाई पावर एक्टिव मोड में है लेकिन गौतम और मनोज तिवारी की आपसी तनातनी इस एक्टिव मोड को लगातार आॅन-आॅफ कर रही है. यह भी पढ़ें: राहुल गांधी के ‘रेप इन इंडिया’ वाले बयान पर बवाल, ‘माफी मांगो’ के नारे से गूंजे दोनों सदन, राहुल की साफ तौर पर ‘ना’ दोनों के बीच अंदरूनी तौर पर चल रही जंग नई नहीं है. आम चुनावों के समय दोनों ने कभी एक दूसरे के लिए प्रचार नहीं किया. चुनाव जीतने के बाद जब प्रधानमंत्री पहली बार राजधानी पधारे थे तो उनके सम्मान में मनोज तिवारी अन्य 6 सांसदों को लेकर उनका स्वागत करने पहुंचे लेकिन गौतम ने समारोह से दूरी बनाए रखी. हाल में प्रदूषण कमेटी में गौतम के उपस्थित न होने से बवाल हुआ. उस दौरान गौतम को वरोदरा में जलेबी खाते हुए देखा गया और सोशल मीडिया पर भी उन्हें जमकर ट्रोल किया गया. उसी वक्त मनोज तिवारी के आवास वाली सड़क पर प्लेट में गंभीर का फोटो और जलेबी लिए कुछ कॉलेज युवकों ने प्रदर्शन किया था. अंदरूनी खबर यही थी कि ये प्रदर्शन तिवारी के कहने पर ही हुआ था ताकि सांसद गौतम की साख गिरे लेकिन इसका ज्यादा असर दिखा नहीं (Popularity of Gautam Gambhir). दोनों के बीच रार तो तब सार्वजनिक हुई जब मनोज तिवारी ने राजधानी में एनआरसी लागू करने की मांग की तो गौतम से अलग राय रखते हुए कहा कि इसमें कोई जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए. वैसे देखा जाए तो दिल्ली की जनता की पसंद कभी मनोज तिवारी रहे ही नहीं. इसकी वजह है कि तिवारी दिल्ली के संपर्क में कभी नहीं रहे. वे तो राजनीति करने दिल्ली आए हैं. उनका जन्म उत्तर प्रदेश के वाराणसी में हुआ और वे सपा नेता रहे. योगी आदित्यनाथ से चुनाव हारने के बाद उन्होंने बीजेपी का रूख किया और फिर जीते. उन्हें 2016 में दिल्ली की भाजपा इकाई का अध्यक्ष बनाया गया. वहीं गौतम के लिए दिल्ली तो घर के आंगन की तरह (Popularity of Gautam Gambhir) है. कहा तो यहां तक जा रहा है कि गौतम के जब राजनीति में आने की सुगबुगाहट होने लगी थी, तभी दिल्ली की जनता ने उन्हें प्रदेश का भावी सीएम कहकर पुकारना शुरु कर दिया था. एक स्पोर्ट्समैन होने के नाते उनकी फैन फोलोइंग और लोकल उम्मीदवारी को देखते हुए ऐसा सोचना गलत भी नहीं है. केवल गौतम गंभीर ही मनोज तिवारी और सीएम पद के बीच का कांटा नहीं हैं, यहां पार्टी के विजय गोयल और रमेश विधुड़ी भी उनके प्रतियोगी हैं जो अंदरूनी तौर पर मुख्यमंत्री पद का दावा ठोक रहे हैं. सूत्रों से खबर तो ये भी है कि बीजेपी आलाकमान की सीएम पद पर पहली पसंद गौतम गंभीर ही हैं. उनका शालीन स्वभाव और बेबाकी प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री व पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को रास आती है लेकिन राजनीति में अनुभवहीनता नये नवेले नेता गंभीर के लिए उलटी जा रही है. अब बीजेपी के चार नेता सीएम की कुर्सी पर बैठने का सपना तो देख रहे हैं लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी पार्टी और वर्तमान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से पार पाना है. दिल्ली में जिस तरह लगातार जनहीन के फैसले आ रहे हैं, उससे राजधानी की जनता बेहद खुश है. महिलाओं के लिए फ्री बस सुविधा, छात्रों के लिए फ्री वाईफाई, बिजली के बिलों में बेसिक छूट, सरकारी स्कूलों का बदला वातावरण और बेरोजगारों के लिए फ्री ट्रेनिंग सेंटर्स आप सरकार के ऐसे कुछ फैसले हैं जिन पर केंद्रीय सरकार पर भी सवाल नहीं उठा सकती. पिछले कुछ सालों में नरेंद्र मोदी पर सवाल दागने और लाइम लाइट में रहने की जगह केजरीवाल ने दिल्ली के विकास में जब से अपना फोकस किया, अगले चुनावों में जीत की जमीन तय करने में कामयाब होते दिख रहे हैं. ऐसे में उन्हें सत्ता की कुर्सी से हिला पाना थोड़ा मुश्किल लग रहा है. वैसे तो आम चुनावों में मोदी लहर ने पूरे देश के साथ-साथ दिल्ली की सभी सातों सीटों पर भी भाजपा को विजयश्री दिला दी. हालांकि इस जीत का क्रेडिट मनोज तिवारी लेने में कामयाब हुए. जबकि यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यहां तिवारी की जगह गौतम गम्भीर भी होते तो भी सातों सीट बीजेपी ही जीतने वाली थी. इसी जीत से उत्साहित मनोज तिवारी स्थानीय तौर पर अपनी उम्मीदवारी पर काम कर रहे हैं और लगातार आलाकमान और शीर्ष पदाधिकारियों से संपर्क में हैं लेकिन गौतम गंभीर की लोकप्रियता (Popularity of Gautam Gambhir) और स्थानीय होने के मुद्दे के आगे शायद मनोज तिवारी पीछे रह जाएं.