देश में लोकसभा चुनावों के साथ विधानसभा उपचुनावों में भी लहराया BJP का परचम

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देश में बुधवार को लोकसभा चुनाव के परिणाम के साथ-साथ कई राज्यों में विधानसभा उपचुनावों के नतीजे भी सामने आए. यहां बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के परिणामों की तरह ही विधानसभा उपचुनावों में भी अपना परचम लहराया है. जिन राज्यों में बीजेपी ने यह कारनामा किया है उस लिस्ट में बिहार, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, एमपी, यूपी और पं.बंगाल जैसे कई प्रदेश शामिल हैं. निम्न सीटों पर विधानसभा उपचुनावों के परिणाम बुधवार को घोषित हुए हैं. बिहारः बिहार में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा की दो सीटों के लिए चुनाव हुआ. इनके नतीजों में जदयू-बीजेपी गठबंधन ने महागठबंधन का सूपड़ा साफ कर दिया. डिहरी सीट पर बीजेपी के सत्यनारायण सिंह ने राजद … Read more

मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल होंगे राजस्थान के ये सांसद

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लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज कर सत्ता में लौटे नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की तैयारी शुरू हो गई है. संसदीय दल की बैठक में मोदी को नेता चुनने और राष्ट्रपति के सामने सरकार बनाने का दावा पेश करने की खानापूर्ति करने के बाद शपथ ग्रहण समारोह होगा. सूत्रों के अनुसार मोदी 30 मई को शपथ ले सकते हैं. मोदी का फिर से प्रधानमंत्री बनना तय होने के बाद अब इस बात की चर्चा होने लगी है कि इस बार उनके मंत्रिमंडल में कौन-कौन शामिल हो सकता है.

राजस्थान की बात करें तो पांच से छह सांसदों को मोदी की टीम में शामिल होने का मौका मिल सकता है. आपको बता दें कि पिछली मोदी सरकार में राजस्थान से राज्यवर्धन सिंह राठौड़, गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुनराम मेघवाल, पीपी चौधरी और सीआर चौधरी मंत्री बने थे. इनमें से सीआर चौधरी को छोड़कर सभी फिर से लोकसभा में पहुंच गए हैं. गौरतलब है कि सीआर चौधरी नागौर से सांसद का चुनाव जीते थे, लेकिन बीजेपी ने इस बार उन्हें टिकट देने की बजाय राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संयोजक हनुमान बेनीवाल से गठबंधन कर उन्हें मैदान में उतारा.

पिछली सरकार में मंत्री होने की वजह से राज्यवर्धन सिंह राठौड़, गजेंद्र सिंह शेखावत और अर्जुनराम मेघवाल का दावा इस बार भी मजबूत है, लेकिन पीपी चौधरी को इस बार मोदी की टीम से बाहर रहना पड़ सकता है. पिछली बार चौधरी को अरुण जेटली की पैरवी से मंत्रिमंडल में जगह मिली थी, लेकिन इस बार वे खुद खराब सेहत से जूझ रहे हैं. उन्हें गुरुवार को ही दिल्ली के एम्स से डिस्चार्ज किया गया है. बीमारी की वजह से जेटली करीब तीन हफ्ते से ऑफिस नहीं जा रहे थे. सूत्रों के अनुसार उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर रखा जा सकता है.

वहीं राज्यवर्धन सिंह राठौड़, गजेंद्र सिंह शेखावत और अर्जुनराम मेघवाल के अलावा राजस्थान से लोकसभा का चुनाव जीते 22 और राज्यसभा के 10 सांसदों में से कई चेहरे खुद को मंत्री बनने की दौड़ में शामिल मान रहे हैं. इनमें से कईयों ने तो बाकायदा लॉबिंग शुरू कर दी है. आइए जानते हैं कि मंत्री बनने की दौड़ में कौन-कौनसे सांसद शामिल हैं और किसका दावा कितना मजबूत है-

राज्यवर्धन सिंह राठौड़
जयपुर ग्रामीण सीट से दोबारा सांसद बने राज्यवर्धन सिंह मोदी की पहली सरकार में मंत्री रहे हैं. उनके पास खेल मंत्रालय के अलावा सूचना एवं प्रसारण जैसे अहम मंत्रालय का जिम्मा था. सेना में कर्नल और ओलंपिक में रजत पदक विजेता राज्यवर्धन पर नरेंद्र मोदी के अलावा बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का वरदहस्त है. नई सरकार में उनका मंत्री बनना तय माना जा रहा है. इस बार उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है. हालांकि एक चर्चा यह भी है कि मोदी-शाह उनके भीतर राजस्थान में पार्टी की कमान संभालने वाला नेता देख रहे हैं.

गजेंद्र सिंह शेखावत
जोधपुर सीट से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को बड़े अंतर से पटकनी देकर दूसरी बार सांसद बने गजेंद्र सिंह शेखावत मोदी की पहली सरकार में कृषि राज्य मंत्री रहे हैं. वे मोदी-शाह के तो चहेते हैं ही, संघ का वरदहस्त भी उन्हें प्राप्त है. गजेंद्र सिंह शेखावत का इस बार भी मंत्री बनना तय माना जा रहा है. हालांकि चर्चा यह भी है कि उन्हें प्रदेशाध्यक्ष बनाया जा सकता है. आपको बता दें कि अशोक परनामी के इस्तीफे के बाद मोदी-शाह ने उन्हें राजस्थान में पार्टी की कमान सौंपने का फैसला कर लिया था, लेकिन वसुंधरा राजे के ‘वीटो’ से घोषणा अटक गई.

अर्जुनराम मेघवाल
बीकानेर सीट से जीत की हैट्रिक लगाकर संसद पहुंचे अर्जुनराम मेघवाल की गिनती बीजेपी के बड़े दलित नेताओं में होती है. वे मोदी की पिछली सरकार में राज्य मंत्री रहे हैं. मेघवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की गुड बुक्स में शामिल हैं. उनका इस बार भी मंत्री बनना तय माना जा रहा है. हालांकि सियासी गलियारों में एक चर्चा यह भी है कि अर्जुन मेघवाल को लोकसभा का अध्यक्ष बनाया जा सकता है. आपको बता दें कि 16वीं लोकसभा की अध्यक्ष रहीं सुमित्रा महाजन ने इस बार चुनाव नहीं लड़ा है. बीजेपी को इस पद के लिए वरिष्ठ नेता की तलाश है.

हनुमान बेनीवाल
नरेंद्र मोदी के नए मंत्रिमंडल में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला नाम नागौर सीट से चुनाव जीते हनुमान बेनीवाल का हो सकता है. आपको बता दें कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी यानी आरएलपी से नागौर सीट पर गठबंधन किया था. इस सीट पर खुद हनुमान मैदान में उतरे और कांग्रेस की ज्योति मिर्धा को बड़े अंतर से पटकनी दी. जाट बिरादरी के सबसे लोकप्रिय नेता बन चुके बेनीवाल का मंत्री बनना इसलिए तय माना जा रहा है, क्योंकि राजस्थान में बीजेपी के पास कोई बड़ा जाट नेता नहीं है. सूत्रों के अनुसार बेनीवाल मंत्री बनने पर अपनी पार्टी का विलय बीजेपी में कर सकते हैं.

दीया कुमारी
राजसमंद सीट से चुनाव जीती दीया कुमारी को मोदी के मंत्रिमंडल में जगह मिल सकती है. आपको बता दें कि दीया कुमारी जयपुर के पूर्व राजपरिवार की राजकुमारी हैं. उन्होंने 2013 के विधानसभा चुनाव से राजनीति में एंट्री की थी. पार्टी ने उन्हें सवाई माधोपुर सीट से उम्मीदवार बनाया, जहां से उन्होंने जीत दर्ज की. 2018 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बीजेपी ने टिकट नहीं दिया. कहा जाता है वसुंधरा राजे से तनातनी की वजह से उनका टिकट कटा. वे लोकसभा चुनाव में टोंक-सवाई माधोपुर से टिकट चाहती थीं, लेकिन पार्टी ने उन्हें राजसमंद से उम्मीदवार बनाया. सूत्रों के अनुसार यदि राज्यवर्धन सिंह राठौड़ और गजेंद्र सिंह शेखावत को प्रदेश संगठन में कोई भूमिका मिलती है तो दीया कुमारी को मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है.

डॉ. किरोड़ी लाल मीणा
मोदी के मंत्रिमंडल में डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का नाम भी शामिल हो सकता है. वे फिलहाल राज्यसभा सांसद हैं. उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का करीबी माना जाता है. हालांकि दौसा लोकसभा सीट पर टिकट को लेकर हुई रस्साकशी में जिस तरह से डॉ. किरोड़ी की राय को दरकिनार किया गया, उसके बाद यह कयास लगाया जा रहा है कि शायद पार्टी नेतृत्व उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दे, लेकिन मोदी-शाह राजस्थान में वसुंधरा राजे को कमजोर करने के लिए उनके खिलाफ बोलने वाले नेताओं को ताकतवर बना सकती है. आपको बता दें कि डॉ. किरोड़ी को वसुंधरा का विरोधी माना जाता है. लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद वे खुलेआम यह कह रहे हैं कि यदि पार्टी विधानसभा चुनाव में वसुंधरा की बजाय दूसरे चेहरे को सामने लाती तो परिणाम दूसरे होते.

दावेदारों की इस फेहरिस्त के बीच यह देखना रोचक होगा कि नरेंद्र मोदी इनमें से किसे कितनी तवज्जो देते हैं. दावेदारी अपनी जगह है, लेकिन मंत्री तो वही बनेंगे जिन पर मोदी हाथ रखेंगे. फिलहाल सभी दावेदार अपने-अपने स्तर पर लॉबिंग में जुटे हैं.

मोदी की आंधी में भी इन दिग्गजों को झेलनी पड़ी हार

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लोकसभा चुनाव के परिणाम आए तो मोदी की आंधी में कांग्रेस के 9 पूर्व मुख्यमंत्रियों के किले भी धवस्त हो गए. पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौडा को भी इस लहर में हार का सामना करना पड़ा. वहीं हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा को बीजेपी के रमेश कौशिक ने सोनीपत सीट पर करारी हार का स्वाद चखाया. दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी की इस तुफानी लहर के बावजूद भी बीजेपी सरकार के कई मंत्री चुनाव हार बैठे. इन सीटों के नतीजे वाक्यी में चौंकाने वाले रहे. गाजीपुरः उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा-रालोद महागठबंधन होने के बावजूद बीजेपी ने प्रदेश में विशाल जीत हासिल की. बीजेपी ने यहां की 80 लोकसभा सीटों में से … Read more

बिहार में चला NDA का जादू, तिनके की तरह उड़ा विपक्ष

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बिहार के चुनावी नतीजे आ चुके हैं. एनडीए ने बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से 39 सीटों पर जीत हासिल की है. यह एनडीए का अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है. नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में बीजेपी-जदयू-लोजपा गठबंधन के सामने महागठबंधन कहीं खड़ा नहीं दिखाई दिया. लेकिन मोदी के लिए इस बार बिहार की चुनौती आसान नहीं थी. हम आपको चुनाव से पहले की चुनौतियों के बारे में बता रहे हैं जिन्हें बीजेपी ने केवल नरेंद्र मोदी की वजह से पार किया.

2014 की मोदी लहर में पुराने साथी जदयू के साथ छोड़ने के बावजूद बीजेपी ने बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया था. उसके बाद 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा. यह संगठन के लिए एक झटके की तरह था. चुनाव हारने का मुख्य कारण राजद-जदयू का गठबंधन रहा.

लेकिन बीजेपी ने इसका बदला 2018 में अपनी तरह से लिया. उन्होंने नीतीश कुमार को अपने पाले में लाने के लिए मना लिया. नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. अगले दिन बीजेपी ने जेडीयू सरकार के समर्थन का ऐलान कर दिया. बीजेपी सरकार में सहयोगी बनी और पुरानी सरकारों की तरह बीजेपी नेता सुशील मोदी को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया.

लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी को केंद्रीय मंत्री और रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाह ने झटका दे दिया. वो एनडीए का साथ छोड़कर चले गए. यह बीजेपी के लिए एक बड़ा झटका था. मोदी को घेरने के लिए तेजस्वी यादव ने बिहार में सामाजिक समीकरणों को साधते हुए महागठबंधन का निर्माण किया. महागठबंधन में राजद, कांग्रेस, रालोसपा, जीतनराम मांझी की ‘हम’ और मुकेश साहनी की ‘वीआईपी’ पार्टी शामिल थीं.

बिहार में चुनाव से पूर्व यह अनुमान था कि इस बार के चुनाव में बीजेपी-जदयू गठबंधन को महागठबंधन से कड़ी चुनौती मिलेगी. लेकिन आए नतीजों ने इस संभावना को सिरे से खारिज कर दिया. मोदी के करिश्माई नेतृत्व में बीजेपी-जदयू-लोजपा गठबंधन ने प्रचंड जीत हासिल की.

मोदी ने यहां सारे जातीय समीकरणों को तोड़ा है. मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र अररिया से भी बीजेपी के उम्मीदवार प्रदीप कुमार ने जीत हासिल की है. प्रदीप यादव की जीत ही बिहार में मोदी मैजिक की स्थिति का आलम बयां करती है.

मोदी के इस तुफान में बिहार के कई दिग्गजों के किले धवस्त हो गए. पाटलिपुत्र से लालु यादव की पुत्री मीसा भारती को बीजेपी के रामकृपाल यादव ने हराया. वहीं बेगूसराय में मोदी की आंधी में सीपीआई के कन्हैंया कुमार उड़ गए. कन्हैंया कुमार को गिरिराज सिंह ने करीब चार लाख वोटों से पटखनी दी. राजद के उम्मीदवार तनवीर हसन तीसरे स्थान पर रहे.

लालु यादव के संसदीय क्षेत्र से इस बार उनकी पत्नी राबड़ी देवी के स्थान पर तेजप्रताप यादव के ससूर चंद्रिका राय चुनाव मैदान में थे. उनको यहां बीजेपी के राजीव प्रताप रुडी से हार का सामना करना पड़ा. बिहार के उजियारपुर लोकसभा क्षेत्र से रालोसपा के उप्रेन्द्र कुशवाह को बीजेपी के नित्यानंद राय से हार का सामना करना पड़ा है.

बिहार की सबसे चर्चित सीट पटना साहिब से बीजेपी के रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस के शत्रुघ्न सिन्हा को भारी अंतर से हराया. वीआईपी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मुकेश साहनी को भी अपने पहले चुनाव में मोदी लहर के कारण हार का सामना करना पड़ा. उनको लोजपा के महबूब अली कैसर ने हराया. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी को भी इस चुनाव में हार का सामना करना पड़ा है.

मोदी-शाह की जोड़ी ने पश्चिम बंगाल में कैसे लगाई दीदी के किले में सेंध?

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यदि किसी राजनीतिक दल को लोकसभा चुनाव में 42 में से महज दो सीटों पर जीत हासिल हो तो उसे अगले चुनाव से ही मृतप्राय: मान लिया जाता है, लेकिन बीजेपी ने इस बदतर स्थिति को चुनौती में बदलकर जीत की नई इबारत​ लिख दी है. जी हां, पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने वो करिश्मा कर दिखाया है, जिसकी कल्पना कोई राजनीतिक दल सपने में भी नहीं कर सकता.

आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं. 2014 की मोदी लहर के बावजूद बीजेपी ने यहां महज दो सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि तृणमूल कांग्रेस ने 34, कांग्रेस ने चार और वाम दलों ने दो सीटों पर फतह हासिल की थी. जबकि 2016 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की 294 सीटों में से तृणमूल कांग्रेस को 211 सीटों पर जीत मिलीं और बीजेपी को महज तीन सीटों पर संतोष करना पड़ा.

दोनों चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के मुकाबले में बीजेपी कहीं नहीं थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी—शाह की जोड़ी ने ममता बनर्जी के किले में सेंध लगा दी है. तृणमूल कांग्रेस को 22 सीटों पर जीत मिली है जबकि बीजेपी ने 18 सीटों पर फतह हासिल की. बीजेपी का यह प्रदर्शन पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के उस दावे के आसपास है, जो उन्होंने चुनाव से पहले किया था. आपको बता दें कि शाह ने पश्चिम बंगाल में 23 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा किया था.

जिस समय अमित शाह ने 23 से ज्यादा सीटें जीतने का दावा किया तो राजनीति के जानकारों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया. सबने यह माना कि पश्चिम बंगाल में वाम दलों के किले को ध्वस्त कर सत्ता पर काबिज हुईं ममता बनर्जी को मात देना नामुमकिन है, लेकिन बीजेपी ने यह करिश्मा कर दिखाया है. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के किले में सेंध कैसे लगाई.

असल में 2014 के लोकसभा चुनाव और 2016 में विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद पश्चिम बंगाल की कमान संघ ने अपने हाथों में ली. बीते तीन साल में पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए जमीन तैयार करने में संघ ने बड़ी भूमिका निभाई. इस दौरान प्रदेश में संघ का नेटवर्क तेजी से बढ़ा. शाखाओं की संख्या इसकी मुनादी करती है. गौरतलब है कि संघ की शाखाओं में 2016 में पश्चिम बंगाल में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. 2016 में इनकी संख्या 700 के आसपास थी, जो अब बढ़कर 2000 को पार कर चुकी है.

पश्चिम बंगाल में संघ की शाखाएं बढ़ने का असर यह हुआ कि सूबे में ममता बनर्जी की कार्यशैली का विरोध करने के लिए एक संगठित शक्ति बीजेपी को मिल गई. इसका फायदा पश्चिम बंगाल में पार्टी के प्रभारी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने बखूबी उठाया. 2017 में बशीरहाट में एक फेसबुक पोस्ट से भड़के दंगे ने उनके लिए ध्रुवीकरण की जमीन तैयार की. राजनीति के जानकारों ने उसी समय यह भविष्यवाणी कर दी थी कि बशीरहाट पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव का बैरोमीटर बनेगा. ऐसा हुआ भी.

आपको बता दें कि बशीरहाट में लगभग 10 लाख मुसलमान रहते हैं. यहां कथित रूप से बांग्लादेश से घुसपैठ और सीमापार गाय की तस्करी होने का आरोप बीजेपी लगाती है. पार्टी के नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान खुलेआम यह कहा कि बशीरहाट और आसपास के इलाकों में यह सब ममता बनर्जी के संरक्षण में होता है. बीजेपी के इस आरोप का बंगाल के हिंदुओं में व्यापक असर दिखा. इसके अलावा ‘इमामों को मिल रहे भत्ते’ और स्कूलों में ‘उर्दू थोपने’ का मामला भी बीजेपी एजेंडे में शामिल रहा. असम की तरह पश्चिम बंगाल में भी एनआरसी लागू करने के बीजेपी के वादे ने हिंदुओं को आकर्षित किया.

इसकी काट के लिए ममता बनर्जी भी ध्रुवीकरण की रणनीति पर चलीं. यानी लोकसभा चुनाव में बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस, दोनों की रणनीति ध्रुवीकरण की रही. बीजेपी नेतृत्व का यह आकलन था कि ध्रुवीकरण के खुले खेल में उनकी पार्टी को सबसे बड़ा फायदा होगा, क्योंकि मुस्लिम वोट तृणमूल कांग्रेस, वाम दलों और कांग्रेस के बीच बंटेंगे जबकि हिंदुओं के वोट सिर्फ उसे मिलेंगे. बीजेपी की 18 सीटों पर जीत इसकी पुष्टि करते हैं.

बीजेपी को एक आकलन यह भी था कि तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के आतंक से त्रस्त वाम दलों और कांग्रेस के समर्थक इस उम्मीद से उनके साथ आएंगे कि बीजेपी ही ममता बनर्जी से मुक्ति दिला सकती है. चुनाव नतीजे इस ओर साफ इशारा करते हैं. ​पश्चिम बंगाल में वाम दलों को एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई जबकि कांग्रेस को महज एक सीट पर संतोष करना पड़ा.

बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 18 सीटों पर सिर्फ जीत ही दर्ज नहीं की है, बल्कि 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए तृणमूल कांग्रेस के सामने तगड़ी चुनौती पेश कर दी है. लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को जहां 43.36 प्रतिशत वोट मिले हैं, वहीं बीजेपी को 40.23 प्रतिशत वोट मिले हैं. लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद आत्मविश्वास से लबरेज बीजेपी के लिए इस अंतर को पाटना मुश्किल काम नहीं है.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी दूसरे नंबर पर तो लोकसभा चुनाव के पहले ही आ गई थी. पंचायत चुनाव के नतीजे इसकी गवाही देते हैं. आपको बता दें कि राज्य की 9214 पंचायत समितियों में से तृणमूल कांग्रेस को 8062 और दूसरे स्थान पर रही बीजेपी को 769 सीटों पर जीत मिली थी. वहीं, 133 सीटें लेकर कांग्रेस तीसरे और 110 सीटों के साथ वाम दल चौथे स्थान पर रहे. इसी तरह 49 हजार 636 ग्राम पंचायतों में तृणमूल कांग्रेस को 38 हजार 118, बीजेपी को 1483, कांग्रेस को 1066 और माकपा को 1483 सीटें मिली.

तृणमूल कांग्रेस के कई नेता भी यह मानते हैं कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी इसी गति से आगे बढ़ती रही तो विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के लिए खतरा बन सकती है. हालांकि वे बीजेपी के इस उभार के लिए ममता बनर्जी को ही जिम्मेदार मानते हैं. अनौपचारिक बातचीत में वे यह खुलकर स्वीकार करते हैं कि प्रदेश में बीजेपी की सबसे बड़ी प्रमोटर उनकी नेता ही हैं. यदि यहां बीजेपी पैर पसार रही है तो इसके लिए खाद—पानी ममता बनर्जी ने ही मुहैया करवाया है.

लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी की अगली रणनीति तृणमूल कांग्रेस में तोड़फोड़ करने की है. कभी ममता बनर्जी के करीबी रहे मुकुल रॉय सहित कई नेता बीजेपी में आ चुके हैं. असल में तृणमूल कांग्रेस के कई नेता यह मानते हैं कि ममता बनर्जी पार्टी को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चला रही हैं. ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी में अपने उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाना कई वरिष्ठ नेताओं को अखर रहा है.

लोकसभा चुनाव में बीजेपी का अच्छा प्रदर्शन ममता बनर्जी पर दबाव और बढ़ाएगा. इस माहौल को बीजेपी मौके की तरह लेगी. केंद्र में सत्ता में लौटने के बाद बीजेपी की ताकत वैसे ही बढ़ गई है. अब तो तृणमूल कांग्रेस के नेता ही यह मानने लगे हैं कि यदि बीजेपी इसी रणनीति और गति से आगे बढ़ी तो पार्टी पश्चिम बंगाल में परचम फहराने के करीब पहुंच सकती है.

देश की वो सीटें जहां मुकाबला एक्जिट पोल में भी फंसा हुआ है…

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लोकसभा चुनाव के परिणाम 23 मई को जारी होंगे. उससे पहले आए एक्जिट पोल्स में बीजेपी की सरकार बनती दिखाई दे रही है. लेकिन देश की कई सीटें ऐसी है जहां मुकाबला कड़ा है. अगर यहां के नतीजे अपेक्षा से उलट हुए तो एक्जिट पोल जमीदोंज हो सकते है. गोरखपुरः गोरखपुर बीजेपी का गढ़ रहा है. लेकिन योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए उपचुनाव में यहां सपा ने जीत हासिल की थी. इस बार यहां मुकाबला काफी कड़ा है. बीजेपी की तरफ से भोजपुरी अभिनेता रविकिशन मैदान में है. उनका मुकाबला सपा के रामभुआल निषाद से है. सहारनपुरः वैसे तो यह मुस्लिम बाहुल्य सीट है लेकिन यहां बसपा … Read more

फिर बोतल से बाहर निकला ‘EVM’ का जिन्न, कहा ‘क्या हुकुम है मेरे आका’

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लोकसभा चुनाव जैसे ही खत्म हुआ, मानो ऐसा लगा जैसे ‘ईवीएम’ नाम जिन्न गुफा से बाहर निकल आया हो और बीजेपी के पक्ष में कह रहा हो ‘क्या हुकुम है मेरे आका’. उस जिन्न से नरेंद्र मोदी ने कहा ‘हे ईवीएम जिन्न, मेरी सरकार बना दो’. इस पर जिन्न ने कहा, ‘जो हुकुम मेरे आका’. इसके बाद जो हुआ, वह सब के सामने है, करीब-करीब सभी एग्ज़िट पोल ने एनडीए की सरकार बना दी. अब इस ईवीएम रूपी जिन्न से डरकर सभी विपक्षी दलों ने पहले सुप्रीम कोर्ट और वहां से दुतकारे जाने के बाद लामबंध होकर चुनाव आयोग के दरवाजे पर अपनी हाजिरी देने पहुंच गए. इस दल में … Read more

अगर फिर बनी पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार तो रचा जाएगा नया इतिहास

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देश में लोकसभा चुनाव के बाद आए एग्ज़िट पोल पूर्ण बहुमत की बीजेपी सरकार रच रहे हैं. अगर यह सच साबित होता है तो भारतीय राजनीति में एक बार फिर इतिहास रचा जाएगा. जवाहर लाल नेहरु और इंदिरा गांधी के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली यह तीसरी सरकार होगी जो सत्ता में वापसी करेगी. बीजेपी 2014 में भी केंद्र में विराजमान हो चुकी है.

इससे पहले जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में कांग्रेस ने लगातार 15 साल तक सत्ता पर अपना कब्जा कायम रखा था. उन्होंने 1952, 1957 और 1962 में लगातार कांग्रेस की सत्ता में भारी बहुमत के साथ वापसी करायी. कांग्रेस ने नेहरु के नेतृत्व में 1952 के चुनाव में 364 सीटों पर जीत हासिल की. 1957 के चुनाव में नेहरु के दमदार नेतृत्व के दम पर कांग्रेस की सीटें 364 से बढ़कर 371 हो गई. 1962 के चुनाव में नेहरू ने अपने शासन के दम पर बहुमत की हैट्रिक लगाई. इस बार कांग्रेस को 361 सीटें मिलीं.

मई, 1964 में नेहरु का निधन हो गया. कांग्रेस के भीतर सत्ता के शीर्ष को लेकर संघर्ष शुरु हुआ. आखिरकार लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर सहमति बनी. लेकिन डेढ़ साल के भीतर उनका भी निधन हो गया.

शास्त्री के निधन के बाद कांग्रेस में फिर से सत्ता संघर्ष स्वभाविक था. अंत में प्रधानमंत्री पद के दो दावेदार सामने आए. एक तरफ मोरारजी देसाई तो दूसरी तरफ जवाहर लाल नेहरु के बेटी इंदिरा गांधी.

यह मामला तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष कामराज के लिए कठिन परीक्षा का दौर था. उन्हें पार्टी में बगैर किसी विरोध के दोनों में से किसी एक के नाम पर सहमति बनानी थी. उन्होंने मोरारजी देसाई को समझाने की तमाम कोशिशें की लेकिन मोरारजी वोटिंग पर अड़ गए. बाद में वोटिंग पर सहमति बनी और यहां इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को पॉपुलर्टी की रेस में काफी पीछे छोड़ दिया.

1967 का संसदीय चुनाव इंदिरा गांधी के नेतृत्व में लड़ा गया. इंदिरा ने पार्टी में आंतरिक विरोध होने के बावजूद अपने नेतृत्व में दमदार वापसी की. कांग्रेस को इस चुनाव में 284 सीटों पर जीत मिली. हालांकि वह दौर कांग्रेस के लिए सुखद नहीं था. इसके बावजूद पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हुआ. 1971 में इंदिरा गांधी ने फिर से सत्ता में वापसी की और अपने नेतृत्व में कांग्रेस को 352 सीटें दिलाईं.

2014 के चुनाव में मोदी के करिश्माई नेतृत्व में बीजेपी ने 282 सीटों पर फतेह हासिल की थी. उस समय नतीजे देखने वालों के लिए एक चमत्कार से कम नहीं था. देश के इतिहास में बीजेपी पहली गैर-कांग्रेसी पूर्ण बहुमत सरकार थी. कांग्रेस का इस चुनाव में लगभग सूपड़ा साफ हो गया था.

हालात यह रहे कि देश का सबसे बड़ा राजनीतिक दल केवल 44 सीटों पर सिमट कर रह गया. राजस्थान, गुजरात, उतराखंड़, गोवा और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला पाया. अब अगर बीजेपी फिर से सत्ता वापसी करती है तो नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद तीसरी पूर्ण बहुमत सरकार होगी जो सत्ता में वापसी करेगी.