राजस्थान: बसपा ने जारी की 6 प्रत्याशियों की लिस्ट

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बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने राजस्थान लोकसभा चुनाव के लिए अपनी नई सूची जारी की है. इस लिस्ट में 6 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं. लिस्ट में जोधपुर, जालौर, जयपुर शहर, पाली, चित्तौडगढ़ और बाड़मेर लोकसभा सीटें शामिल हैं. बीएसपी ने बाड़मेर से बखास्त आईपीएस पंकज चौधरी को टिकट देकर चौंका दिया है. जोधपुर से उनकी पत्नी मुकुल चौधरी को टिकट मिला है. बसपा की लिस्ट के अनुसार, जालौर से भागीरथ विश्नोई, जयपुर शहर से रिटायर्ड आईएएस उमराव सालोदिया, चित्तौड़गढ़ से डॉ.जगदीश चंद्र शर्मा और पाली से शिवाराम मेघवाल को टिकट दिया गया है. यह भी पढ़ें: यूपी में सपा-बसपा गठबंधन को झटका इससे पहले बीएसपी ने राजस्थान के लिए … Read more

मध्य प्रदेश: बीजेपी से उठा संघ का भरोसा, प्रचारकों ने खुद संभाला मोर्चा

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लगता है कि एमपी में विधानसभा चुनावों में हुई हार के बाद संघ का बीजेपी से भरोसा उठ सा गया है. शायद यही वजह रही कि संघ ने लोकसभा के सियासी समीकरणों को समझते हुए प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों पर अपने पदाधिकारियों की ड्यूटी लगाई है. इस मुहिम में संघ से जुड़े सभी संगठनों के ज्यादातर बड़े नाम शामिल हैं, जो हर लोकसभा सीट पर जाकर एक और बीजेपी के पक्ष में माहौल तैयार करेंगे. साथ ही भीतरघात और बगावती सुरों को साधने की कोशिश करेंगे. ऐसा करने की सबसे बड़ी वजह है, विधानसभा चुनावों के समय संघ ने मंत्रियों को डैमेज कंट्रोल करने की जिम्मेदारी सौंपी थी जिसमें … Read more

आखिरकार ‘हाथ’ और ‘झाडू’ में बनी बात, किसी भी वक्त गठबंधन का एलान संभव

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ख़बर है कि लोकसभा चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस के बीच समझौता हो गया है. समझौते के तहत फिलहाल दिल्ली और हरियाणा में दोनों पार्टियां गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में उतरने पर तैयार हो गयी हैं. वहीं, पंजाब को लेकर सहमति बनी है कि फैसला बाद में किया जाएगा. गठबंधन का जो फॉर्मूला तय हुआ है, उसके अनुसार दिल्ली में ‘आप’ 4 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि कांग्रेस 3 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. बदले में हरियाणा में कांग्रेस ‘आप’ को गुड़गांव या करनाल में से कोई एक सीट देगी.

गौरतलब है कि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन को लेकर लंबे समय से कयास लगाये जा रहे थे, लेकिन बात नहीं बन पा रही थी. हालांकि गठबंधन को लेकर ‘आप’ पूरा मन बना चुकी थी और गंभीरता से इसका प्रयास भी कर रही थी, मगर इस मुद्दे पर कांग्रेस के नेता दो गुटों में बंटे थे. पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शीला दीक्षित का खेमा ‘आप’ से किसी भी कीमत पर गठबंधन का विरोध कर रहा था जबकि पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन का गुट गठबंधन की वकालत कर रहा था.

प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको भी गठबंधन के पक्ष में थे. उन्होंने तो बाकायदा पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच एक सर्वे कराकर इसकी आधारभूमि तैयार की थी. गठबंधन की वकालत करने वाले नेताओं का कहना था कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो इसका फायदा भाजपा को होगा और वह दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटें जीत लेगी. वहीं, गठबंधन का विरोध कर रहे नेताओं की राय थी कि यह कांग्रेस के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है, क्योंकि एक ऐसे वक्त में जब पार्टी नए सिरे से दोबारा खड़ी होती दिख रही है और उसका खोया मतदाता दोबारा उसकी ओर आ रहा है, तब गठबंधन से न केवल उसका मनोबल गिरेगा बल्कि उसका बढ़ता आधार भी खिसक सकता है.

इस गुट का साफ मानना था कि लोकसभा में तो कांग्रेस को गठबंधन का विशेष फायदा नहीं ही होगा, उल्टे विधानसभा चुनावों में भी उसे इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा. इनका स्पष्ट मानना था कि ‘आप’ के उभार के पीछे कांग्रेस के वोटों का उसकी ओर पलायन कारण रहा, जो अब बदले हालात में दोबारा पार्टी के पास लौट रहा है. ऊपर से जिस प्रकार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब, गोवा व दूसरे राज्यों में भी गठबंधन की शर्त रख रहे थे, उससे भी गठबंधन की संभावना में रुकावटें आ रही थीं. लेकिन जैसे-जैसे इसके तय होने में समय बीतता गया, उससे ‘आप’ को अपने लिए खतरा भी बढ़ता नज़र आने लगा. कारण, पार्टी के आंतरिक सर्वे में भी यही बात खुलकर आयी कि अगर उसने कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया तो आगे भी उसकी राह कांटों भरी हो सकती है.

दूसरे सूबों में अपना दायरा बढ़ाने की उसकी हसरत तो चकनाचूर होगी ही, विधानसभा चुनाव के बाद दिल्ली की सत्ता से भी वह विदा हो जाएगी. पंजाब विधानसभा चुनाव में अनपेक्षित नतीजों से भी ‘आप’ सशंकित थी. उन्हीं नतीजों का परिणाम है कि मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी ‘आप’ के साथ गठबंधन के विरोध में दिख रहे थे. यही वजह है कि केजरीवाल ने भी मौके की नज़ाकत को भांपते हुए अपना रुख नरम किया और सीधे राहुल गांधी पर ही गठबंधन के लिए दबाव बनाने की रणनीति पर उतर आए. इसका असर भी हुआ और अंतत: नए सिरे से दोनों पार्टियों में गठबंधन को लेकर चर्चा शुरू हुई. राहुल की गंभीरता के आगे शीला दीक्षित खेमा भी नरम हुआ और यह कहने लगा कि आलाकमान जो फैसला करेगा, हम मानेंगे.

बहरहाल, दोनों पार्टियों के बीच समझौता हो गया है और जल्द ही इसकी औपचारिक घोषणा की जा सकती है. वैसे दिल्ली में गठबंधन का मामला सीटों को लेकर भी अटक रहा था, क्योंकि ‘आप’ ने सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए थे. इनमें तीन उम्मीदवारों- पूर्वी दिल्ली से आतिशी, उत्तर-पूर्वी दिल्ली से दिलीप पांडेय और नई दिल्ली से राघव चड्डा की सीटों को वह किसी भी हालत में छोड़ने को तैयार नहीं थी. कारण, ये केजरीवाल के बेहद करीबी लोगों में शामिल हैं.

वहीं, कांग्रेस की भी नज़र इन सीटों पर थी. खासकर अजय माकन चुनाव लड़ने की स्थिति में नई दिल्ली सीट को ही अपने लिए मुफीद मान रहे थे. ऐसे में उनका इरादा भी यह सीट लिये बगैर गठबंधन पर आखिरी मुहर लगवाने का नहीं था. बहरहाल, ‘आप’ ने कांग्रेस की नई दिल्ली सीट को लेकर अपनी बात मान ली है, लेकिन बाकी दो सीटों कांग्रेस को मना लिया है. अब ‘आप’ पश्चिमी दिल्ली, उत्तर-पूर्वी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली और उत्तरी दिल्ली से मैदान में उतरेगी. कांग्रेस के हिस्से में चांदनी चौक, उत्तर-पश्चिमी दिल्ली और नई दिल्ली सीटें आयी हैं.

वैसे कांग्रेस और ‘आप’ के नेता अभी भी सार्वजनिक रूप से गठबंधन की पुष्टि नहीं कर रहे हैं, लेकिन तय है कि एकाध दिनों में इसका ऐलान हो जाएगा. ‘आप’ ने अपनी पसंदीदा सीटें कांग्रेस को देने का फैसला कैसे कर लिया और अब केजरीवाल के तीनों करीबी नेताओं का क्या होगा? वे चुनाव लड़ेंगे, तो कहां से या उन्हें अब चुनाव नहीं लड़ाया जाएगा? ऐसे सवाल ज़रूर अचानक सियासी गलियारों में तैरने लगे हैं. राजनीति की समझ रखने वालों का कहना है कि केजरीवाल ने अपना नफा-नुकसान देख कर ही यह कदम उठाया है.

दरअसल, दिल्ली के अलावा देश का ऐसा कोई राज्य नहीं है जहां आम आदमी पार्टी अपने ठोस जनाधार का दावा कर सकती है. हालांकि उसने कई राज्यों में पूरी कोशिश की, मगर आज की तारीख में उसकी सारी कोशिशें बेनतीजा नज़र आती हैं. गोवा से वह बैरंग वापस लौट चुकी है. पंजाब में भी वह विधानसभा चुनावों के बाद पिछड़ चुकी है. इसके बावजूद कि इससे पहले हुए लोकसभा चुनाव में उसने सूबे की कुल 13 सीटों में 4 सीटें हासिल की थीं. इस पिछड़ने को वह गठबंधन से भरपाई करना चाहती है ताकि मिलकर बीजेपी को हराया जा सके.

गठबंधन के जरिये आम आदमी पार्टी हरियाणा में भी घुसने की कोशिश कर रही है. बीते दिनों जींद विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में इसी के मद्देनज़र उसने जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के उम्मीदवार दिग्विजय सिंह चौटाला का समर्थन किया था. अब हरियाणा में कांग्रेस और जेजेपी से गठबंधन के साथ वह अपनी संभावनाएं जगाना चाह रही है. वहीं पंजाब को लेकर भी कांग्रेस ने उसे भरोसा दिलाया है कि बाद में इस पर बात होगी. देखना शेष है कि पंजाब में अमरिंदर इसके लिए तैयार होते हैं या नहीं? और यह भी कि गठबंधन के बाद ‘आप’ और कांग्रेस का चुनावों में कैसा प्रदर्शन रहता है?

वसुंधराजी कहती थी-गहलोत सड़कों पर घूमकर भीख मांग रहा है: गहलोत

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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आखिरकार अपने बेटे वैभव गहलोत को प्रदेश की सक्रिय राजनीति में प्रवेश कराने के लिए जोधपुर आ ही गए. उन्होंने वैभव की लोकसभा सीट और अपनी कर्मस्थली में वैभव के लिए शहर की जनता के आशीर्वाद के साथ वोट भी मांगे. इस दौरान उन्होंने प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसुन्धरा राजे पर भी निशाना साधा. वसुंधराजी कहती थी ‘गहलोत सड़कों पर घूमकर भीख मांग रहा है।’ मैंने कहा कि वसुंधराजी, मुझे गर्व हो रहा है कि मैं लोगों के बीच जा रहा हूं. यह भी पढ़ें: जोधपुर में गर्माया ‘स्थानीय’ का मुद्दा, एक-दूसरे पर बाहरी होने का तंज जोधपुर से मेरा … Read more

राजस्थान: जोधपुर में गर्माया ‘स्थानीय’ का मुद्दा, एक-दूसरे पर बाहरी होने का तंज

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देश में होने वाले आम चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दों का अपना महत्व होता ही है लेकिन राजस्थान की सबसे हॉट सीट जोधपुर में राष्ट्रीय मुद्दों के साथ ही इस बार स्थानीय होने का मुद्दा काफी गर्मा रहा है. हालांकि इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे वैभव गहलोत और बीजेपी के गजेंद्र सिंह शेखावत दोनों ही प्रत्याशियों की जन्मभूमि जोधपुर नहीं है. इसके बावजूद दोनों अपने आप को स्थानीय बताने के लिए अलग-अलग दलीलें पेश कर रहे हैं. जोधपुर लोकसभा सीट से बीजेपी ने वर्तमान सांसद और केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह को फिर एक बार मैदान में उतारा है वहीं कांग्रेस ने जातिगत समीकरणों को दरकिनार करते हुए प्रदेश मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे को चुनावी मैदान में उतारा है.

एक अप्रैल को जब वैभव गहलोत जोधपुर आए तो बीजेपी प्रत्याशी गजेंद्र सिंह शेखावत ने तंज कसते हुए कहा कि प्रवासी (बाहरी) का जोधपुर में स्वागत है. शेखावत की ओर से वैभव गहलोत को बाहरी बताए जाने के बाद कांग्रेसी कार्यकर्ता भी आक्रामक नजर आ रहे हैं. इसके बाद तो कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गजेंद्र सिंह को ही बाहरी प्रत्याशी बताना शुरू कर दिया है. वैसे देखा जाए तो वैभव और गजेंद्र सिंह दोनों की जन्मभूमि जोधपुर नहीं है.

बात करें गजेंद्र सिंह शेखावत की तो वह मूल रूप से सीकर जिले के मेहरोली से हैं. उनका जन्म जैसलमेर में हुआ था. उनके स्कूली शिक्षा बीकानेर, भीलवाड़ा और चित्तौड़गढ़ में हुई थी. कॉलेज शिक्षा जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय में हुई और यही से उन्होंने छात्र संघ अध्यक्ष का चुनाव लड़ते हुए अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की. छात्रसंघ अध्यक्ष चुने जाने के बाद शेखावत ने जोधपुर संभाग के अलग-अलग जिलों में संगठनात्मक दृष्टि से काम किया और इसी को आधार बनाते हुए गजेंद्र सिंह शेखावत अपने आप को जोधपुर का साबित कर रहे हैं.

बात की जाए वैभव गहलोत की तो उनका जन्म जयपुर में हुआ. स्कूल शिक्षा दिल्ली तो उच्च शिक्षा पूना में हुई. वैभव लंबे समय से जयपुर में ही रह रहे हैं लेकिन 2003 के बाद से सभी विधानसभा, लोकसभा और नगर निगम के चुनावों में वैभव गहलोत जोधपुर की राजनीति में सक्रिय नजर आए. खुद वैभव भी अपने हर संबोधन में खुद को जोधपुर का बेटा बताते हुए कहते हैं कि उनके दादा बाबू लक्ष्मणसिंह में जोधपुर की सेवा की और उसके बाद उनके पिता अशोक गहलोत पिछले 40 वर्षों से जोधपुर की जनता के बीच रहकर कार्य कर रहे हैं. गजेंद्र सिंह के तंज का जवाब देते हुए वैभव गहलोत कहते हैं कि उन्हें प्रवासी बताने वाले पहले अपने गिरेबान में झांक कर देखें कि वह स्वयं कहां से आए हैं.

खैर, कौन प्रवासी है, यह मुद्दा तो चुनावी है लेकिन इस बार जोधपुर में दोनों ही पार्टियों के बीच मुकाबला बेहद कड़ा है. यह सीट अशोक गहलोत के होने से कांग्रेसी गढ़ है और वैभव खुद अपने पिता के नाम पर वोट मांग रहे हैं. वहीं गजेंद्र सिंह को भी इस बात का अहसास है और वें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रहे हैं. दोनों एक-एक वोट को अपने पक्ष में करने के लिए दमखम लगा रहे हैं. ज्यो-ज्यो चुनाव की तारीख नजदीक आती जाएगी, जबानी हमले तो तेज होंगे ही लेकिन प्रवासी और स्थानीय का यह मुद्दा अपनी गर्माहट बनाए रखेगा.

अगले हफ्ते आएगा BJP का घोषणा पत्र, तीन बड़ी घोषणाओं पर रहेगा फोकस

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लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने तो अपना चुनावी घोषणा पत्र ‘जन आवाज पत्र’ घोषित कर दिया है लेकिन बीजेपी के घोषणा पत्र का फिलहाल इंतजार है. चुनाव आयोग ने यह साफ कर दिया है कि राजनीतिक दलों को चुनाव के कम से कम 48 घंटे पहले अपना घोषणा पत्र जारी करना होगा. ऐसे में बीजेपी सोमवार या फिर मंगलवार तक हर हाल में घोषणा पत्र जारी कर देगी. 11 अप्रैल से देश के 20 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में पहले चरण के मतदान होंगे. यह भी पढ़ें: राहुल गांधी का ‘जन आवाज घोषणा पत्र’, बेरोजगारी और किसान मुद्दों पर फोकस बीजेपी के चुनावी घोषणा पत्र ‘संकल्प पत्र’ के … Read more

मध्यप्रदेश: मतदान से पहले ही इन पांच सीटों पर हार मान चुकी है कांग्रेस

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मध्य प्रदेश में 29 में से पांच सीटों पर कांग्रेस ने मतदान से पहले ही हार मान ली है. इसकी बड़ी वजह इन सीटों पर सपा-बसपा का जनाधार है. पिछले लोकसभा चुनाव में इन सीटों पर सपा और बसपा ने कांग्रेस का खेल खराब कर दिया था. इस बार यह नुकसान और ज्यादा होने की के कयास लगाए जा रहे हैं, क्योंकि सपा-बसपा एक साथ मैदान में हैं. कांग्रेस के नेता दबे हुए स्वर में यह स्वीकार करते हैं कि मायावती और अखिलेश यादव के गठबंधन को मध्यप्रदेश में जितने भी वोट मिलेंगे यह उनके वोट बैंक में सेंधमारी होगी. 2014 के चुनाव नतीजों को आधार बनाएं तो मध्यप्रदेश की … Read more