BSP
The Bahujan Samaj Party (BSP) is a national level political party in India that was formed to represent Bahujans (literally means “people in majority”), referring to Scheduled Castes, Scheduled Tribes, and Other Backward Castes (OBC), along with religious minorities. According to Kanshi Ram, when he founded the party in 1984, the Bahujans comprised 85 percent of India’s population, but were divided into 6,000 different castes.
यह थी राहुल गांधी के अमेठी से चुनाव हारने की सबसे बड़ी वजह
अमेठी से राहुल गांधी की हार की वजह से पूरी कांग्रेस सकते में आ गई है. आखिर क्या वजह रही की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीजेपी की स्मृति ईरानी से हार गए. हार के कारणों की तह तक जाने के लिए कांग्रेस ने एक कमेटी का गठन किया है. कमेटी में राजस्थान के जुबेर खां सहित दो नेताओं को शामिल किया गया है. वहीं कमेटी ने अमेठी में डेरा डालते हुए पड़ताल भी शुरू कर दी है. प्रारम्भिक जांच में सामने आया है कि भले ही सपा-बसपा ने अमेठी से प्रत्याशी नहीं उतारा लेकिन उनका वोट बीजेपी को शिफ्ट हो गया, जिसके चलते राहुल 55 हजार वोटों से हार गए. … Read more
यूपी में महागठबंधन के भविष्य पर संशय, अलग होंगे या साथ रहेंगे?
लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा है. सपा को सिर्फ पांच सीटों पर जीत हासिल हुई. हालात इतने बुरे रहे कि मुलायम परिवार के तीन सदस्य कन्नौज से डिंपल यादव, फिरोजाबाद से अक्षय यादव और बदायूं से धर्मेन्द्र यादव को हार का सामना करना पड़ा. तीनों प्रत्याशी 2014 की मोदी लहर में भी जीतने में कामयाब रहे थे लेकिन इस बार बसपा से गठबंधन के बावजूद सपा अपने घर बचाने तक में नाकामयाब रही.
वहीं बसपा के हालात पिछली बार की तुलना में सुधरे तो जरूर, लेकिन पार्टी को जिस प्रदर्शन की उम्मीद थी, बसपा वैसा प्रदर्शन नहीं कर पायी. रालोद के हालात तो 2014 की तरह ही निराशाजनक रहा. सपा-बसपा से गठबंधन होने के बावजूद पार्टी का प्रदेश में खाता तक नहीं खुला. जबकि पार्टी के खाते में गठबंधन की गणित के हिसाब से मजबूत सीटें आयी थी. रालोद सुप्रीमो चौधरी अजित सिंह को जाटलैंड मुजफ्फनगर और उनके पुत्र जयंत को बागपत से हार का सामना करना पड़ा है.
चुनाव में मिली हार के बाद अब यह चर्चा आम है कि सपा और बसपा का गठबंधन जारी रहेगा या टूट जाएगा. अगर गठबंधन जारी रहता है तो अब सपा-बसपा की अगली परीक्षा विधानसभा उपचुनावों में होगी. बता दें कि लोकसभा चुनाव में यूपी के 11 विधायक सांसद चुने गए हैं. इन विधायकों में आठ बीजेपी और एक बीजेपी के सहयोगी अपना दल के हैं. सपा और बसपा का एक-एक विधायक है.
प्रदेश की जिन सीटों पर उपचुनाव होंगे उनमें डला, गोविंद नगर, लखनऊ कैंट, प्रतापगढ़, गंगोह, मानिकपुर, जैदपुर, बलहा, इगलास, रामपुर सदर और जलालपुर सीटें शामिल हैं. लोकसभा चुनावों में बीजेपी की जबरदस्त कामयाबी और विपक्ष को मिली करारी पराजय के बाद ये उपचुनाव सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्ष के बीच शक्ति परीक्षण का पहला अवसर होगा. खासतौर पर विपक्ष के लिए खोई ताकत कुछ हद तक वापस पाने का मौका होगा. उपचुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर सपा और बसपा 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारी को भी परख पाएंगे.
वैसे उपचुनावों में विपक्षी गठबंधन हो या न हो, बसपा के रुख पर सबकी निगाहें रहेंगी. क्योंकि पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि बसपा उपचुनाव में हिस्सा नहीं लेती है. योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री और केशव प्रसाद मौर्य के उप-मुख्यमंत्री बनने के बाद हुए गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में भी बसपा ने भाग नहीं लिया था. बसपा के पुराने रुख को देखते हुए तो ये सुनिश्चित लग रहा है कि इन उपचुनावों में तो बसपा अखिलेश यादव का साथ देगी. इन्हीं चुनावों के नतीजों के आधार पर सपा-बसपा के साथ का भी फैसला हो जाएगा. अगर सपा को कामयाबी मिली तो गठबंधन लंबा चल सकता है. अन्यथा खराब प्रदर्शन की स्थिति में दोनों का साथ छूटना तय है.
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BSP के साथ 2008 की रणनीति पर काम करने जा रही है कांग्रेस
राजस्थान में बसपा के विधायकों का 27 मई को राज्यपाल कल्याण सिंह से मुलाकात का कार्यक्रम तय था. लेकिन बाद में विधायकों ने इस मुलाकात को टाल दिया. कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है. लेकिन इस मुलाकात के पीछे के कारण सत्ता के गलियारों में तलाशें जा रहे हैं. सूत्रों के अनुसार, खबर आ रही है कि बसपा के सभी विधायकों को कांग्रेस अपने दल में शामिल कराने का प्रयास कर रही है.
वैसे बसपा विधायकों ने राजस्थान में कांग्रेस सरकार को समर्थन दे रखा है और सरकार की स्थिति मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार की तरह किनारे पर भी नहीं है. लेकिन प्रदेश संगठन लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद प्रदेश सरकार में अपने आंकड़े दुरस्त करना चाहती है ताकि भविष्य में किसी भी तरह के संकट का सामना नहीं करना पड़े.
2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बहुमत से कुछ फासले पर रह गई थी. उसे 96 सीटों पर ही जीत मिली थी. बहुमत के लिए उसे पांच विधायकों की दरकार थी. शुरुआत में निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार चलाई गई लेकिन निर्दलीय विधायकों के सरगना बीजेपी के बागी नेता किरोड़ी लाल मीणा सरकार के कामकाज में ज्यादा हस्तक्षेप करने लगे थे.
ऐसे में अशोक गहलोत ने सरकार की स्थिति मजबूत करने के लिए बड़ा दांव चला. उन्होंने बसपा के टिकट पर जीते 6 विधायकों को पार्टी में लाने के प्रयास शुरु किए. गहलोत के इस मिशन में उनका साथ दिया तत्कालीन टोंक-सवाईमाधोपुर सांसद नमोनारायण मीणा ने.
अशोक गहलोत और नमोनारायण मीणा की मुहिम रंग लाई और बसपा के सभी 6 विधायकों ने कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली. अशोक गहलोत ने सभी विधायकों को प्रदेश सरकार में अहम पद दिए. 2008 में जिन विधायकों ने बसपा से कांग्रेस की सदस्यता ली थी, उनमें नवलगढ़ विधायक राजकुमार शर्मा, दौसा विधायक मुरारीलाल मीणा, बाड़ी विधायक गिर्राज सिंह मलिंगा, सपोटरा विधायक रमेश मीणा, उदयपुरवाटी विधायक राजेन्द्र सिंह गुढा और गंगापुर विधायक रामकेश मीणा शामिल थे. बसपा विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने के बाद सरकार में कांग्रेस विधायकों का आंकड़ा 96 से बढ़कर 102 हो गया. इसका नतीजा यह रहा कि सरकार पूरे पांच साल बिना किसी दबाव के चली.
अब कांग्रेस एक बार फिर 2008 की मुहिम को दोहराने के प्रयास कर रही है. देखा जाए तो कांग्रेस को कामयाबी मिलने की संभावना भी दिख रही है. क्योंकि इस बार जीते कई बसपा विधायक चुनाव में कांग्रेस से टिकट मांग रहे थे. टिकट न मिलने की स्थिति में वो बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े.
बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव में 6 विधायकों को जीत हासिल हुई थी जिनमें उदयपुरवाटी से राजेंद्र सिंह गुढ़ा, नगर से वाजिब अली, तिजारा से संदीप यादव, नदबई से जोगिंदर सिंह अवाना, करौली-धोलपुर से लाखन सिंह गुर्जर और किशनगढ़ बास से दीपचंद खैरिया शामिल हैं.
राजेंद्र गुढ़ा 2008 की गहलोत सरकार में मंत्री रह चुके हैं. वहीं किशनगढ़ विधायक दीपचंद खैरिया 2008 और 2013 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं. इस बार उनका टिकट काट पार्टी ने कर्ण सिंह यादव पर दांव खेला था.
इन सभी विधायकों में से सिर्फ तिजारा विधायक संदीप यादव ही बीजेपी की पृष्ठभूमि से जुड़े हैं. वो वसुंधरा सरकार में युवा बोर्ड के उपाध्यक्ष रह चुके हैं. इस बार के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी से तिजारा विधानसभा से प्रत्याशी बनाने की मांग की थी लेकिन पार्टी ने यहां से संदीप दायमा को प्रत्याशी बनाया. इसके बाद संदीप यादव ने बागी होकर बसपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीते.
बसपा विधायकों के कांग्रेस के संपर्क में होने की सूचना के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी के सभी 6 विधायकों को दिल्ली तलब किया है. मायावती 2008 में कांग्रेस से धोखा खा चुकी है इसलिए वो इस बार कोई चूक नहीं करना चाहती है. बसपा के विधायकों को कांग्रेस में शामिल कराना कांग्रेस के लिए इसलिए भी जरुरी है क्योंकि अगर बसपा राजस्थान में ज्यादा पांव पसारेगी, तो इसका सीधा-सीधा नुकसान कांग्रेस को ही होगा. इसकी सीधी सी वजह है कि प्रदेश में बसपा और कांग्रेस का कोर वोटर एक ही है.
मोदी लहर में बिना प्रचार किए चुनाव जीता बलात्कार का आरोपी उम्मीदवार
देश में कल आए लोकसभा चुनाव के नतीजों में बीजेपी की सुनामी देखने को मिली. इसमें देश के बड़े-बड़े नेता बह गये. चाहे वो पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा हो या दिल्ली में प्रंदह साल तक राज करने वाली शीला दीक्षित हर किसी को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.
यूपी में मोदी की आंधी ने सपा-बसपा- रालोद के गठबंधन को ताश के पत्तो की तरह बिखेर दिया. मुलायम परिवार के तीन सदस्यों कन्नोज से डिपंल यादव, बदायूं से धर्मेन्द्र यादव और फिरोजाबाद से अक्षय यादव को इस बार चुनाव में हार का सामना करना पड़ा. ये सभी 2014 में मोदी लहर के बावजुद चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे.
लेकिन इस चुनाव की रोचक तथ्य यह नहीं है कि यादव परिवार चुनाव हारा है. इस चुनाव की सबसे चौकाने वाली बात यह है कि उत्तर प्रदेश में इतनी व्यापक लहर होने के बावजुद बसपा के टिकट पर एक ऐसा प्रत्याशी जीता. जिसपर बलात्कार के आरोप है और वो चुनाव प्रचार के समय से ही गायब है.
उत्तर प्रदेश का घोसी लोकसभा क्षेत्र यह इलाका गाजीपुर के आसपास है. अर्थात यह लोकसभा क्षेत्र बीजेपी के गढ़ पूर्वाचंल के इलाके में आता है. यहां से बसपा ने सपा और रालोद के साथ सीटों का बटवारा होने के बाद बसपा नेता अतुल राय को घोसी लोकसभा सीट का प्रभारी घोषित किया.
बता दें कि बसपा की हर चुनाव में यह रणनीति का हिस्सा रहता है कि वो चुनाव से कुछ समय पूर्व उस क्षेत्र में प्रभारी घोषित करती है. बाद में वो उसी प्रभारी को उस क्षेत्र में उम्मीदवार घोषित करती है.
बसपा ने घोसी लोकसभा क्षेत्र से अतुल राय को उम्मीदवार घोषित किया. बता दें कि घोसी लोकसभा क्षेत्र से मऊ विधायक मुख्तार अंसारी के पुत्र अब्बास अंसारी भी टिकट की दावेदारी कर रहे थे. लेकिन पार्टी ने उनको टिकट नहीं दिया.
उम्मीदवार घोषित होने के बाद अतुल राय ने नामांकन दाखिल किया. लेकिन नामांकन दाखिल करने के कुछ समय बाद वो गायब हो गये. कारण रहा कि अतुल राय के उपर बलिया की एक युवती ने दुष्कर्म, धोखाधड़ी,धमकी देने समेत कई धाराओं में केस दर्ज कराया. युवती की तरफ से यह एफआईआर लंका थाने में दर्ज कराई गई रिपोर्ट के अनुसार अतुल राय पर युवती ने आरोप लगाया कि वो लंका इलाके के एक अपार्टमेंट के फ्लैट में झांसा देकर ले गए और यौन शोषण किया.
इस एफआईआर के दर्ज होने के बाद अतुल राय चुनावी क्षेत्र से गायब हो गये. पुलिस उनकी तलाश में लगातार दबिश देती रही. लगा कि बसपा का यह प्रत्याशी तो चुनाव हार जाएंगे. लेकिन नतीजे तो अनुमान के बिल्कुल ही अलग रहे. अतुल राय ने बीजेपी की प्रचंड लहर के बावजुद घोसी लोकसभा क्षेत्र से बड़े अन्तर से जीत हासिल की. उन्होंने बीजेपी के हरिनारायण राजभर को लगभग 1 लाख 23 हजार मतों से मात दी. बता दें कि योगी कैबिनेट से हाल ही बर्खास्त हुए ओमप्रकाश राजभर इसी इलाके से आते है. अतुल राय की जीत ही भारतीय लोकतंत्र को रोचक बनाती है.
लोकसभा चुनाव: बसपा सुप्रीमो मायावती के कुछ बदले-बदले से हैं तेवर
इस लोकसभा चुनाव ने मायावती समेत बसपा की भी तस्वीर को बदल कर रख दिया. अमूमन ‘मतलब भर’ बात करने वाली मायावती ने इस चुनाव में न सिर्फ सोशल मीडिया में एंट्री की बल्कि लगातार उस पर एक्टिव भी रहीं. इसी चुनाव में मायावती ने अपनी पार्टी में एक उभरते नेता की एंट्री भी करवाई जो उनके भतीजे आकाश आनंद हैं. कहा जाता है कि आकाश बसपा के उत्तराधिकारी भी हैं. राजनैतिक मजबूरियों के लिए ही सही लेकिन चिरप्रतिद्वंदी रही सपा के साथ गठबंधन कर ‘जय भीम और जय भारत’ का मंच से नारा देने वाली मायावती ने इसी चुनाव में ‘जय लोहिया’ को भी सराहा. इस बदले हुए रूप के बावजूद मायावती की सख्ती अभी भी बरकरार है. चाहे नेताओं पर व्यक्तिगत हमले की बात हो या अपने ही गठबंधन में सपाईयों को खुले आम बसपाईयों से सीख लेने की नसीहत.
इस चुनाव में मायावती ने सोशल मीडिया का बखूबी इस्तेमाल किया. बसपा सुप्रीमो पहले या तो मीडिया के माध्यम से या फिर रैलियों के माध्यम से ही जनता से रूबरू होती थीं लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. चुनाव की घोषणा से चंद रोज पहले ही मायावती ने ट्विटर के माध्यम से सोशल मीडिया में एंट्री की. उसके बाद से उनके लगातार ट्वीट आने लगे और फॉलोअर्स की संख्या बढ़ने लगी. मायावती के चंद महीनों में ही 2 लाख 68 हजार फॉलोअर्स की संख्या पहुंच गई. मायावती ने ट्विटर का सहारा लेकर ही अपने वोटर्स तक पहुंचने की कोशिश की. हर मतदान वाले दिन मायावती ने सोशल मीडिया के माध्यम से ही लोगों से वोट की अपील की. मायावती ने सोशल मीडिया के माध्यम से भाजपा और कांग्रेस पर हमले भी किए.
इस चुनाव से पहले मायावती के साथ कई बार नीले सूट बूट में युवा शख्स दिखा. जब पड़ताल की गई तो पता चला कि यह मायावती के भाई आनंद का बेटा आकाश है. विदेश से पढ़ाई करके इंडिया वापस आया है. जब मीडिया में आकाश को लेकर खबरें छपीं तो मायावती को उसके बारे में सफाई देनी पड़ी. हालांकि 14 अप्रैल को बदायूं में आयोजित महागठबंधन की एक रैली में मायावती को कहना पड़ा कि मंच पर मेरे भाई का लड़का आकाश आनंद बैठा है. इसको अब राजनीति में जरूर लाना चाहिए. मायावती की बदायूं रैली में इसकी घोषणा के साथ बसपा समेत अन्य राजैनतिक गलियारों में आकाश को बसपा के उत्तराधिकारी के रूप में देखे जाने की चर्चा होने लगी.
मायावती को बहुत ही सख्त नेता के रूप में जाना जाता है. इस चुनाव में भी मायावती ने वही सख्ती बरकरार रखी. मायावती ने पूरे चुनाव भर खुलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को निशाने पर रखा. मायावती ने प्रधानमंत्री मोदी की पत्नी को लेकर भी खुलकर व्यक्तिगत आरोप लगाए. वहीं पूरे चुनाव में भाजपा नेता अमित शाह को पीएम मोदी को ‘चेला’ कहकर ही संबोधित किया. चुनाव के आखिरी चरण के अंतिम तीन दिन तो मायावती ने अपनी रैलियो में जाने से सबसे पहले मोदी और शाह को निशाने पर लेती रहीं. फिर वह रैलियों में निकली. इसके अलावा 21 अप्रैल को फिरोजाबाद की एक रैली में मायावती ने सपाईयों को बसपाईयों से सीख लेने की बात कहते हुए डांट दिया था.
राजनैतिक मजबूरी ही सही लेकिन सपा और बसपा का गठबंधन जब हुआ तो सभी समीकरण दोनों पार्टियों ने साधने की पूरी कोशिश की. दोनों राजनैतिक पार्टियों की चिर प्रतिद्वंदिता के बावजूद भी भी मायावती और मुलायम सिंह ने 19 अप्रैल को मैनपुरी में एक मंच साझा किया. मंच ही नहीं साझा किया इस रैली के समापन पर मायावती ने अपने ‘जय भीम जय भारत’ के अलावा ‘जय लोहिया’ का नारा भी लगाया. यह नहीं इसी मैनपुरी की रैली में मुलायम सिंह यादव ने अपने समर्थकों से भी मायावती के पैर छुआए. इससे पहले मुलायम सिंह की बहू और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव ने सार्वजनिक मंच पर मायावती के पैर छूकर आशीर्वाद लिया था.
क्या यूपी में गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ है?
सपा और बसपा का साथ आना यूपी की सियासत में ‘दो ध्रुवों का एक साथ’ हो जाने जैसा रहा. इसकी चर्चा पूरे देश में है. जाहिर है कि जब चर्चा इतना असर दिखाए तो वोटर्स का प्रभावित होना लाज़मी है. अब तक हुए छह चरणों के चुनाव में कुछ ऐसा ही देखने को मिला. कुछ एक सीटों को छोड़ दें तो गठबंधन के ज्यादातर प्रत्याशी खुद-ब-खुद यह संदेश देने में सफल रहे कि बीजेपी से मुकाबले में वही हैं. कांग्रेस के बड़े नाम तो पूरी लड़ाई में यही साबित करने में रह गए कि वे भी चुनाव लड़ रहे हैं.
शुरुआत अमरोहा के चुनाव से करते हैं. यहां से कांग्रेस ने राशिद अल्वी को टिकट दिया था. टिकट मिलने के कुछ दिन के भीतर ही उन्होंने निजी कारणों से के चलते अपना टिकट वापस कर दिया. कांग्रेस को बाद में यहां से सचिन चौधरी को मैदान में उतारना पड़ा. ऊपरी तौर पर भले ही यह कहा गया हो कि उन्होंने निजी कारणों से टिकट वापस किया, लेकिन भितरखाने के लोग हकीकत बयां करते हैं कि गठबंधन के प्रत्याशी के सामने लोग उन्हें ‘वोट कटवा’ मान रहे थे. ऐसे में उन्होंने चुनाव न लड़ना ही मुनासिब समझा.
इसी तरह, सहारनपुर में कांग्रेस उम्मीदवार रहे इमरान मसूद की भी सारी ताकत यही साबित करने में लगी रही कि वह बीजेपी के उम्मीदवार राघव लखनपाल से सीधे मुकाबले में हैं. दूसरी तरफ गठबंधन के उम्मीदवार हाजी फजलुर्रहमान को वोटर्स में यह संदेश देना आसान था कि उनके पास वोटर्स का अंकगणित कहीं अधिक मजबूत है.
सपा-बसपा और आरएलडी के अपने बेस वोट बैंक हैं जबकि कांग्रेस के पास इस तरह के वोट बैंक की कमी है. ऐसे में साफ है कि बेस वोट बैंक का अंकगणित महागठबंधन के उम्मीदवार के पक्ष में गया है. इस संगठन से जो भी मैदान में उतरा, उसके पास सपा, बसपा और आरएलडी के वोट एकमुश्त थे. ऐसे में उसे केवल मजबूती से चुनाव लड़ना है. बाकी की राह उसके लिए कांग्रेस प्रत्याशी के मुकाबले आसान रही.
वहीं, कांग्रेस का सिंबल पाने वाले नेताओं को भी यह साबित करना कठिन रहा कि वह गठबंधन के बेस वोट के बावजूद ज्यादा मजबूत हैं. कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर जगहों पर यही स्थिति बनी रही. उन्नाव सीट पर कांग्रेस की अन्नू टंडन, कानपुर सीट पर श्रीप्रकाश जायसवाल आदि नेताओं की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा केवल गठबंधन उम्मीदवार के वोटों के अंकगणित से भारी दिखाने में लगा.
वैसे भी सपा, बसपा और बीजेपी के इतर कांग्रेस को मूवमेंट बेस्ड पार्टी माना जाता है. अगर चुनाव के समय कांग्रेस अपने मूवमेंट से लोगों को जोड़ पाती है तो परिणाम बेहतर दिखाई देते हैं. अन्यथा उसके पास करने के लिए कुछ खास नहीं होता है. 2009 में किसानों की कर्जमाफी की बात को जिस तरह से कांग्रेस ने ऊपर तक पहुंचाया था, उसका असर परिणाम के रूप में भी मिला. पार्टी यूपी में 21 सीटें जीतने में कामयाब रही.
इस बार कांग्रेस ने चुनाव मैदान में जाते हुए जनता के लिए न्यूनतम आय योजना का बड़ा वादा किया. लेकिन स्थिति यह रही कि वह इस वादे के बारे में जनता को पूरी तरह बता पाने में ही असफल रह गई. अधिकतर लोग इस योजना के बारे में अनभिज्ञ हैं जिससे वोटर्स के साथ कांग्रेस का जुड़ाव उस हद तक नहीं हो सका जितना उसे अपना असर छोड़ने के लिए जरूरी था.
वहीं, दूसरी तरफ गठबंधन का उम्मीदवार अपने जातीय अंकगणित से अपने लिए वोटर्स में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा. उसका मजबूत कैडर बैकअप भी उसके लिए जनता के बीच पहुंचा. इस तरह से गठबंधन का उम्मीदवार बीजेपी से मुकाबले में दिखा जबकि कांग्रेस ऐसा नहीं कर सकी और लड़ाई बीजेपी बनाम गठबंधन के तौर पर वोटर्स के बीच पहुंच गई.
क्या दलित वोटों के सहारे त्रिशंकु नतीजों की तैयारी में है मायावती?
लोकसभा चुनावों के छह चरण पूरे हो चुके हैं. अब केवल आखिरी चरण का मतदान शेष है. 23 मई को परिणाम आने हैं. इससे पहले यूपी की सियासत और मायावती-अखिलेश यादव के महागठबंधन के चुनावी परिणामों पर सबकी नजरें गढ़ी हुई हैं. यह तो साफ तौर पर लग रहा है कि बीजेपी यहां अपना पिछला प्रदर्शन नहीं दोहरा सकेगी. उनकी इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा ही महागठबंधन है. महागठबंधन का सीधा मुकाबला नरेंद्र मोदी से है.
इस महागठबंधन की अगुवाई कर रही है बसपा सुप्रीमो मायावती. इस बार उनकी सियासी दिनचर्या में भी बदलाव देखा गया है. छठे चरण तक हर रैली और जनसभा में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा है. सातवें चरण से पहले उनके हमले और भी तीखे हो चले हैं. जानकारों का कहना है कि आखिरी चरण की नजदीकी लड़ाई में मायावती की चिंता कोर वोटों में सेंध बचाने की है. 23 मई के बाद आने वाले त्रिशंकु नतीजों में भी महागठबंधन को ‘विकल्प’ बनने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.
यूपी में पिछले छह चरणों में 67 संसदीय सीटों पर मतदान हो चुका है. अंतिम चरण में 13 सीटों पर मतदान शेष है. ये सभी सीटें पूर्वांचल की हैं जिसमें से अधिकतर सीटें पिछड़ा, सवर्ण व दलित बहुल है. अधिकांश सीटों पर गैर यादव अति-पिछड़ी जातियां प्रभावी हैं. गैर जाटव वोटर्स भी अच्छी तादात में हैं. 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने दलित वोटों में अच्छी खासी सेंधमारी की थी. अब एक फिर पूर्वांचल के जातीय कुरुक्षेत्र में मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी ने बसपा के इन कोर वोटों पर नजरें गड़ा रखी है. पीएम मोदी जिस तरह से राजस्थान के थानागाजी में हुई घटना पर मायावती की ‘जवाबदेही’ तय कर रहे हैं, यह इसकी नजीरभर है.
महागठबंधन से जुड़े सूत्रों का कहना है कि मायावती का मोदी पर तीखा हमला भी इसी रणनीति का हिस्सा है. आम तौर पर केंद्रीय एजेंसियों के दबाव या फिर अपनी स्थानीय मजबूरियों में दबे क्षेत्रीय दलों ने मोदी पर इतने तीखे हमले नहीं किए, जितने मायावती ने किए हैं. कांग्रेस खुद मायावती पर सीबीआई के दबाव में काम करने का आरोप लगा चुकी है.
बसपा के एक नेता का कहना है कि मोदी पर सीधा व निजी हमला बोलकर मायावती की रणनीति अपने वोटर्स को यह संदेश देने की है कि वह अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त है और बीजेपी चुनाव हार रही है. कोर वोटर्स को जोड़े रखने के साथ जमीन पर गठबंधन की गणित को और मजबूत करने के लिए यह संदेश जरूरी भी है. अगर मायावती का यह फॉर्मूला काम कर गया तो बीजेपी के पाले में गिरने वाले वाले गैर-जाटव व अति पिछड़े जाति के वोट बैंक को महागठबंधन के पक्ष में वापस लाना आसान होगा.
वर्तमान लोकसभा चुनाव की सबसे दिलचस्प बात यह है कि मोदी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा इस बार यूपी बनता नजर आ रहा है. 2014 के चुनाव में इसी गढ़ ने मोदी को शीर्ष पर बिठाया था. यूपी से हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए बीजेपी को सबसे अधिक उम्मीद ममता बनर्जी की अगुवाई वाले पश्चिम बंगाल से है. यही वजह है कि ‘दीदी’ का मोदी के खिलाफ विरोध लोकतंत्र के ‘थप्पड़’ तक जा पहुंचा है.