दौसा सीट पर संस्पेंस बरकरार, जसकौर मीणा के टिकट की घोषणा अटकी

PoliTalks news

दौसा लोकसभा सीट पर भाजपा उम्मीदवार को लेकर संस्पेंस बढ़ गया है. बुधवार को मीडिया में यह खबर सामने आई कि पार्टी ने जसकौर मीणा को टिकट दे दिया है, लेकिन इसकी अधिकृत घोषणा नहीं हुई. हालांकि प्रदेश बीजेपी के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर जसकौर मीणा को उम्मीदवार बनाने की सूचना साझा की गई, जिसे बाद में हटा लिया गया. इस बीच जसकौर ने दावा किया कि पार्टी ने उन्हें चुनाव की तैयारी करने की सूचना के साथ बधाई भी दे दी है. जसकौर ने यह भी कहा कि किरोड़ी लाल मीणा और ओमप्रकाश हुड़ला मेरे भाई हैं, हम तीनों मिलकर तीन गुना ताकत के साथ आएंगे और विश्वास है … Read more

उत्तर प्रदेश: रियासत नहीं रही तो क्या, सियासत तो शेष है

PoliTalks news

यूपी की सियासत में रियासतों की सक्रियता का लंबा इतिहास रहा है. आजादी के बाद रियासतें तो खत्म हो गई, लेकिन सियासत में शाही परिवारों की खनक आज भी खूब गूंजती है. यूपी की सियासत में रियासत की जुगलबंदी का अपना ही इतिहास है. कुंडा, कालाकांकर, अमेठी, पड़रौना एव भदावर से लेकर परसपुर तक के रजवाड़े राजनीति के बेहद करीब हैं. हालांकि रामपुर का राजघराना पहली बार चुनावी माहौल से दूर है लेकिन भविष्य में फिर से दावेदारी न करे, ऐसा संभव नहीं दिख रहा है. आइए जानते हैं यूपी की कुछ राजघरानों की कहानी जिन्होंने रियासत से सियासत तक का सफर तय किया है.

कुंडा राजघराना – राजा भैया
कुंडा (प्रतापगढ़) राजघराने की सियासत इस बार चुनावी मैदान में पहले से अधिक सक्रिय दिख रही है. इस राजघराने की सियासत से दोस्ती राजा बजरंग बहादुर सिंह से शुरू हुई थी जो स्वतंत्रता सेनानी थे और बाद में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल बने. रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया उन्हीं बजरंग बहादुर के पौत्र हैं. प्रतापगढ़ जिले के साथ ही आस-पास की लोकसभा और विधानसभा सीटों पर भी राजा भैया का खासा दबदबा रहा है. मायावती के कार्यकाल को छोड़ दे तो मुख्यमंत्री चाहे कल्याण सिंह रहे हों, राम प्रकाश गुप्ता हो या फिर मुलायम-अखिलेश रहे हों, राजा भैया उनकी कैबिनेट में मंत्री रहे हैं.

1993 से लेकर 2017 तक राजा भैया निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधानसभा पहुंचते रहे हैं, लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव से ठीक पहले राजा भैया ने जनसत्ता दल नाम से नई पार्टी का गठन कर लिया है और पार्टी के चुनाव चिन्ह पर लोकसभा की चुनिंदा सीटों पर प्रत्याशी उतार रहे हैं.

अमेठी राजघराना – राजा संजय सिंह
अमेठी रियासत के राजा संजय सिंह वर्तमान में कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं. कांग्रेस के गढ़ अमेठी में रियासत से सियासत में संजय सिंह 1980 में उतरे. दो बार विधायक बनने के बाद 1989 तक यूपी की कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे. 1990 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया. 1998 में निष्ठा बदली और अमेठी से ही भाजपा के टिकट पर सांसद बने. 2003 में पुन: कांग्रेस में लौटे और 2009 में सुल्तानपुर से सांसद बने. कांग्रेस के इस गढ़ में 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपना मास्टर स्ट्रोक खेला और संजय की पहली पत्नी गरिमा सिंह को अमेठी से टिकट देकर मैदान में उतारा.

संजय सिंह ने अपनी दूसरी पत्नी अमीता सिंह को कांग्रेस से चुनाव लड़ाया, लेकिन अपनी पहली पत्नी और भाजपा उम्मीदवार गरिमा सिंह के हाथों हारने से नहीं बचा सके. लोकसभा चुनाव में राजा संजय सिंह और अमिता सिंह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के चुनावी मैनेजमेंट में जुटे हैं. बता दें, राहुल गांधी इसी संसदीय सीट से लोकसभा चुनाव लड़ते हैं.

कालाकांकर – राजकुमारी रत्ना सिंह
प्रतागढ़ जिले के कालाकांकर राजघराने के राजा दिनेश सिंह प्रतापगढ़ से चार बार सांसद रहे और इंदिरा सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे. उनके निधन के बाद उनकी छोटी बेटी राजकुमारी रत्ना सिंह रियासत से सियासत में आईं. वह तीन बार प्रतापगढ़ लोकसभा सीट से सांसद रहीं. आखिरी बार 2009 में वह प्रतापगढ़ से जीती थीं. 2014 में प्रतापगढ़ लोकसभा सीट भाजपा के सहयोगी अपना दल को मिली और अपना दल के कुंवर हरिवंश सिंह ने इस सीट से जीत दर्ज कराई. इस बार की राजकुमारी रत्ना सिंह लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट से एक बार फिर से मैदान में हैं.

पडरौना राजपरिवार – आरपीएन सिंह
2014 की मोदी लहर में पराजय का मुंह देख चुके पडरौना की जगदीशपुर रियासत के राजकुमार रतनजीत प्रताप नारायण सिंह (आरपीएन सिंह) इस बार फिर से लोकसभा चुनाव के मैदान में हैं. यूपीए सरकार में गृह राज्यमंत्री रह चुके आरपीएन सिंह पड़रौना सीट से 3 बार कांग्रेसी विधायक भी रह चुके हैं. इससे पहले आरपीएन सिंह के पिता सीपीएन सिंह सियासत में सक्रिय थे. उनका नाम इंदिरा गांधी के करीबियों में शुमार होता था. कुंवर सीपीएन सिंह 1980 और 1984 में पड़रौना लोकसभा सीट से सांसद रहे. उन्होंने केन्द्रीय रक्षा राज्य मंत्री और विज्ञान एवं टेकनेलाजी मंत्री रहते हुए 1982 में सबसे पहले देवरिया जिले में टेलीविजन चालू कराया था. उस समय पूरे प्रदेश में केवल लखनऊ में ही दूरदर्शन देखा जा सकता था.

रामपुर नवाब घराना – इस बार चुनाव से दूर
रामपुर के नवाब घराने का सियासत से गहरा रिश्ता रहा है. रामपुर का नूरमहल कभी रुहेलखंड में कांग्रेस की गतिविधियों का केंद्र होता था. राज परिवार के वारिस नवाब काजिम अली खान उर्फ नवेद मियां रामपुर की स्वार सीट से विधायक रहे. उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में कई पार्टियां बदली. 2017 में वह स्वार सीट से बसपा के प्रत्याशी थे, लेकिन आजम खान के बेटे और सपा प्रत्याशी अब्दुल्ला आजम से हार गए. उनके वालिद नवाब जुल्फिकार अली खान उर्फ मिक्की मियां और मां नूरबानो ने नौ बार लोकसभा में रामपुर का प्रतिनिधित्व किया. आजादी के बाद हुए पहले चुनाव को छोड़ दें तो नवाब खानदान के लोग हमेशा ही कांग्रेस के प्रत्याशी बनते रहे. अधिकतर जीते भी लेकिन 2019 का यह पहला आम चुनाव है, जिसमें नवाब खानदान का कोई सदस्य शामिल नहीं है.

राजस्थान: टोंक-सवाई माधोपुर सीट पर जातिगत समीकरणों में उलझे दोनों दल

PoliTalks news

सियासत में जब चुनाव और टिकट की बात होती है तो पहले यहां न दावेदार देखा जाता है और न ही चेहरा. सबसे पहले देखा जाता है उस क्षेत्र का जातीय समीकरण, जिसके आधार पर किसी प्रत्याशी की जीत तय होती है. फिर शुरू होती है टिकट की जद्दोजहद, जहां वो नेता बाजी मार ले जाता है जो उस क्षेत्र की जातियों पर पकड़ मजबूत रखता हो. फिर चाहें वह दावेदार बाहरी ही क्यों न हो.

कुछ इसी ​तरह ​की स्थिति राजस्थान की टोंक-सवाई माधोपुर लोकसभा सीट पर बनी हुई है. गुर्जर मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने यहां से सुखबीर सिंह जौनपुरिया पर दांव खेला है जबकि कांग्रेस ने एसटी मतदाताओं की अधिकता को ध्यान में रखते हुए नमोनारायण मीणा को मैदान में उतारा है. जौनपुनिया ने 2014 में इस सीट से फतह हासिल की थी जबकि नमोनारायण मीणा 2009 के चुनाव में यहां से विजयी हो चुके हैं.

आपको बता दें कि टोंक-सवाई माधोपुर सीट पर एससी के करीब तीन लाख 60 हजार और एसटी के 3 लाख मतदाता हैं. यहां 2.60 लाख गुर्जर, 1.95 लाख मुस्लिम, 1.45 लाख जाट, 1.35 लाख ब्राह्मण, 1.15 लाख महाजन, डेढ़ लाख माली और एक लाख राजपूत और दो लाख से अधिक बाकी जातियां हैं. दोनों उम्मीदवारों का पूरा चुनाव प्रचार इन जातियों को अपने-अपने पक्ष में लामबंद करने पर केंद्रित है.

चाहे जौनपुरिया हों या मीणा, दोनों उम्मीदवार जातियों को लामबंद करने में जुटे हैं. जौनपुरिया को उम्मीद है कि उन्हें वैश्य, ब्राह्मण, राजपूत और मूल ओबीसी के वोट तो एकमुश्त मिलेंगे ही. जौनपुरिया समर्थक साफतौर पर कहते हैं कि यदि 2014 के चुनाव की तरह इस बार भी गुर्जर वोट भी बीजेपी उम्मीदवार को मिल जाएं तो जीत तय है.

दरअसल, बीजेपी उम्मीदवार सुखबीर सिंह जौनपुरिया विधानसभा चुनाव में गुर्जरों के कांग्रेस की ओर रुख करने से परेशान हैं. आपको बता दें कि विधानसभा चुनाव में सचिन पायटल के टोंक से चुनाव लड़ने का असर आस-पास की सीटों पर भी पड़ा. टोंक और सवाई माधोपुर की आठ विधानसभा सीटों में से बीजेपी सिर्फ मालपुरा सीट पर जीत दर्ज कर पाई. जबकि छह सीटों पर कांग्रेस और एक पर निर्दलीय ने कब्जा जमाया.

बीजेपी को यह डर सता रहा है कि विधानसभा चुनाव की तरह लोकसभा चुनाव में भी गुर्जर वोट कांग्रेस के पाले में जा सकते हैं. हालांकि पार्टी को यह भरोसा है कि सचिन पायलट को मुख्यमंत्री नहीं बनाने की वजह से गुर्जर कांग्रेस से नाराज हैं और वे विधानसभा चुनाव की तरह लोकसभा चुनाव में मतदान नहीं करेंगे. अलबत्ता इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि आरक्षण मिलने के बाद गुर्जर समाज का बड़ा तबका गहलोत सरकार से खुश है.

बात कांग्रेस उम्मीदवार नमोनारायण मीना की करें तो उन्हें गुर्जरों के अलावा मीणा, मुस्लिम और एससी वोट मिलने की उम्मीद है. हालांकि कांग्रेस के कई स्थानीय नेता इस बात से खफा हैं कि एक सामान्य सीट पर एसटी उम्मीदवार को टिकट दिया गया. नमोनारायण मीणा के लिए राहत की बात यह है कि कोई स्थानीय नेता उनका खुलकर विरोध नहीं कर रहा.

दूसरी ओर बीजेपी उम्मीदवार सुखबीर सिंह जौनपुरिया भितरघात से जूझ रहे हैं. देवली-उनियारा में पूर्व विधायक राजेंद्र गुर्जर, गंगापुर सिटी में पूर्व विधायक मानसिंह गुर्जर और पूर्व मंत्री प्रभुलाल सैनी ने सार्वजनिक तौर पर तो नाराजगी जाहिर नहीं की है, लेकिन वे चुनाव प्रचार में सक्रिय नजर नहीं आ रहे. मालपुरा विधायक कन्हैया लाल चौधरी भी जौनपुरिया से नाराज बताए जा रहे हैं.

यह में यह देखना रोचक होगा कि जाति के जंजाल में उलझी राजनीति चुनाव में ​किसका बेड़ा पार करेगी और किसका बेड़ा गर्क. टोंक-सवाई माधोपुर के मतदाता मौन रहकर दोनों दलों के उम्मीदवारों के सियासी करतबों को देख रहे हैं. मतदान के दिन उसका मुखर होना उम्मीदवारों की तकदीर तय करेगा.

‘अगर विपक्ष को ‘अली’ पर विश्वास है तो हमें भी ‘बजरंग बली’ पर विश्वास है’

PoliTalks news

देश में लोकसभा चुनाव का रण सज चुका है. बस इंतजार है तो युद्ध की शुरूआत यानि मतदान की. पहले चरण के लिए वोट 11 अप्रैल को पड़ेंगे. पहले चरण के मतदान के लिए आज शाम को चुनाव प्रभार का शोर भी थम चुका है. ऐसे में आज राजनेताओं के कुछ खास बयान आए जो दिनभर चर्चा में बने रहे. यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने फिर बार ‘हनुमानजी’ को लेकर बयान दिया. राजस्थान विधानसभा चुनाव में भी वह इस तरह का विवादित बयान दे चुके हैं. वहीं पीएम नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर ‘नोट के बदले वोट’ का आरोप लगाया. ‘अगर कांग्रेस सहित सपा-बसपा को ‘अली’ पर विश्वास है तो … Read more

देश में थमा ‘पहला’ चुनावी शोर, 11 को होगी वोटिंग

देश में 20 राज्यों की 91 सीटों पर होने वाले लोकसभा चुनाव के पहले चरण के लिए चुनाव प्रचार आज शाम 5 बजे समाप्त हो गया है. मतदान 11 अप्रैल को होने हैं. इसके साथ ही 3 राज्यों में गुरूवार को विधानसभा चुनाव भी होने हैं जिनके लिए भी प्रचार कैम्पेन खत्म हो गया है. बता दें, आंध्रप्रदेश, अरूणाचल प्रदेश, सिक्किम और ओडिसा में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी होंगे. ओडिसा में 4 चरणों में औेर शेष राज्यों में पहले चरण में चुनाव प्रक्रिया संपन्न होगी. दूसरे चरण के चुनावों के लिए नामांकन की प्रक्रिया कल से शुरू हो रही है. बात करें आंध्रप्रदेश की तो यहां 25 सीटों … Read more

सूर्यनगरी में जुटे कांग्रेस के दिग्गज, वैभव गहलोत के समर्थन में जनसभा

PoliTalks news

सूर्यनगरी जोधपुर आज कांग्रेस के दिग्गज नेताओं का गढ़ बनी हुई है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, डिप्टी सीएम सचिन पायलट, प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे, बीडी कल्ला, मानवेंद्र सिंह और चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा के साथ कई कांग्रेसी नेता और दिव्या मदरेणा सहित कई विधायक यहां मौजूद हैं. मौका है वैभव गहलोत के नामांकन का. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र जोधपुर लोकसभा सीट से कांग्रेसी उम्मीदवार हैं और आज नामांकन दाखिल करने जा रहे हैं. नामांकन के पहले एक जनसभा रखी गई है जहां सभी राजनेता वैभव गहलोत के पक्ष में जनता से वोट अपील कर रहे हैं. पावटा चौराहे स्थिति जनसभा को वैभव गहलोत खुद भी संबोधित करेंगे. जोधपुर कांग्रेस का … Read more

राजस्थान: राजनीति की दिशा तय करेंगे जोधपुर के चुनावी परिणाम

PoliTalks news

देश में होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियां अहम चुनाव बता रही हैं. कांग्रेस इन चुनावों में लोकतंत्र और संविधान बचाने की दलील देते हुए भाजपा सरकार को हटाने का आह्वान कर रही है तो भाजपा मजबूत और सशक्त सरकार बनाने के नाम पर एक बार पुनः जनता से वोट मांग रही है. इन सबसे बीच जोधपुर सीट के चुनावी परिणाम राजस्थान की राजनीतिक की दिशा और दशा तय करने वाले साबित होंगे.

जोधपुर सीट से एक ओर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने पुत्र वैभव गहलोत की राजनीतिक लॉन्चिंग की है तो दूसरी तरफ बीजेपी ने एक बार फिर केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत पर दांव खेला है. कहने को तो यह मुकाबला गजेंद्र सिंह शेखावत और वैभव गहलोत के बीच है लेकिन वैभव के पीछे अशोक गहलोत खुद यहां से चुनाव लड़ रहे हैं. इस वजह से खुद गहलोत की साख इस सीट के चुनावी परिणाम पर टिकी हुई है. इस हिसाब से जोधपुर सीट के चुनावी परिणाम प्रदेश की राजनीति के भविष्य के लिए काफी अहम साबित होंगे.

अशोक गहलोत यदि अपने सुपुत्र वैभव गहलोत को यहां से विजयश्री दिलवाने में सफल रहते हैं तो अशोक गहलोत का न केवल प्रदेश में बल्कि आलाकमान के सामने भी कद बढ़ेगा. साथ ही अपनी ही पार्टी के राजनीतिक विरोधियों के विरोध के स्वर भी धीमे होंगे. अब ऐसा नहीं होता है और वैभव को इस सीट से हार मिलती है तो अशोक गहलोत के राजनीतिक कैरियर में ठहराव आ सकता है. इस पराजय के बाद गहलोत के विरोधी इसे आलाकमान के सामने अशोक गहलोत की असफलता बताएंगे.

इस बार के विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर जिस तरह की कशमकश हुई थी, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अशोक गहलोत का चौथी बार मुख्यतंत्री दावेदार बनना मुमकिन नहीं होगा. पिछले लोकसभा चुनावों में मोदी लहर में बहते हुए गजेंद्र सिंह शेखावत अपनी नैया को पार लगाने में सफल हुए थे. इस बार भी उनके टिकट को लेकर संशय के बादल थे लेकिन कुशल वाकपटुता और संघ के नजदीकी होने का लाभ उन्हें मिला और एक बार फिर वह जोधपुर लोकसभा सीट से मैदान में हैं.

अगर वैभव को पटखनी देकर शेखावत यहां से जीत दर्ज करते हैं तो निश्चित तौर पर न केवल बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के सामने बल्कि प्रदेश में भी उनका राजनीतिक कद ऊंचा होगा. इसके बाद अगर केंद्र में मोदी की सरकार बनती है तो गजेंद्र सिंह को कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिल सकता है. साथ ही उन्हें प्रदेश का भावी प्रदेशाध्यक्ष और मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार भी माना जाएगा. वहीं अगर गजेंद्र सिंह यहां से पराजित होते हैं तो उनके राजनीतिक जीवन में ठहराव की स्थिति भी आ सकती है.

पिछले चुनाव में भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह विश्नोई का टिकट काटकर जब उन्हें उम्मीदवार बनाया गया था तो इसका कई जगह पर विरोध हुआ था. इस वजह से गजेंद्र के भविष्य के लिए उन्हें यहां से जीत दर्ज करना जरूरी होगा. यही वजह है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों के स्थानीय कार्यकर्ता और सभी विधायकों ने चुनावी प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. खासतौर पर कांग्रेस विधायकों को इस बात का एहसास है कि यदि वैभव यहां से ​जीत दर्ज करते हैं तो इसका सीधा लाभ उन्हें मिलेगा. वहीं गजेंद्र को विजयश्री दिलाकर बीजेपी नेता केन्द्रीय नेतृत्व के सामने क्षेत्र में अपनी राजनीतिक शक्ति का एहसास करा सकेंगे जो भविष्य में उनके लिए फायदे का सौदा साबित होगा.