ममता बनर्जी को शिवसेना का बड़ा झटका, राउत बोले- कांग्रेस को छोड़ नहीं बन सकता कोई फ्रंट

ममता की मुहिम को शिवसेना का झटका
4 Dec 2021
Politalks.News/Maharashtra. शिवसेना (Shiv Sena) के सांसद संजय राऊत (Sanjay Raut) ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानि यूपीए को लेकर बड़ा बयान दिया है. संजय राऊत ने ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) के एक बयान को लेकर प्रतिक्रिया दी और कहा कि, 'कांग्रेस (Congress) को छोड़कर कोई फ्रंट नहीं बन सकता है'. राउत ने कहा कि, 'मुझे नहीं लगता है कि राजनीति तौर पर यह सही सोच है. कांग्रेस के साथ हम सब मिलकर अगर काम करें तो अच्छा फ्रंट बनेगा इसका आदर्श उद्धारण महाराष्ट्र है'. राउत ने साफ कहा कि, 'कांग्रेस को दूर रखकर कोई फ्रंट नहीं बन सकता है ये मेरे हिसाब से सही नहीं है. कांग्रेस हमारे साथ है हमारी विचारधारा अलग हो सकती है'. आपको याद दिला दें कि हाल ही में महाराष्ट्र के दौरे पर आईं ममता दीदी ने कहा था यूपीए क्या है? अब यूपीए नहीं है? अब शिवसेना के बयान ने ममता बनर्जी के अभियान की हवा निकालने का काम किया है. https://www.youtube.com/watch?v=bwWXHekPGMM मोदी के खिलाफ लड़ने वालों कांग्रेस को खत्म करने की सोचना, गंभीर खतरा वहीं सामना में लिखे एक लेख में भी ममता बनर्जी को निशाने पर लिया है. सामना के लेख में लिखा है कि, 'कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो, ऐसा मोदी और उनकी पार्टी को लगना एक समय समझा जा सकता है. यह उनके कार्यक्रम का एजेंडा है. लेकिन मोदी और उनकी प्रवृत्ति के विरुद्ध लड़ने वालों को भी कांग्रेस खत्म हो, ऐसा लगना यह सबसे गंभीर खतरा है'. यह भी पढ़ें- मरुधरा में ओमिक्रॉन की आहट से दहशत! ‘बेफ्रिक’ कांग्रेस-भाजपा और बसपा में भीड़ जुटाने की होड़ राष्ट्रीय राजनीति से कांग्रेस को दूर रखना, फासिस्ट राज की प्रवृति को बल देना सामना के लेख में लिखा है कि, 'अपने-अपने राज्य और टूटे-फूटे किले संभालने के साथ विपक्ष के नेतृत्व पर तो कम-से-कम एकमत होना जरूरी है. इस एकता का नेतृत्व कौन करे यह आगे का मसला है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी बाघिन की तरह लड़ीं और जीतीं. बंगाल की भूमि पर भाजपा को चारों खाने चित करने का उन्होंने काम किया. उनके संघर्ष को देश ने प्रणाम किया है. ममता ने मुंबई में आकर राजनैतिक मुलाकात की. ममता की राजनीति कांग्रेस उन्मुख नहीं है. पश्चिम बंगाल से उन्होंने कांग्रेस, वामपंथी और भाजपा का सफाया कर दिया. यह सत्य है फिर भी कांग्रेस को राष्ट्रीय राजनीति से दूर रखकर सियासत करना यानी मौजूदा ‘फासिस्ट’ राज की प्रवृत्ति को बल देने जैसा हैट. 'पार्टी के लोग ही दबा रहे कांग्रेस का गला' सामना में आगे लिखा गया है कि, 'कांग्रेस का दुर्भाग्य ऐसा है कि जिन्होंने जिंदगी भर कांग्रेस से सुख-चैन-सत्ता प्राप्त की वही लोग कांग्रेस का गला दबा रहे हैं. गुलाम नबी आजाद ने साल 2024 के चुनाव में कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं होगी, ऐसा श्राप दिया है. आजाद ने ऐसा कहा है कि आज की स्थिति कायम रही तो कांग्रेस की अवस्था निराशाजनक रहेगी. आजाद वगैरह मंडली ने ‘जी23’ नामक असंतुष्टों का एक गुट तैयार किया है. उस गुट के लगभग सभी लोगों ने कांग्रेस से सत्ता सुख भोगा है लेकिन इस गुट के तेजस्वी मंडल ने कांग्रेस की आज की स्थिति सुधारने के लिए क्या किया? या इस तेजस्वी मंडली को भी अंदर से लगता है कि 2024 में कांग्रेस का काम निराशाजनक रहे, जो भाजपा को लगता है वही इस मंडली को लगता है, इसे एक संयोग ही कहा जाएगा'. यह भी पढ़ें- क्या कैप्टन के बाद अब आजाद? ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे गुलाम नबी क्या बनाने जा रहे हैं नई पार्टी? 'जो भी है स्पष्ट करें, पर्दे के पीछे गुटर-गूं न करें' सामना के लेख में आगे लिखा गया है कि, 'कांग्रेस ने जब तक लोकसभा में 100 का आंकड़ा पार नहीं किया तो राष्ट्रीय स्तर पर 'गेम चेंज' नहीं होगा. इसलिए भाजपा की रणनीति कांग्रेस को रोकनी है, लेकिन यही रणनीति मोदी और भाजपा के विरुद्ध मशाल जलाने वालों ने भी रखी तो वैसे होगा? देश में कांग्रेस की नेतृत्व वाली ‘यूपीए’ कहां है? यह सवाल मुंबई में आकर ममता बनर्जी ने पूछा. यह प्रश्न मौजूदा स्थिति में अनमोल है. यूपीए अस्तित्व में नहीं है, उसी तरह एनडीए भी नहीं है. मोदी की पार्टी को आज एनडीए की आवश्यकता नहीं. लेकिन विपक्षियों को यूपीए की जरूरत है. यूपीए के समानांतर दूसरा गठबंधन बनाना यह भाजपा के हाथ मजबूत करने जैसा है. यूपीए का नेतृत्व कौन करे? यह सवाल है. कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए गठबंधन किस-किस को स्वीकार नहीं है, वे खुलेआम हाथ ऊपर करें, स्पष्ट बोलें. पर्दे के पीछे गुटर-गूं न करें. इससे विवाद और संदेह बढ़ता है'. कांग्रेस को दबाना विपक्षियों की राजनीतिक चाणक्य नीति सामना के लेख में आगे कहा गया है कि, 'इसी तरह यूपीए का आप क्या करेंगे? यह एक बार तो सोनिया गांधी या राहुल गांधी को सामने आकर कहना चाहिए. यूपीए का नेतृत्व कौन करे, यह मौजूदा समय का मुद्दा है. यूपीए नहीं होगा तो दूसरा क्या? इस बहस में समय गंवाया जा रहा है, जिसे विपक्ष का मजबूत गठबंधन चाहिए, उन्हें खुद पहल करके 'यूपीए' की मजबूती के लिए प्रयास करना चाहिए, एनडीए या यूपीए गठबंधन कई पार्टियों के एक साथ आने पर उभरे. वर्तमान में जिन्हें दिल्ली की राजनीतिक व्यवस्था सही में नहीं चाहिए उनका यूपीए का सशक्तीकरण ही लक्ष्य होना चाहिए. कांग्रेस से जिनका मतभेद है, वह रखकर भी यूपीए की गाड़ी आगे बढ़ाई जा सकती है. अनेक राज्यों में आज भी कांग्रेस है. गोवा, पूर्वोत्तर राज्यों में तृणमूल ने कांग्रेस को तोड़ा लेकिन इससे केवल तृणमूल का दो-चार सांसदों का बल बढ़ा. 'आप' का भी वही है. कांग्रेस को दबाना और खुद ऊपर चढ़ना यही मौजूदा विपक्षियों की राजनीतिक चाणक्य नीति है.