लोकसभा के पिछले कई चुनावों से राजस्थान में यह ट्रेंड बना हुआ है कि जिसकी सत्ता होती है उसकी ज्यादा सीटें आती हैं, लेकिन इस बार यह सियासी परंपरा टूटती हुई​ दिखाई दे रही है. राज्य में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार है मगर पार्टी को बीजेपी के मुकाबले कम सीटें जीतने की उम्मीद है. दोनों चरणों का मतदान पूरा होने के बाद कांग्रेस ने यह मान लिया है कि राजस्थान में बीजेपी उस पर भारी पड़ेगी.

आलाकमान को सौंपी रिपोर्ट में कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने यह माना है कि पार्टी के शीर्ष नेता चुनाव से पहले मोदी और राष्ट्रवाद के अंडर करंट को नहीं भांप पाई. मतदान के बाद मिले फीडबैक के आधार पर कांग्रेस के नेताओं ने यह माना है कि कुछ सीटों पर उम्मीदवार कमजोर रह गए. इससे उक्त सीटों पर बीजेपी को वॉकओवर मिल गया है. यदि मोदी और राष्ट्रवाद के अंडर करंट को अंदाजा पहले लगा ​लिया होता तो मजबूत उम्मीदवार उतारे जा सकते थे.

ताज्जुब की बात यह है कि टिकट बंटवारे के बाद राहुल गांधी ने प्रभारी अविनाश पांडेय, सीएम अशोक गहलोत और डिप्टी सीएम सचिन पायलट को दिल्ली बुलाकर इस गलती के बारे में रिपोर्ट मांगी थी. आलाकमान ने राजसमंद, उदयपुर, चितौड़गढ़, अजमेर, चूरू, भीलवाड़ा, झुंझुनूं और झालावाड़ में कमजोर उम्मीदवार होने की बात कही थी. इन सीटों पर उम्मीदवार बदलने पर भी चर्चा हुई लेकिन प्रदेश के नेताओं ने यहां के प्रत्याशियों के मुकाबले में होने की बात कही.

मतदान के बाद मिले फीडबैक के आधार पर कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व ने यह मान लिया है उन्होंने आलाकमान के सामने 8 सीटों पर उम्मीदवारों के मुकाबले में होने की बात कहकर चूक की. सूत्रों के अनुसार इस बारे में अविनाश पांडेय ने एक रिपोर्ट राहुल गांधी को भेजी है. इसके मुताबिक सात सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार भारी अंतर से चुनाव हार रहे हैं. आइए जानते हैं इन सात सीटों के बारे में —

अजमेर
अजमेर से कांग्रेस ने रिजु झुंझुनवाला को टिकट देकर सबको चौंका दिया. चुनाव खत्म होने तक कई कांग्रेस नेता तो यही पूछते रहे कि रिजु कौन है. रिजु जातिगत और सियासी, दोनों समीकरणों से बेहद कमजोर रहे. उन्हें स्थानीय नेताओं का भी पूरा सहयोग नहीं मिला. महज पैसों के दम पर उन्होंने चुनाव में संघर्ष किया. अजमेर सीट पर रिजु की जगह अगर सचिन पायलट या रघु शर्मा को टिकट दिया जाता तो पार्टी सीट निकाल सकती थी. आपको बता दें कि रघु शर्मा ने डेढ़ साल पहले हुए उपचुनाव में धमाकेदार जीत दर्ज की थी.

चितौड़गढ़
चितौड़गढ़ में कांग्रेस की स्थिति पहले से ही कमजोर मानी जा रही थी, क्योंकि पार्टी को मजबूत उम्मीदवार नहीं मिल रहा था. स्वास्थ्य खराब होने के चलते गिरिजा व्यास ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया. कांग्रेस ने यहां गोपाल सिंह ईडवा को टिकट थमा दिया. उन्हें पीसीसी चीफ सचिन पायलट का करीबी माना जाता है. उन्हें टिकट इस आधार पर मिला कि वे पांच साल तक कंधे से कंधा मिलाकर साथ रहे. चुनाव में स्थानीय नेताओं ने ईडवा का साथ नहीं दिया. यहां कांग्रेस अगर किसी स्थानीय नेता को टिकट देती तो मुकाबला बराबरी का बन सकता था.

उदयपुर
उदयपुर सीट पर कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव हारने वाले रघुवीर मीणा पर दांव खेला. आपको बता दें कि यहां से 200 किलोमीटर की दूरी पर गुजरात की सीमा शुरु हो जाती है. इस वजह से मोदी का असर यहां सबसे ज्यादा दिख रहा था. कांग्रेस यदि यहां किसी नए चेहरे को मौका देती तो बात बन सकती थी. चुनाव में गिरिजा व्यास और सीपी जोशी की निष्क्रियता रघुवीर मीणा को बड़ा नुकसान दे गई.

राजसमंद
राजसमंद में कांग्रेस ने किसी भी रणनीति पर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया. टिकट वितरण में बस यह ध्यान रखा गया कि सीपी जोशी देवकीनंदन काका की पैरवी कर रहे हैं. परिसीमन के बाद हुए दो चुनाव में अब तक राजपूत ही यहां से जीत दर्ज कर पाया है. गुर्जरों की संख्या कम होने के बावजूद कांग्रेस ने काका को सीपी की जिद के चलते मौका दिया. यहां से यदि रावत जाति के किसी नेता पर दांव खेला जाता तो दीया कुमारी से मुकाबला किया जा सकता था.

भीलवाड़ा
भीलवाड़ा से रामपाल शर्मा को टिकट मिलने की काबिलियत यह थी कि स्पीकर सीपी जोशी ने उनकी पैरवी की थी. जबकि धीरज गुर्जर और विधायक रामलाल जाट ने खुलेआम शर्मा का विरोध किया. गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव में भीलवाड़ा से सिर्फ कांग्रेस का एक विधायक चुनाव जीता था. संघ की सक्रियता की वजह से भीलवाड़ा को मिनी नागपुर कहा जाता है. यहां से रिजु झुंझुनवाला को मौका दिया जाता तो वे ही रामपाल शर्मा से बेहतर उम्मीदवार साबित होते.

झालावाड़-बारां
पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के गढ़ और बेटे दुष्यंंत सिंह के सामने कांग्रेस ने लड़ाई लड़ने से पहले ही हथियार डाल दिए. बीजेपी से कांग्रेस में आए प्रमोद शर्मा को यहां से टिकट दिया. कांग्रेस के नेताओं ने ही उन्हें स्वीकार ही नहीं किया. यहां से यदि प्रमोद जैन भाया को टिकट दिया जाता तो बात बन सकती थी, लेकिन मंत्री को टिकट नहीं देने के फार्मूले के तहत भाया को मैदान में नहीं उतारा गया. यहां भी भारी अंतर से कांग्रेस की हार के संकेत साफ तौर पर मिल रहे हैं.

चूरू
पहले कांग्रेस ने राजस्थान में किसी भी मुस्लिम नेता को टिकट नहीं देने की रणनीति बनाई थी, लेकिन आखिर में चूरू में कांग्रेस अपने टिकट वितरण के पुराने ढर्रे पर आ गई और रफीक मंडेलिया को टिकट दे दिया. मंडेलिया विधानसभा चुनाव हार चुके हैं. अगर यहां पर कांग्रेस किसी राजपूत या ब्राह्मण प्रत्याशी को मौका देती तो मुकाबले में आ सकती थी.

झुंझुनूं
झुंझुनूं में कांग्रेस ने सूरजगढ़ से विधानसभा चुनाव हार चुके श्रवण कुमार को टिकट दिया. श्रवण की जगह राजबाला ओला को मैदान में उतारा जाता तो वे बेहतर उम्मीदवार साबित होतीं. श्रवण की व्यक्तिगत इमेज और पकड़ वोटर्स के बीच अच्छी नहीं थी. उन्हें ओला परिवार की गुटबाजी का भी सामना करना पड़ा.

कुल मिलाकर चुनाव प्रचार और मतदान के बाद कांग्रेस नेताओं को यह अहसास हुआ है कि इन आठ सीटों पर कमजोर उम्मीदवार मैदान में उतार दिए. पार्टी के नेताओं को अपनी गलती का अहसास तब हुआ है जब तीर कमान से निकल चुका है. ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि चुनाव परिणाम आने के बाद इस गलती का ठीकरा किसके सिर फूटता है.

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