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राजनीति जहां नेता एक—दूसरे को नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ते वहां ऐसे नेता की कल्पना की जा सकती है जो सबको हंसाता था. वो भी खुद को मजाक का केंद्र बनाकर. संभवत: आपको कोई नाम याद नहीं आए, लेकिन एक ऐसा नेता हुए हैं जो सबको हंसाते थे. इनका नाम है पीलू मोदी. सत्तर के दशक में पीलू मोदी ने भारतीय संसद को जितना हंसाया है उतना शायद अब तक किसी ने नहीं हंसाया. उनकी खूबी ये थी कि वो अपना मजाक खुद बनाते थे. कहा भी जाता है कि असली हास्य वही होता है, जिसमें खुद को भी न बख्शा जाए.

जब पीलू संसद में बोलते थे तो विरोधी भी उनकी बातों को गौर से सुनते थे. सबका ध्यान उनकी चुहलबाजी और मजाक पर रहता था. कांग्रेस सांसद जेसी जैन उन्हें अक्सर इसी वजह से छेड़ा करते थे कि वे कोई न कोई फुलझड़ी छोड़ेंगे. एक दिन पीलू को उन पर गुस्सा आ गया और उन्होंने जैन से कहा, ‘स्टॉप बार्किंग.’ यानी भौंकना बंद कीजिए. जैन यह सुनकर तमतमा गए. उन्होंने कहा, ‘अध्यक्ष महोदय, ये मुझे कुत्ता कह रहे हैं. यह असंसदीय भाषा है.’ उनकी इस आपत्ति पर सदन की अध्यक्षता कर रहे हिदायतउल्लाह ने आदेश दिया कि पीलू मोदी ने जो कुछ भी कहा वो रिकॉर्ड में नहीं जाएगा. आसन की इस व्यवस्था पर मोदी ने मजेदार प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, ‘ऑल राइट देन, स्टॉप ब्रेइंगण्’ यानी रेंकना बंद कीजिए. जेसी जैन को ब्रेइंग शब्द का मतलब समझ नहीं आया इसलिए उन्होंने इस पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की. यह शब्द संद की कार्रवाई के रिकॉर्ड में अभी भी कायम है.

यह वह दौर था जब भारत में जो कुछ भी गलत होता था उसका दोष अमरीकी खुफिया एजेंसी सीआईए के मत्थे मढ़ा जाता था. एक दिन पीलू मोदी को पता नहीं क्या सूझी. वे अपने गले में ‘आई एम ए सीआईए एजेंट’ लिखी तख्ती गले में लटकाकर गले में संसद पहुंच गए. उन्हें देखकर सदन में खूब ठहाके लगे. मोदी की इंदिरा गांधी से तगड़ी अदावत थी, लेकिन व्यक्तिगत तौर पर दोनों के व्यक्त्गित रिश्ते बहुत अच्छे थे. इंदिरा गांधी पीलू मोदी का एक भी भाषण नहीं छोड़ती थीं. भाषण सुनने के बाद गांधी लगभग हर बार पीलू को अपने हाथ से चिट्ठी लिख कर कहती थीं कि तुमने बहुत बढ़िया बोला. पीलू मोदी उसका जवाब देते थे और चिट्ठी का समापन ‘पीएम’ शब्द से करते थे. एक दिन सदन में गांधी और मोदी के बीच किसी मुद्दे पर नोकझोंक हो गई. पीलू ने कहा, ‘आई एम ए परमानेंट पीएम, यू आर ओनली टेंपेरेरी पीएम’ इस पर इंदिरा गांधी हंसने लगीं तो पीलू मोदी ने कहा कि पीएम का मतलब ‘पीलू मोदी’ है.

इंदिरा गांधी के बारे में यह मशहूर है कि वे संसद में शाम के समय अखबार की क्रासवर्ड पजल हल किया करती थीं. इस बात का पीलू मोदी को पता चला तो उन्होंने शांति से चल रहे सदन के बीच ‘प्वाएंट ऑफ ऑर्डर’ बोलकर सबको चकित कर दिया. स्पीकर संजीव रेड्डी इस पर खूब नाराज हुए. उन्होंने गुस्से से पूछा कि सब ठीक तो चल रहा है फिर क्या ‘प्वाएंट ऑफ ऑर्डर’ है. तो मोदी बोले, ‘क्या कोई सांसद संसद में क्रॉसवर्ड पजल हल कर सकता है? यह सुनते ही इंदिरा गांधी के हाथ थम गए. बाद में उन्होंने पीलू को एक नोट लिख कर पूछा कि तुम्हें कैसे पता चला कि मैं क्रॉसवर्ड पजल हल करती हूं? इस पर पीलू ने जबाव में ​लिखा कि मेरे जासूस हर जगह पर मौजूद हैं.

पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो पीलू मोदी के करीबी दोस्तों में शामिल थे. दोनों का बचपन मुंबई में सा​थ—साथ बीता और दोनों अमेरिका में साथ—साथ पढ़े भी. 1972 में जब भुट्टो शिमला समझौता करने भारत आए तो उन्होंने पीलू से मिलने की इच्छा जाहिर की. सरकार ने पीलू को शिमला बुलवाया. इस दौरान पीलू ने शिमला समझौते के कई रोचक पहलुओं पर गौर किया, जिन्हें उन्होंने अपनी पुस्तक ‘जुल्फी माई फ्रेंड’ में किया है. उन्होंने लिखा है, ‘एक क्षण के लिए जब बिलियर्ड्स रूम का दरवाजा थोड़ा सा खुला तो मैंने देखा कि जगजीवन राम बिलियर्ड्स की मेज के ऊपर बैठे हुए थे और इंदिरा गांधी मेज पर झुकी शिमला समझोते के मसौदे से माथापच्ची कर रही थीं. चव्हाण और फखरुद्दीन अली अहमद भी मेज पर झुके हुए थे और उन सब को नौकरशाहों के समूह ने घेर रखा था.’

पीलू मोदी ने आगे लिखा, ‘दस बजकर पैंतालीस मिनट पर जब भुट्टो और इंदिरा गांधी समझौते पर दस्तख्त करने के लिए राजी हुए तो पता चला कि हिमाचल भवन में कोई इलेक्ट्रॉनिक टाइप राइटर ही नहीं है. आनन-फानन में ओबेरॉय क्लार्क्स होटल से टाइप राइटर मंगवाया गया. तभी पता चला कि पाकिस्तानी दल के पास उनकी सरकारी मोहर ही नहीं है, क्योंकि उसे पहले ही पाकिस्तानी प्रतिनिधिमंडल के सामान के साथ वापस भेजा जा चुका था. अंतत: शिमला समझौते पर बिना मोहर के ही दस्तखत हुए. समझौते से पहले मैंने देखा कि कुछ भारतीय अफसर, साइनिंग टेबल पर मेजपोश बिछाने की कोशिश कर रहे थे और हर कोई उसे अलग-अलग दिशा में खींच रहा था. उन्होंने सारे बंदोबस्त की बार-बार जांच की, लेकिन जब समझौते पर दस्तखत करने का वक्त आया तो भुट्टो की कलम चली ही नहीं. उन्हें किसी और का कलम ले कर दस्तखत करना पड़ा.’

आपातकाल के समय पीलू मोदी को जेल भेज दिया गया. रोहतक की जेल में पश्चिमी कमोड नहीं होने की वजह से उन्हें निवृत्त होने में बहुत परेशानी होती थी. उन्होंने को संदेश भेजकर अपनी परेशानी इंदिरा गांधी की बताई तो उसी दिन शाम को टॉयलेट में बंदोबस्त हो गया. मोदी चाहते तो अपनी रिहाई के लिए भी गुजारिश कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. पीलू मोदी बहुत जबरदस्त मेहमाननवाज थे. लोग उनकी दावतों में शामिल होना अपनी खुशनसीबी समझते थे.

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