रिश्तों से बढ़कर कुछ नहीं, सपनों और अपनों के बीच संतुलन बनाना बड़ी चुनौती- गौर गोपाल दास

jlf
17 Jan 2026
जयपुर में आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) में कई हस्तियां शिरकत कर रही है. जेएलएफ के तीसरे दिन शनिवार को मोटिवेशनल स्पीकर और लेखक गौर गोपाल दास का सेशन हुआ. गौर गोपाल दास ने अपने सेशन में यूथ पर फोकस किया. गौर गोपाल दास ने इस मौके पर कहा कि रिश्तों से ज्यादा जरूरी कुछ भी नहीं है. पैसा और सक्सेस उसके बाद है. अगर अकेले रह गए तो पैसे और सक्सेस का क्या फायदा. जीवन में कोई तो अपना होना चाहिए. हर इंसान की जिंदगी में कोई ना कोई बोझ से और उसे परेशान करता है. उन्होंने सोशल मीडिया का भी जिक्र किया. गौर गोपाल दास ने कहा कि लोग अपनी सेल्फी दुनिया को दिखा सकते हैं, लेकिन दिल की बात कहने के लिए किसी अपने की ही जरूरत होती है. जयपुर के JLN मार्ग स्थित होटल क्लार्क्स आमेर में चल रहे जेएलएफ के तीसरे दिन का सेशन राज्यसभा सांसद और इंफोसिस के सह-संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति की पत्नी सुधा मूर्ति की स्पीच के साथ शुरू हुआ. JLF में आज के सत्रों में गांधी, सावरकर, जिन्ना के विचारों को लेकर भी अलग-अलग सेशन्स हुए. सपनों और अपनों के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती- गौर गोपाल दास गौर गोपाल दास ने अपनी लोकप्रिय किताब 'You Can Have It All: Unlock the Secrets to a Great Life' पर खुलकर चर्चा की और जीवन में सपनों और रिश्तों के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया. गौर गोपाल दास ने कहा कि आज के दौर में सबसे बड़ी चुनौती सपनों और अपनों के बीच संतुलन बनाना है. उन्होंने बताया कि करीब 99 प्रतिशत लोग इस संतुलन को नहीं बना पाते. उन्होंने कहा कि लोग मौत को बेवजह बदनाम करते हैं, जबकि असली तकलीफ तो जिंदगी से होती है. जब इंसान मन का बोझ छोड़ने का फैसला करता है, तभी उसकी जिंदगी बदलनी शुरू होती है. गौर गोपाल दास ने कहा कि परफेक्शन की तलाश में खुद पर बेवजह का बोझ ना डाले, क्योंकि जिंदगी स्वाभाविक रूप से अधूरी ही होती है. उन्होंने समाज से अपील की कि युवाओं की उलझनों, अधूरे सपनों और मानसिक संघर्षों को समझे. उन्होंने कहा कि हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम अपनी बात किसी को बताते नहीं और लोग पूछते भी नहीं. उन्होंने कहा कि जब तक हम बोलेंगे नहीं, कोई नहीं समझ पाएगा कि हम किस दौर से गुजर रहे हैं. उन्होंने कहा कि हमारी जिंदगी के ज्यादातर रिश्तों की शुरुआत परिवार से होती है. प्यार, गुस्सा, माफी, पैसे संभालना और नजरअंदाज करना-ये सब आदतें परिवार से मिलती हैं. ये अनुभव हमें रेड फ्लैग और ग्रीन फ्लैग पहचानना सिखाते हैं. हम इतिहास नहीं जानते तो भविष्य को भी नहीं समझ सकते- सुधा मूर्ति वहीं, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में प्रसिद्ध लेखिका और समाजसेवी सुधा मूर्ति ने अपनी किताब के जरिए भारत-पाक विभाजन की पीड़ा, इतिहास की समझ और बच्चों में संघर्ष क्षमता विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया। सत्र की शुरुआत में मंदिरा नायर ने सुधा मूर्ति से पूछा कि उन्होंने यह किताब अपनी पोती के लिए क्यों लिखी और इसके केंद्र में भारत-पाकिस्तान विभाजन को ही क्यों रखा ? इस पर सुधा मूर्ति ने बेहद सहज और आत्मीय अंदाज में बताया कि उन्होंने ये किताब अपनी ग्रैंडडॉटर नॉनी के लिए लिखी है, जो लंदन में रहती है. वे चाहती थीं कि उनकी पोती अपनी जड़ों, अपने पूर्वजों के संघर्ष और उस भूमि के इतिहास को समझे, जहां से उसका परिवार आया है. उन्होंने कहा कि उनकी बेटी की शादी ऋषि सुनक से हुई है और उनके दादा-दादी लाहौर और एबटाबाद से थे. विभाजन के समय वे सब कुछ छोड़कर पहले नैरोबी, फिर दार-एस-सलाम और अंतत, लंदन पहुंचे. उन्होंने दो बार अपना घर खोया. सुधा मूर्ति ने कहा कि आज की पीढ़ी स्वतंत्रता और जमीन को सहज मान लेती है, लेकिन इसके पीछे पीढ़ियों का संघर्ष छिपा है. बच्चों को उपदेश देकर नहीं, बल्कि कहानियों के माध्यम से इतिहास समझाया जा सकता है, इसलिए उन्होंने इस कथा को दादी और पोती के संवाद का रूप दिया. सुधा मूर्ति ने कहा कि यह उनकी सीरीज की तीसरी किताब है. पहली किताब में उन्होंने भारत के खोए हुए मंदिरों और उनकी वास्तुकला पर लिखा, दूसरी में नदियों के महत्व को दर्शाया और तीसरी किताब में विभाजन को केंद्र में रखा. उन्होंने कहा, अगर हम इतिहास नहीं जानते, तो भविष्य को भी नहीं समझ सकते. इतिहास और भविष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. इस कहानी के लिए उन्होंने व्यापक शोध किया-अमृतसर, उज्जैन, दिल्ली, लंदन के संग्रहालयों का दौरा भी किया.