लंबित मामलों से चरमरा रही अदालतें, राजस्थान में 25.56 लाख केस पेंडिंग

4 Feb 2026

सांसद मदन राठौड़ के सवाल पर सरकार ने दिये आंकड़े, जयपुर मेट्रो कोर्ट में कुल 6.67 मामले पेंडिंग, हर 10 केस में से 8 क्रिमिनल केस, ट्रायल में देरी पर हाईकोर्ट ने दी आरोपी को जमानत

प्रदेश में न्यायपालिका मुकदमों की पेंडेसी से जूझ रही है. प्रदेश की अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है. प्रदेश के जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में 25.56 लाख से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें 20.47 लाख आपराधिक और 5.08 लाख सिविल मामले शामिल है. खासतौर पर जयपुर मेट्रो कोर्ट लंबित मुकदमों के भारी बोझ में दबा हुआ है. केन्द्र सरकार ने राज्यसभा में भाजपा के सांसद मदन राठौड़ के सवाल के जवाब में ये जानकारी दी. है. जनवरी 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, कुल लंबित मामलों में 20.47 लाख आपराधिक और 5.08 लाख सिविल मामले हैं.

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अदालतों में लंबित मामलों के आंकड़ों के मुताबिक हर 10 में से 8 मामले आपराधिक केस के है. अदालतों में लंबित मुकदमों के भारी बोझ के चलते मामलों की जांच और ट्रायल भी प्रभावित हो रहा है. जयपुर मेट्रो कोर्ट सबसे ज्यादा लंबित मुकदमो के बोझ से चरमरा रहे हैं. जयपुर मेट्रो- I में 3.58 लाख और मेट्रो-II में 3.09 लाख मामले लंबित हैं. दोनों मेट्रो न्यायालयों में कुल 6.67 लाख मामले लंबित हैं, जो प्रदेश में लंबित कुल मामले का एक चौथाई से भी अधिक हैं. अलवर में 1.32 लाख, जोधपुर मेट्रो में 1.15 लाख, उदयपुर में 1.14 लाख और कोटा में 1.02 लाख मामले लंबित हैं. भीलवाड़ा में भी 80,000 से अधिक मामले लंबित हैं. अधिकांश जिलों में आपराधिक मामले कुल लंबित मामलों का लगभग तीन-चौथाई हैं. हालांकि छोटे जिलों जैसे सालूम्बर, फलोदी, बालोतरा और जैसलमेर में लंबित मुकदमों की संख्या कम है. लेकिन वहां भी आपराधिक मामले सिविल मामलों से कहीं अधिक हैं.

एक तरफ बढ़ते लंबित मामले और दूसरी तरफ अदालतों में खाली पड़े पदों के चलते लंबित मामलों की संख्या और भी बढ़ती जा रही है. केंद्र सरकार ने राज्यसभा में अपने जवाब में बताया कि जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में न्यायिक पदों की नियुक्ति संबंधित उच्च न्यायालय और राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट के 2007 के आदेश के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राज्यों और उच्च न्यायालयों को समय सीमा का पालन करना होगा

ट्रायल में देरी सजा से पहले सजा- हाईकोर्ट

लंबित मामलों के चलते ट्रायल में देरी का ऐसा ही मामला हाईकोर्ट में जयपुर पीठ में पहुंचा. राजस्थान हाईकोर्ट ने बिना सजा के आरोपी को 6 साल से ज्यादा समय तक जेल में रखने पर हैरानी और नाराजगी जताई. कोर्ट ने इसे स्वतंत्रता के अधिकार का घोर उल्लंघन बताया है. जस्टिस अनिल कुमार उपमन की अदालत ने संजीवनी क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसायटी के तत्कालीन चेयरमैन शैतान सिंह को जमानत देते हुए यह टिप्पणी की. आरोपी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव सुराणा ने बहस करते हुए कहा कि आरोपी के खिलाफ जिन धाराओं में चार्जशीट पेश की गई, उसमें अधिकतम 7 साल की सजा का प्रावधान है और आरोपी पिछले 6 साल से भी ज्यादा समय से जेल में है. मामले में अभी तक चार्ज भी फ्रेम नहीं हुए हैं.

दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद अदालत ने इस मामले को न्यायिक प्रक्रिया की विफलता बताते हुए गंभीर चिंता जताई. कोर्ट ने कहा- किसी भी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक कि उसका अपराध साबित ना हो जाए. ऐसे में उसे सालों तक जेल में बंद रखना सजा देने के समान है और संविधान की मूल भावना के विपरीत है. हाईकोर्ट ने ट्रायल में देरी के आधार पर आरोपी की जमानत अर्जी मंजूर की है. हाईकोर्ट ने कहा- सजा से पहले सजा न्याय नहीं है. आरोपी बिना ट्रायल के ही 6 साल से जेल में है.