राजस्थान: अजमेर में कई खेमों में बंटी कांग्रेस झुंझुनवाला के लिए बड़ी चुनौती

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अजमेर लोकसभा सीट के लिए भाजपा के भागीरथ चौधरी और कांग्रेस के रिजू झुंझुनवाला के बीच चुनावी दंगल तय हो गया है. उद्योगपति झुंझुनवाला के लिए राजनीति का क्षेत्र बिल्कुल नया है. टिकट की घोषणा के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने जयपुर में रिजू झुंझुनवाला का परिचय अजमेर जिले के कांग्रेसी नेताओं से कराया और उसके साथ ही कांग्रेस उम्मीदवार की चुनावी प्रचार की रेलगाड़ी पटरी पर गति पकड़ने लगी. अजमेर आते ही झुंझुनवाला सबसे पहले पुष्कर गए और बाद में दरगाह पर हाजिरी दी. इस दौरान कांग्रेस के सभी प्रमुख नेता उनके साथ नजर आए.

झुंझुनवाला के अजमेर आने से पहले ही कई प्रोफशनल टीमों ने अजमेर पहुंचकर सोशल साइट सहित अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से उनके चुनावी प्रचार के काम का शुरू कर दिया. इन सबके बीच अजमेर जिले में कई खेमों में बंटी कांग्रेस झुंझुनवाला के लिए खासी समस्या साबित हो रही है. चूंकि झुंझुनवाला राजनीति में नए चावल हैं इसलिए उनके साथ कोई विवाद या नेताओं का पूर्वाग्रह नहीं जुड़ा हुआ है लेकिन जिले के नेताओं के बीच खींचतान और वर्चस्व को लेकर विवाद जगजाहिर है. इतना ही नहीं, झुंझुनवाला के लिए कांग्रेस आलाकमान से भी कमजोर प्रत्याशी होने की शिकायत कर उम्मीदवार बदलने का प्रस्ताव रखा है.

उल्लेखनीय है कि नेताओं की गुटबाजी के चलते पिछले लोकसभा के उपचुनाव में अजमेर सीट पार्टी के खाते में आने के बावजूद, कुछ महीनों बाद हुए विधासभा चुनावों में जिले की आठ में से कांग्रेस को केवल दो सीटों से संतोष करना पड़ा था. इन स्थितियों से निबटने के लिए झुंझुनवाला के चुनाव की कमान पूर्व मंत्री बीना काक ने खुद संभाल रखी है. पूर्व मंत्री बीना काक झुंझुनवाला की करीबी रिश्तेदार हैं. टिकट की घोषणा के तुरंत बाद से काक ने अजमेर में डेरा डाल लिया. बीनाकाक जिले के सभी कांग्रेस नेताओं से अलग-अलग मुलाकात कर उनके क्षेत्रों की राजनीतिक स्थितियों को समझने में जुटी हुई हैं. इसके साथ जिले के प्रभारी मंत्री प्रमोद जैन भाया और मंत्री रघु शर्मा भी लगातार जिले के नेताओं से संपर्क में हैं.

जिले के मतदाताओं की जातिगत स्थिति पर नजर डालें तो जिले में सर्वाधिक मतदाता जाट समुदाय से हैं. इसके बाद राजपूत और रावणा राजपूत, मुस्लिम, ब्राह्मण सहित अन्य जातियां हैं. बीजेपी ने लगातार तीसरी बार जाट उम्मीदवार को मैदान में उतारा है. इससे पहले भाजपा ने 2014 में कांग्रेस के सचिन पायलट के सामने जाट नेता सांवरलाल जाट को चुनावी मैदान में उतारा था, जिन्होंने पायलट को बड़े वोट अंतर से पटखनी दी थी. कार्यकाल के दौरान सांवरलाल के निधन और उसके बाद हुए उपचुनावों में बीजेपी ने सांवरलाल के पुत्र रामस्वरूप लांबा को चुनावी मैदान में उतारा. हालांकि कांग्रेस प्रत्याशी रघु शर्मा के सामने लांबा को हार का सामना करना पड़ा था.

लेकिन लोकसभा की तब और अब की राजनीतिक स्थिति बिलकुल ही अलग है. उस समय तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की नीतियों के खिलाफ लोगों ने मतदान किया और बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक माने जाने वाला राजपूत और ब्राह्मण अलग-अलग कारणों से छिटक गए. परंपरागत जनाधार सरकने का खामियाजा बीजेपी को उठाना पड़ और रघु शर्मा ने जिले की आठ विधानसभा सीटों पर बढ़त हासिल कर भाजपा से अजमेर लोकसभा सीट छीन ली.

इस बार लोकसभा चुनाव में एक बार फिर नए सिरे से राजनीतिक समीकरण बनने शुरू हो गए हैं. कांग्रेस प्रत्याशी रिजु झुंझुनवाला वैश्य समाज से है. वैश्य समाज भाजपा का परंपरागत वोट बैंक है. ऐसे में कांग्रेस के रणनीतिकार झुंझुनवाला के नाम पर वैश्य समाज में सेंध लगाने के काम में जुट गए है. कांग्रेस नेता मुस्लिम, एससी-एसटी वर्ग सहित पिछले चुनाव में कांग्रेस का साथ देने वाले राजपूत और ब्राह्मण समाज को भी साध रहे हैं.

आडवाणी पर मेहरबानी की तैयारी, भोपाल से बेटी प्रतिभा को टिकट देने पर चर्चा

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बीजेपी मध्य प्रदेश की भोपाल सीट पर पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की बेटी प्रतिभा आडवाणी को चुनाव मैदान में उतारने जा रही है. इसके पीछे उसका मक़सद एक तीर से दो निशाना साधना है. पहला, पार्टी के भीष्म पितामह लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी दूर कर उनका व विरोधियों का मुंह बंद करना और दूसरा, भोपाल जैसी अपनी मजबूत परम्परागत सीट को बचाना जहां से इस बार कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह पूरे दमखम के साथ चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं.

गौरतलब है कि बीजेपी ने इस बार गुजरात के गांधीनगर से लालकृष्ण आडवाणी का टिकट काट दिया है. उनकी जगह इस सीट से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबसे खास सिपहसालार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह चुनाव लड़ रहे हैं. जिस तरह मोदी-शाह की जोड़ी द्वारा आडवाणी की इच्छा को एक तरह से नज़रअंदाज़ करते हुए उनका टिकट काटा गया, कहा जा रहा था कि इसे उन्होंने अपना अपमान माना. पार्टी के इस निर्णय से आडवाणी के ख़फ़ा होने की बातें कही जा रही थीं.

इसका संकेत पार्टी के स्थापना दिवस से ठीक दो दिन पहले आडवाणी के लिखे उस ब्लॉग से भी मिला, जिसमें उन्होंने परोक्ष रूप से मोदी-शाह की जोड़ी को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि भारतीय लोकतंत्र का सार अभिव्यक्ति का सम्मान और इसकी विभिन्नता है. अपनी स्थापना के बाद से ही बीजेपी ने कभी उन्हें ‘शत्रु’ नहीं माना जो राजनीतिक रूप से उसके विचारों से असहमत हो, बल्कि उन्हें अपना सलाहकार माना है. इसी तरह, भारतीय राष्ट्रवाद की बीजेपी की अवधारणा में पार्टी ने कभी भी उन्हें ‘राष्ट्र विरोधी’ नहीं कहा, जो राजनीतिक रूप से उससे असहमत थे.

आडवाणी ने अपने ब्लॉग में यह भी लिखा कि पार्टी निजी और राजनीतिक स्तर पर प्रत्येक नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर प्रतिबद्ध है, इसलिए बीजेपी हमेशा मीडिया समेत सभी लोकतांत्रिक संस्थानों की आज़ादी, अखंडता, निष्पक्षता और मजबूती की मांग करने में सबसे आगे रही है. जाहिर है उनका इशारा मौजूदा दौर में पार्टी की कार्यशैली और मोदी-शाह की जोड़ी के कार्य करने के तरीकों की ओर था. कहा जा रहा था कि आने वाले दिनों में आडवाणी बीजेपी की वर्तमान नीतियों के बहाने मोदी-शाह के ख़िलाफ़ अपनी भड़ास और निकालेंगे. उनके आगे और आक्रामक होने का अंदेशा था. यूं ही नहीं उन्होंने पांच साल से ठप पड़े अपने ब्लॉग को तरोताज़ा किया था.

मीडिया और सोशल मीडिया ने तो इसे हाथों-हाथ लिया ही, विपक्ष भी इसी बहाने बीजेपी पर हमलावर हो रहा था. बीजेपी के असंतुष्ट नेताओं की आडवाणी के घर आवाजाही भी अचानक बढ़ गयी थी, जिसके बाद कई तरह के कयास लगने लगे थे. संभव था कि आगे कोई बड़ी ख़बर आ सकती थी. यह नि:संदेह बीजेपी के लिए मुसीबत का सबब बन सकता था. लिहाजा, तत्काल डैमेज कंट्रोल की एक्सरसाइज शुरू की गयी. प्रतिभा आडवाणी को भोपाल से टिकट दिए जाने की चर्चा इसी ‘आपदा प्रबंधन’ की दिशा में उठा कदम समझा जा रहा है.

सूत्र बताते हैं कि आडवाणी का टिकट काटे जाने के बाद से ही हालांकि मध्य प्रदेश के कुछ स्थानीय नेताओं द्वारा भोपाल सीट के लिए प्रतिभा आडवाणी का नाम आगे किया जा रहा था, लेकिन पार्टी ने तब इस पर कोई खास तवज्जो नहीं दी. अब बदली परिस्थितियों में इस पर गहन विचार किया जा रहा है. संभव है कि जल्द इसकी घोषणा हो जाए. वैसे भी मध्य प्रदेश की कई सीटों पर बीजेपी ने अभी तक अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की है. इंदौर सीट पर उम्मीदवार की घोषणा में हो रही देरी के कारण नाराज सुमित्रा महाजन ने चुनाव लड़ने से इनकार भी कर दिया है. यह मामला तूल भी पकड़ रहा है. लिहाजा बीजेपी भी अब जल्द से जल्द अपने सभी उम्मीदवारों का ऐलान करना चाह रही है.

भोपाल सीट तो वैसे भी उसके लिए काफी महत्वपूर्ण है, जो पिछले दो दशक से ज्यादा समय से उसकी झोली में ही जाती रही है. इसे ‘हिंदुत्व’ राजनीति के प्रभाव वाली सीट के तौर पर भी निरूपित किया जाता है. इस बार कांग्रेस ने अपने दिग्गज और बकौल बीजेपी मुस्लिमपरस्त नेता दिग्विजय सिंह को यहां से मैदान में उतारकर लड़ाई को रोचक बना दिया है. जिस मजबूत रणनीति और तैयारी के साथ दिग्गी राजा चुनाव मैदान में पसीना बहा रहे हैं, उससे इस सीट पर बीजेपी की जीत को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं. यही वजह है कि उम्मीदवार तय करने में बीजेपी को इतनी देरी हो रही है.

पहले मौजूदा विधायक आलोक संजर का नाम उछला, फिर संगठन सचिव वीडी शर्मा को उम्मीदवार बनाये जाने की बातें उठीं, भोपाल के मेयर आलोक शर्मा दौड़ में आये और अंतत: एक समय ऐसा लगा कि मालेगांव धमाके की आरोपी साध्वी प्रज्ञा भारती ही दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ बीजेपी की उम्मीदवार होंगी. लेकिन पार्टी ने उन पर भी दांव लगाना खतरे से खाली नहीं समझा. आरएसएस की राय थी कि उमा भारती को ही यहां से खड़ा कर दिया जाए, लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया. शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर जैसों को लेकर भी चर्चाएं चलीं. अब इस क्रम में प्रतिभा आडवाणी का नाम मजबूती के साथ सियासी गलियारे में तैर रहा है.

कहा जा रहा है कि प्रतिभा आडवाणी की उम्मीदवारी के पक्ष में स्थानीय नेताओं ने तर्क दिया है कि अव्वल तो यह सीट हिंदू वोटों के एकमुश्त प्रभाव वाली है, दूजे यहां डेढ़ लाख से ज्यादा सिंधी मतदाता हैं. स्वाभाविक है कि दिग्विजय सिंह अगर 3.5 लाख मुस्लिम वोटों के अलावा हिंदू वोटों में सेंध लगाने का प्रयास करेंगे तो कम से कम सिंधी मतदाताओं में तो प्रतिभा आडवाणी के कारण कोई घुसपैठ नहीं हो पायेगी.

बीजेपी आलाकमान भी नहीं चाहता कि उसके लिए प्रतिष्ठा वाली रही यह सीट हाथ से निकले. और वह भी दिग्विजय सिंह से मात खाकर, जिन्हें वह हमेशा जोरदार तरीके से मुस्लिमों को तुष्ट करने वाले नेता बतौर निरूपित करती रही है. यही वजह है कि प्रतिभा आडवाणी को यहां से खड़ा कर बीजेपी एक तीर से दो निशाने साधने की कवायद करती जान पड़ रही है. वैसे पिछले आम चुनाव में भी मध्य प्रदेश ईकाई द्वारा लालकृष्ण आडवाणी को भोपाल सीट से उम्मीदवार घोषित करने की मांग की गयी थी. तब पार्टी आलाकमान ने भी यह प्रस्ताव आडवाणी के पास रखा था, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए इससे इनकार कर दिया था कि वह गांधीनगर सीट से ही लड़ना पसंद करेंगे.

अब बदले हालात में मध्य प्रदेश के नेताओं ने फिर से आडवाणी परिवार के लिए इस सीट की पेशकश की है, जिस पर आलाकमान भी गंभीर है. उसे इसमें अपने लिए फायदा दिख रहा है. हालांकि खुले तौर पर इसकी पुष्टि करने से पार्टी नेता अभी कतरा रहे हैं. बीजेपी के एक नेता ने अनौपचारिक बातचीत में यह स्वीकार किया कि इस मसले पर गंभीर विचार हो रहा है. उनका कहना था कि इस कदम से आडवाणी की नाराजगी भी दूर की जा सकती है और दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ एक अच्छा उम्मीदवार भी दिया जा सकता है ताकि भोपाल सीट पर पार्टी का कब्जा बरकरार रहे.

विदित है कि प्रतिभा आडवाणी एक बेहद सफल टीवी एंकर और डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता होने के साथ-साथ अपने पिता लालकृष्ण आडवाणी के साथ उनकी राजनीतिक गतिविधियां में भी सक्रिय रही हैं. 2009 में जब एनडीए ने आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया था, तक प्रतिभा ने भी अपने पिता के लिए खूब पसीना बहाया था. अपने पिता के सियासी सफर में वे एक सारथी की भूमिका में रही हैं. अब 51 वर्षीया प्रतिभा आडवाणी के स्वयं सियासत की पगडंडियों पर उतरने  की तैयारी है.

आखिरकार ‘हाथ’ और ‘झाडू’ में बनी बात, किसी भी वक्त गठबंधन का एलान संभव

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ख़बर है कि लोकसभा चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस के बीच समझौता हो गया है. समझौते के तहत फिलहाल दिल्ली और हरियाणा में दोनों पार्टियां गठबंधन के साथ चुनाव मैदान में उतरने पर तैयार हो गयी हैं. वहीं, पंजाब को लेकर सहमति बनी है कि फैसला बाद में किया जाएगा. गठबंधन का जो फॉर्मूला तय हुआ है, उसके अनुसार दिल्ली में ‘आप’ 4 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जबकि कांग्रेस 3 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. बदले में हरियाणा में कांग्रेस ‘आप’ को गुड़गांव या करनाल में से कोई एक सीट देगी.

गौरतलब है कि दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन को लेकर लंबे समय से कयास लगाये जा रहे थे, लेकिन बात नहीं बन पा रही थी. हालांकि गठबंधन को लेकर ‘आप’ पूरा मन बना चुकी थी और गंभीरता से इसका प्रयास भी कर रही थी, मगर इस मुद्दे पर कांग्रेस के नेता दो गुटों में बंटे थे. पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शीला दीक्षित का खेमा ‘आप’ से किसी भी कीमत पर गठबंधन का विरोध कर रहा था जबकि पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन का गुट गठबंधन की वकालत कर रहा था.

प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको भी गठबंधन के पक्ष में थे. उन्होंने तो बाकायदा पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं के बीच एक सर्वे कराकर इसकी आधारभूमि तैयार की थी. गठबंधन की वकालत करने वाले नेताओं का कहना था कि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो इसका फायदा भाजपा को होगा और वह दिल्ली की सभी सातों लोकसभा सीटें जीत लेगी. वहीं, गठबंधन का विरोध कर रहे नेताओं की राय थी कि यह कांग्रेस के लिए आत्मघाती कदम साबित हो सकता है, क्योंकि एक ऐसे वक्त में जब पार्टी नए सिरे से दोबारा खड़ी होती दिख रही है और उसका खोया मतदाता दोबारा उसकी ओर आ रहा है, तब गठबंधन से न केवल उसका मनोबल गिरेगा बल्कि उसका बढ़ता आधार भी खिसक सकता है.

इस गुट का साफ मानना था कि लोकसभा में तो कांग्रेस को गठबंधन का विशेष फायदा नहीं ही होगा, उल्टे विधानसभा चुनावों में भी उसे इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा. इनका स्पष्ट मानना था कि ‘आप’ के उभार के पीछे कांग्रेस के वोटों का उसकी ओर पलायन कारण रहा, जो अब बदले हालात में दोबारा पार्टी के पास लौट रहा है. ऊपर से जिस प्रकार दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दिल्ली के साथ-साथ हरियाणा, पंजाब, गोवा व दूसरे राज्यों में भी गठबंधन की शर्त रख रहे थे, उससे भी गठबंधन की संभावना में रुकावटें आ रही थीं. लेकिन जैसे-जैसे इसके तय होने में समय बीतता गया, उससे ‘आप’ को अपने लिए खतरा भी बढ़ता नज़र आने लगा. कारण, पार्टी के आंतरिक सर्वे में भी यही बात खुलकर आयी कि अगर उसने कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं किया तो आगे भी उसकी राह कांटों भरी हो सकती है.

दूसरे सूबों में अपना दायरा बढ़ाने की उसकी हसरत तो चकनाचूर होगी ही, विधानसभा चुनाव के बाद दिल्ली की सत्ता से भी वह विदा हो जाएगी. पंजाब विधानसभा चुनाव में अनपेक्षित नतीजों से भी ‘आप’ सशंकित थी. उन्हीं नतीजों का परिणाम है कि मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह भी ‘आप’ के साथ गठबंधन के विरोध में दिख रहे थे. यही वजह है कि केजरीवाल ने भी मौके की नज़ाकत को भांपते हुए अपना रुख नरम किया और सीधे राहुल गांधी पर ही गठबंधन के लिए दबाव बनाने की रणनीति पर उतर आए. इसका असर भी हुआ और अंतत: नए सिरे से दोनों पार्टियों में गठबंधन को लेकर चर्चा शुरू हुई. राहुल की गंभीरता के आगे शीला दीक्षित खेमा भी नरम हुआ और यह कहने लगा कि आलाकमान जो फैसला करेगा, हम मानेंगे.

बहरहाल, दोनों पार्टियों के बीच समझौता हो गया है और जल्द ही इसकी औपचारिक घोषणा की जा सकती है. वैसे दिल्ली में गठबंधन का मामला सीटों को लेकर भी अटक रहा था, क्योंकि ‘आप’ ने सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए थे. इनमें तीन उम्मीदवारों- पूर्वी दिल्ली से आतिशी, उत्तर-पूर्वी दिल्ली से दिलीप पांडेय और नई दिल्ली से राघव चड्डा की सीटों को वह किसी भी हालत में छोड़ने को तैयार नहीं थी. कारण, ये केजरीवाल के बेहद करीबी लोगों में शामिल हैं.

वहीं, कांग्रेस की भी नज़र इन सीटों पर थी. खासकर अजय माकन चुनाव लड़ने की स्थिति में नई दिल्ली सीट को ही अपने लिए मुफीद मान रहे थे. ऐसे में उनका इरादा भी यह सीट लिये बगैर गठबंधन पर आखिरी मुहर लगवाने का नहीं था. बहरहाल, ‘आप’ ने कांग्रेस की नई दिल्ली सीट को लेकर अपनी बात मान ली है, लेकिन बाकी दो सीटों कांग्रेस को मना लिया है. अब ‘आप’ पश्चिमी दिल्ली, उत्तर-पूर्वी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली और उत्तरी दिल्ली से मैदान में उतरेगी. कांग्रेस के हिस्से में चांदनी चौक, उत्तर-पश्चिमी दिल्ली और नई दिल्ली सीटें आयी हैं.

वैसे कांग्रेस और ‘आप’ के नेता अभी भी सार्वजनिक रूप से गठबंधन की पुष्टि नहीं कर रहे हैं, लेकिन तय है कि एकाध दिनों में इसका ऐलान हो जाएगा. ‘आप’ ने अपनी पसंदीदा सीटें कांग्रेस को देने का फैसला कैसे कर लिया और अब केजरीवाल के तीनों करीबी नेताओं का क्या होगा? वे चुनाव लड़ेंगे, तो कहां से या उन्हें अब चुनाव नहीं लड़ाया जाएगा? ऐसे सवाल ज़रूर अचानक सियासी गलियारों में तैरने लगे हैं. राजनीति की समझ रखने वालों का कहना है कि केजरीवाल ने अपना नफा-नुकसान देख कर ही यह कदम उठाया है.

दरअसल, दिल्ली के अलावा देश का ऐसा कोई राज्य नहीं है जहां आम आदमी पार्टी अपने ठोस जनाधार का दावा कर सकती है. हालांकि उसने कई राज्यों में पूरी कोशिश की, मगर आज की तारीख में उसकी सारी कोशिशें बेनतीजा नज़र आती हैं. गोवा से वह बैरंग वापस लौट चुकी है. पंजाब में भी वह विधानसभा चुनावों के बाद पिछड़ चुकी है. इसके बावजूद कि इससे पहले हुए लोकसभा चुनाव में उसने सूबे की कुल 13 सीटों में 4 सीटें हासिल की थीं. इस पिछड़ने को वह गठबंधन से भरपाई करना चाहती है ताकि मिलकर बीजेपी को हराया जा सके.

गठबंधन के जरिये आम आदमी पार्टी हरियाणा में भी घुसने की कोशिश कर रही है. बीते दिनों जींद विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में इसी के मद्देनज़र उसने जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के उम्मीदवार दिग्विजय सिंह चौटाला का समर्थन किया था. अब हरियाणा में कांग्रेस और जेजेपी से गठबंधन के साथ वह अपनी संभावनाएं जगाना चाह रही है. वहीं पंजाब को लेकर भी कांग्रेस ने उसे भरोसा दिलाया है कि बाद में इस पर बात होगी. देखना शेष है कि पंजाब में अमरिंदर इसके लिए तैयार होते हैं या नहीं? और यह भी कि गठबंधन के बाद ‘आप’ और कांग्रेस का चुनावों में कैसा प्रदर्शन रहता है?

राजस्थान की इस सीट पर कोई जीते-हारे, सांसद तो ‘भाई’ ही बनेगा

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लोकसभा चुनावों को लेकर देशभर में इन दिनों सियासी कवायदों एवं दांवपैचों का दौर पूरे शबाब पर है. हर कोई शह और मात के इस खेल में येन-केन-प्रकारेण अपने प्रतिद्वंदी को पटखनी देने के लगा है. बात जब राजनीति की हो तो यहां न कोई रिश्ता हावी होता है और न कोई दोस्ती. इससे इतर भाई-भतीजावाद भी राजनीति में नया नहीं है. रिश्तों के साथ साथ राजनीतिक रोटियां सेकने में भी हर कोई आगे रहता आया है.

काफी हद तक ऐसा होना लाजमी भी है, क्योंकि जब दो रिश्तेदार एक दूसरे के खिलाफ या फिर अप्रत्यक्ष रूप से साथ मिलकर चुनाव लड़े तो निश्चित रूप से जीत तो तय ही है, भले ही दोनों में से किसी की भी हो. ऐसा ही नजारा आजकल राजस्थान के बीकानेर लोकसभा क्षेत्र में इन दिनों एक ही नारा चल रहा है ‘हारे-जीते कोई, सांसद बनेगा भाई.’ ऐसा इसलिए क्योंकि बीकानेर सीट से कांग्रेस और भाजपा दोनों से ही टिकट पाने वाले प्रत्याशी रिश्ते में मौसेरे भाई लगते हैं. हालांकि यह बात अलग है कि दोनों भाईयों को अपनी ही पार्टी के खेवनहारों से डर लग रहा है.

क्षेत्र में जहां जीत की हैट्रिक बनाने की तैयारी में जुटे बीजेपी उम्मीदवार और केंद्रीय राज्य मंत्री अर्जुनराम मेघवाल को पार्टी छोड़ चुके कद्दावर नेता देवी सिंह भाटी के आक्रामक विरोध का सामना करना पड़ रहा है, वहीं कांग्रेस उम्मीदवार मदन मेघवाल के लिए भी मुश्किलें कम नहीं हैं. बीजेपी सरकार में मंत्री रहे देवीसिंह भाटी ने विधानसभा चुनाव में पुत्रवधु की हार का हिसाब चुकता करने के लिए खुलेआम अर्जुनराम का विरोध शुरू कर दिया है. देवी सिंह भाटी ने अपनी चार दशक की राजनीति में कई पार्टियां बदलीं, लेकिन हर हाल में कांग्रेस का विरोध किया. इस बार अर्जुनराम को हराने के लिए वह कोई भी हथकंडा अपनाने को तैयार हैं.

देवी सिंह भाटी ने मेघवाल को हराने के लिए यहां तक कह दिया कि चाहे कांग्रेस को वोट दे दो, लेकिन अर्जुनराम को हराओ. यह कड़वाहट इसलिए भी है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में मेघवाल ने श्रीकोलायत में दलित मतों का ध्रुवीकरण कर उन्हें देवी सिंह भाटी के खिलाफ कर दिया था. अब इन आरोप में कितनी सच्चाई है, यह तो नहीं पता लेकिन भाटी उन्हीं बूथ पर पीछे रहे, जहां दलित मतों का बोलबाला है. यही वजह रही कि दोनों के बीच कड़वाहट ने जन्म ले लिया. पिछले दिनों अर्जुनराम को टिकट मिलने का संकेत मिलते ही भाटी ने बीजेपी से त्यागपत्र दे दिया था. अब भाटी समर्थक सड़कों पर उतर चुके हैं और हर हाल में अर्जुनराम को हराने की रणनीति बना रहे हैं.

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बीजेपी उम्मीदवार अर्जुनराम मेघवाल का विरोध करते पार्टी कार्यकर्ता

बीकानेर में आजकल जगह-जगह अर्जुनराम मेघवाल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. हाल ही में शहर के हृदयस्थल कोटगेट पर अर्जुनराम का पुतला जलाया गया. गौरतलब है कि विरोध करने वालों के हाथ में भाजपा का झंडा और पैरों में अर्जुनराम का पुतला था. यानी स्थिति ‘मोदी से बैर नहीं, अर्जुनराम की खैर नहीं’ जैसी हो चली है. हालांकि अर्जुनराम का मानना है कि इस विरोध का चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

अब बात करें मदन मेघवाल की जो सेवानिवृति के बाद कांग्रेस टिकट पर अर्जुनराम के सामने ताल ठोकने के लिए तैयार हैं. उनका भी कई जगह विरोध हो रहा है. इस मामले में कांग्रेसी विधायक गोविंद मेघवाल के समर्थक सबसे आगे हैं. उनके अनुसार, कांग्रेस प्रत्याशी जीत की स्थिति में नहीं है. वहीं जिला परिषद की उप जिला प्रमुख इंदू देवी तर्ड का पत्र भी चर्चा में है, जिसमें रायसिंहनगर में हुए किसान आंदोलन के दौरान तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मदन मेघवाल पर लगे आरोपों का जिक्र है.

राजस्थान में हो रहे इस राजनीतिक तमाशे को राजनीति के जानकार कौतुहल से देख रहे हैं. गौर करने वाली बात यह भी है कि एक तरफ जहां अर्जुनराम का विरोध नजर आ रहा है, वहीं दूसरी तरफ मोदी के प्रति भक्ति में कोई खास कमी नहीं आई है. यही कारण है कि अब अर्जुनराम मोदी के नाम पर जीत की उम्मीद लगाकर बैठे हैं. वे दस साल से बीकानेर से सांसद हैं. पांच साल विपक्ष और पांच साल सरकार में मंत्री रह चुके मेघवाल बीकानेर में अपनी ओर से करवाए गए कार्यों को लंबी सूची बताते हैं.

अर्जुनराम बीकानेर को हवाई सेवा देने के साथ ही राजमार्गों के विस्तार का जिक्र चुनाव प्रचार के दौरान कर रहे हैं. इसके बावजूद ठीक एक साल पहले दो अप्रैल को दलितों के समर्थन में भारत बंद के दौरान हुई उत्पात का खामियाजा अर्जुनराम को भुगतना पड़ सकता है. सवर्ण जाति के झंडाबरदार यह आरोप लगाते हैं कि दो अप्रैल को बीकानेर में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना के सूत्रधार अर्जुनराम ही थे.

मदन मेघवाल के पास गिनाने के लिए कुछ नहीं है, इसलिए वे स्थानीय कांग्रेस नेताओं के हाथों की सिर्फ कठपुतली बने नजर आ रहे हैं. कांग्रेस के पास जीत का एकमात्र आधार ‘अर्जुनराम का विरोध है.’  मदन मेघवाल अपने भाषणों में इंदिरा गांधी नहर पानी में एक इंच की बढ़ोतरी नहीं होने का जिक्र जरूर कर रहे हैं. बहरहाल, ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प हो चला है कि चुनावी रण में कौनसा ‘भाई’ बाजी मारता है और कौनसा जनता के हाथों हार का सामना करता है.