स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की जीवनी | Swami Avimukteshwaranand Biography in Hindi

26 Jan 2026

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की जीवनी (Swami Avimukteshwaranand Biography in Hindi)

Swami Avimukteshwaranand Latest News  - स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद उत्तराखंड स्थित जोशीमठ ज्योतिर्मठ के 46वें और वर्तमान शंकराचार्य हैं, जो आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित 4 अद्वैत मठों में से एक है. वे स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य थे और सितंबर, 2022 में उनकी मृत्यु के बाद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिर्मठ का शंकराचार्य बना दिया गया. उसके बाद, वे ज्योतिर्मठ में आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा निर्मित आश्रम में निवास करते हुए अपना आगे का जीवन बीता रहे है. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को प्रायः 'राजनीतिक बयान' देने के लिए भी जाना जाता है. अभी हाल ही में, मौनी अमावस्या को प्रयागराज के त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान करने देने से स्थानीय प्रशासन के द्वारा कथित तौर पर रोक लगाने पर वे नाराज है. हालांकि, प्रशासन का कहना है कि अविमुक्तेश्वरानंद अपने 200-300 अनुयायियों को लेकर संगम तट तक बढ़ रहे थे, जिससे भीड़ नियंत्रण की प्रणाली बिगड़ने की आशंका थी, इसी कारण उन्हें पालकी में बैठकर संगम तट तक जाने से रोका गया. इस लेख में हम आपको स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की जीवनी (Swami Avimukteshwaranand Biography in Hindi) के बारें में जानकारी देने वाले है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म और परिवार (Swami Avimukteshwaranand Birth & Family)

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म 15 अगस्त, 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के पट्टी तहसील के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था. उनका मूल नाम उमाशंकर उपाध्याय है. उनके पिता का नाम पंडित रामसुमेर था.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की शिक्षा (Swami Avimukteshwaranand Education)

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कक्षा छह तक गांव से पढाई की. आगे की पढाई उन्होंने गुजरात से की. बाद में, उन्होंने वाराणसी के सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और फिर आचार्य की शिक्षा प्राप्त की. वहाँ अध्ययन करते हुए अविमुक्तेश्वरानंद ने संस्कृत व्याकरण, वेदों, पुराणों, उपनिषदों, आयुर्वेद और अन्य धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का आरंभिक जीवन (Swami Avimukteshwaranand Early Life)

उत्तर प्रदेश के गांव में जन्मे अविमुक्तेश्वरानंद का आरंभिक जीवन सामान्य लोगो की तरह ही रहा है. सन्यास ग्रहण से पूर्व वे उमाशंकर उपाध्याय के नाम से जाने जाते थे. गांव की पढाई के बाद उनका जीवन गुजरात में बीता. उनके पिता जब गुजरात गए, तब उन्होंने अपने बेटे उमाशंकर को भी साथ ले गए, जहां उनकी मुलाकात काशी के रामचैतन्य से हुई, जो स्वामी करपात्री महाराज के शिष्य थे. पंडित रामसुमेर ने अपने पुत्र को वहीं छोड़ दिया. उमाशंकर ने उन्ही की प्रेरणा से संस्कृत का अध्ययन करना शुरू कर दिया और वैराग्य एवं ब्रह्मचर्य के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित हुए.

इससे पहले कॉलेज में पढाई करते हुए अविमुक्तेश्वरानंद (तब के उमाशंकर उपाध्याय) ने छात्र राजनीति में भी भाग लिया था और ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस)’ की छात्र इकाई ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी)’ के सदस्य बने. एबीवीपी के छात्र नेता रहते, उन्होंने वर्ष 1994 में छात्रसंघ का चुनाव भी जीता.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का धार्मिक गुरु के रूप में जीवन

स्वामी करपात्री जी महाराज जब अस्वस्थ हुए तब अविमुक्तेश्वरानंद, राम चैतन्य के साथ काशी आये, जहाँ उन्होंने अंतिम सांस तक स्वामी करपात्री जी की सेवा की. उन्ही दिनों अविमुक्तेश्वरानंद की मुलाकात पुरी के पीठाधीश्वर स्वामी निरंजन देव तीर्थ और शारदा द्वारकाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का दर्शन और सानिध्य प्राप्त हुआ. उन्होंने स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से दीक्षा ली और उनके शिष्य बन गये. इसी के बाद, 15 अप्रैल, 2003 को उन्होंने दंड सन्यास की दीक्षा ली और फिर ‘उमाशंकर उपाध्याय’ से ‘स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद’ बन गए. 11 सितंबर, 2022 को जब जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ब्रह्मलीन हो गए, तब उसी के बाद, 12 सितंबर 2022 को अपने गुरु स्वरूपानंद सरस्वती का पट्टाभिषेक या उपाधि प्राप्त हुई. 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद 'शंकराचार्य' के पद को लेकर उठे विवाद

सितंबर 2022 को शंकराचार्य की उपाधि प्राप्त करने के बाद से ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवादों में पड़ गए. अविमुक्तेश्वरानंद के स्वयं को शंकराचार्य कहलाने को लेकर 21 सितंबर 2022 में स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने इसे रोकने के लिए न्यायालय की शरण ली. इसके बाद, अक्टूबर, 2022 में सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें, जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस बी. वी. नागरत्ना शामिल थे, उसने सुनवाई करते हुए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को 'शंकराचार्य' वाली पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी. यह विवाद न्यायालय में अब भी लंबित है.

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का भारतीय जनता पार्टी से संबंध

हाल के वर्षो में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का भारतीय जनता पार्टी से अच्छा संबंध नहीं देखा गया है. भाजपा सरकारों की सार्वजनिक आलोचना और उनके मुखर रुख के कारण उन्हें भाजपा विरोधी करार दिया है. हालांकि, यह धारणा उनके अतीत को नजरअंदाज करती है. आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने से पहले, अविमुक्तेश्वरानंद न केवल आरएसएस के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े एक छात्र नेता थे बल्कि 2014 से पहले मोदी के कट्टर समर्थक भी थे. 2014 में, उन्होंने खुलकर प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी का समर्थन किया था. लेकिन बाद के वर्षो में उनके सुर भाजपा विरोधी वाले हो गए. यहाँ तक कि वे राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा में भी शमिल नहीं हुए. दरअसल, इसके पीछे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गौ भक्ति है. वे परम गौ भक्त है और उनका कहना है प्रधानमंत्री गौ माता की रक्षा में विफल रहे है. वे माँ गंगा को 'राष्ट्रीय नदी' घोषित करने की भी मांग कर चुके है. उनका मानना है कि कथित रूप से हिन्दुओ की सरकार होने के बाद भी हिन्दुओ के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया है और इसी कारण उनके बयान प्रायः भाजपा विरोधी रहे है.

हालांकि, व्यावहारिक रूप से ऐसा नहीं जान पड़ता है, अविमुक्तेश्वरानंद वैसे मुद्दों पर भी कई बार कांग्रेस का साथ देते देखे गए है जहाँ उसके कार्य हिन्दू धर्म विरोधी रहे है. इसके विपरीत धर्म के पक्ष में भाजपा के कार्य करने की उन्होंने आलोचना की है. जून, 2024 में भाजपा के द्वारा लोकसभा में जब विपक्ष के नेता राहुल गाँधी के उस बयान की निंदा की गई जिसमें, राहुल ने हिन्दुओ को हिंसक बताया था, तब भाजपा के साथ देने के बदले अविमुक्तेश्वरानंद ने खुलकर कांग्रेस नेता राहुल गाँधी का बचाव किया. इस तरह उनके पहले और वर्तमान के जीवन, विचार में बहुत अंतर देखा जा सकता है.  

इस लेख में हमने आपको स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की जीवनी (Swami Avimukteshwaranand Biography in Hindi) के बारे में जानकारी दी है. अगर आपका कोई सुझाव है तो हमें कमेंट करके जरूर बताएं.